बरेली से बाड़ी, हिंगलाज माता और रामदरबार


बरेली से बाड़ी की ओर चलने का अर्थ है नर्मदेय क्षेत्र से पहाड़ की गोदी की ओर चलना। नर्मदा का मैदान उतना विस्तृत नहीं है जितना गंगा का। दस किलोमीटर उत्तर दक्षिण चलते ही नर्मदा की घाटी अपनी रंगत बदलने लगती है। घाटी से हम विंध्य या सतपुड़ा की ऊंचाईयों में चढ़ने लगते हैं। यह मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से कम, नक्शे को बार बार ध्यान से देखने के आधार पर ज्यादा कह रहा हूं। व्यक्तिगत अनुभव तो मध्य प्रदेश की गिनीचुनी ट्रेन यात्राओं का ही है जो उत्तर से दक्षिण जाते हुये की हैं।

अब जब प्रेमसागर बरेली से बाड़ी की ओर चले तो मुझे वही याद आया। यात्रा शुरू करते समय ही मैंने एक घण्टे बाद उनसे पूछा – ऊंचाई नीचाई आ रही है सड़क में? आसपास खेत हैं या पहड़ियां। प्रेम सागर ने उत्तर दिया कि जगह ऊंची नीची है। एक ओर खेत हैं पर दूसरी ओर तो जमीन ऊंची-नीची है। आबादी है, पर वह ज्यादातर बरेली के आसपास ही थी। उसके आगे एक नदी पड़ी, जिसका नाम वे नहीं जान पाये। नक्शे में देखने पर पता चलता है कि वह बरना नदी है जो बाड़ी के पास बरना जलाशय से निकलती है और आगे जा कर घूमते घामते नर्मदा में समा जाती है। बरना जलाशय बड़ा है और विंध्य की गोद में है। बरना नाम शायद वरुणा का अपभ्रंश है। नदी है वरुणा-नर्मदा। वैसे ही जैसे वरुणा वाराणसी में गंगा से मिलती हैं, ये वरुणा-नर्मदा, नर्मदा में मिलती हैं। बरना जलशय में कई नदियां आ कर मिलती हैं (बरना भी उनमें से एक है) और फिर बरना उसमें से निकलती है। उस जलाशय के आसपास घूमना रोचक अनुभव होगा। पर वह लेने तो प्रेमसागर निकले नहीं हैं। वे तो आज बाड़ी में रुक कर आगे बढ़ लेंगे – शायद भोपाल की ओर।

गिरजाघर में प्रतिमा

आज की प्रेमसागार की यात्रा छोटी है। कुल बीस किलोमीटर की। कुछ डी-टूर भी जोड़ लिया जाये तो 21-22 किलोमीटर होगी। वे अपना रीयल टाइम लोकेशन शेयर करने लगे हैं तो बीच बीच में मैं मैप पर झांक लेता हूं कि सीधे सपाट चल रहे हैं या नीचे उतर रहे हैं/ऊपर चढ़ रहे हैं। एक स्थान पर मुझे लगता है कि वे एक गिरजाघर के पास से गुजरने वाले हैं। मैं उन्हे आगाह करता हूं फोन पर कि वे चर्च का चित्र लेने का प्रयास करें। वे चर्च का चित्र तो नहीं भेज पाये पर वर्जिन मेरी और जीसस की मूर्ति का चित्र जरूर भेजा। एक बगीचा भी था। जिसे देख कर लगता है कि यह स्थान परित्यक्त नहीं हो गया है। गिरजा जीवंत है। रविवार को परिवार वहां जुटते होंगे। अंग्रेज चले गये बहुत जमाने पहले पर थोड़ी बहुत ईसाई आबादी आसपास बच रही होगी। या बढ़ भी रही हो?! क्या पता!

गिरजाघर का परिसर

प्रेम सागर को आगे एक नब्बे साल से अधिक उम्र के सज्जन मिले। वे पूरी तरह फिट थे। स्वतंत्रता सेनानी थे, गुजरात के रहने वाले पर यहीं बस गये हैं – शायद यहीं कोई जॉब करते रहे हों। सड़क किनारे वे चाय के लिये एक होटल पर आये थे, वहीं पर मिले। बताया कि उनकी पैदाइश 1927 की है। उन्होने एक गरीब आदमी को पैंतीस हजार दे कर मदद की थी चाय आदि की दुकान खोलने में। उसे मिल कर आश्वासन भी दे रहे थे कि भविष्य में भी कोई जरूरत हो तो उनसे बेझिझक मांग सकता है।

नब्बे प्लस के स्वतंत्रता सेनानी जी के साथ प्रेमसागर।

मैंने प्रेमसागर से आज पूछा कि उन्हें दिन भर की यात्रा में कब कब लगा कि महादेव की उपस्थिति थी यात्रा के दौरान? आखिर कहा जाता है न कि कंकर में शंकर हैं तो चलते चले जाने की सार्थकता तो इसी में है कि कभी कभी उनकी अनुभूति होती रहे। प्रेम सागर ने कहा कि आज दो बार ऐसा लगा। उनमें से पहली बार तो इन स्वतंत्रता सेनानी जी के मिलते समय लगा था। इतनी उम्र में भी वे निस्वार्थ लोक कल्याण में लगे थे।

