स्किट्जो़फ्रेनिया के ध्रुव



Globe हिन्दी ब्लॉगरी और काफी सीमा तक भारतीय समाज में संकुचित सोच के दो ध्रुव नजर आते हैं। एक ध्रुव यह मानता है कि सेन्सेक्स उछाल पर है। भारत का कॉर्पोरेट विकास हो रहा है। भारत विश्व शक्ति बन रहा है। देश को कोई प्रगति से रोक नहीं सकता। दूसरा ध्रुव जो ज्यादा सिनिकल है, मानता है कि कुछ भी ठीक नहीं है। किसान आत्महत्या पर विवश हैं। सेन्सेक्स से केवल कुछ अमीर और अमीर हो रहे हैं। बड़े कॉरपोरेट हाउस किराना बाजार भी सरपोटे जा रहे हैं। आम आदमी और गरीब हो रहा है। समाज में खाई बढ़ रही है। "सर्जिंग इण्डिया" और "स्टिंकिंग भारत" दो अलग अलग देश नजर आते हैं। 

यह फ्रेगमेण्टेड सोच मीडिया का स्किट्जो़फ्रेनिया है जो विभिन्न प्रकार से फैलाया जाता है। मीडिया फ्रेगमेण्टेशन फैला पाने में सफल इसलिये हो पाता है, क्योंकि हमें स्वतन्त्र वैचारिकता की शिक्षा नहीं मिलती। हमारी शिक्षा पद्धति लिखे पर विश्वास करने को बौद्धिकता मानती है। आदमी स्वतन्त्र तरीके से अपने विचार नहीं बनाते।

ये दोनो ध्रुव जो मैने ऊपर लिखे हैं – सचाई उनके एक के करीब नहीं है। सचाई कहीं बीच में है। पर अगर हम एक ध्रुव को पकड़ कर बैठ जायें तो निश्चय ही स्क्टिजो़फ्रेनिक होंगे। राजनेता चुनाव जीतने के लिये जाग्रत भारत या चौपट भारत के ध्रुव सामने रखते हैं – वोट की खातिर। पर मुझे लगता है कि बड़े नेताओं को (अर्थात राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को) यह स्पष्ट है कि सचाई कहीं मिड वे है। वे जो बोलते हों; पर आर्थिक नीतियां ऐसी चल रही हैं जो लगभग दोनो ध्रुवों के बीच में कहीं सोची-समझी नीति का परिचय देती हैं। समस्या राज्यों और चिर्कुट स्तर पर आती है। उसकी काट एक शिक्षित समाज ही है। पर अगर हिन्दी ब्लॉग जगत शिक्षित और जाग्रत समाज का नमूना है – तो मुझे निराशा होती है। बहुत से लोग बहुत सा सिनिसिज्म ले कर आते हैं और अपनी पोस्टों में उंडेलते हैं। नये साल के संदर्भ में कुछ पॉजिटिव पोस्टें, कुछ सकारात्मक रिजोल्यूशन, कुछ अच्छाई नजर आयी। अन्यथा वही सिनिसिज्म दीखता रहा।

शिक्षित समाज से तीन चुनौतियों का मुकाबला करने की अपेक्षा की जाती है। भारत में विविधता और भिन्नता (जातिगत-धर्मगत भिन्नता सन्निहित) से उत्पन्न घर्षण और दिनो दिन बढ़ रहे वैमनस्य से छुटकारा पाने के लिये एकात्मता की स्थापना एक जागरूक और शिक्षित वर्ग से ही सम्भव है। दूसरे, यह मान कर चला जा सकता है कि आने वाले समय में पर्यावरण विषमतर होता जायेगा। जगत का तापक्रम बढ़ेगा। नदियां साल भर बहने की बजाय मौसमी होने लगेंगी। और उत्तरोत्तर फसलें खराब होने लगेंगी। इससे कई प्रकार के तनाव होंगे। तीसरे – विकास के साथ-साथ स्वार्थ, संकुचन और सांस्कृतिक क्षरण की समस्या उतरोत्तर बढ़ेगी।

