भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
मानसून जागा तो गाँव के मन में फिर से उम्मीद भी जाग उठी
आज बारिश हुई। पकौड़े बनाने-खाने का बहाना भी मिल गया। लेकिन मन में एक और हिसाब चलता रहा। आज की बारिश जोड़ भी ली जाए, तब भी शायद इस मौसम में जिले में सामान्य से लगभग 80 प्रतिशत कम वर्षा हुई होगी। और यह भी संभव है कि आने वाले महीने इस कमी की पूरी भरपाई न कर पाएँ।
कल एक मित्र ने टिप्पणी की थी कि वे दुनिया के उस हिस्से में रहते हैं जहाँ लोग बारिश से ऊब जाते हैं। वहाँ वर्षा इतनी होती है कि पेड़-पौधे सूरज की रोशनी और गर्मी तक रोक लेते हैं। भारत का मामला उलटा है। यहाँ जल ही जीवन है। शहर में बारिश पकौड़ों का मौसम बनाती है, गाँव में खेती का कैलेंडर बदल देती है।
कहा जाता है कि भारत के पास दुनिया के लगभग 4 प्रतिशत मीठे जल संसाधन हैं, जबकि आबादी 18 प्रतिशत से अधिक है। जहाँ पानी दुर्लभ होता है, वहाँ वर्षा वरदान होती है; जहाँ पानी प्रचुर होता है, वहाँ वह जीवन का स्वाभाविक परिवेश बन जाती है। पर सोचता हूँ कि जल का सम्मान दोनों जगह है।
इसी सोच के साथ मैंने बीनू के जॉन की पुस्तक Under a Cloud: Life in Cherrapunji, the Wettest Place on Earth पढ़नी शुरू की है। शुरुआती पन्नों में लिखा है कि चेरापूंजी (सोहरा) और मायसिनराम में साल भर में लगभग 14,000 मिलीमीटर वर्षा होती है। मेरे गाँव के आसपास औसतन 800 मिलीमीटर। अंतर अठारह-बीस गुना का है। फिर भी न मेरे गाँव का किसान बारिश से ऊबता है, न सोहरा का खासी।
Under a Cloud
यह जानकर और भी आश्चर्य हुआ कि जनवरी-फरवरी में यहाँ भी ताल-तलैया सूखने लगते हैं और चेरापूंजी में भी पानी की किल्लत हो जाती है। तब लगता है कि समस्या केवल वर्षा की मात्रा की नहीं, पानी को सँभालने की भी है।
बिहार में कोसी की बाढ़ झेलने वाला हो या ब्रह्मपुत्र के माजुली और उमानंद जैसे द्वीपों पर रहने वाला, जल कभी-कभी उसके लिए संकट भी बन जाता होगा। लेकिन वही समाज जल की पूजा भी करता है – आख़िर वही बाढ़ उपजाऊ मिट्टी भी लाती है। सदियों से वही मिट्टी अगली फसल और सभ्यता दोनों का आधार बनती रही है।
मुझे अपने विवाह की एक रस्म याद आती है। परिवार और पट्टीदारी की महिलाएँ गीत गाती हुई मुझे गाँव के हर कुएँ और तालाब का दर्शन कराने ले गई थीं। उस समय मैं स्वयं उस जुलूस में शायद थोड़ा हास्यास्पद लग रहा होऊँगा, पर आज समझ में आता है कि वह केवल रस्म नहीं थी; वह जीवन के आधार को प्रणाम करने की परंपरा थी।
भदोही और चेरापूंजी की बारिश
आज बारिश हुई है। मैं गाँव में निकल नहीं पाया, पर घर बैठे भी अनुमान लगा सकता हूँ कि हर किसान अब धान की बुआई की तैयारी में लग गया होगा। जिसका लड़का रोज बनारस मज़दूरी करने जाता होगा, उसे कुछ दिन और रुकने के लिए कहा जा रहा होगा। औरतें अपनी ब्याही बेटियों को फोन कर रही होंगी—”आ जाओ, रोपनी में हाथ बँटाना है।”