वहीं कुछ दूर पर एक महिला – नाम बताया मनीषा बैरागी – जी ने प्रेमसागर को कांवर लिये जाते देख रोक लिया और जलेबी-फलहारी चिवड़ा और चाय का नाश्ता कराया।

रास्ते में प्रेमसागर तो एक ओर खेत और दूसरी ओर पेड़ और ऊंची नीची जमीन दिखी। एक स्थान पर कोई पॉलीटेकनिक संस्थान था और एक गौशाला। वे सब दूर से चलते चलते ही देखे उन्होने। उनके चित्र यहां लगा देता हूं जिससे भविष्य में यात्रा करने वालों को स्थान की प्रकृति का कुछ अहसास रहे।

बाड़ी पंहुच गये होंगे हमारे पदयात्री जी साढ़े तीन बजे तक। शाम छ बजे वे मंदिरों के दर्शन को निकलने वाले थे। मैं अगर बीस किलोमीटर चलूं तो दो दिन पांव की मालिश करवाऊंं! गजब की जीजीविषा है प्रेमसागर में चलने और घूमने की। मेरी पत्नी जी कहती हैं – यह उनका और अपना तुलना राग तो छेड़ा ही मत किया करो। तुम्हारी और उनकी यू.एस.पी. अलग अलग विधाओंंमें है। तुम लिखते नहीं तो क्या करते? प्रेमसागर चलते नहीं तो क्या करते? यह जरूर है कि प्रेमसागर के बारे में नहीं लिखते तो कुछ और लिखते।” वे शायद वेगड़ जी कथन से प्रभावित हैं। उन्होने कहा है कि मैं नर्मदा की यात्रा नहीं करता तो क्या करता? मेरा जन्म ही उसके लिये हुआ है।

वन विभाग के रेस्ट हाउस के पास ही है हिंगलाज मंदिर। मूल शक्तिपीठ तो हिंगलाज माता का बलूचिस्तान में है। पर रायसेन जिले का यह मंदिर भी प्राचीन है। किसी साधक को माताजी ने सपने में प्रेरणा दी थी और (कथाओं के अनुसार) कालान्तर में वे बलूचिस्तान के मंदिर से ज्योति ले कर भी आये थे। “उसके बाद माता जी स्वयम यहां प्रकट हो गयी थीं।” नेट पर उपलब्ध सामग्री में इस मंदिर के विलुप्त होने और पुन: जीर्णोद्धार की बात भी है। प्रेमसागर ने बताया कि एक छतरी नुमा इमारत में औरंगजेब की प्रसाद बांटने की शरारत (?) और उनके द्वारा भेजे मांसाहारी भोज के मिठाई में बदल जाने के चमत्कार की कथा भी है। पर मुझे लगता है कि मामला इतिहास के नहीं, आस्था और श्रद्धा के डोमेन में है। इस मंदिर की बहुत मान्यता है। शक्तिपीठ ही माना जाता है इस पीठ को।

मंदिर में वहां के पुजारी जी और माँ हिंगलाज संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य पण्डित देवनारायण त्रिपाठी जी से भेंट हुई प्रेमसागर की। आज की यात्रा के शिव-तत्व-दर्शन में दूसरी घटना प्रेम सागर त्रिपाठी जी से मिलना बताते हैं। त्रिपाठी जी ने उन्हें दो चुनरी, श्रीफल, सेब और केले और दुर्गा सप्तशती की एक पुस्तक उपहार में दी और ढेर सारा आशीर्वाद दिया यात्रा के लिये। प्रेमसागर ने कहा – “वे प्रसाद (भोजन) ग्रहण करने का भी जोर दे रहे थे; भईया, पर रेस्ट हाउस में मेरा भोजन बन रहा था; इसलिये उन्हें मना किया। अन्यथा वहीं प्रसाद ग्रहण करता। कल यहां से निकलते समय यदि हो सका तो उनके पास कुछ देर रुकूंगा। उनकी तरफ से आज नवरात्रि की अष्टमी को जो उपहार मिला, उससे मैं अपने को धन्य मानता हूं। फल तो मैं खा जाऊंगा, पर बाकी उपहार तो मेरे साथ बना रहेगा।”

राम दरबार

पास में ही राम जानकी मंदिर है। रात में रामदरबार के जो चित्र प्रेमसागर ने भेजे वे इतने स्पष्ट नहीं हैं, पर सुंदर पेण्टिंग से लगते हैं। चित्र में पूरे राम परिवार की मूर्तियां सिंगार के साथ हैं।

