गांवदेहात डायरी

यहां गांवदेहात में गांव कई हिस्सों में बंटा है—ब्राह्मण, केवट, पासी और चमरउट। इनके पुरुष अलग-अलग व्यवसाय में हैं और महिलाओं का जीवन भी अलग-अलग तरह से चलता दिखता है। मैं इन्हें हाशिये से देखता हूं; बहुत-सी बातें पत्नीजी से सुनकर समझता हूं।
हर हिस्से में महिलाओं की स्वतंत्रता, उनके काम और घर-समाज में उनकी भूमिका अलग है। यह सब देखते हुए तुलना अपने आप होने लगती है—किसकी ज्यादा चलती है, किसको ज्यादा अधिकार हैं, कौन ज्यादा सहज दिखता है।
यह विषय समाजशास्त्र का है और मेरी समझ सीमित है। फिर भी, एक आम आदमी की नजर से कुछ बातें दिखती हैं।
चमरउट की महिलाएं अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्र दिखती हैं। गांव में उनकी आवाजाही भी अधिक है। घर और बाहर—दोनों जगह वे काम में बराबर की हिस्सेदारी निभाती हैं। मेहनताना भले थोड़ा कम हो, पर उनकी भूमिका कम नहीं आंकी जाती। शायद इसी कारण वहां लड़की का जन्म ज्यादा सहजता से स्वीकार होता है।
छोटी लड़कियां घर का काम संभालती हैं और बड़ी होकर खेतों में बुआई, कटाई, निराई में लगती हैं। कई समूह सुबह-सुबह रोटियां बांधकर 20–25 किलोमीटर दूर खेतों में काम करने निकलते हैं। इस बाहर निकलने से उनमें एक आत्मविश्वास भी आता दिखता है।
ऐसे माहौल में कई बार काम के दौरान प्रेम संबंध भी बनते हैं और कुछ लड़कियां अपने विवाह के निर्णय खुद लेने लगती हैं। बताया जाता है कि समाज धीरे-धीरे इसे स्वीकार भी कर रहा है।
केवट महिलाओं में परंपरागत रूप से शादी-ब्याह में पूड़ी बेलने का काम रहा है। अब यह काम बदलकर समूहों द्वारा भोजन के ठेके लेने तक पहुंच गया है। इससे उनकी गतिशीलता और आर्थिक भूमिका दोनों बढ़ी हैं।
पसियान की महिलाओं को मैंने कम ही बाहर काम करते देखा है; वे अधिकतर घर और आसपास तक सीमित दिखीं। संभव है कि मेरा अवलोकन अधूरा हो।
ब्राह्मण महिलाओं के बारे में, मेरे देखने में, गांव में उनकी स्वतंत्रता अपेक्षाकृत सीमित है। बाहर निकलने और काम करने के अवसर कम हैं। पढ़ाई और विवाह जैसे निर्णय प्रायः पुरुषों द्वारा लिए जाते हैं। लड़कों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति भी अधिक दिखती है। घूंघट की परंपरा भी अब तक बनी हुई है।
जाति यहां सिर्फ ब्राह्मण की पहचान नहीं तय करती—
औरतों के जीने की सीमा भी खींच देती है। 🙁
यह एक सपाट अवलोकन है। हर वर्ग और हर उम्र के भीतर जीवन की कई परतें हैं, जिन्हें मैं पूरी तरह नहीं देख पाता। शायद उतनी सूक्ष्मता से देखना मेरे लिए सहज भी नहीं है।
फिर भी इतना स्पष्ट है कि गांव के अलग-अलग जातीय समूहों में महिलाओं का जीवन, उनकी स्वतंत्रता और उनके अनुभव—एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं।
एक ही गांव में रहती हैं सब औरतें—
पर हर जाति की औरत का गांव अलग है।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
27 मार्च 2026
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