कल साइकिल लेकर निकलूँगा। देखना चाहता हूँ कि एक दिन की बारिश ने गाँव का रंग कितना बदल दिया है। कहीं खेतों में ट्रैक्टर उतर आए होंगे, कहीं पौध उखाड़ी जा रही होगी, कहीं मेड़ पर खड़े किसान आकाश का मिज़ाज पढ़ रहे होंगे।
मानसून देर से आया है, पर लगता है कि उसने सबसे पहले खेतों को नहीं, लोगों के मन को सींचा है।
एक पोते की स्मृति और अपना ही भविष्य टटोलने की कोशिश।
मैं छोटा था। चार साल का। बब्बा एक लाठी लिए, धोती-बंडी पहने स्कूल को निकलते थे। पास के गांव शम्भू के पूरा में प्राइमरी के हेड मास्टर थे। बच्चे बहुत डरते थे। बड़े भी उन्हें आते देख पगडंडी से नीचे उतर जाते थे। अपने बाबा पर मुझे गर्व भी था और उनसे डर भी बहुत लगता था।
अब उनके जाने के चालीस साल बाद उनके बारे में सोचता हूं तो बहुत कुछ उमड़ता-घुमड़ता है मन में। सबसे ज्यादा तो उनके जीवन की सादगी और उनकी दिनचर्या पर ध्यान जाता है।
आजकल दुनिया लंबी उम्र के नुस्ख़े खोज रही है। कोई उपवास की घड़ी बाँध रहा है, कोई कैलोरी गिन रहा है, कोई सप्लीमेंट की शीशियाँ सजा रहा है। इन सबको देखते हुए मुझे बार-बार अपने बाबा की याद आती है। वे इन शब्दों से अपरिचित थे। उन्हें “टाइम-रिस्ट्रिक्टेड ईटिंग”, “सर्कैडियन रिद्म” या “लॉन्गेविटी” जैसे किसी शब्द का ज्ञान नहीं था। वे बस अपना जीवन जीते थे। और ऐसा जीते थे कि सत्तासी वर्ष की आयु तक पहुँच कर गए।
हर एकादशी को वे अलोना खाते थे। किस उम्र से यह करना शुरू किया, वह बताने वाला अब कोई नहीं। मुझे नहीं मालूम कि उन्होंने अपने जीवन में कितनी एकादशियाँ अलोना कीं। शायद हजारों। पर यह जरूर था कि उसमें कोई प्रदर्शन नहीं था, कोई धार्मिक आडंबर भी नहीं। जैसे साँस लेना स्वाभाविक है, वैसे ही वह व्रत भी उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था।
उनके दिन की शुरुआत सूर्योदय से पहले हो जाती थी। गाँव अभी नींद में होता और वे दिन का स्वागत करने निकल पड़ते। पहला भोजन लगभग नौ-दस बजे होता। उसके बाद खेत, मेड़, रास्ते, लोग, मौसम या प्राइमरी स्कूल—सब उनके दिन के साथी थे। भोजन के बाद थोड़ी-सी झपकी। शाम ढलते-ढलते घर वापसी। रात का भोजन एक-दो रोटियों का होता, जिन्हें वे दूध में मींजकर खा लेते। उससे अधिक की उन्हें न आवश्यकता थी, न इच्छा। आठ-नौ बजे तक उनका दिन समाप्त हो जाता।
भोजन दिन में दो बार होता था। यदा कदा चना-चबैना होता रहा होगा, जिसकी मुझे स्मृति नहीं है।
उन्होंने कभी व्यायाम नहीं किया। कोई वजन नहीं उठाया, कोई मुगदर नहीं भांजा। उस अर्थ में कतई नहीं, जिसमें आज हम व्यायाम समझते हैं।