रेस्ट हाउस में व्यवस्था चंद्रकांत त्यागी जी कर रहे हैं। उन्होने ही बताया है कि कल विनायका (?) के लिये रवाना होंगे प्रेमसागर। वे भोपाल के लिये रवाना होंगे। रास्ते में भोजपुर पड़ेगा जहां विशालकाय शिवलिंग है। अगला मुकाम – विनायका मुझे नक्शे में दिखता ही नहीं। अगला मुकाम नक्शे में देख कर उसकी दूरी ज्ञात करना प्रेमसागर की पदयात्रा अनुशासन में नहीं है। वे रास्ते में लोगों से पूछने, फोन पर मार्ग के बारे में बात कर जानकारी लेने आदि पर ज्यादा यकीन करते हैं। वे जैसे जैसे चलते जायेंगे, वैसे वैसे मार्ग मुझे स्पष्ट होगा।

चंद्रकांत त्यागी

मैं सोचता था कि प्रेमसागर ॐकारेश्वर के लिये होशंगाबाद की ओर निकलेंगे, पर अगर वे भोपाल की ओर निकलते हैं तो पहले उज्जैन जाना होगा – महाकाल दूसरे ज्योतिर्लिंग होंगे उनकी पदयात्रा के। पर पता नहीं उनकी यात्रा की योजना कौन बना रहा है? प्रेमसागर खुद तो बना नहीं रहे। शायद प्रवीण दुबे जी बना रहे हों; या शायद महादेव ही बना रहे हों। उनकी यात्रा का हर दिन, हर मुकाम मेरे लिये अप्रत्याशित ही होता है।

और इस प्रकार की लबड़-धबड़ यात्रा मेरी प्रकृति से फिट नहीं बैठती। पर तुम कर ही क्या सकते हो जीडी? दिनेश कुमार शुक्ल जी मुझसे कहते हैं – “प्रेमसागर को लिखो महराज, पर अपने आसपास का जो देखते-लिखते-बुनते हो, जो इप्रेशनिष्ट कथ्य उसमें निकल कर आता है, उसे कमतर मत आंको।” प्रेमसागर के अगले मुकाम के बारे में अस्पष्टता को ले कर मुझे दिनेश जी की बात याद हो आयी है। प्रेमसागर के चक्कर में कोलाहलपुर की सुंदर मूर्ति बनाने वाले के पास जाना और मिलना रह ही गया। अब नवरात्रि भी बीतने को आयी। आसपास भी देखो, जीडी!

हर हर महादेव!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी (गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा
1332 किलोमीटर
जो सज्जन प्रेमसागर को यात्रा के लिये अपना छोटा-मोटा अंशदान करना चाहें, उनके लिये UPI Address है – 9905083202@ybl
प्रेमसागर किलोमीटर काउण्टर

द्वादश ज्योतिर्लिंग पदयात्रा के प्रथम चरण में प्रयाग से अमरकण्टक तक की यात्रा की पोस्टों की सूची यहां हैं। कुल 25 पोस्टें हैं।
अमरकण्टक से उज्जैन की यात्रा की पोस्टेंं उसके बाद उसी पेज पर हैं।
यात्रा की निकट भूतकाल की कुछ पोस्टें –

41. उदयपुरा से बरेली और नागा बाबा से मिला सत्कार
42. बरेली से बाड़ी, हिंगलाज माता और रामदरबार
43. बाड़ी से बिनेका
44. भोजपुर पंहुचे प्रेमसागर
45. भोजेश्वर मंदिर और भोपाल
46. भोपाल, बारिश, वन और बातचीत
47. भोपाल के आगे निकले प्रेमसागर
48. प्रेमसागर – सिहोर होते हुये आष्टा
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा

उदयपुरा से बरेली और नागा बाबा से मिला सत्कार


12 अक्तूबर 21 रात्रि –

आज सवेरे उदयपुरा से निकलने के एक घण्टे बाद ही प्रेमसागर को एक छोटी नदी का बड़ा पुल मिला। नर्मदा के उत्तर में यह नदी है तो और उत्तर में विंध्य की किसी पहाड़ी-जंगल से निकलती होगी। सवेरे के गोल्डन ऑवर की रोशनी में चित्र अच्छा आया है। नक्शे में खूब छानने पर भी दिखी नहीं। ऐसी अनेक नदियों का मकड़जाल बिछा है नर्मदेय क्षेत्र में। यह सब नर्मदा का सौंदर्य बढ़ाता है। क्या उपमा देंगे? ये नर्मदा की घनी केश राशि की एक एक लटें हैं?

उदयपुरा और बरेली – दोनो मध्यप्रदेश में हैं; राजस्थान और उत्तरप्रदेश में नहीं। प्रेमसागर को आज उदयपुरा से आगे बढ़ना है होशंगाबाद की ओर। नर्मदा से उत्तर में है यह मार्ग। करीब 8-10 किलोमीटर नर्मदा तट से दूर। किनारे किनारे चलने वाले परकम्मावासी यह मार्ग नहीं चुनते होंगे। पर नक्शे में मैं देखता हूं तो ढेरों मंदिर पड़ते हैं रास्ते में। मुख्य हनुमान जी और माता जी के हैं। कुछ बाबा लोग भी हैं – हरदौल बाबा, मेणे वाले बाबा, पटेल बाबा, मंदारी बाबा आदि। ये बाबा लोकल देवता होंगे। या शिवजी ही ग्लोकल हो कर बाबाओं में रूपांतरित हुये हों। कहीं कहीं मंदिरों में हनुमान जी के साथ शिवजी का ड्यूयेट भी दिखता है नक्शे में। यह जरूर है कि राम-जानकी-कृष्ण बड़े मार्जिन से हनुमान जी से पापुलर वोट हारते दीखते हैं। “राम से अधिक राम कर दासा” वाली बात सिद्ध है!

