सवेरे का सपना था, इसलिये याद रह गया।


सवेरे का सपना था। इसलिये याद रह गया।

वह सड़क किनारे बैठा था। बगल में बरसात का पानी भरा एक छोटा गड्ढा था। कीचड़ था। रात में पानी बरसा होगा। उसे उठने की जल्दी नहीं थी।

मैंने नोटबुक निकाली। पता नहीं सपने में नोटबुक कहाँ से आ गई। पूछा – “जमीन पर क्यों बैठे हो?”

उसने कहा – “स्वर्ग गया था। वहीं रह रहा था। फिर किसी ने हिसाब देखा। बोले – मुन्ना कबाड़ी, तुम्हारा कबाड़ इकट्ठा करने का कोटा अभी पूरा नहीं हुआ है। कुछ बाकी है। जाओ, पूरा करके आओ।”

“तो लौट आए?”

“हाँ। अब काम पर निकलूंगा।” उसके चेहरे पर न उदासी थी, न खुशी। जैसे कोई आदमी तहसील से लौट कर कहे – अभी एक कागज और लगाना है।

मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने पूछा – “स्वर्ग से वापस भेज दिया गया। खराब नहीं लगा?”

वह मेरी ओर देखने लगा। बोला – “खराब क्यों लगेगा? काम बाकी रह गया था। पूरा करना है। उन्होंने कहा है – पूरा कर लो, फिर आ जाना।”

मैंने कहा – “पर स्वर्ग तो ज्यादा अच्छा होगा। यहाँ कीचड़ है। कबाड़ी का काम भी कोई बहुत अच्छा काम नहीं माना जाता।”

वह हँसा भी नहीं। बोला – “यहाँ भी ठीक ही है। कबाड़ी का काम करता रहा हूँ। वही कर लूँगा। काम पूरा हो जाए तो चला जाऊँगा।”

मुझे लगा, तुलना केवल मैं कर रहा था। वह नहीं। उसके लिये स्वर्ग और यह सड़क शायद दो जगहें भर थीं। काम जहाँ मिले, वहीं रहना है।

फिर नींद खुल गई। चाय पीते समय भी वही सपना याद आता रहा। पत्नी जी को सुनाया। विवेचना की हम दोनों ने मिलकर। अजीब सपना लगा उनको भी।

मैं सोचता रहा – मुन्ना कबाड़ी कौन था?

वह कोई अनजान आदमी था; या मैं ही था?

कबाड़ी क्या करता है? लोग जो फेंक देते हैं, उन्हें उठा लेता है। उनमें कुछ काम की चीज़ खोज लेता है।

मैं भी तो कुछ वैसा ही करता हूँ। गाँव में घूमता हूँ। लोग, पेड़, पक्षी, किसान, बच्चों की बातें, टूटे नल, कीचड़, बरसात, नीलगाय, भुआलिन, सब बटोरता रहता हूँ। दूसरे जिन बातों पर ध्यान नहीं देते, वे मेरी नोटबुक में चली आती हैं।

कबाड़ नहीं तो और क्या है यह?

शायद हर लेखक थोड़ा-बहुत कबाड़ी होता है।

सपने की सबसे अजीब बात स्वर्ग नहीं थी। अजीब बात मुन्ना था। उसने एक बार भी नहीं पूछा – मुझे वापस क्यों भेज दिया?

एक बार भी नहीं कहा – मुझे यहीं रहने दो।

उसे केवल इतना मालूम था कि उसका कोटा पूरा नहीं हुआ है। कोटा पूरा करना है। उसके बाद जो होगा, देखा जाएगा।

जागने के बाद से सोच रहा हूँ – क्या आदमी सचमुच इतना निस्पृह हो सकता है?

या सपने हमारे भीतर किसी ऐसे आदमी को जन्म दे देते हैं, जो जागती दुनिया में दिखाई नहीं देता?

और एक बात।

अगर सचमुच ऊपर कहीं हिसाब-किताब होता हो, तो क्या हर आदमी को यही कहा जाता होगा – “अभी तुम्हारा काम बाकी है। जाओ, पूरा करके आओ।”

मुन्ना कबाड़ी और मैं – सपने में

या यह बात केवल मुन्ना कबाड़ी से कही गई थी? ग्रंथों में पढ़ता हूं तो नहुष ने तो बवाल ही मचा दिया था। स्वर्ग से इतनी आसानी से कौन लौटता है?


