पत्थर के ईंख पेरने वाले कोल्हू का समाजशास्त्र 


टुन्नू पंडित बताते जा रहे थे – “मिर्जापुर के आगे विंध्याचल की पहाड़ी से निकलता था पत्थर और वहीं बनते थे बड़े, आठ फुट के कोल्हू। इतनी बड़ी चीज जो वहां बनती थी, पूरे इलाके में – गोरखपुर देवरिया तक दिखती है। बीच में कहीं कोई पहाड़ नहीं जहां वे बन सकें।” 

विंध्य की पहाड़ियों में बना ईख का कोल्हू कैसे गांव गांव पंहुचता था, जब  कोई सड़क नहीं थी, कोई रेल या बस या ट्रक नहीं थे। बेलनाकार कोल्हू को लुढका कर आगे बढ़ाना ही एक मात्र जरीया था। 

“हर गांव का सहयोग होता था जीजा जी। जिस गांव की सीमा पर कोई कोल्हू आया नहीं कि नौजवान तैयार रहते थे। वे धकेल धकेल कर अपना गांव पार करा देते थे। कोई मेहनताना नहीं, कोई शुल्क नहीं। जिस गांव में वह कोल्हू रुक गया, उस गांव की नाक कट जाती थी। उस गांव के लड़कों की शादी नहीं होती थी। यही कहा जाता था कि उहां सब हिंजड़े हैं!” 

Sugar cane kolhu pushing
कोल्हू को लुढ़का कर गांव की सीमा पार कराते नौजवान

चार–पाँच टन का वह कोल्हू कोयला या डीज़ल से नहीं चलता था।

उसे न ठेके की ज़रूरत थी, न मज़ूरी की। वह समाज के जुड़ाव, गांव गिरांव की लाज, इज्जत और प्रतिष्ठा से चलता था! 

उस समय के समाज की कल्पना की जाये जब मर्दानगी का मतलब हिंसा, आगजनी, आतंक नहीं;  बल्कि सामूहिक श्रम निभाने की क्षमता था। आज हम जिसे “इन्फ्रास्ट्रक्चर” कहते हैं, तब वह चरित्र का इम्तिहान था।

इंफ्रास्ट्रक्चर के लिये हम सरकार को कोस सकते हैं; चरित्र की ताकत तो समाज के अंदर से आती थी।

बिना खर्च किये, बिना काग़ज़, बिना सरकारी आदेश — कोल्हू अपने गंतव्य गाँव तक पहुँचता था, यह जानना ही अपने आप में आधुनिक सोच को चुनौती देता है।

हम आश्चर्य से सुन रहे थे—और समझ रहे थे कि यह सिर्फ़ बीते समय की बात नहीं है।

समूचे कोल्हू का चित्र
टुन्नू पंडित जी का दिया समूचे कोल्हू का एक चित्र।

टुन्नू पण्डित बोले जा रहे थे… आगे भी बहुत कुछ सुनाने को है टुन्नू जी के पास। 

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टुन्नू पंडित सुनाते हैं पुराने समय का हाल


कंकड़हिया सड़क – गंगा के कंकरों को जगह जगह गड्ढे भरता और धुरमुस से पीटता आदमी गांव से लालानगर तक जाता था। दिन भर के काम पर उसे चार आना मजूरी मिला करती थी। फागुन से पहले सड़क यूं रिपेयर होती थी और उसके बाद गुड़ का बैलगाड़ियों का काफिला निकला करता था तिलंगा से। 

दिन भर जगह जगह गुड़ लादते, चलते शाम को पंहुचता था सौ बैलगाड़ी का कारवां शिवाला पर। एक बनिया जिसे जानकारी होती थी कारवां की, वह किराना का सामान दिया करता था, वही केवट और हरिजन बस्ती को सूचना देता था कि उनकी महिलायें घास की टोकरियां लिये तैयार रहें। 

रात गुजारता था कारवां शिवाला पर। “आप समझिये जीजा जी, सन 1945-50 तक की बात होगी यह।” 

उस जमाने में एक कोयला से चलती बस जाती थी कछवां बाजार से चील्ह तक। एक ही बस थी जो जाती थी और शाम को वापस आती थी। मिर्जापुर जाने का वही साधन था। आगे गंगा पर पीपा पुल हुआ तो उससे, वर्ना नाव से लोग मिर्जापुर से आते जाते थे।

