दूसरी पारी – माधोसिंह रेलवे स्टेशन पर ट्रांजिट

चील्ह से गंगा उसपार मिर्जापुर बिंध्याचल से यात्री माधोसिंह आया करते थे। उनके अलावा मिर्जापुर से तांबे या पीतल के बर्तन भी आया करते थे। उनका माधोसिंह में यानांतरण होता था। उस रेल लाइन की अपनी संस्कृति थी, अपना अर्थशास्त्र।


अक्तूबर 2015 के पहले दिन मैं रिटायर होने के बाद पहले दिन, सपरिवार, माधोसिंह रेलवे स्टेशन के रेस्ट हाउस पंहुचा।

हम माधोसिंह के रेस्ट हाउस में आ गये थे। गांव में रहने के जो सपने बुने थे, वे पहले ही दिन से धूमिल होने लगे। माधोसिंह स्टेशन पर मुझे जो मिले वे रेलवे के ही लोग थे। स्टेशन मास्टर साहब, उनके चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी और टी आई भोलाराम जी। उन सब ने बड़ी फुर्ती से हमारा सामान उतरवाया और हमें रेस्ट हाउस ले कर गये। कोई लोकल, कोई गांव वाला, कोई संबंधी नहीं थे। यह स्वप्न था कि गांव हमें बांहे फैला कर स्वागत करेगा, वैसा कुछ नहीं था वास्तविकता में। भविष्य एक जीर्ण शीर्ण ताल सा लगा, जिसमें काई की मोटी परत थी और जिसे हमें दोनो हाथ से हटा कर पानी चीरते हुये अपना रास्ता बनाना था।

हमने वैसे ही किया।

और, सोचने पर लगता है कि सारी जिंदगी रेल को समर्पित कर अपनी गांव-देस, नाते रिश्ते, सम्बंध सब को ठेंगे पर रख कर काटने के बाद अगर मैं अपेक्षा करता था कि गांव हमें “बांहे फैला कर स्वागत” करेगा; तो वह एक निहायत मूर्खतापूर्ण आशावाद था। हम पूरी नौकरी में दोनो हाथ पैसा पीटे होते और सम्पन्नता में सगे सम्बंधियों को “पाले” होते, तब भी शायद लोग आगे की आशा में आपके आगे पीछे घूमते। हमने तो दशकों से न सामाजिकता निभाई थी, न सम्पन्नता अर्जित की थी। हमें तो आगे भी अपना जीवन, अपना रास्ता, अपने तरीके से जीने की जद्दोजहद करनी थी। दूसरी पारी में रिटायरमेण्ट का रोमाण्टिसिज्म नहीं था, एक ठोस यथार्थ आगे था, जिसे हमें फेस करना था और अपनी शर्तों पर, अपने तरीके से गांव में रहना था।

दो दिन बाद हमने अपने सम्बंधियों – मूलत: अपने तीनों साले साहब और उनके परिवार को माधोसिंह रेस्ट हाउस में आमंत्रित किया। वे सभी आये। हमने रेस्ट हाउस में भोजन का इंतजाम किया। लगभग चार पांच घण्टे उन्होने हमारे साथ व्यतीत किये। मेरी बिटिया-दामाद-नाती और बेटा-बहू-पोती भी पंहुचे। अकेले होने की जो मायूसी पहले दिन हुई थी, वह काफी हद तक दूर हुई।

दो अक्तूबर – रेस्ट हाउस में एकत्र परिवार की महिलायें और बच्चे।

माधोसिंह से कटका पिछला ब्लॉक स्टेशन है। सड़क से जुड़ा हुआ। स्टेशन से 300 कदम पर वह जगह है जहां हमारा मकान बन रहा था। हमें वहां रोज बनते मकान को देखने जाना था। कोई वाहन नहीं था। अंतत: एक ऑटो वाले से बात की। हर रोज का भाड़ा तय किया। वह हमें माधोसिंह से कटका के हमारे मकान तक ले जाने और वापस रेस्ट हाउस में लाने वाला था। बड़ा भला नौजवान था वह। ऑटो में आना जाना भी एक अनुभव था। दशकों से कार या रेलवे के व्यक्तिगत सैलून की प्राइवेसी के अभ्यस्त हो गए थे, तो रोज ऑटो की यात्रा परिवर्तन की शुरुआत थी।

autorickshaw at madhosingh railway station
इसी तरह का ऑटो रिक्शा रोज के किराये पर तय किया हमने। कार और रेलवे सैलून से बिल्कुल अलग तरह का साधन।

हम लोग सवेरे रेस्ट हाउस में नाश्ता कर निकलते थे। दोपहर का भोजन – पराठां सब्जी साथ में टिफन में ले जाते थे। और शाम चार बजे वापस रेस्ट हाउस आ जाते थे। हमारे जाने से मकान बनने की गति बेहतर हो गयी थी – या कम से कम हमें वैसा लगा।

वहां पहले दिन जाते हुये गांव की सड़क पर एक मोटा सा सांप दिखा। धीरे धीरे चलता हुआ। ऑटो रोक कर उसे ध्यान से देखा। डर भी लग रहा था कि गांव का जीवन भी क्या विकट है। पहले ही दिन सांप के दर्शन हुये, वह भी सड़क पर सरेआम घूमते। खैर, वह सांप क्या, गूंगी थी। सैण्ड बोआ। निरीह सांप। लोगों ने बताया कि उसका दिखना शुभ शकुन है। धन सम्पदा की वृद्धि होती है। इसी में हम प्रसन्न हुये! अन्यथा एकबारगी लगा कि किस अरण्य में अपनी रिहायश बना ली है। उसके बाद सांप बहुत बार दिखे और भयानक लगने वाले भी। ऐसा नहीं कि रेल सेवा के दौरान सांप न दिखे हों, पर अब उनके दिखने की आवृत्ति बढ़ गई थी।