बेहन, बारिश और एक बंद छाता


कुछ परिस्थितियाँ बदली नहीं जातीं। उनमें अपने मन को बदला जाता है।

एक औरत धान की नर्सरी से पौधे उखाड़कर उनके छोटे-छोटे गट्ठर बना रही थी। इधर उसे बेहन कहते हैं। दो छोटे बच्चे भी उसके साथ थे। वे पौधे समेटते, गट्ठर पकड़ाते और बीच-बीच में पानी में छपाछप भी कर लेते।

नर्सरी में इतना पानी था कि पैर पूरी तरह धँसते नहीं थे, पर गीले जरूर हो जाते थे। औरत ने सिर पर छाता लगा रखा था। शायद धूप से बचने के लिए। शायद बारिश की आशंका से। गाँव में छाता अक्सर दोनों काम करता है।

मैं कुछ दूर से यह दृश्य देख रहा था। आकाश में बादल थे, पर इतने भी नहीं कि कोई काम रोक दे।

फिर अचानक जैसे मौसम ने अपना मन बदल लिया। पहले हवा चली। फिर वह तेज होती गई। कुछ ही क्षणों में बादल उमड़ आए और बिना किसी भूमिका के मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई।

धान की नर्सरी देखते-देखते पानी से भर गई। बच्चों ने काम छोड़ दिया। औरत ने बेहन के गट्ठर किनारे रखे और तीनों घर की ओर चल पड़े।

पर तभी एक छोटा-सा क्षण आया। ऐसा क्षण, जिसे शायद उन्होंने शब्दों में कभी व्यक्त नहीं किया होगा।

उन्हें समझ में आ गया कि अब बचने जैसा कुछ नहीं है। कपड़े भीग चुके थे। घर तक पहुँचते-पहुँचते और भी भीगना ही था। जितनी लड़ाई लड़नी थी, हार चुके थे। अब छाता साधे रखना ही बोझ हो गया था। और तभी संघर्ष समाप्त हो गया।

औरत ने छाता बंद कर दिया।

वे पास के गूलर के पेड़ के नीचे खड़े हो गए। पेड़ की छाया भी उस बारिश में कोई बहुत बड़ा आश्रय नहीं थी। पत्तियों से मोटी-मोटी बूँदें टपक रही थीं। बच्चे शायद कुछ कह रहे थे। औरत मुस्कुरा रही थी। वे बारिश रुकने का उतना इंतज़ार नहीं कर रहे थे, जितना उसके बीच कुछ पल जी रहे थे।

बारिश थोड़ी हल्की हुई। वे तब भी तुरंत नहीं चले। मुझे लगा, वे अब भीगने से नहीं बच रहे थे; वे भीगने को स्वीकार कर चुके थे।

बेहन, बारिश और बंद छाता

जीवन में शायद बहुत-सी परिस्थितियाँ ऐसी ही होती हैं। हम पहले उनसे लड़ते हैं। बचने की पूरी कोशिश करते हैं। छाते खोलते हैं। रास्ते बदलते हैं। दौड़ते हैं। लेकिन एक क्षण ऐसा भी आता है जब पता चलता है कि अब इस बारिश से बचना संभव नहीं।

उस क्षण दो रास्ते होते हैं। एक—भीगते हुए भी शिकायत करते रहना। दूसरा—छाता बंद कर देना।

उस महिला ने शायद कोई दार्शनिक ग्रंथ नहीं पढ़ा होगा। ‘स्वीकार’ पर कोई व्याख्यान भी नहीं सुना होगा। पर उस दिन उसने मुझे बिना बोले यह पाठ पढ़ा दिया।

कुछ परिस्थितियाँ बदली नहीं जातीं। उनमें केवल अपने मन का मौसम बदला जा सकता है।

मैं दूर से यह सब देख रहा था। मेरे पास शब्द हैं, इसलिए मैं यह लिख पा रहा हूँ। मैं कवि होता तो शायद बादलों, गूलर और धान के पौधों को रूपक बना देता।