दिन में एक नदी और एक नहर और मिली रास्ते में। नाम पता नहीं चला। रास्ते में कोई आदमी आसपास नहीं था, जिससे प्रेमसागर पूछते। कुल मिला कर जल की कमी नहीं इस इलाके में। मईया का प्रताप है कि जो भी फसल लेना चाहो, हो जाती है। सांवां, कोदों, तिन्नी – सब होता है मोटे अनाज के रूप में। अरहर और धान के खेत भी दिखे प्रेमसागर को। एक जगह चने की बुआई भी हो रही थी। ग्रामीण सड़क से थोड़ा दूर था, वहां तक जा नहीं पाये।

ग्यास और प्रीतम। इन दो बच्चों ने प्रेमसागर को राह चलते रोका और मंदिर में बिठा कर साबूदाने की खीर खिलाई।
माता जी का मंदिर

सवेरे साढ़े नौ बजे एक मंदिर पर समय गुजारने के चित्र भेजे हैं चलते चलते प्रेम सागर ने। माता के दरबार के नाम से जानी जाती है यह जगह। वहां दो बच्चों ने प्रेमसागर को राह चलते रोका और मंदिर में बिठा कर साबूदाने की खीर खिलाई। नवरात्रि का समय है सो साबूदाने की ‘फलहारी’ खीर थी जो व्रत करने वाले भी खा सकें। बच्चों के नाम भी लिखे हैं प्रेमसागर ने। ग्यास और प्रीतम।

चार घण्टे से ज्यादा चल चुके थे माता जी के मंदिर तक प्रेमसागर। साबूदाने की खीर खा कर वहीं विश्राम करने लगे। बारह बजे तक वहीं आराम किया। अपनी आगे की यात्रा का समय-आकलन उन्होने कर लिया होगा अन्यथा आराम के लिये रुकने की बात तो साढ़े नौ बजे नहीं एक डेढ़ घण्टे बाद उठती है जब धूप और तेज हो जाती है। बाद में प्रेमसागर ने बरेली पंहुचते पंहुचते फोन पर बताया कि वहीं पर एक नागा बाबा थे, जूना अखाड़े के। चलते समय वे प्रेमसागर की बिदाई करने लगे। बिदाई की विधिवत परम्परा निर्वहन के साथ उन्हें पांच सौ एक रुपये भी दे रहे थे। प्रेम सागर ने मना किया और मात्र एक रुपया लेने की बात की। “भईया जूना अखाड़ा के नागा बाबा लोगों में इस तरह बिदाई करने और मान सम्मान करने का चलन है।”

“अरे यह क्या बात हुई आपको पांच सौ एक रख लेना चाहिये था!”

“नहीं भईया, नागा लोगों का दिया धन पचाना आसान बात नहीं है। मेरे मना करने पर भी पचास रुपया और दिये नागा बाबा। नाम पूछने पर बताये कि जब सन्यासी बन गये तो नाम का क्या। कपड़ा-लंगोट कुछ नहीं पहने थे। बस एक गमछा लपेट लिये थे लोगों के सामने आने के समय।”

जूना अखाड़े के नागा बाबा

मेरी पत्नी जी से सुना तो टिप्पणी की – “बकलोल हैं प्रेम सागर। जो मिल रहा था, रख लेना था। इन अखाड़ा-वखाड़ा वाले बाबा लोगों के पास खूब सम्पदा है। खूब पैसा है। उनसे जो मिले ले लेना चाहिये!” 😆

फिर जोड़ा – “पर शायद ठीक किया; उस लकड़हारे की तरह जिसने देवता से सोने, चांदी की कुल्हाड़ियां लेने से मना कर दिया था यह कह कर कि उसकी कुल्हाड़ी तो लोहे की है। और देवता ने उसे तीनो कुल्हाड़ियां दे दी थीं। हो सकता है अंतत: प्रेमसागर के साथ महादेव कुछ वैसा ही करें। परीक्षा बहुत लेते हैं ये महादेव!”

