होरमुज़ से गुजरते जहाज का स्वप्न

गांवदेहात डायरी

खाड़ी युद्ध के चक्कर में आजकल बाहरी समाचार पत्रों का पठन बढ़ गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स, वाल स्ट्रीट जर्नल और वाशिंगटन पोस्ट तो नियमित देखता ही हूँ। उनकी रिपोर्टिंग, विश्लेषण और एडीटोरियल कंटेंट प्रभावित करते हैं। हमारे यहाँ के अखबार प्रायः वही बातें उठा कर छापते नज़र आते हैं। उनका अपना मौलिक लगभग शून्य है।

मान लिया जाये कि हमारे संवाददाता खाड़ी या ईरान में नहीं हैं। पर जो दो जहाज नेचुरल गैस लेकर होरमुज़ से निकल आये—क्या उनसे भी कोई व्यक्तिगत सम्पर्क हमारे अखबार नहीं बना पाये?
दोनों जहाजों—शिवालिक और नंदादेवी—में लगभग दो सौ सेलर्स रहे होंगे। कांडला या मूंदरा बंदरगाह पर उनसे बात कर कोई मौलिक फीचर नहीं रचा जा सकता था?

शायद यही विचार मन में रहे होंगे जब मुझे भोर का सपना आया।

तीन बजे के आसपास नींद खुल गई। सपना ताजा था। सोचा—अगर अभी नहीं लिखूँगा तो सुबह तक उसका आधा हिस्सा उड़ जाएगा। एक गिलास पानी पीकर मैं स्टडी टेबल पर बैठ गया और डायरी खोल ली।

यह रहा सपने का हाल।

सपने में एक सेलर, जो नेचुरल गैस के जहाज पर था, अपनी कथा सुना रहा था—

होरमुज़ से गुजरते जहाज का स्वप्न

नीलकंठ भाई,

आज आखिर हम कांडला की ओर सुरक्षित पानी में पहुँच गये हैं। जहाज़ का इंजन अभी भी उसी स्थिर लय में धड़क रहा है, पर पिछले पाँच दिनों में उसकी आवाज़ भी अलग लग रही थी—जैसे वह भी तनाव में हो।

हमारा टैंकर एलएनजी से भरा हुआ है। जहाज़ के पेट में लगभग –162°C पर ठंडी रखी गैस है। ज़रा-सी दुर्घटना या आग का खतरा सबको चौकन्ना कर देता है। इस बार तो चिंता होरमुज़ जलडमरूमध्य की थी। सच कहूँ तो मैं काफी तनाव में था।

हमने लोडिंग कतर के रास लाफ़ान टर्मिनल पर की थी। बंदरगाह से निकलते ही रेडियो पर चेतावनियाँ आने लगीं—
“सतर्क रहें, क्षेत्र में ड्रोन गतिविधि की सूचना है।”

कप्तान ने तुरंत अतिरिक्त निगरानी लगा दी। रात की वॉच में दो लोगों की जगह तीन आदमी कर दिये गये।

पहली रात समुद्र सपाट था, हवा हल्की। पर जहाज़ पर कोई भी चैन से नहीं सो रहा था। किसी ने खुल कर नहीं कहा, पर सब जानते थे—अगर कहीं हमला हुआ तो यह जहाज़ आसान निशाना है।

दूसरे दिन हम होरमुज़ जलडमरूमध्य के पास पहुँचे। दोनों तरफ पहाड़ जैसे चुपचाप खड़े रहते हैं और बीच से जहाज़ों की कतार गुजरती रहती है। पर इस बार दृश्य अलग था। कुछ दूरी पर एक नेवी का जहाज़ भी दिखाई दिया। उसने रेडियो पर बस इतना कहा—
“रूट पर बने रहें।”

डेक पर खड़े होकर मैंने देखा कि दूर-दूर तक तेल टैंकर, कंटेनर जहाज़ और गैस कैरियर एक ही धारा में चल रहे हैं। जैसे सड़क पर ट्रैफिक जाम हो—बस फर्क इतना कि यहाँ हर वाहन करोड़ों डॉलर का है।

उसी शाम पहली बार तनाव सचमुच महसूस हुआ। रडार पर एक छोटी तेज़ नाव कुछ मिनट के लिए दिखाई दी। कप्तान तुरंत ब्रिज पर आ गये। सर्चलाइट तैयार रखी गई।

कुछ देर बाद वह नाव दिशा बदलकर दूर निकल गई। पर उन दस मिनटों में जहाज़ पर जो सन्नाटा था, वह अजीब था।

तीसरे दिन हम अरब सागर में खुल गये। तब जाकर थोड़ी राहत मिली। गैली में चाय थोड़ी देर तक चलने लगी। किसी ने रेडियो पर पुराने हिंदी गाने लगा दिये। कुछ ठहाके भी सुनाई दिये।

लेकिन कप्तान ने साफ कहा—
“रिलैक्स मत होइये। कार्गो सुरक्षित पहुँचाना ही असली काम है।”

समुद्र में जीवन अजीब होता है, नीलकंठ भाई। दिन में चार-चार घंटे की ड्यूटी, फिर आराम। चारों तरफ केवल पानी। मोबाइल सिग्नल भी मुश्किल से आता है। ऐसे में दिमाग भटकता रहता है—किसी को घर याद आता है, कोई बच्चों की पढ़ाई सोचता है।

मुझे भी कई बार लगा—यह सब क्यों कर रहे हैं?

फिर याद आता है कि यही गैस भारत के शहरों में जलेगी, कारखानों में चलेगी। कहीं न कहीं किसी रसोई का चूल्हा इससे गर्म होगा।

… …

कांडला पोर्ट के पायलट जहाज़ पर चढ़े तो जहाज़ के कई लोग मुस्कुरा दिये। पायलट ने मजाक में कहा—

“अब आप लोग घर के पानी में आ गये।”

नीलकंठ भाई,
समुद्र का काम यही है—बाहर से शांत दिखता है, पर भीतर हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता है।

और हर बार होरमुज़ से गुजरते समय दिल थोड़ा ज़रूर धड़कता है।
इस बार तो कुछ ज़्यादा ही धड़कता रहा।

— आपका
समुद्र में तैरता हुआ दोस्त।

***

नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर
18 मार्च 2026

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

One thought on “होरमुज़ से गुजरते जहाज का स्वप्न

  1. जबरदस्त -शायद हमारे अखबार इस सपने से ही कुछ मौलिकता सीख लें

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