रोज रोज कटका/विक्रमपुर आना और बनते हुये मकान को देखना शुरू में अच्छा लगा। फिर तो एक रुटीन सा हो गया। मानो दफ्तर जाना और वहां से लौटना हो। कटका की बजाय माधोसिन्ह स्टेशन का जीवन ज्यादा रसमय था। सवेरे साइकिल ले कर मैं स्टेशन प्लेटफार्म की तीन चार चक्कर लगाता था। एक चाय की ट्रेन में वेण्डिंग करने वाले व्यक्ति हरिहर से मुलाकात हुई। स्टेशन के दूसरी ओर किसी रेलवे क्वार्टर में वह चाय बनाता था। चौरी चौरा एक्स्प्रेस के समय पर प्लेटफार्म पर आता था और उसी ट्रेन में इलाहाबाद सिटी तक जा कर रास्ते भर चाय बेचता था।

harihar tea vendor
Harihar, tea vendor

पहले दिन मुझे देख कर वह चौंका। एक अपरिचित, बाहरी व्यक्ति लगा। फोटो खींचते देख उसे यह भी लगा कि मैं किसी मुसीबत में डाल सकता हूं, उसको। उसने प्रतिवाद भी किया। पर बाद में और लोगों से मेरे बारे में पूछा होगा। अगले दिन उसने नमस्कार कर मुझे एक कुल्हड़ चाय भी पिलाई। मुझे उस चाय का पैसा देने में भी दिक्कत हुई। वह ले नहीं रहा था।

वह मेरा मित्र बन गया। रोज सवेरे तैयारी से आता था। साफ सफेद कुर्ता-पायजामा और एक जैकेट। जेब में करीब 200 रुपये की रेजगारी। एक कुल्हड़ की डालिया और एक चाय का टोंटी लगा ड्रम – यह उसका किट होता था। एक दिन वह चाय का ड्रम और कुल्हड़ के बिना प्लेटफार्म पर दिखा तो पता चला कि दो किलो दूध की चाय बना रहा था पर दूध फट गया। बड़ा ‘नुस्कान’ हो गया। उसके नुक्सान से मुझे भी मायूसी हुई।

अब पांच साल बाद भी मन होता है माधोसिंह स्टेशन जा कर हरिहर के बारे में तहकीकात करूँ और मुलाकात करूँ।

harihar and gyan dutt pandey
हरिहर के साथ मैं

माधोसिंह कालोनी के एक अंत पर मुझे एक टर्नटेबल के अवशेष दिखे। यहां चील्ह से माधोसिन्ह तक एक नैरो गेज की रेल लाइन हुआ करती थी। उसका स्टीम इंजन यहां आ कर टर्न हुआ करता था। चील्ह से गंगा उसपार मिर्जापुर बिंध्याचल से यात्री माधोसिंह आया करते थे। यहां उन्हें मुख्य लाइन की इलाहाबाद और मऊ या गोरखपुर अथवा बलिया/गाजीपुर की ओर जाने को गाड़ियां मिलती थीं। उसके अलावा मिर्जापुर से तांबे या पीतल के बर्तन भी आया करते थे। उनका माधोसिंह में यानांतरण (Transshipment) होता था।

माधोसिंह-चील्ह रेल लाइन के इंजन को टर्न करने के लिये यहां टर्न-टेबल थी। स्टीम इंजन यहां घूम कर अपनी दिशा बदलता था।

उस रेल लाइन की अपनी संस्कृति थी, अपना अर्थशास्त्र। रेलवे के लिये वह यातायात, बदलते समय के साथ मिर्जापुर का शास्त्री पुल बनने, पीतल का उद्योग खत्म हो जाने और सड़क यातायात विकसित होने से घाटे का सौदा हो गया और वह लाइन कालांतर में खत्म कर दी गयी। ध्यान से देखने पर मुझे माधोसिंह मेंन प्लेटफार्म की बगल में एक बे-प्लेटफार्म (bay-platform) की जगह और कोचों में पानी भरने के लिये लगे वाटर फिलिंग कॉलम भी दिखे। अभी भी कुछ अवशेष बचे थे पुराने सिस्टम के।

पुराना, परित्यक्त पम्प हाउस

पहले, जब चील्ह तक की रेल लाइन थी और बहुत सा पार्सल यातायात भी था, माधोसिंह की रेल कॉलोनी निश्चय ही आज से बड़ी रही होगी। यहां ट्रेन ड्राइवर, गार्ड और ट्रेन परीक्षण के कर्मचारी भी रहते होंगे। ट्रेनों को और कॉलोनी को बिजली पानी की कहीं अधिक आवश्यकता होती होगी। स्टीम इंजन यहां वाटर कॉलम पर पानी लेते होंगे और उसके कारण ट्रेनें यहां 15-20 मिनट रुकती होंगी। उस समय बहुत से चाय-भजिया-पकौड़े समोसे या भोजन की दुकानें/स्टॉल भी होते होंगे। आज तो स्टेशन उस उजड़े चमन का कंकाल भर ही रह गया है। मुझे वहां एक भूतिया पम्पहाउस का अवशेष भी दिखा। उसमें स्टीम इंजन के जमाने के स्टाफ की आत्मायें जरूर निवास करती होंगी, जिन्हे स्वर्ग की जिंदगी की बजाय रेल का वातावरण पसंद आता होगा! और ऐसे बहुत से लौकिक पारलौकिक जीव होंगे यह मैं शर्तिया कह सकता हूं। 🙂

माधोसिंह प्लेटफार्म की बगल में कोच फिलिंग के पाइप का कॉलम जो चील्ह की रेल लाइन को सर्व करता होगा। ऐसे कई कॉलम थे वहां जो तब तक कायम थे।

करीब दो तीन हफ्ते हम लोग वहां रहे। इस दौरान बहुत बारीकी से मैंने स्टेशन और कॉलोनी को रेलकर्मी की निगाह से और एक बाहरी की निगाह से – दोनो प्रकार से देखा। दिन प्रति दिन मैं रेल अधिकारी से आम नागरिक बनता जा रहा था। रेल का खोल उतरता जा रहा था। और वह उतरना मुझे परेशान नहीं कर रहा था।

अक्तूबर के महीने में भी गर्मी काफी थी। बिजली बहुत जाया करती थी। हमने स्टेशन के जनरेटर पर अपनी निर्भरता अपने इनवर्टर को कमीशन कर समाप्त कर ली थी। इसके लिये स्टेशन के बिजली विभाग के कर्मी ने ही काम किया। शायद इरफान नाम था उसका। कुल मिला कर हम वहां इतने सहज और सुविधा संपन्न हो गये थे कि वहां से निकल कर अपने गांव के घर में (जहांं सुविधायें हमें बनानी पड़तीं) जाने का विशेष मन नहीं हो रहा था।

फिर भी हम जल्दी मचा रहे थे कि हमारा घर बन कर तैयार हो और हम उसमें शिफ्ट कर सकें। अखिर एक दिन वहां शिफ्ट होना ही था।


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उज्जैन के रेलवे गुड्स यार्ड की यादें