रास्ते में चलते हुये लोगों ने प्रेमसागर को हाईवे पर चलने की बजाय खेत की मेड़ पकड़ कर तिरछे निकलने का एक रास्ता बताया। उसपर चल दिये प्रेमसागर। जब सड़क से दूर हो गये तो लोकेशन बताने वाला एप्प भ्रमित हो कर अण्टशण्ट लोकेशन बताने लगा। अंतत: उन्हें एक छिंद धाम के इन्टीरियर मंदिर परिसर में दिखाया। छिंद धाम में मध्यप्रदेश भर के लोग मनौती के लिये आते हैं। मंत्री भी आते हैं और संत्री भी। वहां हनुमान जी का मंदिर है और राम जानकी भी हैं। मनौती वाले देव शायद हनुमान जी हैं और पीपल के दो विशालकाय वृक्ष।

वहां से सिंगल लेन वाली सड़क बरेली आती है। पता चला कि खेतों की मेड़ लांघते प्रेमसागर छिंद धाम पंहुचे थे। कीचड़ में पैर भी धंसे पर पांच किलोमीटर बचाने की चहक उनकी आवाज में थी। …. मैंने दोनो मार्गों का तुलनात्मक अध्ययन किया नक्शे पर। पूरी तरह परखने पर उन्होने कुछ खास नहीं बचाया था चलने में। पर खेतों में धंस कर आने का एडवेंचर तो मिला ही होगा। समय उन्हें उतना ही लगा। या शायद कुछ ज्यादा ही। पैर भी कीचड़ में सने होंगे जो उन्होने छिन्द धाम के सरोवर में धोये होंगे। पर उनकी जगह अगर मैं होता तो मैं भी यह “छोटे रास्ते पर चलने” का एडवेंचर ही करता! गांव के टेढ़े-घुमाव वाले रास्तों पर चलने का अपना ही आनंद है!

प्रेमसागार और महेंद्र सिंह राजपूत

उदयपुरा से बरेली नक्शे में 35 किमी दूर है। महेंद्र सिंह राजपूत, जिनके यहां उदयपुरा में आतिथ्य पाये थे प्रेमसागर; उनकी ससुराल है बरेली में। उन्होने सत्कार उदयपुरा में किया तो बरेली में उनके ससुराल वालों की बारी थी पुण्य लूटने की। प्रेमसागर पदयात्रा करते वहां पंहुचे तो महेंद्र सिंह और उनका परिवार के अन्य लोग पीछे से आये। उनका आने का ध्येय “महराज” जी को ससुराल वालों से परिचित कराना था। नवरात्रि का समय है तो वे लोग रुके नहीं। रात में नौ-दस बजे के बीच वापस उदयपुरा लौट गये।

पैंतीस किलोमीटर चल कर बरेली आने और लौटने का यह कार्य केवल महराज रूपी अतिथि को हैण्ड-ओवर करना भर था। आतिथ्य की परम्परा का यह डायमेंशन “नर्मदे हर” के क्षेत्र में ही हो सकता है जहां परकम्मा करने वालों का सत्कार उनकी संस्कृति का अंग बन गया है! स्लाइड-शो में देखा जा सकता है कि प्रेमसागर जी के लिये कितने लोग थे। इतने लोग प्रेमसागर के निमित्त इकठ्ठा हुये तो सेलिब्रिटी बन ही गये हैं वे!

रात आठ बजे ही मुकाम पर पंहुचे प्रेमसागर। आज पैर में तकलीफ वाली बात नहीं की उन्होने और मैं पूछ भी नहीं पाया। पंहुचने पर ठकुराइन के मायके वालों के आदर सत्कार में ही डूब गये होंगे वे। उसके बाद न उनका फोन आया और न कोई मैसेज ही। अगले दिन सवेरे उन्होने बताया कि भोजन शानदार बना था और मीठा में खीर और रसमलाई दोनो थी। कांवर यात्रा में पैर की ऐसीतैसी तो होती है पर भाव भी खूब छक रहे हैंं प्रेमसागर। यह मैंने कहा तो तुरंत उन्होने जोड़ा – भईया आपका आशीर्वाद है।

आशीर्वाद मेरा है और भोजन का आनंद वे ले रहे हैं! 😆

आगे वन विभाग के एसडीओ साहेब तरुण जी ने प्रेमसागर के लिये इंतजाम कर रखा है। बरेली से बारी अगले दिन उन्हें पंहुचना है जो मात्र बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर है।

13 अक्तूबर की यात्रा छोटी है – बरेली से बारी

उसकी चर्चा अगली पोस्ट में होगी!

हर हर महादेव! नर्मदे हर! जय हो!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी (गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा
1332 किलोमीटर
जो सज्जन प्रेमसागर को यात्रा के लिये अपना छोटा-मोटा अंशदान करना चाहें, उनके लिये UPI Address है – 9905083202@ybl
प्रेमसागर किलोमीटर काउण्टर

द्वादश ज्योतिर्लिंग पदयात्रा के प्रथम चरण में प्रयाग से अमरकण्टक तक की यात्रा की पोस्टों की सूची यहां हैं। कुल 25 पोस्टें हैं।
अमरकण्टक से उज्जैन की यात्रा की पोस्टेंं उसके बाद उसी पेज पर हैं।
यात्रा की निकट भूतकाल की कुछ पोस्टें –

41. उदयपुरा से बरेली और नागा बाबा से मिला सत्कार
42. बरेली से बाड़ी, हिंगलाज माता और रामदरबार
43. बाड़ी से बिनेका
44. भोजपुर पंहुचे प्रेमसागर
45. भोजेश्वर मंदिर और भोपाल
46. भोपाल, बारिश, वन और बातचीत
47. भोपाल के आगे निकले प्रेमसागर
48. प्रेमसागर – सिहोर होते हुये आष्टा
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा

कुछ और चलें – गाडरवारा से उदयपुरा


11 अक्तूबर, रात्रि –

दूरियां जल्दी तय कर लेने का लालच (?) है प्रेमसागर को। उन्होने सोचा था कि पच्चीस किलोमीटर के हिसाब से मुकाम रखेंगे। उसी हिसाब से उन्हें गाडरवारा से चल कर सांईखेड़ा तक चलना था। पर दस-इग्यारह बजे तक उन्हें लगा कि काफी दूरी तय कर ली है। इसके अलावा मौसम भी अच्छा है। सांईखेड़ा तो वे तीन बजे तक पंहुच ही जायेंगे। कुछ और चलें तो नर्मदा पार कर उदयपुरा भी पंहुच सकते हैं। वहां भी रुकने का विकल्प है। वहां के लोग भी फोन कर आमंत्रित कर रहे हैं।

और प्रेमसागर ने आगे बढ़ने का निर्णय किया। दो बजे मैंने नेट पर नक्शे में देखा – बड़ी तेजी से प्रेम सागर आगे बढ़ रहे थे। पर सांईखेड़ा में उन्हें देर तक रुके पाया। रुकने वाली जगह पर कोई गूगल मैप में एक मैडीकल स्टोर दिखाई दे रहा था। हो सकता है वहां कोई दवाई लिए हों। वहां से चलने पर उनकी चाल धीमी लगने लगी थी।

नर्मदा किनारे तो बहुत देर तक कोई गतिविधि नहीं नजर आयी। करीब घण्टा भर हुआ। वे नदी के करीब थे, पर नक्शे के स्टेटस के हिसाब से नदी पार नहीं की थी।

वहीं से उनका फोन शाम छ बजे मुझे आया – “भईया जरा देख कर बतायें यहां से अभी कितना दूर है उदयपुरा।”

सवा आठ किलोमीटर है। पर बहुत देर से आपने नदी पार नहीं की। क्या दिक्कत है?”

“पैर में दर्द हो रहा है। मालिश कर रहा हूं। उदयपुरा से फोन कर रहे हैं। आठ किलोमीटर है तो दो घण्टा लगेगा। पन्द्रह मिनट में एक किलोमीटर चलता हूं मैं।” – प्रेमसागर की आवाज में संतोष था। वे आठ बजे तक तो पंहुच ही जायेंगे!

मुझे अपनी दशा सम्पाती की तरह लगी। रामायण का वह गीध और किसी प्रकार से वानरों की सहायता नहीं कर सकता था। उसके पंख जल चुके थे और वह बूढ़ा भी था। खुद जा कर लंका से सीता की सुधि नहीं ला सकता था। वह केवल यह देख सकता था कि लंका कितनी दूर है और उसमें सीता कहां पर हैं। मैं भी केवल यह बता सकता था कि प्रेमसागर का गंतव्य कितना दूर है। यह बता सकता था कि रास्ते में एक और नदी – मच्छवई नदी – और पड़ेगी। पतली सी नदी दिखती है नक्शे में। हो सकता है सूखी हुई हो। और, कोई शॉर्टकट नहीं है जिसे पकड़ा जा सके। नक्शे के हिसाब से सीधा रास्ता है उदयपुरा का। सड़क लगभग कौव्वा-उड़ान के रास्ते के हिसाब से है।

हनूमान (प्रेमसागर) नर्मदा तट पर थे और सम्पाती (मैं) अपने घर, जिला भदोही में। हनूमान के पास अपना भी गैजेट था, अपना जंतर, अपना मोबाइल। उसमें देख सकते थे कि कितनी दूर है उदयपुरा। पर उन्हे मुझ सम्पाती से जानना था! 😆

अंतत: वे सात साढ़े सात बजे तक छू ही लिये उदयपुरा। नक्शे में कुल चालीस किलोमीटर है यह गाडरवारा से। नक्शे में दिखाई दूरी में आसपास का और चलना जोड़ लें 42-43 किमी चलना हुआ होगा। पच्चीस किमी चलना तय किया पर चले उससे पंद्रह सत्रह किलोमीटर ज्यादा।

दूरी तय करने का लोभ प्रेमसागर में है और उसका कोई तोड़ नहीं है। उसके लिये उनके पास तर्क हैं। … पैर में दर्द इसलिये हुआ कि रास्ते में कोई चाय का दुकान नहीं मिला। चाय न मिले तो कोई बात नहीं, आराम कहीं भी किया जा सकता था पर मेन बात कांवर को ऊंचे जगह पर रखने की है; वह चाय की दुकान पर ही हो पाता है। इसी तरह के और तर्क थे प्रेम सागर के पास। “पैर में दर्द है भईया पर एक ठो टैबलेट खा लेंगे, रात में सोयेंगे तो ठीक हो जायेगा।”