यह चुनौतियां फेस करने के लिये शिक्षित लोग व्यक्तिगत रूप से या समग्रता से कहां तैयार हो रहे हैं? और अगर स्किट्जो़फ्रेनिया, सिनिसिज्म या पढ़े लिखों की जूतमपैजार को तैयारी मानने की बात समझा जाये तो भगवान ही मालिक है इस देश का।


Shiv यह पोस्ट मैं शिवकुमार मिश्र के कल के हमारे ज्वाइण्ट ब्लॉग पर लिखे व्यंग "रीढ़हीन समाज, निकम्मी सरकार और उससे भी निकम्मी पुलीस डिजर्व करता है" के सीक्वेल के रूप में लिख रहा हूं। वह लेख पढ़ कर बहुत दिनों से चल रहे विचारों को व्यक्त करने का मुझे निमित्त मिल गया। हमारा मीडिया-प्रोपेल्ड बुद्धिजीवी समाज शोर अधिक करता है, पर दूरगामी पॉजिटिविज्म देखने में नहीं आता।

कायदे से मुझे यह पोस्ट उस ब्लॉग पर छापनी चाहिये थी; पर मैं उत्तरोत्तर महसूस करता हूं कि उस ब्लॉग पर शिव के विचार आने चाहियें और मेरी हलचल इस ब्लॉग पर। मैं शिव से अनुरोध भी करता रहा हूं कि वे उस ब्लॉग के अकेले कर्ता-धर्ता बन जायें। वैसे भी उनके सटायर के स्तर के टक्कर का लिख पाना मेरे बस की बात नहीं। और अब वे स्वयम रेग्युलर लिख भी रहे हैं। पर छोटे भाई के सामने बड़े की कहां चलती है!


अनुगूंज-२३: कम्प्यूटर प्रयोग – मेरा घरेलू कम्प्यूटर और संचार तन्त्र



Akshargram Anugunjहर एक ब्लॉगर अपना घर का स्टडी टेबल और कम्प्यूटर सिस्टम जमाता होगा। मेरा अध्ययन तो सामान्यत: बिस्तर पर होता है। पर कम्प्यूटर और संचार (कम्यूनिकेशन) का सिस्टम मेज कुर्सी पर काफ़ी सीमा तक मेरी व्यक्तिगत और सरकारी आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर बना है।

इस लेख को अंश में मैं पहले इस पोस्ट पर प्रस्तुत कर चुका हूं। अनुगूंज – २३ के लिये इसे संशोधित और परिवर्धित कर पुन: प्रस्तुत कर रहा हूं|

अनुगूंज-२३ के विषय में मुझे ख्याल नहीं था। आलोक ९२११ जी ने याद दिलाया; उसके लिये अतिशय धन्यवाद।  

पहले पहल मैं आपको अपने कम्प्यूटर और संचार व्यवस्था का वास्तविक घरेलू परिदृश्य दिखाता हूं। यह घर के फर्नीचर सेट-अप का हिस्सा है और सामान्यत इसे आप मेरा अभयारण्य कह सकते हैं। घर में कोई गतिविधि चल रही हो; अगर मैं इन चित्रों में दिखाई गयी कुर्सियों में से एक पर बैठा होऊ तो मुझे व्यस्त मान कर बक्श दिया जाता है:

COMP SMALL1
यह घर में मेरे लैपटॉप की सेटिंग है

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यह घर में मेरे डेस्कटॉप की सेटिंग है 

उक्त दोनो सिस्टम अलग अलग और अलग कमरों में होते हुये भी संचार नेटवर्क से जुड़े हैं। मैं उसका विवरण नीचे देता हूं।