उज्जैन गुड्स यार्ड, जिसे एन सी यार्ड कहा जाता था, ने मुझे रेलवे संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सिखाया। एन सी यार्ड का मतलब था Newly Constructed Yard. नया बना होगा, पर बहुत जल्दी रेलवे का फुटकर लदान का युग खत्म हो गया। … उज्जैन ही नहीं; पूरी रेलवे के यार्ड अपनी महत्ता खो बैठे।


सन 1985-86 का समय। रेलवे पच्चीस तीस प्रतिशत यातायात वैगन लोड में लदान करती थी और उसे पटरी पर पूरे रेक के रूप में चलाने के लिये बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। गुड्स शण्टिंग यार्ड जिंदा थे। रेलवे की प्रोबेशनरी ट्रेनिंग में मैंने बहुत सा समय रेलवे गुड्स यार्डों की कार्यप्रणाली समझने में लगाया था। देश के पूर्वी भाग में अण्डाल, और धनबाद से जुडी रेल कोल लोडिंग साइडिंग्स, कोट्टवालसा – किरंदुल रेल खण्ड की यात्रा और बछेली यार्ड आदि अनुभव अभी भी दिमाग में हैं। उनका मस्तिष्क में दर्ज समय गड्डमड्ड हो सकता है। मेरे नोट्स जो काफी सालों तक मेरे सामान में रहे; तबादलों के दौरान कालांतर में कहीं इधर उधर हो गये हैं। अन्यथा बेहतर तरीके से उनके बारे में लिख सकता।

कोट्ट्वालसा – किरंदुल रेल लाइन, चित्र विकीपेडिया से

मेरा मूल रेलवे पश्चिम रेलवे है; अत: वहां कई यार्ड देखे और ट्रेनिंग में काफी घिसाई की। कोटा रेल मण्डल में ट्रेनिग करते हुये मैंने दिल्ली का तुगलकाबाद यार्ड चार-छ दिन घूम घूम कर देखा। मुझे अब भी याद है कि दिन भर ट्रेनिंग के बाद जब चीफ यार्ड मास्टर वेद प्रकाश जी (आशा है, उनका नाम ठीक से ले रहा हूं) यार्ड ऑफिस में एक कप चाय और एक बालूशाही के साथ आधे घण्टे अपने अनुभव सुनाते थे तो अपना रेलवे के साथ जुड़ाव मजबूत होते पाता था! मैंने उस मण्डल की ट्रेनिंग में आगरा ईस्ट बैंक, जमुना ब्रिज, ईदगाह, गंगापुर और सवाई माधोपुर यार्ड एक कोने से दूसरे कोने तक घूम घूम कर देखे और उनकी शंटिंग का अनुभव किया। शंटिंग इंजनों – स्टीम और छोटे डीजल शंटिंग इंजनों पर भी चढ़ा। शौकिया तौर पर बॉयलर में कोयला भी झोंका। कालांतर में जब मैं कोटा मण्डल का वरिष्ठ परिचालन प्रबंधक बना तो वह पुरानी ट्रेनिंग मेरे बहुत काम आयी।


Header Photo by Neelkamal Deka on Unsplash


पर मेरी पहली पोस्टिंग रतलाम मण्डल में सहायक परिचालन अधीक्षक के रूप में हुई थी। रहने को रतलाम स्टेशन पर एक पुराना सैलून मिला था। उसका फायदा यह था कि एक अटेण्डेण्ट मिल गया था जो (अपनी भयंकर दारू पीने की आदत के बावजूद) अच्छे से मेरे मन माफिक सादा भोजन बनाता था और जब तब तलब लगने पर चाय पिलाया करता था।

नौकरी ज्वाइन करने के बाद दूसरे या तीसरे दिन मुझे उज्जैन यार्ड जाने को कहा गया। 111 नम्बर सवारी गाड़ी में मेरा चार पहिये का सैलून लगा। जो चार पहिये और पुरानी तरह की स्प्रिंग के कारण बहुत हिलता था। उसमें यात्रा करना एक सजा की तरह होता था। रात की यात्रा में सैलून में हिलते डुलते मैं उज्जैन पंहुचा। नींद अच्छे से आयी नहीं थी।

नयी नौकरी में अपने आप को “प्रमाणित” करने का जोश इतना था कि मैं बहुत जल्दी ही गुड्स यार्ड में पंहुच गया। उज्जैन स्टेशन के पूर्वी किनारे पर बना वह यार्ड पच्चीस लाइनों का था, और वैगनों से भरा था। मुश्किल से दो चार रेल लाइनें खाली थीं। इंजन को एक ओर से दूसरी ओर ले जाने के लिये भी एक ही लाइन खाली थी!

यार्ड का मुख्य काम भोपाल की ओर से आने वाली तीस बॉक्स वैगन की कोयले की ट्रेनों को यार्ड में ले कर चालीस वैगनों की ट्रेन बना कर रवाना करना था। इसके अलावा दिन भर में पांच छ मिक्स्ड लोड (फुटकर लदान के वैगनों से बनी ट्रेनें) यार्ड में आते थे, जिनकी छ्न्टाई कर अलग अलग दिशाओं की ट्रेनें बनानी पड़ती थीं। मुझे जल्दी ही समझ आ गया कि अच्छे (और मेहनती) यार्ड मास्टर, मूवमेण्ट इंस्पेक्टर आदि की टीम के बावजूद यार्ड बहुत अच्छी तरह काम नहीं कर रहा था। शण्टिंग की अधिकता, वैगनों के कैरिज-वैगन परीक्षण में लगने वाला समय और उसमें वैगनों का ‘सिक’ किया जाना, अन्य विभागों से तालमेल और मण्डल के परिचालन की समस्याओं के प्रभाव यार्ड की वर्किंग पर थे। महीने में एक या दो बार ऐसा अवसर आता था कि यार्ड वैगनों-ट्रेनों से ‘पैक’ हो जाता था और उसकी सहायता के लिये माल गाड़ियां यार्ड में लेने की बजाय बाई-पास करनी होती थीं।

दो मूवमेण्ट इंस्पेक्टर/चीफ यार्ड मास्टर मुझे अब भी परिवार के अंग की तरह याद हैं। आर एस सोढ़ी सिक्ख थे और अय्यर दक्षिण भारतीय होने के बावजूद बहुत अच्छी हिंदी बोलते थे। इन दोनो से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। महीने में पांच छ दिन तो मैं वहां पंहुचा ही रहता था। मैं अपने को यार्ड का अंग सा मानने लगा था।