पता नहीं, महादेव कह रहे हैं क्या कि टैबलेट खा बेट्टा, और चला चल?! महादेव हैं मूडी देवाधिदेव। ऐसी प्रेरणा दे सकते हैं। … मैंने प्रेमसागर से तर्क करना बंद कर दिया। कांवर प्रेम सागर की, संकल्प प्रेम सागर का, यात्रा प्रेमसागर की; मैं जबरी उनके पैर के दर्द को ले कर दुबला हो रहा हूं। … तुमसे अपने गठियाग्रस्त पैर के दर्द का इलाज तो होता नहीं और तुम नसीहत देते हो प्रेमसागर को, जीडी! बंद करो अपनी एम्पैथी! मैं चुप हो गया।

वैसे भी, कल नीरज रोहिल्ला ने टिप्पणी की थी –

रीताजी की बात में दम है (पूर्ण सहमति नहीं है अभी), इंजीनियरिंग में कहते हैं 1st order effect, 2nd order and 3rd order etc. उनकी यात्रा का 1st order ध्येय किसी भी प्रकार बाधित न हो, एक सूत भी नहीं, तभी बाकी करेक्शन लगाए जा सकते हैं। 🙂

नीरज की फेसबुक पेज पर टिप्पणी

प्रेमसागर का फर्स्ट ऑर्डर ध्येय यात्रा को (जल्दी) सम्पन्न करना है। और वे अपनी क्षमताओं का पूरा दोहन उसके लिये करना चाहते हैं। तब सेकेण्ड ऑर्डर, थर्ड ऑर्डर ध्येय का प्रश्न ही नहीं उठता। पीरियड।

मैं सोचता था कि अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करने के लिये प्रेमसागर को ज्यादा ध्यान देना चाहिये पर प्रेमसागर जानते हैं अपनी कुल्हाड़ी की गुणवत्ता। सौ से ज्यादा बार सुल्तानगंज से देवघर कांवर ले कर चल चुके हैं। उन्हें संज्ञान है कि उनकी कुल्हाडी टॉप क्लास है।


सवेरे गाडरवारा से निकल कर प्रेमसागर ने एक दुकान पर चाय पी। चाय सर्व करने वाले का चित्र उन्होने भेजा है। इकहरे बदन का आदमी। कांधे पर एक नेपकिन लिये है और हाथ में चाय का पेपर कप। कुल्हड़ का चलन मध्यप्रदेश में नहीं है। कुम्हार अपनी मिट्टी बारबार उपयोग किये जा सकने वाले उपकरणों को बनाने में करता है एक बार चाय पी कर फैंकने वाले कुल्हड़ में नहीं। वहां गांगेय पीली मिट्टी बहुतायत में नहीं होती। वैसे कुल्हड़ न हो तो पेपर कप अगला उपयुक्त बायो डीग्रेडेबल विकल्प है। यहां उत्तर प्रदेश में तो लोग पैसा बचाने के लिये कुल्हड़ और पत्तल की बजाय प्लास्टिक की ग्लास और थर्मोकोल की प्लेट चलाते हैं जो अंतत: पोखर-ताल-नदी को चौपट करती है। मुझे वह चाय वाला आदमी और वह पेपर कप देख कर अच्छा लगा।

चाय की वह छोटी दुकान नहीं थी, सड़क किनारे का बड़ा रेस्तरां था। शायद गाडरवारा कस्बे के छोर पर ही होगा। साफ सुथरी जगह। बड़ी जगह पर चाय के पैसे भी ज्यादा लगे होंगे। सवेरे सवेरे उसमें प्रेमसागर के अलावा कोई और ग्राहक नजर नहीं आता था उस चित्र में जो प्रेम सागर ने भेजा था।

रास्ता अच्छा था – स्टेट हाईवे है वह। बबूल के पेड़ बहुत थे सड़क किनारे, जैसा प्रेमसागर ने बताया। मौसम भी साथ दे रहा था। धूप असहनीय नहीं थी। प्रेमसागर प्रसन्न थे और सांईखेड़ा में रुकने की बजाय आगे बढ़ जाने की सोचने और उस हिसाब से मुझे तर्क देने लगे थे।

रास्ता अच्छा था – स्टेट हाईवे है वह।

आसपास खेती थी, गन्ना ज्यादा दिखा प्रेमसागर को। नर्मदा घाटी का इलाका है। सतपुड़ा और विंध्य की ऊंचाइयों से झरता पानी इस घाटी में आता होगा, सो पानी पर्याप्त मिल जाता होगा गन्ने की खेती के लिये – यह मेरी अटकल है। अन्यथा पश्चिमी मध्यप्रदेश – मालवा इलाके में जहां मैंने दो दशक गुजारे हैं, गन्ने की खेती की किसान सोच भी नहीं सकता था। “लोग बता रहे थे कि इस नर्मदेय क्षेत्र में जमीन का ये हाल है कि सब तरह की फसल हो जाती है यहां – धान, गेंहू, गन्ना, चना, मक्का …।”

साईंखेडा से 12 किमी पहले, एक हनुमान जी के मंदिर में एक विरक्त साधू के समीप प्रेमसागर कुछ समय बैठे।

