आते रहा करो चच्चा!


लोग और मीडिया कह रहे हैं कि क्लाइमेट चेंज से प्रेरित मौसम गड्ड-मड्ड हो रहे हैं। मुझे भी लग रहा है।

बीस साल पहले जब मैं रतलाम में रहता था तो वहां सर्दियां शुष्क होती थीं और वातावरण में धूल ज्यादा ही होती थी। वहां के शुरुआती दिनों में मैंने देखा था कि नगरपालिका पानी के टेंकरों से दो बत्ती चौराहे (जिसे रतलाम का इण्डियागेट या कनाटप्लेस जैसी जगह कहा जा सकता था और जहां मेरा दफ्तर – डीआरएम ऑफिस – हुआ करता था) पर धूल से निजात के लिये सड़क धोया करती थी। सूखे मौसम और धूल के कारण मुझे सांस लेने में सर्दियों में दिक्कत हुआ करती थी। कभी कभी तो मैं केडीला का इनहेलर – जो दमा के मरीज ले कर चला करते हैं – अपने पास रखता था।

उसके बाद जब मेरी पोस्टिंग उत्तर प्रदेश की तराई के इलाके – गोरखपुर – मे हुई तो वहां की नमी के कारण मुझे सांस लेने में कभी दिक्कत नहीं हुई। सर्दियों में खांसी और/या सांस भारी चलने की कभी शिकायत नहीं हुई। लेकिन अब, इस साल वातावरण में शुष्कता और धूल यहां वैसी ही है, जैसी मध्यप्रदेश के मालवा में हुआ करती थी। अब महीने भर से ज्यादा हो गया जब मेरी खांसी नहीं जा रही और कभी कभी सांस लेने में भी दिक्कत हो रही है। सवेरे बाहर साइकिल ले कर निकलते समय एक पतला मास्क लगाने से आराम मिल रहा है। उससे मुंह पर ठण्डी हवा भी नहीं लगती और धूल से भी बचाव हो रहा है। बस यही दिक्कत है कि मास्क लगाते समय चश्मा उतार देना होता है अन्यथा सांस की भाप उसपर जम कर दृष्यता कम कर देती है।

सांस की समस्या को ले कर मैं महराजगंज कस्बे के आयुर्वेदिक अस्पताल गया। खांसी-सर्दी के लिये वहां पखवाड़े पहले गया था। उनके आयुष किट से लाभ भी हुआ था। खांसी कम हो गयी थी। पर सांस की दिक्कत कायम थी या बढ़ गयी थी। … वातावरण में धान की कटाई और पुआल की ढुलाई/उससे भूसा बनाने की प्रक्रिया में तेजी आने से धूल ज्यादा ही कष्ट दे रही है।


अस्पताल में फार्मासिस्ट शिवपूजन त्रिपाठी ही थे।

अस्पताल में फार्मासिस्ट शिवपूजन त्रिपाठी ही थे। डाक्टर साहब आज भी नहीं थे। शिवपूजन जी ने बताया – “चच्चा, यहां तो छोटा अस्पताल है। भदरासी (मोहन सराय और अदलपुरा के बीच बनारस से निकटस्थ स्थान) में बड़ा, पचास बिस्तर का अस्पताल है। वहां सर्जरी भी होती है। वहां डाक्टर साहब हफ्ते में तीन दिन अटैच हैं। यहां तो वे सोम, बुध और शुक्रवार को ही मिल सकेंगे।”

खैर, मेरा ध्येय तो दवाई लेना था। मेरे लिये तो शिवपूजन जी का होना ही पर्याप्त था। उनसे पिछली मुलाकात पर लिखी ब्लॉग पोस्ट उन्होने पढ़ी थी। अच्छी ही लगी होगी उन्हें। उसी का परिणाम था कि बड़े मनोयोग से उन्होने और उनके सहायक मनोज ने मेरे लिये सप्ताह भर की दवाओं की पुड़ियाँ बना कर मुझे दीं।

उन्होने बताया – एक पुड़िया में शीतोपलादि, गोदंती, शंख, सोम और चिरायता का मिश्रित चूर्ण है। उसे सुबह शाम शहद के साथ लेना है। दूसरी पुड़िया में चंद्रामृत रस, त्रिभुवनकीर्ति रस, खरिरादि वटी और आयुष-64 वटी हैं। उन्हें पानी के साथ लिया जा सकता है।

बड़े मनोयोग से शिवपूजन त्रिपाठी जी और उनके सहायक मनोज ने मेरे लिये सप्ताह भर की दवाओं की पुड़ियाँ बना कर मुझे दीं।

इन दवाओं के अलावा मुझे आयुष-किट भी पुन: दिया। “चच्चा, आप जैसे उम्र वालों के लिये ही विशेष रूप से सरकार ने सप्लाई किया है। आप जो बाजार से खरीद कर चवनप्राश सेवन कर रहे हैं, उसकी बजाय इस किट वाला ही पहले खाइये, यह ज्यादा गुणकारी है।” – त्रिपाठी जी ने अपने भरपूर आदर और स्निग्धता से मुझे सिंचित कर दिया।

त्रिपाठी जी धूप में बैठे थे। मुझे भी आग्रह किया – “थोड़ी देर बैठि क धूप ल चच्चा। (थोड़ी देर धूप का आनंद लीजिये चच्चा।)”

वहां से मैं चलने को हुआ। मेरा वाहन चालक गाड़ी घुमा चुका था। त्रिपाठी जी ने कहा – “आपने अपने लेख में लिखा था कि अगली बार साइकिल से आयेंगे। आप साइकिल से आये होते तो और अच्छा लगता चच्चा! बाकी, आप आते रहा करें। आपका आना अच्छा लगता है और हम भी कुछ नया सीख सकते हैं।”