यार्ड में बहुत समय व्यतीत करने के कारण मैं उज्जैन यार्ड का ‘एक्सपर्ट’ जैसा हो गया था। मुझे अच्छी तरह याद है कि ई. श्रीधरन (कोंकण और मैट्रो रेलवे ख्याति वाले) बतौर पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक उज्जैन यार्ड आये थे और यार्ड ऑफिस की दीवार पर बहुत ऊंचे टंगे यार्ड डायग्राम के आधार पर यार्ड कार्यप्रणाली समझाने के लिये मैंने एक लम्बी लकड़ी हाथ में प्वाइण्टर की तरह ली थी। श्रीधरन बहुत बारीकी से किसी भी विषय को समझा करते थे। उस प्वाइण्टर से यार्ड की पच्चीस लाइनों को अपने कद (पांच फुट साढ़े तीन इंच) और डायग्राम की ऊंचाई के कारण मैं अलग अलग चिन्हित नहीं कर पा रहा था। लिहाजा मैंने बिना झिझक जूते उतारे और यार्ड ऑफिस की टेबल पर खड़े हो कर दस पंद्रह मिनट का प्रेजेण्टेशन यार्ड वर्किंग के बारे में महाप्रबंधक महोदय को दिया। नौजवान था मैं। जोश था और महाप्रबंधक जैसे शीर्षस्थ अधिकारी का भय नहीं था मुझमें। अन्यथा, कोई भी अन्य अधिकारी इस तरह की “भदेस” प्रेजेंटेशन तकनीक की कल्पना नहीं कर सकता था। 🙂

पर श्रीधरन जी ने मेरी प्रशंसा की और बाद में मण्डल रेल प्रबंधक महोदय ने भी कहा – जीडी, बहुत बढ़िया किया तुमने!

उज्जैन गुड्स यार्ड, जिसे एन सी यार्ड कहा जाता था, ने मुझे रेलवे संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सिखाया। एन सी यार्ड का मतलब था Newly Constructed Yard. नया बना होगा।

पर बहुत जल्दी रेलवे का फुटकर लदान का युग खत्म हो गया। कोयला लदान के वैगन भी बेहतर बनने लगे। ट्रेनें तीस बॉक्स वैगनों की बजाय पहले चालीस और फिर 56-58 बॉक्स-एन वैगनों की होने लगीं, जिनकी यार्ड में ले कर चालीस या पैंतालीस डिब्बों की ट्रेन बनाने की आवश्यकता ही नहीं रही। और उज्जैन यार्ड अप्रासंगिक हो गया। उज्जैन ही नहीं; पूरी रेलवे के यार्ड अपनी महत्ता खो बैठे। सबसे दयनीय दशा तो मुगल सराय यार्ड की सुनने में आती थी जो एक तरफ बना और दूसरी तरफ बनते ही अप्रासंगिक होने लगा था!

मेरे रतलाम मण्डल में जाने के बाद एक दशक भर लगा यह परिवर्तन होने में।

अनेकानेक यादें जुड़ी हैं उज्जैन गुड्स यार्ड और रतलाम-उज्जैन की लगभग नियमित यात्राओं की। और वे सब एक ब्लॉग पोस्ट में समेटी नहीं जा सकतीं।

(उस जमाने में डिजिटल कैमरा नहीं था। मेरे पास चित्र नहीं हैं। जो चित्र पोस्ट पर लगे हैं वे इधर उधर से प्रतीकात्मक रूप से लगाये गये हैं।)


बर्फी सोनकर और (सब्जी) मण्डी के बदलाव के भय

बर्फी सोनकर अपने अनुभव, नेटवर्क, सूचनाओं और इनट्यूशन की बदौलत इतना कमाते हैं, जितना कोई मध्य स्तर की कम्पनी का सीईओ कमाता होगा। उनका लड़का रंगीला, अभी सीखते हुये बतौर आढ़त एप्रेण्टिस, मजे से व्यवसाय करता है।


आजकल किसान आंदोलन के संदर्भ में सुनता हूं कि यह आंदोलन आढ़तियों द्वारा प्रायोजित है। और मुझे लगता भी है। अनाज मण्डी मैंने देखी नहीं। मेरे एक दो एकड़ में इतना अनाज होता ही नहीं कि मण्डी जाना पड़े। पर बतौर सब्जी क्रेता एक बार मण्डी अवश्य गया हूं। और वह अनुभव महत्वपूर्ण है।

सर्दियों का ही मौसम था। सन 2016 की जनवरी थी। नया नया ग्रामीण बना था और नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद एक एक दमड़ी संभल कर खर्च करने का सोच थी। किसी ने बताया कि अगर थोक में सब्जी खरीदी जाये तो बहुत सस्ती पड़ेगी। महराजगंज कस्बे के सभी सब्जी वाले कछवां सब्जी मण्डी से सवेरे सवेरे सब्जी खरीद कर लाते हैं और अपनी गुमटियों, ठेलों या फुटपाथ पर बेचते है।

मैं सीधे खरीदने के लिये कछवां सब्जी मण्डी गया। वहां व्यापारी मिले – बर्फ़ी सोनकर। उन्होने 25 साल पहले 200रु से सब्जी खरीद-बिक्री का थोक काम शुरू किया था। आज 2 लाख रोज का कारोबार (बकौल उनके) करते हैं। दो लाख का कारोबार अगर टर्नओवर भी मान लें (उन्होने यह स्पष्ट नहीं किया था कि यह उनका मुनाफा है या कुल काम का लेवल), तो उनकी आमदनी करीब तीस हजार रोज होगी। उनके आढ़त व्यवसाय का मूल आसपास (मुख्यत: गंगा किनारे के किरियात क्षेत्र) के व्यापक सब्जी उत्पादक किसानों से सही और आत्मीय तालमेल ही होगा।

बड़े अदब से मिले सोनकर जी। वैसा सत्कार किया, जैसे इलाके के सम्पन्न (?) ब्राह्मण का करते हैं। बार बार वे मुझे ‘गुरूजी’ का सम्बोधन दे रहे थे। गुरूजी विद्वान ब्राह्मण के लिये कहा जाने वाला शब्द है इस इलाके में। उन्होने मुझे अपने तख्त के पास एक कुर्सी पर बिठाया और चाय पिलाई। फिर अपने लड़के; रंगीला सोनकर को निर्देश दिया कि मण्डी से मेरी आवश्यकता अनुसार सब्जी खरीदवा दें। उनका तो ट्रकों माल आता जाता है। कई बार मण्डी को फिजिकली टच भी नहीं करता। “कलकत्ता साइड से आता है और वे उसे दाम के हिसाब से दिल्ली या और जगहों पर डायवर्ट कर देते हैं।’