रास्ते में, साईंखेडा से 12 किमी पहले, एक हनुमान जी के मंदिर में एक विरक्त साधू के समीप प्रेमसागर कुछ समय बैठे। वे साधू (या सज्जन) सामान्य साधू वाले वेष में नहीं थे। ध्यानमग्न थे। उनके हाथ “आजानुभुज” थे। कृषकाय शरीर। चेहरे पर शांति थी और शरीर की नसें फूली देखी जा सकती थीं। एक टाट पर बैठे थे। व्यक्तित्व आकर्षक था। ऐसे कई लोग, जो तपस्या करते हैं, मिल जाते हैं। उन्हें ढूंढने बहुत दूर नहीं जाना पड़ता। बस आपकी प्रवृत्ति, आपकी ट्यूनिंग वैसी होनी चाहिये। उनसे बात भी हुई प्रेमसागर की। यात्रा की बात सुनी तो महात्मा जी अपनी मोहमाया की बात करने लगे। विरक्त हो गये हैं पर परिवार अभी भी साथ जुड़ा है। मोहमाया छूटती नहीं। प्रेमसागर से उन्हें तुलना करने की जरूरत आन पड़ी। महात्मा जी शायद तुलना-वृत्ति से उबर नहीं सके हैं।

एक चाय की दुकान वाला बहुत स्नेही जीव था। सड़क से प्रेमसागर को बुला कर ले गया और चाय नाश्ता कराया। फलहारी चिवड़ा भी खिलाया। नाम बताया राकेश। एक फोटो भी लिया प्रेमसागर ने चाय वाले का। चित्र में समोसे के साथ तली हुई बड़ी बड़ी हरी मिर्चें रखी हैं। प्रेमसागर का कहना है कि हरी मिर्च खानी चाहिये। उससे पेट खराब नहीं होता और एक भी बीज अगर पेट में है तो बुखार नहीं आता। मेरा हरी मिर्च का अनुभव शून्य है। कभी गलती से एक टुकड़ा खाने में चला जाये तो ढेर सारा पानी पीना पड़ता है और तुरंत उसके एण्टी-डोट की तरह गुड़ की भेली की याद हो आती है। दुनियां दो खेमे में बंटी है – मिर्च भक्त और मिर्च द्रोही! प्रेमसागर और ज्ञानदत्त दो अलग अलग खेमे के हैं! 😆

चाय की दुकान वाला राकेश

रात साढ़े सात बजे प्रेमसागर उदयपुरा के महेंद्र सिंह राजपूत जी के घर पर पंहुचे। वहां उनका आदर सत्कार हुआ। ठहरने के लिये पास के एक होटल के कमरे की व्यवस्था थी। महेंद्र सिंह जी दो भाई हैं और ज्वाइण्ट फैमिली रहती है। उन दोनो की पुत्रियां और बेटा हैं और चित्र में उनके बुजुर्ग पिताजी भी हैं। थके थे प्रेमसागर, सो टैबलेट खा कर सोये। मुझे कोई चित्र भेजने-बातचीत करने का अनुष्ठान भी अगले दिन सवेरे पूरा हुआ।

कल सवेरे भोर में ही उन्हें बरेली के लिये निकलना है। मध्यप्रदेश का यह बरेली उदयपुरा से 35-37 किमी दूर है। चलने में, आटे के साथ नमक बराबर उससे ज्यादा ही हो जाता है, जो नक्शे में दिखाया जाता है। दूसरे दूरी रास्ते की दुरुहता का मापदण्ड तो होती नहीं। पर दूरी से एक आंकड़ा तो मिलता ही है। आकलन के अनुसार उदयपुरा तक प्रेमसागर 1083 किमी चल चुके हैं। इससे ज्यादा ही चले होंगे, कम नहीं।

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी (गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा
1332 किलोमीटर
जो सज्जन प्रेमसागर को यात्रा के लिये अपना छोटा-मोटा अंशदान करना चाहें, उनके लिये UPI Address है – 9905083202@ybl
प्रेमसागर किलोमीटर काउण्टर

द्वादश ज्योतिर्लिंग पदयात्रा के प्रथम चरण में प्रयाग से अमरकण्टक तक की यात्रा की पोस्टों की सूची यहां हैं। कुल 25 पोस्टें हैं।
अमरकण्टक से उज्जैन की यात्रा की पोस्टेंं उसके बाद उसी पेज पर हैं।
यात्रा की निकट भूतकाल की कुछ पोस्टें –

41. उदयपुरा से बरेली और नागा बाबा से मिला सत्कार
42. बरेली से बाड़ी, हिंगलाज माता और रामदरबार
43. बाड़ी से बिनेका
44. भोजपुर पंहुचे प्रेमसागर
45. भोजेश्वर मंदिर और भोपाल
46. भोपाल, बारिश, वन और बातचीत
47. भोपाल के आगे निकले प्रेमसागर
48. प्रेमसागर – सिहोर होते हुये आष्टा
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा
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