उनका व्यायाम खेत तक जाने वाली पगडंडी थी। उनका जिम गाँव की मेड़ें थीं। उनके ट्रेडमिल की जगह कच्ची सड़क थी, जिस पर वे अस्सी वर्ष पार कर जाने के बाद भी रोज़ बारह-पंद्रह किलोमीटर चल लेते थे। शरीर दुबला था, लेकिन दुर्बल नहीं। उसमें सहज श्रम की कमाई थी, प्रदर्शन की नहीं।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उन्होंने भोजन नहीं नापा, भूख को पहचाना। उन्होंने कैलोरी नहीं गिनी, श्रम किया। उनके पास घड़ी नहीं थी। दालान से बाहर निकल, आसमान में सूरज निहार कर वे कह देते थे—दो बज गए हैं। उन्होंने नींद का ऐप नहीं लगाया, अँधेरा होते ही सो गए। उन्होंने स्वास्थ्य की चिंता नहीं की; जीवन जिया। शायद स्वास्थ्य उसी का एक उपफल था।
पर यदि कोई मुझसे पूछे कि उनकी सबसे बड़ी संपत्ति क्या थी, तो मैं खेतों का नाम नहीं लूँगा।
मैं कहूँगा—उनकी जिज्ञासा।
जीवन के अंतिम वर्ष में उनकी आँखें धुँधला चुकी थीं। पढ़ना कठिन हो गया था पर उनके भीतर शिक्षक का अनुशासन कमजोर नहीं हुआ था। उन्होंने मेरे द्वारा उन्हें ला कर दी के. एम. मुंशी का “लोपामुद्रा” पचासी-छियासी की उम्र में पूरी पढ़ी।
मुझे उन्हें चारपाई पर बैठे, सिर किताब में गड़ाये पन्ने दर पन्ने पढ़ते हुये का दृश्य आज भी विस्मित करता है। शरीर थक सकता है, आँखें कमज़ोर हो सकती हैं, लेकिन यदि मन अभी भी किसी पुस्तक के अगले पन्ने तक पहुँचना चाहता है, तो मनुष्य वास्तव में बूढ़ा नहीं हुआ है।
अंतिम महीनों में उम्र ने उनपर अपना अधिकार जताया। कुछ मतिभ्रम हुआ, पैरों ने जवाब देना शुरू किया, एक सर्दी और कफ़ ने उन्हें बिस्तर पर रोक लिया। लेकिन इससे पहले उन्होंने अपने हिस्से का जीवन पूरा जी लिया था। ऐसा नहीं लगता कि मृत्यु ने उन्हें बीच रास्ते से उठाया। लगता है जैसे उन्होंने अपना काम पूरा किया और फिर चुपचाप चले गए।
मेरे पर-बाबा भी पचासी वर्ष से अधिक जिए थे। उनकी पत्नी – मेरी बुढ़िया आइया – भी उनके कुछ वर्ष बाद तक रहीं। इसलिए कभी-कभी सोचता हूँ—क्या यह विरासत रक्त में थी या जीवन-पद्धति में? शायद दोनों में। पर यदि मुझे किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं जीवन-पद्धति को चुनूँगा। क्योंकि वही विरासत हर पीढ़ी को फिर से अर्जित करनी पड़ती है।
अब मैं जब साइकिल लेकर गाँव की सड़क पर निकलता हूँ, खेतों की ओर देखता हूँ, किसी पेड़ की नई पत्ती पर ठिठक जाता हूँ, या घर लौटकर कोई पुस्तक खोल लेता हूँ, तो कभी-कभी लगता है कि मैं केवल अपना दिन नहीं जी रहा। मेरे भीतर कहीं बाबा का जीवन-अनुशासन भी चल रहा है।
समय बदल गया है। अब हमारी थाली बदल गई है, हमारा काम बदल गया है, हमारी रातें कृत्रिम रोशनी से भर गई हैं। लेकिन कुछ बातें अभी भी बचाई जा सकती हैं—सादा भोजन, नियमित दिनचर्या, चलते रहने की आदत, और जीवन के अंतिम पड़ाव तक जिज्ञासु बने रहने की ललक।