लेखनी का प्रभाव होता है; नहीं?! आप किसी के बारे में सकारात्मक लिखें, बिना किसी अतिरेक भरी लप्पो-चप्पो के। सीधा और सरल लिखा तो उस व्यक्ति को, अपरिचित होने पर भी, स्नेह सिंचित कर ही देता है। त्रिपाठी जी द्वारा मुझे दिया आदर-स्नेह मुझे यह गहरे से अहसास करा गया।

मैं डाक्टर साहब से मिल कर दीर्घायु और उसके लिये उचित आयुर्वेदिक जीवन पद्धति के बारे में उनके विचार जानना चाहता था। वह फिर कभी। अभी तो यह विचार गहरे से बना रहा कि शिवपूजन त्रिपाठी जी से मिलने ही वहां जाया जा सकता है। जब मन आये तब!

चलते समय त्रिपाठी जी ने फिर कहा – आवत रहा करअ चच्चा! (आते रहा करो चच्चा!)।


गांवदेहात में आने पर चच्चा, फुफ्फा, दद्दा जैसे सम्बोधन मिलते हैं मुझे। अजब गजब तो तब था जब मैं सड़क पर साइकिल से गुजर रहा था और सड़क किनारे निपटान को बैठी पांच छ साल की लड़की वहीं से बोली थी – पालागी दद्दा! लड़की का नेकर या पायजामा निपुचा हुआ था पर माता पिता के दिये बड़ों के अभिवादन के संस्कार उसमें कायम थे!

इन सम्बोधनों के अलग पूरी कामकाजी जिंदगी तो गुजार दी “सर” नामक सम्बोधन सुनते हुये।

यहाँ भी मुझे अफसर मानता हुआ गांव का ही एवजी चौकीदार लगा हुआ वह आदमी सवेरे मुझे सैर के लिये निकलते देख अपनी जगह से उठ कर अटेंशन की मुद्रा में हाथ नीचे कर मुठ्ठियां बांधे कहता है – गुड नाइट सर!

इन सब के सम्बोधन में कतरा कतरा ह्यूमर है। पर शिवपूजन त्रिपाठी जी के ‘चच्चा’ में आदर सिंचित अपनत्व है! जय हो!


धूप सेंकते हुये इचिगो इची


बहुत दिनों बाद जुकाम काबू में आया था। बहुत दिन बाद धूप में लेटना, तीखी धूप होने के बावजूद भी, अच्छा लग रहा था। मोबाइल या टैब पर धूप में पढ़ना अच्छा अनुभव नहीं होता। सो मैं ऑडीबल पर हिंदी में इचिगो इची सुन रहा था। सुनते हुये अमेजन पर चक्कर भी लगा आया था कि किताब खरीदी जाये या नहीं, और खरीदी जाये तो हिंदी में या अंग्रेजी में। ऑडीबल पर तो मैम्बरशिप होने के कारण फ्री में सुनने को मिल रही थी।

आधी से ज्यादा सुनने के बाद पुस्तक अच्छी तो लगी पर यह तय किया कि पुस्तक कहीं से मुफ्त में मिल जाये या पुस्तक का सार संक्षेप ब्लिंकिस्ट पर मिल जाये तो खरीदने से बचा जा सकता है।

मैं उस पुस्तक के दूसरे भाग को सुन रहा था जिसमें सुनने, देखने, स्पर्श, स्वाद, गंध और एकाग्रता के साथ प्रयोग करने की बातें हो रही थीं। इस बीच अरुणा (नौकरानी) चाय दे कर गयी। चाय और नमकीन पर बिना ध्यान दिये, सुनने में तल्लीन मैं चाय पीता जा रहा था। अचानक ध्यान आया कि मुझे इस क्षण में एकाग्रता का प्रयोग करना चाहिये।

इस बीच अरुणा (नौकरानी) चाय दे कर गयी। चाय और नमकीन पर बिना ध्यान दिये, सुनने में तल्लीन मैं चाय पीता जा रहा था। अचानक ध्यान आया कि मुझे इस क्षण में एकाग्रता का प्रयोग करना चाहिये।

ऑडीबल सुनने को पॉज दे कर मैंने अपनी आंखें बंद कीं। चाय का मग एक हाथ से लिया और दूसरे से एक एक टुकड़ा नमकीन खाने लगा। सेव के टुकड़ों के आकार को अनुभव करता गया। मुंह में नमकीन की कुरकुराहट महसूस की। नमकीन घर में बनी थी, सो मालुम था कि उसमें अच्छी गुणवत्ता का बेसन, दो छोटे मसले हुये आलू, मूंगफली का तेल और सेंधा नमक था। उसके अलावा और कोई मसाला नहीं। आलू के कारण मनमाफिक कुरकुराहट थी। आंख बंद कर स्पर्श और स्वाद लेते हुये वह ज्यादा ही महसूस हो रही थी। सूंघने पर (जुकाम कुछ ठीक होने पर गंध महसूस होने में ज्यादा दिक्कत नहीं थी) यह भी लग रहा था कि तेल की क्वालिटी भी उत्तम है। चाय में भी काली मिर्च, दालचीनी और इलायची-सोंठ का स्वाद जो पहले आधा कप खत्म करते हुये नहीं ध्यान दिया था, अब पता चल रहा था और अच्छा लग रहा था।