मुझे बस 5-10 किलो आलू, मटर इत्यादि लेना था।

बर्फी सोनकर
उनसे बातचीत से मुझे लगा कि अपने पिता के सहायक की भूमिका के अलावा, रंगीला फुटकर काम में भी कछवां सब्जी मण्डी में 5-7 हजार रुपया रोज बना लेते होंगे। … इन्फ़ोसिस/टीसीएस छाप नौकरी ठेंगे पर। सॉफ्टवेयर से बेहतर है मटर और गोभी।

रंगीला हमको तो फुटकर खरीद के लिये उन जगहों से ले कर गुजरे जहां छोटे दुकानदार अपनी दैनिक जरूरत की खरीद कर रहे थे। मेरी जरूरत तो बर्फी और रंगीला सोनकर के स्तर की कत्तई नहीं थी। फिर भी रंगीला सोनकर हमारे साथ घूमे और उनके साथ होने से हमें सब्जी सस्ती – बहुत ही सस्ती मिली।

खैर, सब्जी खरीद का यह मॉडल सस्ता बहुत होने के बावजूद मेरे लिये व्यवहारिक नहीं था। साल में एक दो बार मिलने पर बर्फी और रंगीला हमें तवज्जो दे सकते थे; हफ्ते दर हफ्ते तो वह नहीं किया जा सकता। इसके अलावा हमारी थोड़ी सब्जी की जरूरत के लिये मण्डी तक दौड़ लगाना फायदे का सौदा नहीं। उसमें समय लगता है, कार का पेट्रोल का खर्चा भी सब्जी को उतना ही सस्ता या मंहगा बना देता है, जितना हम पास के महराजगंज में महेंदर की फुटपाथ की दुकान से खरीदते हैं।

कछवां सब्जी मण्डी का वह भाग जहां फुटकर दैनिक दुकानदार अपनी सब्जी खरीदते हैं।

कछवां सब्जी मण्डी में करीब 20 मिनट तक घूम कर रंगीला सोनकर से बातचीत हुई। वे अपने पिता बर्फ़ी सोनकर के व्यवसाय में हाथ बटाते हैं। उन्होने बताया कि सब्जी उनका पारिवारिक और पुश्तैनी व्यवसाय है। सब्जियां ट्रकों से कलकत्ता, दिल्ली, इलाहाबाद और बनारस जाती हैंं।

उनसे बातचीत से मुझे लगा कि अपने पिता के सहायक की भूमिका के अलावा, रंगीला फुटकर काम में भी कछवां सब्जी मण्डी में 5-7 हजार रुपया रोज बना लेते होंगे। … इन्फ़ोसिस/टीसीएस छाप नौकरी ठेंगे पर। सॉफ्टवेयर से बेहतर है मटर और गोभी।

रंगीला सोनकर

रंगीला सोनकर का मैने मोबाइल नम्बर लिया। यद्यपि भविष्य में कोई सम्पर्क नहीं किया तो कालांतर में वह खो गया। पर वह नौजवान अपने रोलोडेक्स में जोड़ने लायक था। और मित्र बनाने योग्य भी।

मण्डी व्यवस्था अगर सरकारी एक्ट के माध्यम से खड़बड़ा दी जाये तो कितना बड़ा भूचाल आयेगा?! वह भूचाल आजकल संसद द्वारा पारित बिलों की बदौलत अनाज मण्डी के भविष्य को लेकर आया है। अनाज के आढ़त के “बर्फी सोनकर” निश्चय ही बिलबिला रहे हैं। और अगर यह कहा जा रहा है कि किसान आंदोलन आढ़तिया प्रायोजित है तो अतिशयोक्ति नहीं।

कछवां मण्डी में मैंने एक घण्टा व्यतीत किया। जगह बड़ी थी, पर फिर भी बहुत से लोग और सामान वहां था। मैंने देखा तो नहीं है, पर जैसा पढ़ा है और वीडियो देखे हैं, फिश-मार्केट जैसा माहौल था।

वहां से चलते समय लग रहा था कि रेलवे की अफ़सरी की बजाय काश बर्फ़ी सोनकर की तरह सब्जी के आढ़त का काम किया होता!

बर्फी सोनकर अपने अनुभव, नेटवर्क, अपनी सूचनाओं और कुछ सीमा तक अपने इनट्यूशन की बदौलत इतना कमाते हैं, जितना कोई मध्य स्तर की कम्पनी का सीईओ कमाता होगा। उनका लड़का रंगीला, अभी उनसे सीखते आढ़त एप्रेण्टिस होने के बावजूद उतना कमाता होगा, जितना मैं रेल के विभागाध्यक्ष के रूप में तनख्वाह पाता था।

मण्डी व्यवस्था अगर सरकारी एक्ट के माध्यम से खड़बड़ा दी जाये तो कितना बड़ा भूचाल आयेगा?! वह भूचाल आजकल संसद द्वारा पारित बिलों की बदौलत अनाज मण्डी के भविष्य को लेकर आया है। अनाज के आढ़त के “बर्फी सोनकर” निश्चय ही बिलबिला रहे हैं। और अगर यह कहा जा रहा है कि किसान आंदोलन आढ़तिया प्रायोजित है तो अतिशयोक्ति नहीं।

देर सबेर होगा क्या? तकनीक सब्जी और अनाज के व्यवसाय में उसी तरह पैठ बनायेगी जिस तरह ओला और उबर या डोमिनो पित्जा या स्विग्गी और जोमैटो की गिग इकॉनॉमी पूरे बाजार के समीकरण पलट दे रही है! सिंघू बॉर्डर की पांय पांय उसे रोक नहीं पायेगी। बर्फी सोनकर, भले ही कछवां मण्डी के अपने तख्त पर बैठ कर बिजनेस करें या अपने घर पर; उनके आसपास स्मार्टफोन, वेब ब्राउजर, एप्प आदि जरूर आ जायेगे। ज्यादा बड़े स्तर पर बनें तो शायद वे कमॉडिटी ऑनलाइन एक्स्चेंज की तरह “बर्फीवेज पोर्टल” जैसा कोई प्लेटफार्म बना लें – अमेजन, मंत्रा स्टाइल में। 🙂

commodityonline

पर बाजार का स्टाइल तो बदलने वाला ही है। एआई (आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस) पैठ करेगी अनाज और सब्जी के थोक बाजार में भी और कंवेंशनल आढ़तिये का तख्ता हिलेगा ही। अभी देखता हूं तो कमॉडिटी ऑन लाइन पर गोभी की भी खरीद बिक्री हो रही है! एमसीएक्स पोर्टल भी एग्री कमॉडिटी को डील करने का सेक्शन बना रहा है और हिंदी में भी वेब पेज निर्माणाधीन है। समय बदल रहा है।

mcxindia

अनाज व्यापार पांच दस साल में बहुत बदलेगा। बहुत खड़बड़ाहट होगी। कई उखड़ेंगे और कई आयेंगे, नये कई जमेंगे। अभी जो मंथन चल रहा है देश में, वह ट्रेलर है।