मेरा (पिताजी का) मकान रेलवे दफ़्तर से १४ किलोमीटर दूर है। दफ़्तर इतनी अधिक लिखित पोजीशन दिन में बार-बार जेनरेट करता है कि मुझे फ़ैक्स पर निर्भर रहना पड़ता है – जो सस्ता उपाय है लिखित सूचना को प्राप्त करने का। और फैक्स भी मैं सीधे कम्प्यूटर में लेता हूं जिससे व्यर्थ कागज बरबाद न करना पड़े। केवल बहुत जरूरी पन्नों की हार्ड कॉपी लेता हूं। 

मुझे रेलवे ने बात करने और डाटा ट्रांसफर के लिये एक बीएसएनएल फोन दे रखा है। उसी फोन के माध्यम से मैं अपने दफ्तर के रेलवे और बीएसएनएल नेटवर्क को एक्सेस करता हूं। बचा काम मैं रेलवे द्वारा दिये गये मोबाइल फोन से या घर पर उपलब्ध व्यक्तिगत (पिताजी के नाम) बीएसएनएल फोन से पूरा करता हूं।

मेरा घर का कम्प्यूटर और संचार नेटवर्क इस प्रकार का है:Communication Layout

इस ऊपर वाला तन्त्र में मेरा लैपटॉप दो ब्रॉडबैण्ड सूत्रों से और डेस्कटॉप एक से जुड़ा है। डेस्कटॉप से फैक्स-प्रिण्टर-स्कैनर युक्त है। फोन करने की सुविधा दोनो ’केन्द्रों’ पर है। मैं लगभग १५-१८ पेज प्रति दिन फैक्स के रिसीव करता हूं। इण्टरनेट का प्रयोग लगभग ८ घण्टे प्रतिदिन होता है।

मैं जब अपने कम्प्यूटर और संचार नेटवर्क को देखता हूं तो पाता हूं कि इसे स्थापित करने में बहुत कुछ मेरा खुद का योगदान है। मैने एक "नेटगीयर" वायरलेस मॉडम भी लगा रखा है जो बीएसएनएल डाटालिंक को बिना तार के पूरे घर भर की रेंज में लैपटॉप से जोड़ देता है। यह लगभग रुपये २०००/- का मिला है। पूरा सिस्टम शायद यह बीएसएनएल के सामान्य कॉनफीग्यूरेशन के अनुकूल न भी हो। पर वह काम कर रहा है!  

इस कम्प्यूटर और संचार तन्त्र से लाभ यह है कि मैं दो बीएसएनएल फोनों के स्टार्ट-अप ब्रॉडबैण्ड प्लान २५० का प्रयोग सुविधानुसार कर रुपये ५०० प्रति मास में २ जीबी का डाउनलोड सुनिश्चित कर लेता हूं। यह बहुत सस्ता है। अगर यह भी कम पड़ता है तो मैं अपने दफ्तर के फोन के ब्रॉडबैण्ड खाते के यूजरनेम और पासवर्ड का प्रयोग कर उसमें १ जीबी डाउनलोड की बची हुई क्षमता का इस्तेमाल भी कर लेता हूं। कुल मिला कर मैं बीएसएनएल के न्यूनतम टैरिफ रेट पर काम करते हुये महीने में ३ जीबी डाउनलोड का फायदा लेता हूं। और उसमें भी मेरी जेब से खर्च केवल रुपये २५० मात्र है। शेष रुपये ५०० तो रेलवे वहन करती है!    

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: अनुगूँज, anugunj,


यह बहुत रोचक होगा अगर ब्लॉगर लोग अपनी घर की कम्प्यूटर सेटिंग के चित्र प्रस्तुत करें। मेरे लैपटॉप-डेस्कटॉप सेटिंग के चित्र देख कर तो मेरी पत्नी मुंह बिचका कर गयी हैंSarcastic – "घर की सफाई-डस्टिंग कोई और करे; फोटो दिखाने को तुम चघड़ बने रहते हो!"Happy

Gyan(328)

नये साल में मेरे बगीचे में नरगिस की कलियां खिल गयीं मित्रों!

नया साल मुबारक!