हजारा की छोटी झाड़ी पर फल लदे थे और वे हरे से रंग बदल कर सुनहरे हो रहे थे।

चाय खत्म होने के बाद मैंने आंखें खोलीं। आसपास जो भी था उसे एक नये कोण से देखा। हजारा की छोटी झाड़ी पर फल लदे थे और वे हरे से रंग बदल कर सुनहरे हो रहे थे। बदाम के पत्ते भी हरे से लाल हो रहे थे। किसम किसम के फूलों की गंध भी मैंने सूंघी। उन गंधों को नाम तो नहीं दे सकता पर आंख बंद होने पर वे फूल सामने लाये जायें तो (लगभग) बता सकता हूं कि कौन सा फूल है।

घर परिसर में वनस्पति और जीव, रंग और गंध, समय के साथ उनकी वृद्धि और बदलाव – कितना कुछ है जिसे देखा-महसूसा जा सकता है। उसके लिये इन पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होने की आवश्यकता नहीं कि यह हिंदू जीवन धारा है या बौद्ध-जेन। यह भी जरूरी नहीं कि उनका सम्बंध जीवन-मृत्यु, शाश्वतता या नश्वरता से जोड़ने तोड़ने का उपक्रम किया जाये। कोई यह फलसफा भी ठेलने की जरूरत नहीं कि हम भूत-वर्तमान-भविष्य के किस हिस्से में जी रहे हैं। इचिगो इची आपकी अनुभूति धारा ट्रिगर कर सकती है; पर जरूरी नहीं कि आप उस धारा में बह निकलें। बह गये तो आप किताब खरीद लेंगे और शायद कभी पढ़ेंगे नहीं।

तबीयत ठीक हो जाये; मौसम की धूल हवा से गायब हो जाये; अस्थमा का अहसास जाता रहे; तब किताब पढ़ना, धूप सेंकना, तितली, फलों, फूलों को निहारना अच्छा लगने लगे। तब शायद और भी आनंद आ जाये।

फिलहाल जो अनुभूति हुई, वह ऊपर लिख डाली है। …. आज एक किताब और खत्म की – इचिगो इची!


इकीगाई, इचिगो इची और खांची भर बौद्ध-जेन टाइप की ‘बेस्ट-सेलर’ पुस्तकों का जमाना है। उनमें जो कुछ है, वह हमें अपने ग्रंथों – रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, चाणक्य नीति आदि में प्रचुर मिलता है। पर वाया पश्चिम, जहां कोई स्टीव जॉब्स सिर मुंड़ा कर गेरुआ चोला पहन लेता है और कोई डान बटनर ओकीनावा में सैकड़ा पार लोगों की कॉलोनी खोज लेता है; यह सब ज्ञान हमें री-पैकेज्ड मिल रहा है। कोई खराबी नहीं। ये पुस्तकें लिखने में लिखने वाले सज्जनों ने मेहनत खूब की है। पर वैसी ही मेहनत भारतीयों को अपने यहां उपलब्ध सामग्री और जीवन पद्धति के आधार पर भी करनी चाहिये। ऐसा मेरा सोचना है। आखिर अर्जुन भी विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बना था जब अंधेरे में उसने देखा था कि उसके हाथ भोजन को बिना यत्न मुंह तक ले जा रहे हैं। सारा ज्ञान यहां से चला और वाया जापान हमें बेस्टसेलर के रूप में मिल रहा है! 🙂


पूस, पुआल और पराली और आबो हवा पर फुटकर विचार


पूस के महीने की शुरुआती यादें गांव में पुआल के बिछावन पर कथरी बिछाये सोते लोगों की हैं। धान की फसल निपट चुकी है। पुआल के गठ्ठर भी घरों में सहेज लिये गये हैं। गेंहूं के लिये खेतों में पलेवा (पानी डाल कर भिगाने का कृत्य) लगाया जा रहा है और रात रात भर किसान ठण्ड में हुहुआते हुये खेतों में पानी को मोड़ता, दिशा देता दीखता है। इस दृष्य में पूस का महीना है, पुआल की भरमार है पर पराली का कोई स्थान नहीं था/है।

भला हो शैलेंद्र की पत्नीजी का जिन्होने पुआल को बेचने का निर्णय कर लिया। उनका एक कारिंदा एक छोटा पिक-अप ट्रक लाया है और उसपर पुआल लद रहा है। एक छोटे टाटा मैजिक नुमा पिक-अप पर कितना पुआल लद सकता है यह देख कर मैं हैरान हूं।

अमृतलाल वेगड़ जी से उधार लिया जाये तो ‘पूस प्रकृति है, पुआल संस्कृति है और पराली विकृति है’। यहां पराली की विकृति अभी नहीं आयी है। छोटी जोत के गरीब किसान वह विकृति अफोर्ड नहीं कर सकते। यहां तो धान और अन्य अन्न के दाने भी खेत से बीनने वाले लोग भी हैं। खेतों में चूहों की बिलों को खोद कर उसमें से अनाज निकालने वाले मुसहर भी हैं। गरीबी की अलग जीवन शैली होती है। एक अलग स्तर का मिनिमलिज्म। यू-ट्यूब पर मिनिमलिज्म का व्लॉग ठेलने वाले क्या जानें मिनिमलिज्म का सही मतलब। उनके लिये तो पैसे वालों का अलग दिखने का एक फैशन है अपरिग्रह/मिनिमलिज्म! उनका पश्चिमी तर्ज का मिनिमलिज्म तो मुझे तनिक भी नहीं सुहाता।

खैर, यहां पर यद्यपि पराली की विकृति नहीं है, प्रदूषण की विकरालता उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है।