युवाल नोवा हरारी को पढ़ा, सुना जाये! 😆


पुरा-वनस्पति शास्त्री डा. अनिल पोखरिया जी

डा. अनिल से बातचीत में ही पता चला कि अरहर की दाल गांगेय प्रदेश में पहले नहीं मिलती। ओडिसा से सम्भवत यहां आयी। इसी प्रकार कटहल दक्षिण भारत से उत्तर के गांगेय और सरयूपार इलाकों में आया।


बीस अप्रेल 2018 की पोस्ट, जो फेसबुक नोट्स ने गायब कर दी है। फेसबुक अपनी नोट्स की सेवा अक्तूबर 2020 से बंद कर चुका है। इस लिये मुझे हार कर अपनी कुछ पोस्टें जो फेसबुक पर थीं, ब्लॉग में उतारनी पड़ रही हैं। 😦

उनमें से एक पोस्ट डा. अनिल पोखरिया पर है। डा. पोखरिया यहां अगियाबीर की पुरातत्व खुदाई स्थल से जले हुये अनाज के सेम्पल ले कर गये थे। उन सेम्पल्स की डेटिंग करनी थी उन्हें। किस समय के बीज हैं? उससे बहुत कुछ पता चलेगा कि नियोलिथिक (उत्तर पाषाण युग का) मानव इस टीले पर कब आया? सेम्पल लिये पौने तीन साल हो गये हैं। बी.एच.यू. की पुरातत्व विभाग की टीम (डा. अशोक कुमार सिंह और डा. रविशंकर) अपनी रिपोर्ट लगभग बना चुके हैं। उन्हे इंतजार है बीजों की कार्बन डेटिंग का।

डा. पोखरिया को मैंने पिछले सप्ताह फोन किया। डा. रविशंकर से भी बात की। उनके अनुसार अभी जो अतीत की तारीख निकल कर आयी है, वह ताम्र पाषाण मानव के युग की है। पेलियोसाइंस की मदद से अभी वे अभी वे नियोलिथिक काल में स्थापित नहीं कर पाये हैं अगियाबीर को। पर दोनो सज्जन अभी भी आशावान हैं। और अभी तो अस्सी फीसदी अगियाबीर के टीले का पुरातात्विक अध्ययन बाकी है। मेरे विचार से अगियाबीर टीले की पुरातनता की तारीख को और अतीत में धकेल पाने की बजाय उस टीले में नगरीय सभ्यता के और पुख्ता प्रमाण पाना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। पर एक होड़ सी है अवैध उत्खनन कर मिट्टी बेच कर पैसा कमाने की जुगत में बैठे माफिया में और पुरातत्वविदों में। कौन जीतेगा?

कोई जीते, मैं तो साक्षी भर हूं। जो होगा वह ब्लॉग पर लिखने का विषय होगा।

आप इस प्रस्तावना के बाद डा. अनिल पोखारिया की अगियाबीर और गंगा तट पर किये कार्य पर पुरानी पोस्ट देखें –


डा. अनिल पोखरिया वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं बीरबल साहनी इन्स्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज, लखनऊ में। वे आर्कियॉलॉजिकल साइट्स पर उपलब्ध पाषाणयुग के वनस्पति अवशेषों – मसलन जले हुये अन्न के टुकड़ों, बीजों आदि का अध्ययन कर यह पता लगाते हैं कि उस समय के मानव की फूड- हैबिट्स कैसी थीं, उस समय का वातावरण कैसा था, ट्रेड लिंक्स कैसे और कहां से थे और लोगों का आदान-प्रदान या पलायन कैसे हुआ होगा।

कल 19 अप्रेल 2018 को मिले थे पुरातत्व-वनस्पति विज्ञानी डा. अनिल पोखरिया जी।

मुझे पहले मालुम नहीं था कि विशेषज्ञता की यह – पेलियो-एथेनो-बोटनी ( Paleoethnobotany ) – भी कोई विधा है। पर अगियाबीर की नियोलिथिक/कैल्कोलिथिक पुरातत्व साइट पर कल उनसे मुलाकात के बाद लगा कि भारतवर्ष की प्रागैतिहासिक विरासत संजोने का बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं डा. अनिल और उनके प्रकार के विशेषज्ञ गण!

आज (बीस अप्रेल 2018) गंगा तट पर मैं और मेरी पत्नीजी डा. अनिल के पास पंहुच गये। अगियाबीर की खनन की ट्रेंचों में से निकली मिट्टी वहां ला रहे थे श्रमिक। गंगा के पानी में वह मिट्टी खंगाल कर उसमें से जले (या कार्बोनाइज्ड) अन्न के अवशेषों का अध्ययन करने जा रहे थे अनिल जी। उन्हें करीब 15-20 तसले मिट्टी की आवश्यकता थी इस प्रयोग की। तीन चार तसले मिट्टी ला चुके थे श्रमिक। और मिट्टी लाये जाने की प्रतीक्षा करते हुये उन्होने अपने कार्य के बारे में हमें बताया।

गंगा तट पर पुरातत्व खनन की मिट्टी टब में खंगालते डा. अनिल

करीब बीस-बाइस सालों से पुरातत्व साइट्स पर इस प्रकार का अध्ययन कर रहे हैं पोखरिया जी। अभी वे लखीसराय, बिहार के पास एक आर्कियॉलॉजिकल साइट से हो कर आये थे। उनके साथ आये सज्जन बता रहे थे कि पिछले 8-10 दिन से वे पुरातत्व साइट्स पर ही हैं। अपने कार्य के बारे में मुझे समझाने में वे बड़े सरल शब्दों में बात कर रहे थे। दो दशकों की विशेषज्ञता की रुक्षता कहीं भी परिलक्षित नहीं हो रही थी। साइट पर खुदाई करने वाले लोगों के लिये वे नाश्ते की चीजें खुद ले कर आये थे। सरकारी ब्यूरोक्रेसी में जो खुर्राटपन नजर आता है (और मैं जिसका अंग रह चुका हूं) वह उनके व्यक्तित्व में लेश मात्र भी नजर नहीं आता था। उनके साथ वार्तालाप में एक नयी विधा को जानने और नये प्रकार के विशेषज्ञ से मिलने का जो आनन्द था, वह उनके व्यक्तित्व की सरलता से और भी बढ़ गया था!