(जोड़ा – सवेरे ७:२२ पर)  


रविरतलामी जी ब्लॉगर.कॉम मूर्ख नहीं है



रवि रतलामी ने अपने लेख ’हनी, आई श्रंक द पिक्स’ मे‍ यह कहा है कि मैने लगभग १०० केबी के चित्रों का प्रयोग किया है और वह - 

"आवश्यकता से 10 गुना अधिक रिसोर्स का प्रयोग किया गया है जो चिट्ठाकार के लिए भी ठीक नहीं है और उसके पाठकों के लिए भी." (रवि के शब्द)

चिट्ठाकार/ब्लॉगर (पढ़ें – ज्ञानदत्त पाण्डेय) तो कालिदास (अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला) है, उसकी फिक्र न की जाये। पर क्या उससे पाठक को टेक्स किया जा रहा है? और अगर पाठक को टेक्स किया जा रहा है तो ब्लॉगर.कॉम भी उतनी बार टेक्स हो रहा है जितनी बार पेज क्लिक हो रहे हैं।

क्या ऐसा है? क्या ब्लॉगर.कॉम मूर्ख है मेरी तरह!

raviratlami आप जरा उनके लेख में उद्धृत मेरे ब्लॉग पोस्ट "कैसे लाऊं जिप्सियाना स्वभाव" का अवलोकन करें। उसपर उपलब्ध चित्रों पर राइट क्लिक कर चित्र को अपने कम्प्यूटर पर सेव करें («बायां चित्र देखें)। आप पायेंगे कि चित्र, जो पन्ने पर आ रहे हैं, १५ से २७ केबी के हैं – न कि ९० से १२४ केबी के जैसा रवि कह रहे हैं। हां आप अगर चित्र पर क्लिक कर उसे डाउनलोड करने का यत्न करेंगे तो वे अवश्य ९० से १२४ केबी के मिलेंगे।

मैने आप (पाठक) के रिसोर्स को चूना नहीं लगाया! जब आप मेरा पेज डाउनलोड करते हैं तो आपको चित्रों के लिये १५-२७ केबी का डाउनलोड करना होता है। पर आप मेरे चित्र डाउनलोड करना चाहें तो जरूर आपको दस गुने रिसोर्स देने होंगे।

खैर में अब कोशिश करूंगा कि ब्लॉगर.कॉम पर १०० केबी छाप चित्र ही न ठेलूं। उससे मेरा लाभ है। पर भूतकाल में मैने न पाठक को चूना लगाया है न ब्लॉगर.कॉम ही मूर्ख है! 


वैसे भी मैं विण्डोज लाइवराइटर से पोस्ट बनाते समय सामान्यत: चित्र का ऑप्शन Small(240×169) रखता हूं जो सबसे छोटा साइज है। उसमें फोटो ठीक ठीक दिखती है और रिसोर्स १५-३० केबी की रेंज में लगता है पेज पर।  


कैसे लाऊं जिप्सियाना स्वभाव



छब्बीस दिसम्बर को मेरा दफ्तर इलाहाबाद में सिविल लाइन्स से बदल कर सुबेदारगंज चला गया। महाप्रबंधक कार्यालय का उद्घाटन तो पिछले महीने ही हो गया था। मेरे दफ्तर का शिफ्टिंग अब हुआ। बड़ी आलीशान इमारत है नये दफ्तर की। खुला वातावरण। पर मैं अवसादग्रस्त हो गया हूं। नयी जगह पर अटपटा लग रहा है। ट्यूब लाइट नहीं लगी हैं सभी। चपरासी के लिये घण्टी नहीं है। चाय बनाने का इन्तजाम नहीं हो पाया है। बाहर से लायी चाय ’पेशल’ है पर अदरक कस के पड़ी है उसमें। इण्टरकॉम और इण्टरनेट काम नहीं कर रहे। कमरे में कर्टेन नहीं लगे हैं। स्टॉफ अपने दफ्तर और कण्ट्रोल सेण्टर की जगह के लिये लड़ रहा है।

उत्तर मध्य रेलवे के नये मुख्यालय उद्घाटन के कुछ चित्र

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शाम होते ही फेटीग और मच्छर घेर लेते हैं। मैं घर के लिये निकल लेता हूं। पर घर का रास्ता भी नयी जगह से पंद्रह मिनट और लम्बा हो गया है। अंधेरा हो गया है। ट्रैफिक ज्यादा है। यह ड्राइवर तेज क्यों चल रहा है? अवसाद ही अवसाद!