मेरे पड़ोसी, शैलेंद्र के यहां उनके धान के खेतों से निकला पुआल गंजा हुआ था। उसके तिनके धूल में मिल कर अच्छा खासा प्रदूषण करते थे। भला हो उनकी पत्नीजी का जिन्होने पुआल को बेचने का निर्णय कर लिया। उनका एक कारिंदा एक छोटा पिक-अप ट्रक लाया है और उसपर पुआल लद रहा है। एक छोटे टाटा मैजिक नुमा पिक-अप पर कितना पुआल लद सकता है यह देख कर मैं हैरान हूं। इस तरह के पिक-अप पर या ट्रेक्टर की ट्रॉलियों पर खूब पुआल इधर से उधर ट्रांसपोर्ट हो रहा है। गांव देहात की पगडण्डी नुमा सड़कों पर पुआल लदे ये हाथी डगमग डगमग करते चलते हैं तो उनके कभी भी पलटने का अंदेशा होता है। उनके आसपास से साइकिल निकालने के भय को भी किसी सिण्ड्रॉम – मसलन पुआलाइटिस सिण्ड्रॉम की संज्ञा दी जा सकती है। वह सिण्ड्रॉम मुझमें घर कर गया है। आजकल गांव की सड़कों-पगडण्डियों पर चलना नहीं सुहा रहा।

यह पुआल ट्रांसपोर्टेशन अभी महीना भर तो चलेगा ही।

रीडर्स डाइजेस्ट में पुआल वाहन का एक कार्टून

ग्राम्यजीवन का नोश्टॉल्जिया लगता है बड़ी उथली चीज है। धान की कटाई, पुआल के भूसा बनाने की क्रिया और पुआल के ट्रॉन्स्पोर्टेशन की लॉजिस्टिक्स ने कुल मिला कर पूरे इलाके की एयर क्वालिटी इण्डेक्स बरबाद कर रखी है। मेरे अपने इलाके की एक्यूआई 160-170 के आसपास है। खराब। और भारत के नक्शे में देखता हूं तो पाता हूं कि कमोबेश पूरे देश का एक्यूआई खराब है। दिल्ली ही नहीं, पूरा देश धूल, सांस की बीमारियों और दमे का शिकार हो रहा होगा व्यापक तौर पर। मीडिया में अभी इसकी चर्चा का फैशन नहीं है, पर एयर क्वालिटी देश की एक बड़ी हेल्थ समस्या हो ही गयी है। पानी बरबाद हो गया है तो निम्न मध्यवर्ग भी आर.ओ. का पानी पीने लगा है। उसी तरह मास्क पहनना एक 24X7 की अनिवार्यता हो जायेगी।

पुआल से चारा काटा जा रहा है और उससे उड़ने वाली तिनकों की धूल पूरे वातावरण में व्याप्त हो रही है। वातावरण में नमी नहीं है तो यह धूल घण्टों हवा में तैरती रहती है।

खांसी, जुकाम और सांस लेने की समस्या – जो मूलत: पुआल और इस साल के अचानक अत्यंत सूखे मौसम की देन है – मैं महीने भर से परेशान हूं। सोचा था कि इस साल बारिश देर से हुई है। कुआर और कार्तिक के महीने में भी बारिश होती गयी। उससे वातावरण में नमी रहेगी और कोहरा जल्दी तथा घना होगा। पर शुष्क वातावरण के कारण कोहरा तो नजर ही नहीं आता। सवेरे ओस भी मामूली सी होती है जो घण्टे भर की सवेरे की धूप में गायब हो जाती है।

बड़ा ही सड़ल्ला सा मौसम है। जिसे देखो, वही खांस रहा है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश ने कम सड़ल्ला नहीं है यहां मौसम। पूरा भारत अभिशप्त है। कोई आश्चर्य नहीं कि वायरमेण्टल परफार्मेंस इण्डेक्स में भारत देश दुनिया के सभी 180 देशों में फिसड्डी है – एक सौ अस्सीवें स्थान पर है। कोई मीडिया वाला इसकी बात नहीं करता!

एयर क्वालिटी इण्डेक्स में पूरा भारत कमोबेश दयनीय दशा में है।

ऐसा नहीं है कि पूरी दुनियाँ में आबो-हवा खराब हुई हो। मैंने जोआन नोरबर्ग की पुस्तक प्रोग्ररेस के सार संक्षेप में निम्न प्रसंग पढ़ा –

Rapid industrialization harmed the natural environment. But there have been significant improvements in recent decades.

Take London. In the 1950s, it suffered from what was called the “Great Smog” at the time. Locals burned huge amounts of coal to keep the cold at bay in winter. The smoke, combined with industrial emissions, created a cloud of smog that engulfed the city. Around 12,000 people died as a result.

For three centuries, all the way up to the 1970s, the city’s pollution rose. But after that, it decreased sharply and returned to pre-industrial levels, due, in large part, to the development of cleaner technologies. Emissions of sulfur dioxide, the toxic compound in smog, have fallen by 94 percent since the 1970s.

But it’s not just the United Kingdom that’s seen improvements. Worldwide, 172 out of 178 countries made progress between 2004 and 2014 according to the Environmental Progress Index.

उक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि दुनियाँ के लगभग सभी देशों ने अपनी आबो हवा में सुधार के प्रयास किये हैं और उनकी दशा बेहतर हुई है। यह तो भारत है, जहाँ स्वच्छता के व्यापक अभियान के बावजूद Environmental Progress Index में भारत सबसे निचले पायदान पर बना हुआ है।

अब सुना है केजरीवाल जी दिल्ली में कूड़े के पहाड़ और यमुना का पानी साफ करेंगे। उन जैसे विज्ञापनवीर से कोई उम्मीद तो नहीं, पर देखें कि वे दिल्ली को लंदन बना पाते हैं क्या?