डा. अनिल ने बताया कि कार्बोनेटेड अन्न से कुछ अनुमान तो उसके आकार-प्रकार से; अर्थात अनाज की मॉर्फ़ोलॉजी से लग जाते हैं। विस्तृत अध्ययन के लिये वे इसका लैब में परीक्षण करते हैं। अन्न की आयु पता करने के लिये रेडियोकार्बन (सी-14) डेटिंग या एएमएस (एक्सीलरेटर मास स्प्रेक्टोमीट्री) डेटिंग तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। सी-14 डेटिंग की सुविधा उनकी संस्थान की लैब में उपलब्ध है। एएमएस डेटिंग के लिये सेम्पल पोलेण्ड या चीन भेजने होते हैं।

मिर्जापुर के विन्ध्य क्षेत्र में पुरातत्व स्थल के अपने अनुभव के बारे में डा. अनिल ने बताया कि वहां उन्हें शरीफा के बीज मिले। आमतौर पर धारणा यह है कि शरीफ़ा भारत में पोर्चुगीज लाये। तदानुसार यह 15-16वीं सदी में आया होना चाहिये था। पर उन्हें जो बीज मिले वे तीन चार हजार साल पहले के थे। कुछ अन्य पुरातत्व स्थलों पर भी शरीफ़ा के बीज मिले। ये बीज मानव बस्ती के आसपास मिले, जंगल में नहीं। इससे यह पता चलता है कि बहुत पहले भी किसी प्रकार यहां और योरोप के ट्रॉपिकल जलवायु स्थलों के बीच किसी न किसी प्रकार का मानवीय आदानप्रदान था। पेलियोएथनोबोटानिकल अध्ययन से यह भी पता चला है कि आज से दस हजार साल पहले लौकी एशिया-अफ़्रीका से अमेरिका पंहुची! डा. अनिल ने बताया कि इस सन्दर्भ में हाल में एक पेपर पब्लिश हुआ है।

डा. अनिल से बातचीत में ही पता चला कि अरहर की दाल गांगेय प्रदेश में पहले नहीं मिलती। ओडिसा से सम्भवत यहां आयी। इसी प्रकार कटहल दक्षिण भारत से उत्तर के गांगेय और सरयूपार इलाकों में आया।

बहुत रोचक है सभ्यताओं और उनके साथ वनस्पतियों का मानव आदान-प्रदान या पलायन से प्रभावित होना। आर्कियोबोटानी पुरातन रहस्य की कई परतें खोलती है और पुरातत्व अध्ययन को कई नये आयाम प्रदान करती है।

अपना प्रयोग प्रारम्भ करते हुये, डा. अनिल ने एक टब में पुरातत्व स्थल से लाई मिट्टी उंडेली। इस काम के लिये उन्होने गंगा किनारे एक प्लेटफार्म बनवाया था। उस टब को पानी से भर कर मिट्टी को अपने दस्ताने पहने हाथ से खूब हिलाया। मिट्टी के मोटे गीले ढेले हल्के मसल कर तोड़े जिससे उनके बीच के बीज अलग हो सकें। पूरी तरह मिलाने के बाद एक 0.6मिमी की छन्नी से पानी निथार कर छन्नी में राख के कण और जले (कार्बोनेटेड) बीज अलग किये। उनकी पैनी निगाहों ने कुछ दाल और जौ के बीज तत्काल ही पहचान लिये और हमें दिखाये।

जब खुदाई की मिट्टी से ऊपर उतर आया तत्व छन्नी में निथारा तो मिली यह राख और उसमें जले हुये अन्न के दाने। बायें अंगूठे पर एक दाल का दाना निकाल कर दिखाया अनिल जी ने। >3000 साल पुराना दाल का दाना!

हम जिसे मात्र मिट्टी समझ कर चल रहे थे उसमें राख और बीज भी थे, इसकी कल्पना भी नहीं थी हमें।

डा. पोखरिया ने बताया कि अपने साथ लाये कपड़े के थैलों में वे ये राख और अवशेष सुखा कर लैब में अध्ययन के लिये ले जायेंगे।

डा. अनिल ने कपड़े का थैला दिखाया जिसमें राख/अवशेष सुखा कर ले जायेंगे वे।

अपने आधे घण्टे के डिमॉन्स्ट्रेशन में डा. अनिल पोखरिया जी ने हमें बता दिया अपने कार्य करने की तकनीक का मोटा अन्दाज। बाकी, उनको मैने अपना ईमेल पता दे दिया है इस अनुरोध के साथ कि वे मुझे इस विषय में कुछ पठनीय सामग्री, छपे पेपर्स और नेट पर उपलब्ध सामग्री के लिंक्स भेज दें। अब, रिटायरमेण्ट के बाद इस प्रकार के अनूठे विषयों पर जानकारी हासिल करना ही महत्वपूर्ण हो गया है मेरे लिये। आगे जीवन में वह जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके और डा. अनिल जैसे लोगों से जितना ज्यादा से ज्यादा ग्रहण कर सकूं – यही इच्छा रहेगी भविष्य की!

मिट्टी से राख-बीज छानते डा. अनिल और अन्य पुरातत्व कर्मी

रेणु की “एक आदिम रात्रि की महक” से उभरी रेल यादें

उसी दौरान मैं माही नदी के किनारे बहुत घूमा। उसके दृष्य अभी भी याद हैं। माही नदी में एक बरसाती नदी “लाड़की” आ कर मिलती थी। मेरे मन में यह भी साध बाकी रही कि चल कर लाड़की का उद्गम स्थल देखूं।


एक सज्जन ने मुझे भुवन शोम देखने को कहा, तो दूसरे ने फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी एक आदिम रात्रि की महक पढ़ने की सलाह दी –

वात्स्यायन जी ने फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की एक आदिम रात्रि की महक की बात की

और मुझे लगा कि वास्तव में मैंने कितना कम पढ़ा या देखा है! खैर, हिंदी समय पर ‘रेणु’ जी की कहानी मिल गयी और वही नहीं, कई और भी मैंने डाउनलोड कर इत्मीनान से किण्डल पर पढ़ीं।

हिंदी समय के पन्ने पर ‘रेणु’ जी की सात कहानियां थीं। ये सातों एक वर्ड डॉक्यूमेण्ट बना कर किण्डल पर सहेज लीं। एक पुस्तक का मजा देने वाला प्रयोग। यह अमेजन पर खरीदने पर ढाई-तीन सौ लगते!