मैं गाड़ुलिया लुहारों और जिप्सियों की कल्पना करता हूं। ये घुमन्तू लोग तो आज यहां कल वहां। उन्हे तनाव नहीं होता क्या? दक्षिणी-पूर्वी योरोप के गड़रिये – जो अपनी भेड़ों के साथ चारे और पानी की तलाश में घूमते हैं, क्या वे नयी जगह में असहज होते हैं?

यायावरी और फक्कड़ी जीवन में कैसे लाई जाये? अधेड़ उम्र में जीवन की निश्चितता को कैसे अनलर्न किया जाये? ये प्रश्न हॉण्ट कर रहे हैं और बड़ी तीव्रता से कर रहे हैं।

पता नहीं, अज़दक चीन हो आये। मुझे कोई चुनार जाने को कह दे – जो मेरे अपने कार्यक्षेत्र का अंग है और जिसके कर्मचारी मेरे कहने पर सभी सम्भव कम्फर्ट मुहैया करा देंगे – तो भी मैं वहां न जाऊं। जाने के लिये ठेला जाऊं तो बात अलग है!  

जरा सा परिवर्तन, जरा सा डिसकम्फर्ट सहा नहीं जाता। कैसे बदला जाये अपने स्वभाव को?Thinking

कोई सुझाव हैं आपके पास?  


लगता है इस जिप्सियाना प्रश्नों के चलते मेरी ब्लॉगिंग अनियमित रहेगी।


मेरा घर का कम्प्यूटर और संचार नेटवर्क



हर एक ब्लॉगर अपना घर का स्टडी टेबल और कम्प्यूटर सिस्टम जमाता होगा। मेरा अध्ययन तो सामान्यत: बिस्तर पर होता है। पर कम्प्यूटर और संचार (कम्यूनिकेशन) का सिस्टम मेज कुर्सी पर काफ़ी सीमा तक मेरी व्यक्तिगत और सरकारी आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर बना है।

रेलवे की कार्यप्रणाली चाहती है कि हम रेल की पटरी और दफ़्तर के समीप रहें पर इलाहाबाद में पैत्रिक मकान के होते यह सम्भव नहीं है। मेरा पिताजी का मकान रेलवे दफ़्तर से १४ किलोमीटर दूर है। दफ़्तर इतनी अधिक लिखित पोजीशन दिन में बार-बार जेनरेट करता है कि अगर कागज ले कर मेरे घर कोई वाहन आता रहे तो सामान्य दिन में सुबह शाम और छुटटी के दिन पूरे समय एक वाहन इसी काम भर को हो। लिहाजा मुझे फ़ैक्स पर निर्भर रहना पड़ता है – जो सस्ता उपाय है लिखित सूचना को प्राप्त करने का। और फैक्स भी मैं सीधे कम्प्यूटर में लेता हूं जिससे व्यर्थ कागज बरबाद न करना पड़े। केवल बहुत जरूरी पन्नों की हार्ड कॉपी लेता हूं। 

"मेरे दफ्तर की पुरानी जीप अफसरों के घर लिखित पोजीशन लेजाने का काम करती है। खटारा होने के कारण उसपर प्रति किलोमीटर फ़्यूल खर्च एक बड़े ट्रक के फ़्यूल खर्च से तुलनीय होगा। मेरे उक्त कम्प्यूटर और संचार तन्त्र से मेरे ऊपर वह खर्च बचता है। रेल विभाग की उस बचत का आंकड़ा जोड़ूं तो बड़ा अच्छा लगेगा! "