यह देखा जाये कस्बे की सफाई का नमूना। मैंने अपनी साइकिल दूर रोक ली। सड़क किनारे झाड़ू लगा कर सफाई कर्मी ने कूड़े में आग लगा दी थी। जो जल रहा था उसमें ज्यादातर प्लास्टिक और रबर था। उससे ढेर सा काला धुआं निकल रहा था और दुर्गंध भी थी। मैं आगे जा ही नहीं पाया। वापस लौट लिया घर को। … यह रोज की कहानी है। सफाई करने का अर्थ यहां प्लास्टिक का प्रयोग कम करना नहीं, प्लास्टिक को जलाना ही है। 😦


आयुष – कस्बे के राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय में


यह एक संयोग ही था कि मैं वैकल्पिक चिकित्सा के उपाय तलाशते हुये वहां पंहुच गया।

सर्दी के मौसम में मुझे सप्ताह भर पहले हल्का कफ हुआ और वह तरह तरह की देसी-विलायती दवाओं के कब्जे से बचता हुआ ज्यादा ही कष्ट देने लगा था। पिछले छ साल में ऐसा जबरदस्त कफ नहीं हुआ था जिसमें शरीर जकड़ा हुआ लगे। पता नहीं, कोरोना की व्याधि, जो उस काल में टीके, काढ़े और पुन: टीके के बूस्टर डोज से दबी कुचली थी, अब समय पा कर त्रास देने लगी हो और इस तरह की सर्दी जुकाम की बढ़ती संख्या उसी का परिणाम हो। आजकल दीख भी रहा है कि लोग सर्दी-जुकाम-बुखार से ज्यादा ही पीड़ित हो रहे हैं।

मेरे एक मित्र ने बताया कि पास के महराजगंज कस्बे में राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय है। वहां अधिकृत डाक्टर/वैद्य की व्यवस्था है। जरूरी कुछ दवायें भी वहां (बिना शुल्क) मिल जाती हैं। मैं ढूंढते-पूछते वहां पंहुच गया। एक बड़े ताल के किनारे अच्छा बड़ा परिसर था अस्पताल का। चार पांच कमरे थे। डाक्टर साहब का कक्ष ठीकठाक था। एक कक्ष में दवायें थीं, दूसरे में चिकित्सा के उपकरण और एक अन्य वार्ड था मरीजों के भर्ती करने के लिये। कुल मिला कर हार्डवेयर व्यवस्था एक अस्पताल की थी, मात्र डिस्पेंसरी की नहीं। पर अस्पताल में एक चिकित्सक, एक फार्मासिस्ट और दो अन्य कर्मचारियों की टीम मात्र थी। वे भी महराजगंज के स्थानीय नहीं हैं। अप-डाउन करते हैं। उतने से तो केवल ओपीडी मरीज ही देखे सकते हैं।

पर यह व्यवस्था भी मेरी अपेक्षा से बेहतर थी। एक कस्बे में यह भी होना सुखद है।

यह जरूर खटका कि डाक्टर साहब (डा. जीतेंद्र कुमार सिंह जी) वहां मौजूद नहीं थे। आला लगाये फार्मासिस्ट श्री शिवपूजन त्रिपाठी जी परिसर में खुले में धूप सेंकते मेज लगा कर बैठे थे। उन्होने मेरी समस्या सुनी और बताया कि दवा मिल जायेगी। एक रजिस्टर में मेरा पंजीकरण किया। फोन नम्बर और पता लिखा। समस्या और निदान दर्ज किया। फिर मुझे दवाओं का प्रेस्क्रिप्शन और दवायें दीं। एलोपैथी की चिकित्सा पद्यति में शायद प्रेस्क्रिप्शन लिखने को अधिकृत न होते हों, पर यहां आयुर्वेदिक चिकित्सा में था। मुझे भी कोई उहापोह नहीं था उनसे दवाई लेने में। हम आयुर्वेदिक दवायें सामान्यत: सेल्फ-मेडीकेशन के रूप में लिया करते हैं भारतीय घरों में। यह स्थिति तो उससे कहीं बेहतर थी। एक जानकार पैरामेडिक दवा दे रहे थे।

त्रिपाठी जी ने मुझे आयुष का एक वेलनेस किट ही दे दिया। बताया कि ये किट कोरोना काल में सप्लाई किये गये थे। इनमें कफ-फ्लू की सभी औषधियां हैं। वे इलाज भी करती हैं और इम्यूनिटी बूस्टर भी हैं। उनमें क्वाथ/काढ़ा, संशमनी वटी, आयुष-64 टैबलेट, च्यवनप्राश, अणु तेल आदि है। सौ ग्राम च्यवनप्राश के साथ दवायें इतनी थीं उस किट में कि एक व्यक्ति का इलाज तो मजे से हो जाये। यह किट भारत सरकार की संस्था आईएमपीसीएल का बना हुआ है।

मैं तो मात्र दवा का प्रेस्क्रिप्शन लेने गया था वहां पर मुझे दवाओं का पूरा किट, वह भी मानक तौर पर बना हुआ और मुफ्त दिया त्रिपाठी जी ने। त्रिपाठी जी के साथ मेरा एक चित्र भी खींचा हिमांशु गिरि – वार्डकर्मी – ने। उसके उपरांत मेरे अनुरोध पर पूरे चिकित्सालय का भ्रमण भी कराया हिमांशु जी ने। शायद वे मुझे ‘विशिष्ट’ मरीज का दर्जा दे रहे थे। अस्पताल की साफ सफाई की व्यवस्था से मैं प्रभावित हुआ!