“स्टीम इंजन की बस?” – मैं और मेरी पत्नीजी आश्चर्य से बोल उठे। 

Steam Bus Alone
कछवां बाजार से चील्ह जाती स्टीम बस

“हां मेरे समय के पहले की बात है। पर अपने बचपन में (1970 की आसपास) बनारस में कोयले से चलता रोड रोलर तो अपनी आंखों देखा है।” टुन्नू ने कहा।

बैलगाड़ी का कारवां, स्टीम इंजन की बस — हमारी कल्पना में भी नहीं था यह भारत, यह इलाका। 

मैने सोचा – गज़ब चल रहा है टुन्नू  का यह बताना। 

टुन्नू यूं बोलते जा रहे थे, और मुझे लग रहा था—यह सब अगर काग़ज़ पर नहीं उतरा, तो शायद अगली पीढ़ी के लिए कभी हुआ ही नहीं माना जाएगा।

नहीं लिखा गया तो यह ओरल हिस्ट्री गायब ही हो जायेगी!

जारी रहेगा टुन्नू उवाच!!

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गुड़ से लदी 100 बैलगाड़ी का काफिला


टुन्नू पण्डित – शैलेंद्र दुबे, मेरे साले साहब; इलाके का इतिहास खोलना शुरू किये हैं अब।

सन 1940-50 में चलता था गोपीगंज के पास तिलंगा से गुड़ से लदा सौ बैलगाड़ियों का काफिला। कलकत्ता जाता था। साढ़े सात सौ किलोमीटर की यात्रा।

रोड़ भी क्या रोड थी। गंगा के कंकर बिछाये जाते थे। एक आदमी धुरमुस से पीट कर उन्हें समतल करता था। तिलंगा से चला कारवां पहला पड़ाव कटका-विक्रमपुर के पास करता था।

बैलगाड़ी के साथ 100-200 लोग और बैल रात गुजारते रहे होंगे – भोर होते ही चल देते होंगे। कैसी और कितनी चहल पहल होती रही होगी!

और यह चल रहा था, तब जब 1860 के दशक में रेल आ चुकी थी।

कब तक चला बैलगाड़ी का कारवां। कब बदलाव हुआ। यह सब सोच कर ही इतिहास जानने का उत्साह मन में जग रहा है।

गुड़ लदा बैलगाड़ी कारवां

टुन्नू पण्डित के साथ कई बैठकें होनी हैं अब। एक बातचीत का रिकॉर्डर साथ में रख कर।

टुन्नू पंडित की जय हो!

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अगले दिन 29 जनवरी की सोशल मीड़िया पर पोस्ट –

गोपीगन्ज के तिवारी जी से मैने पूछा – सुना है तिलंगा से कलकत्ता के लिये 100 बैलगाड़ियों का काफिला जाया करता था। गुड़ से लदा हुआ।

तिवारी जी की उम्र 60+ की होगी। उनके बचपन में बैलगाड़ी के कारवां की स्मृति तो नहीं है, पर यह जरूर याद है कि तिलंगा (गोपीगंज से 5 किमी दूर) में जब भी जाते थे, बैलगाड़ियां बहुत दीखती थी वहां। उनके जन्म के एक दो दशक पहले का दृश्य रहा होगा कारवां का।

और गुड़ तो खूब होता था इलाके में। हर गांव में गन्ने की खेती और कई कोल्हू होते थे गन्ना पिराई के। बड़े, पत्थर के कोल्हू!

महराजगंज के बाबा प्रधान ने कहा – जी, वैसा हुआ करता था। बाकी, ज्यादा जानकारी पता कर एक दो दिन में बात करेंगे मुझसे।

बैलगाड़ी का कारवां – 1940-50 का रेलवे का कम्पीटीटर! यह जानकारी मुझे बहुत आकर्षित कर रही है।

टुन्नू पंडित का कहना है – कारवां गांव के पास आता था तो केवटाने की औरतें, सिर पर घास की टोकरी लिये दौड़ लगाती थीं – बैलों को घास चाहिये होता था। दो सौ बैलों के लिये घास! शिवाला के पास मैदान में कारवां रुकता था और बाटी लगा करती थी शाम के समय।

यह सब सुन लिख कर क्या बनेगा जी? इतिहास या उपन्यास? या कुछ लिखने बनाने की काबलियत है जीडी में?

बैलगाड़ी का कारवां शाम को शिवाला पर
बैलगाड़ी का कारवां शाम को शिवाला पर रात्रि विश्राम

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