मेरे पास रेलवे और बीएसएनएल के कमसे कम दो सरकारी फ़ोन चालू दशा में होने चाहियें। बीएसएनएल का फ़ोन तो विभाग ने दे रखा है पर रेलवे फ़ोन की १४ किलोमीटर की लाइन बिछाना न भौतिक रूप से सम्भव है और न सस्ता। लिहाजा मुझे दफ़्तर में रेलवे फ़ोन पर बात करने के लिये वहां बीएसएनएल-रेलवे नेटवर्क की इण्टरफ़ेस सेवा का प्रयोग करना पड़ता है। बचा काम मैं मोबाइल फोन से या घर पर उपलब्ध व्यक्तिगत (पिताजी के नाम) बीएसएनएल फोन से पूरा करता हूं।

मैं जब अपने कम्प्यूटर और संचार नेटवर्क को देखता हूं तो पाता हूं कि इसे स्थापित करने में बहुत कुछ मेरा खुद का योगदान है। और शायद यह बीएसएनएल के सामान्य कॉनफीग्यूरेशन के अनुकूल न भी हो। पर वह काम कर रहा है!

मेरा घर का कम्प्यूटर और संचार नेटवर्क इस प्रकार का है:Communication Layout

यह ऊपर वाला तन्त्र तो फिर भी सीधा सीधा दिख रहा है, पर जब यह भौतिक तारों, कनेक्टर्स, कम्प्यूटर और पावर सप्लाई के उपकरणों, स्विचों आदि से सन्नध हो जाता है तो काफी हाइटेक और उलझाऊ लगता है। मुझे इलेक्ट्रॉनिक्स इन्जीनियरिंग छोड़े २५ वर्ष हो गये – पर यह सिस्टम देख जब बीएसएनएल वाला कर्मी सिर खुजाता है, तब लगता है कि हम पढ़ाई में इतने लद्धड़ ("Five point someone" छाप) भी नहीं थे। इसमें मेरा लैपटॉप दो ब्रॉडबैण्ड सूत्रों से और डेस्कटॉप एक से जुड़ा है। डेस्कटॉप से फैक्स-प्रिण्टर-स्कैनर युक्त है और फोन दोनो ’केन्द्रों’ पर है। बस मुझे यह नहीं आता कि नेटगीयर से दोनो कम्प्यूटरों के डाटा कैसे शेयर किये जायें। अभी तो मैं पेन ड्राइव से डाटा-ट्रान्सफर करता हूं। 

मेरे दफ्तर की पुरानी जीप अफसरों के घर लिखित पोजीशन लेजाने का काम करती है। खटारा होने के कारण उसपर प्रति किलोमीटर फ़्यूल खर्च एक बड़े ट्रक के फ़्यूल खर्च से तुलनीय होगा। मेरे उक्त कम्प्यूटर और संचार तन्त्र से मेरे ऊपर वह खर्च बचता है। रेल विभाग की उस बचत का आंकड़ा जोड़ूं तो बड़ा अच्छा लगेगा! उसके अलावा फैक्स हार्ड कॉपी की बचत अलग। मैं अपनी तनख्वाह बराबर तो विभाग को बचवा ही देता होऊंगा।Happy


AnoopAnoop Shukla अनूप शुक्ल ने रविवार शाम को अपने दफ्तर से फोन किया। मैं इन सज्जन की मेहनत करने की प्रवृत्ति से उत्तरोत्तर प्रभावित हो रहा हूं। वर्ष का अन्त है। सब लोग छुट्टी के मूड में हैं। न भी हों तो लोग रविवार को गुजरात के मोदीफिकेशन का टीवी-इण्टरनेट पर अवलोकन कर रहे थे। ऐसे में ये सरकारी जीव दफ्तर में काम कर रहे हों – यह जान कर विचित्र भी लगा और सुखद भी।