महराजगंज का यह आयुर्वेदिक अस्पताल देखते समय मेरे दिमाग में ताराशंकर बंद्योपाध्याय का उपन्यास ‘आरोग्य निकेतन’ कौंध रहा था। उसमें उपन्यास के मुख्य पात्र – ग्रामीण पृष्ठभूमि के नाड़ी वैद्य जी, उभर रहे एलोपैथिक चिकित्सा के घटकों/पात्रों से, अपनी गुणवत्ता के बावजूद भी हाशिये में जाते प्रतीत हो रहे थे। आज की भाजपा सरकार उस सौ साल के हाशिये के संकरेपन को कम करने का प्रयास कर रही है। इस अस्पताल की सुविधाओं को देख कर लगता तो है कि प्रयास पूरे मन से किया गया है। पर यह भी है कि प्रयास सरकारी भर है। जो सुविधायें विकसित की गयी हैं, उनका पूरा दोहन नहीं हो रहा।

अब भी इस पद्यति की बजाय पूरे परिवेश में झोलाछाप डाक्टरों की भरमार है। आम जनता को पुन: उस दृढ़ता से आयुर्वेद के प्रति भरोसे की सीमा में नहीं लाया जा सका है। शायद युग भी इंस्टेंट निदान का है। लोग भी पुख्ता निदान की बजाय पैरासेटामॉल और ब्रूफेन के आदी हो गये हैं। उन्हें लगता है कि इलाज का अर्थ सुई लगा कर इण्ट्रावेनस तरीके से शरीर को ‘ताकत’ देना ही है! लोग गांवदेहात में सोखा-ओझा, झाड़ फूंक और झोलाछाप डाक्टरी के बीच झूलते हैं। 😦

(बांये – आयुष किट देते शिवपूजन त्रिपाठी जी। दांये – हिमांशु गिरि)

खैर, मुझे त्रिपाठी जी के आयुष किट से लाभ हुआ है। पर्याप्त लाभ। मैं किट की सभी दवायें नियम से ले रहा हूं। क्वाथ दिन में तीन बार पी रहा हूं। थूक में गाढ़ा बलगम-कफ काफी कम हुआ है और खांसी भी कम है। इस पूरे किट का सेवन तो कर ही जाऊंगा। इस बार तो उस अस्पताल तक मेरा वाहन चालक मुझे ले कर गया था। एक बार और साइकिल भ्रमण करते हुये वहां जा कर उन लोगों से मिलना है। तब शायद डाक्टर साहब से भी मुलाकात हो जाये; इस बार तो वे किसी सर्जरी करने के लिये किसी अन्य सेण्टर पर गये हुये थे।

यह प्रकरण मुझे अगर आयुर्वेद-भक्त बना दे तो मेरी पर्सनालिटी में एक और आयाम जुड़ जाये।


शाम को देखने के लिये एक कोना तलाशो!


सर्दियों की शाम जल्दी आती है और तेजी से ढलती है। सूरज करीब करीब दक्षिण में अस्त होते हैं। मेरे घर में हमारे लगाये पेड़ बहुत हो गये हैं और उनकी छाया इतनी होती है कि अस्ताचल को जाते सूरज को निहारना सहज नहीं है। उसके लिये जरूरी है कि आपके और ढलते सूरज के बीच कोई व्यवधान न हो। लोग इसीलिये सवेरा और सांझ देखने के लिये नदी का किनारा तलाशते हैं।

सवेरे और शाम के सूरज में ज्यादा महत्व सवेरे का है। इसीलिये गंगा किनारे के अधिकांश नगर इस तरह बसे हैं कि किनारे पर खड़े व्यक्ति को नदी के जल में से उठता सूरज दिखे। वह देखने का जुनून मुझे कई-कई-कई दिनों रहा है। प्रयाग में शिवकुटी में मैं वही करता रहा हूं। और उस सवेरे गंगा कछार के भ्रमण पर अनेक ब्लॉग पोस्टें भी हैं।

शैलेंद्र के घर से दिखती सांझ

यहाँ आजकल स्वास्थ्य नरम होने के कारण गंगा तट पर जाना नहीं हो रहा है। वैसे भी, साठ के पार की उम्र के लिये सर्दियों के मौसम में बहुत सवेरे और सांझ के समय घूमना उचित नहीं कहा गया। सो मैं अपना पैदल चलने और साइकिल चलाने का अनुष्ठान घर-परिसर में ही कर रहा हूं।

यहां गांव में मेरा और मेरे साले साहब – शैलेन्द्र दुबे का गृह-युग्म है। दोनो का घर का परिसर जोड़ लिया जाये तो एक बीघे से ज्यादा ही होगा। उस परिसर में घुमावदार तरीके से साइकिल चलाने में एक चक्कर करीब 215 मीटर का होता है। उसमें मैं पचास साठ चक्कर लगाता हूं। चक्कर लगाने में मुझे बहुत सतर्क नहीं रहना होता – कोई यातायात का भय नहीं होता। सो बड़े मजे से साइकिल चलाते हुये पुस्तक संक्षेप सुनता जाता हूं। यह करते हुये मैंने इस महीने में करीब 200 पुस्तकों की समरी सुन डाली है।

सवेरे जब घर के बाहर नहीं निकलता तो ड्राइंग/बेड रूम के लम्बे चक्कर ब्रिस्क वाक के रूप में लगाते हुये 3000 से ज्यादा कदम चलता हूं। उस चक्कर के पथ को बनाने के लिये मुझे कुछ फर्नीचर को सरकाना होता है और घर की फर्नीचर सज्जा से छेड़छाड़ मेरी पत्नीजी को नागवार गुजरती है।