शायद दीर्घजीविता का सबसे बड़ा रहस्य वर्षों की गिनती में नहीं, बल्कि इस बात में है कि जीवन के कितने वर्षों तक मनुष्य का औत्सुक्य कायम रहता है।
बाबा ने मुझे यही सिखाया। बिना कभी सिखाने की कोशिश किए। बिना कभी कहे। कहा तो शायद उन्होंने मुझे कभी कुछ नहीं। उनके द्वारा मेरी प्रशंसा भी मुझे किसी और के बताने पर ही पता चली।
बाबा को याद करते-करते मैं अनायास अपना हिसाब लगाने लगता हूँ।
वे अस्सी वर्ष की आयु तक रोज़ खेत चले जाते थे।
वे अस्सी वर्ष की आयु तक रोज़ खेत चले जाते थे। मैं अब साइकिल चलाता हूँ। वे पैदल चलते थे, मैं पैडल भरता हूँ। वे लोपामुद्रा पढ़ते थे, मैं किंडल पर किताबें पढ़ता हूँ। वे लालटेन के समय के आदमी थे, मैं इंटरनेट के समय का।
हमारे बीच आधी सदी से ज्यादा का फ़ासला है, पर कुछ बातें अब भी एक-सी हैं—सुबह जल्दी उठने की इच्छा, दिन भर कुछ करते रहने की बेचैनी, और यह विश्वास कि मनुष्य को आख़िरी साँस तक जिज्ञासु बने रहना चाहिए।
फिर भी मैं उनसे पीछे हूँ। काफी पीछे।
मुझे मधुमेह है। घुटनों में ऑस्टियोआर्थराइटिस है। गर्मी में हाँथ का बेना नहीं, एयर कंडीशनर चाहिए। सर्दी में अलाव की बजाय हीटर का सहारा लेना पड़ता है। सप्ताह में दो रातें ऐसी आती हैं जब नींद रूठ जाती है। मेरा शरीर उनके शरीर जैसा सहज नहीं रहा।
कभी-कभी लगता है कि मैंने विज्ञान तो बहुत पा लिया, पर शरीर की वह सादगी खो दी, जो उन्हें बिना जाने मिली थी।
फिर अपने ही विचार पर मायूस सा मुस्कुरा देता हूँ। आखिर हर पीढ़ी को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है। अपने काल-समय के अनुसार।
बाबा की लड़ाई अभाव, मलेरिया, अकाल और कठिन श्रम से थी। एक बार सियार ने काट लिया तो रेबीज़ के इलाज के लिए उन्हें कसौली तक जाना पड़ा। मेरी लड़ाई मधुमेह, बैठकर काम करने की आदत और चौबीस घंटे जगती हुई दुनिया से है।
इसलिए मेरा उद्देश्य बाबा जैसा बनना नहीं है। वह संभव भी नहीं। मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि जब मेरी उम्र सत्तासी वर्ष हो, तब भी नियमित, हर सुबह साइकिल निकालने का मन करे, कोई नई किताब मुझे पुकारे, और किसी पौधे की नई पत्ती देखकर मैं ठिठक जाऊँ।
यदि ऐसा हुआ, तो समझूँगा कि मैंने बाबा से मिली विरासत का कुछ हिस्सा बचा लिया। और सतासी से जितना ज्यादा जिया, वह बोनस ही माना जाएगा!
फ्रीडमैन ने दुनिया को वहाँ से देखा जहाँ नई सड़कें बन रही थीं। मैं उसे वहाँ से देख रहा हूँ जहाँ उन सड़कों पर चलते वाहनों ने पैदल चलने की ताकत घटा दी है।
थॉमस फ्रीडमैन का ताजा लेख है न्यूयॉर्क टाइम्स में – Everybody Is a Loser in This Middle East War. वह लेख पढ़ा।
फिर उनकी पुरानी पुस्तक The World Is Flat निकाल ली।
उसे उलटते-पलटते एक प्रश्न मन में आया… क्या आज भी दुनिया उतनी ही सपाट है जितनी बीस वर्ष पहले दिखाई देती थी?
