कभी-कभी जीवन में ऐसा होता है कि कोई नई आवाज़ कानों में पड़ती है और लगता है—हाँ, यही तो सुनना चाह रहा था मैं! मेरे साथ यह अनुभव तब हुआ जब मैंने पहली बार, दो तीन साल पहले पुलियाबाज़ी पॉडकास्ट सुना। इसमें तीन लोग – प्रणय कोटस्थाने, सौरभ चंद्र और ख्याति पाठक – बतकही कीContinue reading “पुलियाबाज़ी की पुलिया गांव की नहीं है”
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रात ढलते ही झींगुर गायन
रात आते ही – शाम सात सवा सात बजे झींगुर गायन शुरू कर देते हैं। और यह आवाज रात भर चलती है। गांव के सन्नाटे का संगीत है यह। पितृपक्ष लग गया है जो कोई अन्य आवाज – कोई डीजे या जै मातादी जागरण या अखंड मानस पाठ आदि नहीं हो रहा। आजकल झींगुरचरितमानस काContinue reading “रात ढलते ही झींगुर गायन”
भुआलिन या मिलीपीड्स
बारिश के इस कीड़े से तंग हो गये हैं हम। सैंकड़ों की संख्या में जन्म लेती हैं। पहले एक झुंड में धीरे धीरे चलती हैं। जैसे भेड़ें एक झुंड में चल रही हों। कौन उनमें लीडर है? कौन किसके पीछे चल रहा है – पता नहीं चलता। पर जैसे जैसे इनका आकार बढ़ता है, इनकाContinue reading “भुआलिन या मिलीपीड्स”