सवेरे जब घर के बाहर नहीं निकलता तो ड्राइंग/बेड रूम के लम्बे चक्कर ब्रिस्क वाक के रूप में लगाते हुये 3000 से ज्यादा कदम चलता हूं। उस चक्कर के पथ को बनाने के लिये मुझे कुछ फर्नीचर को सरकाना होता है और घर की फर्नीचर सज्जा से छेड़छाड़ मेरी पत्नीजी को नागवार गुजरती है। पर उस नागवारी का जोखिम मैं उठाता हूं। … कोई भी महान कार्य कभी बिना जोखिम के हुआ है?! 😆

उसके बाद, जब पर्याप्त गर्मी हो जाती है वातावरण में, सवेरे दस बजे के बाद, साइकिल चलाते हुये लगभग एक घण्टा व्यतीत होता है। कुल डेढ़ घण्टे का यह शारीरिक श्रम शरीर को टोन अप कर रहा है। शायद जब तक सर्दियां खतम हों, मेरा वजन कम हो कर सामान्य की श्रेणी (BMI<24) में आ जाये। विचार तो वही किया है।


पर ढलता सूरज निहारने का मोह अभी भी गहरा है। कल उसी मोह के वशीभूत मैंने एक कोना तलाशा। यह जगह शैलेंद्र के घर का पश्चिमी कोना है। धूप का आनंद लेने के लिये वहां एक पुराना तख्त रखा है जो कई मौसमों को झेलता बुढ़ा गया है। मैं शैलेंद्र के ओसारे से एक कुर्सी खींच लाया और कुर्सी पर बैठ, तख्ते पर पैर फैला कर सूरज को निहारने लगा।

धूप का आनंद लेने के लिये वहां एक पुराना तख्त रखा है जो कई मौसमों को झेलता बुढ़ा गया है। मैं शैलेंद्र के ओसारे से एक कुर्सी खींच लाया और कुर्सी पर बैठ, तख्ते पर पैर फैला कर सूरज को निहारने लगा।

शाम ढलने का समय था। आधा घण्टे में सूरज उस चारदीवारी से नीचे सरक जायेंगे। नीचे सरकने के साथ ही ठण्ड तेजी से बढ़ेगी। एक घण्टे में तो अंधेरा पसरने लगेगा। सूर्य अस्त तो अंधेरा मस्त! पर अभी तो सब सांझ की गोल्डन ऑवर की आभा में एक तिलस्मी आनंद दे रहा था। मुझे यह मलाल होने लगा कि यह जगह बैठने के लिये पहले क्यों नहीं तलाशी। अभी सर्दी के तीन महीने कम से कम और हैं, जब हर शाम यहाँ बैठा जा सकता है।

शैलेंद्र की नौकरानी आ कर मुझे देख गयी – फूफा, यहाँ कहाँ बैठे हैं? कमरे में चलिये। मैं चाय बनाती हूं।

मैंने उसे कहा कि अगर चाय बन रही है तो यहीं दे जाये। सूर्यास्त निहारते चाय पीना और भी आनंददायक होगा।

चारदीवारी पांच ईंट टूटी है। सूरज उस टूट से नीचे सरक आये हैं। मुझे बरबस रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता याद आती है – प्रकृति में कुछ है जो दीवार पसंद नहीं करता। … टूटी चारदीवारी से सूरज के अलावा पुराने ट्यूब वेल की नालियाँ, चरती बकरियां, बिंदान और चमरऊट की बस्तियां दीखती हैं। खेतों से धान की फसल कट गयी है तो दूर तक दीखता है।

चाय आती है और साथ में शैलेंद्र भी। आज वे कहीं गये नहीं थे। पूरा दिन आराम करने मेंं निकाल दिया था। चाय खत्म होते होते सूरज ढल जाते हैं।

साइकिल, सुकून, शाम, शैलेंद्र की चाय और उनका साथ – यह आनंद है गांव में रहने का। डेनमार्क के लोग Hygge – ह्यूगा की बात करते हैं प्रसन्नता के संदर्भ में। डेनमार्क दुनियाँ के प्रसन्नतम देशों में है। सर्दी का मौसम, गांवदेहात की यह जिंदगी, यह भी एक प्रकार का Hygge ही तो है!

इस देसी ह्यूगा के लिये कोई देशज शब्द होना/क्वाइन किया जाना चाहिये। जिसमें जिंदगी का सरल बहाव, आनंद, सम्बंधों की ऊष्णता और सुकून सब शामिल हो। भारत जैसे विशाल देश में डेनमार्क के ह्यूगा की बात शायद न की जा सके, पर सूर्यास्त देखने के लिये कोने की तरह देश में ह्यूगा के द्वीप तो बन ही सकते हैं।


डेंगू, पपीता, बकरी और ड्रेगन फ्रूट


मेरी पत्नीजी (बहुत से लोगों की तरह) कब्ज से बचने के लिये रोज पपीता सेवन करती हैं। प्रति दिन, बारहों महीने। गांव में रहते हुये पपीते की सतत उपलब्धता कठिन है। उनके लिये पपीता-प्रबंधन कठिन काम था।

रामगुन फल का ठेला लगाने वाले सज्जन सहायता किया करते थे, पर पाया कि उनकी पपीता उपलब्ध कराने की सक्सेस रेट 40-50% से ज्यादा नहीं थी। वे पास की कछवांं मण्डी से अपने फल लाते हैं। कछंवा मण्डी में सब्जियाँ तो ठीक ठाक मिल जाती हैं पर फल के बारे में वह मण्डी बहुत व्यवस्थित नहीं है।

रामगुन के बहुधा फेल हो जाने पर घर पर माली का काम देखने वाले रामसेवक जी को कहा कि वे हर महीने एक दो पपीते के पौधे ही घर के परिसर में लगा दें, जिससे हर समय (किसी न किसी पपीते के पेड़ पर) पपीते मिलने लगें। पर पपीतों की भी शायद कोई यूनियन है। वे डाइवर्सीफाइड तरीके से फल नहीं देते, जैसे गायें गाभिन होती हैं और दूध देती हैं।

घर के बगीचे में पपीते। अभी कच्चे हैं।

कुल मिला कर; गांव में हर मौसम में पपीता पाने के लिये बनारस या मिर्जापुर शहर की बड़ी मण्डी या बाजार पर निर्भर रहना ही पड़ता है। पपीते के मुद्दे पर शहर जीता, गांव हारा!