खैर, मुद्दे की बात; रेणु की कहानी में रेलवे के छोटे स्टेशन का वातावरण तो है। करमा जैसा चरित्र मैंने देखा नहीं, शायद ध्यान देता तो मिल जाता। पर यहीं कटका स्टेशन पर लखंदर है। मास्टर साहब हजार डेढ़ हजार की एवजी में उसे रखते हैं। स्टेशन की सफाई करता है। यहां तो नहीं, पर अपनी नौकरी के दौरान कई एवजी (दिहाड़ी वाले या कॉट्रेक्ट कर्मी) बड़े स्मार्ट देखे हैं मैंने। ब्रांच लाइन पर तो ब्लॉक वर्किंग और सिगनल एक्स्चेंज भी कर लेते हैं – ऐसा सुना है। उनके अथवा चतुर्थ श्रेणी के रेगुलर कर्मचारी से यह काम कराये जाने की रिपोर्ट होने पर मास्साब नप जाते हैं। पर ब्रांच लाइन में इस तरह का रिस्क दिलेर लोग ले ही लेते हैं यदा कदा।

छोटे स्टेशनों पर निरीक्षण करते इस तरह के दृष्य पर ध्यान देने और उसे मोबाइल कैमरे में लेने का शौक मुझे रहा है। रेल कर्मी अपना भोजन यूं भी बना लेते हैं प्लेटफार्म पर।

छोटे स्टेशन पर पनपते प्रेम-प्यार को देखने का अवसर नहीं मिला। मेरे साथ कम से कम चार पांच लोगों की “भीड़” रहती थी। उसमें निहायत व्यक्तिगत व्यवहार के दर्शन नहीं हो पाते। हां, नौकरी के शुरुआती दिनों में, जब गोधरा-रतलाम खण्ड का विद्युतीकरण का काम चल रहा था तो तीन ब्लॉक सेक्शन जिनमें सिंगल लाइन हुआ करती थी, वहां के काम को देखने के लिये फील्ड में मुझे जाना पड़ा।

वे लगभग जंगल के बीच के अनास, पंचपिपलिया और भैरोगढ़ थे। उन स्टेशनों पर मुझे हफ्तों रहना पड़ा। अनास स्टेशन पर, रात के एक बजे, यूं ही अकेले पटरी के किनारे दो किलोमीटर निकल गया। बीच का अनास नदी का पुल भी पार किया एडवेंचर के लिये। टपक जाता तो नीचे जल विहीन अनास नदी 25 – 30 मीटर नीचे थी। तब कोई मोबाइल होते नहीं थे। स्टेशन पर हल्ला मचा कि एओएस साहब गुम हो गये हैं। वह इलाका भील जनजाति का है और उनसे शहरी मानव के सम्बंध बहुत मधुर नहीं थे। कम से कम रेल स्टाफ वैसा ही समझता था कि अगर उनके चंगुल में मैं फंसता तो छिनैती करते और वह भी बिना मारे पीटे नहीं!

रात में दो-तीन कर्मचारी साथ में आरपीएफ रक्षक को ले कर मुझे ढ़ूंढने निकले। पर तब तक मैं दूसरी ओर के कैबिन में पंहुच गया था। उन सब ने राहत की सांस ली और मुझे समझाइश दी कि वैसा एडवेंचर रात में न करूं।

भैरोगढ़ स्टेशन पर चाय की गुमटी में बैठी वह किशोरी अभी भी मुझे याद है। वह किसी रेलवे कर्मी की बच्ची थी जो बहुत से बाहर से वहां आये कर्मचारियों को चाय पिलाया करती थी। उसी पर कुछ रेणु जी जैसे कथा बुनने की सम्भावना बनती थी।

उसी दौरान मैं माही नदी के किनारे बहुत घूमा। उसके दृष्य अभी भी याद हैं। माही नदी में एक बरसाती नदी “लाड़की” आ कर मिलती थी। मेरे मन में यह भी साध बाकी रही कि चल कर लाड़की का उद्गम स्थल देखूं।

इंजीनियरिंग विभाग के पीडब्ल्यूआई साहब का रजिस्टर का पोटला लादे चतुर्थ श्रेणी का कर्मी। रेणु इस पर खूब बढ़िया कहानी लिखते!

भैरोगढ़ स्टेशन पर चाय की गुमटी में बैठी वह किशोरी अभी भी मुझे याद है। वह किसी रेलवे कर्मी की बच्ची थी जो बहुत से बाहर से वहां आये कर्मचारियों को चाय पिलाया करती थी। उसी पर कुछ रेणु जी जैसे कथा बुनने की सम्भावना बनती थी। कोई भी जवान गैंग मैन या जूनियर पी डब्ल्यू आई भी उसके प्रेम में पड़ सकता था। उसकी चमकती आंखें और भरा शरीर अभी भी मुझे याद है। उसकी चाय की बिक्री खूब होती थी।


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बहुत समय बाद; तीस साल बाद; रिटायरमेण्ट के समय मैं एक बार पुन: भैरोंगढ़ और माही नदी के समीप गया। और सांझ का दृष्य वैसा ही लगा, जैसा मेरे रेल के शुरुआती दिनों में था।

माही नदी किनारे शाम। चित्र 2015 का है।

पंचपिपलिया, जैसा नाम है, बड़े बड़े पीपल के वृक्षों से आच्छादित था। कहा जाता है कि भीम की पत्नी हिडिम्बा यहीं की थी। वहां मैं एक सप्ताह रहा। वह भी जंगल और ऊबड़ खाबड़ इलाका। पर हिडिम्बा तो क्या, किसी नारी की छाया भी नहीं दिखी। मेरे भीतर के रेणु को जगाने के लिये न सही मन था और न माहौल। मैं एक शुष्क रेल यातायात सेवा का सहायक ऑपरेशन अधीक्षक था। जिसे अपने विभाग में अपनी ‘धाक’ जमाने की ज्यादा फिक्र थी। 😦

फणीश्वर नाथ रेणु तो क्या, किसी भी स्तर का कथाकार बनने के गुण मुझमें नहीं थे। आगे विकसित होंगे? राम जाने! लेकिन ट्विटर पर वात्स्यायन जी ने जब कहानी पढ़ने के लिए अनुशंसा की थी तो इस लिए तो कदापि नहीं की होगी कि मैं अपने आप को रेणु जी से तुलना कर देखने लिखने लगूं।

उस कहानी ने इतनी यादें ताजा कीं, वही बहुत है। कहानी का ध्येय वही होता है!