निबड़ियाघाट का पीपे का पुल

गांवदेहात डायरी

निबड़िया घाट पीपा पुल निर्माण
निबड़ियाघाट का पीपे का पुल

सत्तर की उम्र में पैडल चला कर गया पचेवरा तक। जाने में 16 और आने में 9 किलोमीटर। मौसम ठीक था, फिर भी लगा कि पानी की बोतल साथ ले गया होता तो बेहतर होता।

मुझे आशा नहीं थी कि कुछ अलग देखने को मिलेगा। वही टूटी सड़क, वही ईंट-भट्ठे पर काम करते मजदूर, स्कूल जाते बच्चे और गगरांव में भैंसों को सानी देती, उपले पाथती महिलाएं। यही सब अपेक्षा थी और यही मिला भी।

अंतर पचेवरा में जाकर मिला। वहां बांस की तीन भुजाओं वाले ट्राइपॉड जैसे ढांचे पर बैठे कुछ लोग दिखे। उनसे पूछा तो बताया कि ये पॉन्टून पुल बनाने के काम में लगे हैं। उन्हीं से पता चला कि आज काम का आखिरी दिन है। पुल बनकर तैयार है। बीस तारीख को यातायात के लिये खुलेगा।

आगे जाकर देखा तो पीपे के पुल की झलक भी मिल गई। वहां तक जाने के लिये करार से ढलवां रास्ता भी बना दिया गया है।

घाट के पीपल के चबूतरे पर एक आदमी बैठा था। उससे पूछा—
“मेरी साइकिल उस पार चली जाएगी?”

उसने छोटा-सा उत्तर दिया—
“नहीं। मुझे भी अपनी साइकिल के साथ उस पार जाना है, पर अब मैं मिर्जापुर के गंगापुल से जाऊंगा—24 किलोमीटर साइकिल चला कर।”

इसी बीच एक सज्जन गंगा नहा कर लौट रहे थे। चबूतरे पर सुस्ताने बैठे और मुझसे बोले—
“खूब मजे में जा सकते हैं। तीन मोटर साइकिलें तो मैंने जाती देखीं।”

सड़क चलते एक आदमी ने हमारी बातचीत सुन ली। ऊंची आवाज में बोला—
“काहे बूढ़ मनई के फंसावत हउवा? रस्ता अबहीं ठीक नाहीं बा।”

अलग-अलग राय थी लोगों की। मुझे उस पार जाना भी नहीं था। बस कौतूहल शांत करना था। सोचा—आज नहीं तो दो दिन बाद सही।

पहले जब भी यहां आता था तो मछेरों की नावें दिखती थीं। उनसे मोलभाव करते मछली खरीददारों को देखता था। तब मन होता था कि किसी मछेरे के साथ नदी के उस पार घूम आऊं। अब वह काम अपनी साइकिल से, पीपे के पुल के जरिये कर सकूंगा।

एक नई संभावना ने मन में कई योजनाएं बनानी शुरू कर दीं। एक नया रास्ता खुलेगा तो गंगा और उस पार के गांवों को पहली बार घूमकर देखूंगा। सत्तर साल की उम्र में भी जीडी के अंदर एक बालक जिंदा है।

वापसी में दो बच्चे साइकिल से स्कूल जाते मिले। मेरी अलग तरह की साइकिल देखकर उनमें से एक बोला—
“बब्बा, रेस लगाइए?”

मैंने चुनौती स्वीकार कर ली। पैडल-असिस्ट मोड में मैं जल्दी ही उनसे काफी आगे निकल गया। फिर मन में कुछ विचार आया और मैंने साइकिल धीमी कर ली। बच्चे आगे निकले और तेज पैडल मारते बोले—

“बब्बा, हम जीत गए!”

मैं भी चाहता था कि बच्चे जीत जाएं।
मैं यह भी चाहता हूं कि मेरे अंदर का बच्चा भी खुश रहे।

-‌- ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
18मार्च 2016

@@@@@@@ 

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

2 thoughts on “निबड़ियाघाट का पीपे का पुल

  1. मैं भी चाहता था कि बच्चे जीत जाएं।
    मैं यह भी चाहता हूं कि मेरे अंदर का बच्चा भी खुश रहे।
    -इससे बड़ी खुशी का और क्या साधन हो सकता है ।

    Liked by 1 person

Leave a reply to Gyan Dutt Pandey Cancel reply

Discover more from मानसिक हलचल

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Design a site like this with WordPress.com
Get started