(वैसे इस पुच्छल्ले पर लगाने के लिये "अनूप शुक्ल" का गूगल इमेज सर्च करने पर दाईं ओर का चित्र भी मिला। अब आप स्वयम अपना मन्तव्य बनायें। हां, सुकुल जी नाराज न हों – यह मात्र जबरी मौज है!Red heart)


इस्लामिक एपॉस्टसी की अवधारणायें



कुछ दिन पहले तेजी बच्चन जी के निधन का समाचार मिला। इसको याद कर मुझे इण्टरनेट पर किसी जवाहरा सैदुल्ला के इलाहाबाद के संस्मरणों वाला एक लेख स्मरण हो आया; जिसमें तेजी बच्चन, फिराक गोरखपुरी, अमिताभ के जन्मदिन पर दी गयी पार्टी आदि का जिक्र था। उसे मैने कई महीने पहले पढ़ा था। इण्टरनेट पर सर्च कर उस लेख को मैने पुन: देखा। यह चौक.कॉम नामक साइट पर मिला।

ध्यान से देखने और उसके बाद आगे खोज से पता चला कि जवाहरा सैदुल्ल्ला एक नारी हैं और स्विट्जरलैण्ड में रहती हैं। लेखिका हैं। उनका एक ब्लॉग है ब्लॉगस्पॉट पर – Writing LifeJavahara

मुझे अपने इस्लामी नामों की अल्पज्ञता पर झेंप हुयीEmbarrassed। मैं जवाहरा सैदुल्ल्ला से अनुमान लगा रहा था कि यह कोई अधेड़ सज्जन होंगे और पार्टीशन के बाद या कालांतर में पाकिस्तान चले गये होंगे। यह नाम किसी महिला का होता है – मुझे कल ही पता चला।

जवाहरा सैदुल्ल्ला प्रैक्टिसिंग मुस्लिम नहीँ हैं। मैने उनका इस्लाम और एपॉस्टसी (apostasy – स्वधर्म त्याग) विषयक लेख – Muslim Dissent पढ़ा। धर्म में व्यापकता होनी चाहिये – जरूर। वह व्यक्ति को सोचने और अपनी अवधारणायें बनाने की पर्याप्त आजादी देने वाला होना चाहिये। पर जवाहरा सैदुल्ल्ला इस लेख में कहती हैं कि इस्लाम में यह आजादी नहीं है। एपॉस्टसी की सजा – जैसा जवाहरा लिखती हैं – मौत है। एपॉस्टसी में अल्लाह और पैगम्बर पर विश्वास न करने के अलावा लेख में उन्होने १० और कृत्य भी बताये हैं। इनमें जगत के शाश्वत होने और पुनर्जन्म में विश्वास करना भी शामिल है।

मैने पहले के एक पोस्ट में अपने हिन्दू होने के पक्ष में यह पूरी आजादी वाला तर्क ही दिया है। उस सन्दर्भ में जवाहरा सैदुल्ल्ला जी की यह ब्लॉग पोस्ट मुझे बहुत पठनीय लगी। पर एक धर्म (इस्लाम) जो विश्व में इतना फैला और जिसने वृहत भू भाग पर अपना वर्चस्व कायम किया, क्या केवल अपनी एपॉस्टसी वाली अवधारणाओं के चलते मौत के भय से यह कर पाया? यह पहेली मैं सुलझा नहीं पाया हूं अब तक।

मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि इस्लाम के प्रति मेरे मन में अनादर नहीं है – कौतूहल है। और उसके लिये मैं समझने को खुले मन से पढ़ने – समझने को आतुर हूं। मैं कई लोगों से कोई ऐसी पुस्तक सुझाने का अनुरोध कर चुका हूँ, जो इस्लाम को सरलता से समझाने में सहायक हो और दूसरे मतावलम्बियों से सहज संवाद करती हो। सामान्यत: इस्लाम पर लिखा ऐसा होता है जो क्लिष्ट अरबीनिष्ट शब्दों के समावेश से पठन बहुत आगे बढ़ने नहीं देता।