पर सच कहूँ तो वर्षा का असली अर्थ मेरे शब्दों में नहीं था। वह उस महिला के बंद किए हुए छाते में था। उन दो बच्चों की भीगी हुई हँसी में था।

वे शायद कभी इस घटना पर लेख नहीं लिखेंगे, कविता भी नहीं। पर उस दिन वर्षा को सबसे अच्छी तरह उन्होंने ही पढ़ा था। मैं तो केवल अपने बरामदे की सुरक्षित जगह से देख भर रहा था।

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भारत: एक लोकतांत्रिक देश ।


“आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की,
इस मिट्टी से तिलक करो, यह धरती है बलिदान की।”

यह गीत बचपन से हमें भारत से प्रेम करना सिखाता है। यह हमारे देश की सुंदरता, एकता और लोकतंत्र की बात करता है। जब भी मैं यह गीत सुनती हूँ, मुझे अपने देश पर गर्व होता है।

लेकिन कल जंतर-मंतर की घटनाएँ देखकर मेरा मन बहुत दुखी हो गया। मैंने कुछ छात्रों और प्रदर्शनकारियों को पुलिसकर्मियों को फूल देते हुए देखा। यह एक शांतिपूर्ण विरोध का प्रतीक था। लेकिन उसके बाद जो लाठीचार्ज और धक्का-मुक्की की तस्वीरें और वीडियो सामने आए, उन्हें देखकर मैं बहुत परेशान हो गई।

मैं बार-बार यही सोच रही थी—क्या हमारे देश में शांति से अपनी बात कहना इतना कठिन हो गया है? क्या लोकतंत्र में लोगों की आवाज़ सुनी जानी चाहिए या नहीं? अगर आज छात्रों की बातें नहीं सुनी जाएँगी, तो कल हमारी बातें कौन सुनेगा? अगर हम विरोध प्रदर्शन में नहीं जा सकते, तो हम बोल सकते हैं। अगर हम बोल नहीं सकते, तो हम लिख सकते हैं। अगर हम लिख भी नहीं सकते, तो हमें किसी न किसी तरह से विरोध करना होगा। हमें कुछ न कुछ करना ही होगा। भारत ने कल अपना सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन देखा।

सोनम वांगचुक जैसे ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट , जो हमारे अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, मुझे यह याद दिलाते हैं कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध कितना ज़रूरी है। लेकिन अफ़सोस की बात है कि इस पूरे मामले में कोई भी सही काम नहीं कर रहा है।

हाल ही में अपने शांतिपूर्ण अनशन के दौरान पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर अस्पताल ले जाए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि यह उनकी इच्छा के विरुद्ध किया गया और उन्हें अपनी बात खुलकर रखने की आज़ादी भी नहीं दी गई। यह घटना कई लोगों के मन में एक प्रश्न छोड़ जाती है—क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना है, या फिर असहमति की आवाज़ को सम्मानपूर्वक सुनना भी है? यदि एक शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी की आवाज़ भी इस तरह दबाई जाए, तो फिर “भारत एक लोकतांत्रिक देश है” यह वाक्य केवल किताबों में अच्छा लगता है |

इतिहास में जब महात्मा गांधी जी ने अन्याय के विरुद्ध अनशन किया, तो उनकी आवाज़ को गंभीरता से लिया गया। आज जब सोनम वांगचुक जी शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने के लिए अनशन कर रहे हैं, तो मेरे मन में एक सवाल उठता है। क्या आज के लोकतांत्रिक भारत में शांतिपूर्ण विरोध को उतनी ही गंभीरता से सुना जाता है, जितनी कभी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सुना जाता था? यही तुलना मुझे सबसे अधिक सोचने पर मजबूर करती है।

मैं किसी से नफ़रत नहीं करती। मैं सिर्फ़ इतना चाहती हूँ कि हमारे देश में हर व्यक्ति की बात शांति से सुनी जाए और समस्याओं का समाधान बातचीत से निकले, न कि बल प्रयोग से। यही एक सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।

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