रामसेवक बनारस के बंगलों में माली का काम करते हैं और गांव से सिवाय रविवार के बाकी दिन बनारस आते जाते हैं। सो एक दिन मुझे ब्रेन-वेव आई कि उन्हें ही कहा जाये कि वे हर दूसरे तीसरे दिन एक दो पपीते ले आया करें। उन्हें झिझकते हुये कहा तो वे सहर्ष तैयार हो गये। अब कोई परेशानी नहीं होती। रामसेवक जी की पपीता उपलब्ध कराने की सक्सेस रेट लगभग शत प्रतिशत है।

रामसेवक पपीता वैसा खरीदते हैं, जैसा अपने लिये खरीद रहे हों। मोल भाव कर और गुणवत्ता देख कर। अभी दो दिन पहले उन्होने फोन कर कहा कि दाम ज्यादा हैं और उनका खरीदने का मन नहीं हो रहा है। चालीस-पचास रुपये किलो मिलने वाला पपीता 80रु किलो से कम नहीं मिल रहा।

उन्हें कहा गया कि एक ही खरीदें, थोड़ा छोटा। एक सप्ताह में पपीता प्राइस इण्डेक्स में 8-10% नहीं, पूरे 100% का उछाल!

रात घर आने पर उन्होने पपीता देते हुये बताया कि डेंगू फैला है और लोग पपीता खरीदने पर टूट पड़े हैं। यह धारणा है कि पपीता गिरते प्लेटलेट्स की रामबाण दवा है।

डेंगू का प्रकोप और मरीज के गिरते प्लेटलेट्स पर मरीज के तीमारदारी में जुटे लोगों का पैनिक रियेक्शन होता ही है। ऐसे में, जिस भी पदार्थ में लोगों को लगता है कि श्वेत रक्त कणिकाओं को बढ़ाने की क्षमता होती है, उसका इंतजाम करने मेंं वे जुट जाते हैं।

डेंगू के प्रकोप के समय मेरे ड्राइवर ने बताया कि द्वारिकापुर के गड़रिया लोग अपनी भेड़ों का दूध 80रुपये पाव बेच रहे हैं। बकरियों का दूध भी उसी भाव जाता है। मेरा ड्राइवर डेंगू की शाश्वतता पर दाव खेलते हुये ड्राइवरी का काम छोड़ कर बकरी पालन पर ध्यान लगाने की कहने लगा है। अगले कुछ सालों में वह बकरी पालन के सभी पहलुओं पर मंथन कर अपने काम की लाइन बदल लेगा।

सिकंदर सोनकर ने ड्रेगन फ्रूट दिखाया

उधर महराजगंज बाजार का फल वाला सिकंदर सोनकर प्लास्टिक की पन्नियों में भरे विचित्र से फल अपनी दूकान के प्राइम लोकेशन पर जमा रहा था। उसने बताया कि फल का नाम ड्रेगन फ्रूट है। डेंगू की बीमारी में गिरते प्लेटलेट्स को थामने के लिये लोग इसका प्रयोग करते हैं। उसने एक पेटी ड्रेगन फ्रूट मंगाया है। एक पेटी में 18 फल और थोक कीमत 1500 रुपये। वह इसे 100रुपया फल के दाम से बेच रहा है।

पपीता, भेड़ बकरी का दूध या ड्रेगन फ्रूट – सभी ऑफ-बीट चीजों की बेतहाशा मांग है डेंगू के प्रकोप से लड़ने के लिये।

मैंने नेट छाना ड्रेगन फ्रूट के नाम से। विकिपेडिया पर इसका नाम पिताया है। यह केक्टस प्रजाति के पौधे का फल है। पकने पर यह फल हल्का मीठा होता है। तरबूज, नाशपाती और कीवी के मिलेजुले स्वाद वाला फल। विभिन्न वेब साईट्स पर यह बताया कि इसमें आयरन और विटामिन सी भरपूर होता है। किसी ने इसे डेंगू या प्लेटलेट्स बढ़ाने से नहीं जोड़ा। पर लोग हैं कि इसे भी डेंगू की रामबाण दवा मान रहे हैं।

एक पके पिताया की अनुदैर्ध्य काट। चित्र https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=11849341 द्वारा

मच्छर रहेंगे ही। डेंगू मलेरिया जाने वाला नहीं लगता। ऐसे में गुलाब (मेरे ड्राइवर) की सोच की वह बकरी पालन करेगा; खराब नहीं। पर डेंगू का दोहन करने के लिये मैं क्या कर सकता हूं? मैं बकरी पालन तो कर नहीं सकूंगा। पर पपीता के पौधे लगा सकता हूं। उससे मेरी पत्नीजी का कब्ज भी दुरुस्त हो जायेगा और डेंग्फ्लेशन (Dengue-inflation) के समय मार्केट का दोहन भी किया जा सकेगा।

क्या पता, डेंगू और पपीता का समीकरण मुझे करोड़पति बना दे! 😆


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