कुछ वर्ष पहले तक मैं दुनिया को समझने के लिए नक्शे देखता था। अब कभी-कभी लोगों की दिनचर्या देखता हूँ।
गांव में बैठा हूँ, पर सोच कभी विरार की लोकल ट्रेन में चली जाती है, कभी बंगलूरू के किसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर के शयनकक्ष में और कभी पुणे की टैक्सी में बैठे उस बिहारी युवक तक पहुँच जाती है जो मोबाइल पर जर्मन सीख रहा है।
सोचता हूँ— मुंबई के विरार में रहने वाला एक युवक रोज़ चर्चगेट तक आने-जाने में तीन घंटे खर्च करता है। उसका मोबाइल उसे दुनिया भर की खबरें दे सकता है, लेकिन घर पहुँचने में फिर भी डेढ़ घंटा लगता है।
बंगलूरू का एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर रात के दो बजे फ़ोन उठाता है। शिकागो में बैठा उसका सहकर्मी किसी समस्या में फँसा है। तकनीक ने दोनों को लगभग एक ही कमरे में ला दिया है, लेकिन समय-क्षेत्र अब उसके शयनकक्ष तक पहुँच गया है।
पुणे में टैक्सी चलाने वाला बिहार का एक युवक मोबाइल पर जर्मन सीख रहा है। उसे उम्मीद है कि किसी दिन कोई जर्मन पर्यटक उसे पूरे भारत के भ्रमण के लिए नियुक्त कर सकता है। वह पुणे की सड़कों पर गाड़ी चला रहा है, बिहार में अपनी पत्नी को महीने का खर्च चलाने के लिये पैसे भेजने हैं, पर उसके सपनों का एक हिस्सा यूरोप में घूम रहा है।
इन लोगों में कोई समानता नहीं दिखती। फिर भी मुझे लगता है कि ये सब एक ही कहानी के पात्र हैं।
बीस वर्ष पहले थॉमस फ्रीडमैन ने “The World Is Flat”लिखी थी। उनका तर्क था कि तकनीक, इंटरनेट और वैश्वीकरण दुनिया को समतल बना रहे हैं। दूरी का महत्व घटेगा। प्रतिभा को अधिक अवसर मिलेंगे। दुनिया का एक कोना दूसरे कोने से अधिक आसानी से जुड़ सकेगा।
उस भविष्यवाणी में काफी सच्चाई थी।
मैं आज पूर्वांचल के एक गाँव में बैठकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बातचीत कर सकता हूँ। मेरी नातिन सौ किलोमीटर दूर है, लेकिन लगभग प्रतिदिन मेरे साथ पढ़ती है। दुनिया के किसी विश्वविद्यालय में हुई चर्चा का सार कुछ मिनटों में मेरे सामने आ सकता है। यह सब फ्रीडमैन की सपाट होती दुनिया का ही हिस्सा है।
लेकिन मुझे लगता है कि कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।
दुनिया सपाट नहीं हुई। दुनिया में झुर्रियाँ पड़ गईं।
जब कपड़ा मेज़ पर फैला होता है तो उसकी सतह सरल होती है। लेकिन जब वही कपड़ा सिकुड़ता है या मोड़ा जाता है, तो दूर-दूर के हिस्से अचानक पास आ जाते हैं और पास के हिस्से दूर हो जाते हैं। मुझे आज की दुनिया कुछ ऐसी ही लगती है।
बंगलूरू और शिकागो पहले से अधिक पास आ गए हैं। लेकिन उसी प्रक्रिया में किसी इंजीनियर की रात और दिन के बीच की दूरी बढ़ गई है।
जर्मनी और पुणे पहले से अधिक पास आ गए हैं। लेकिन उस टैक्सी चालक के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी हो गई है—उसे केवल सड़कें नहीं, भाषाएँ भी सीखनी हैं।
मैं अपने गाँव में बैठकर दुनिया से जुड़ सकता हूँ। लेकिन उसी समय मेरे आसपास ऐसे लोग भी हैं जिनकी दुनिया केवल मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन तक सीमित होती जा रही है।
दूरी समाप्त नहीं हुई है। दूरी का स्वरूप बदल गया है।
कभी दूरी किलोमीटर में मापी जाती थी। अब वह ध्यान, कौशल, भाषा और नेटवर्क में भी मापी जाती है।
एआई ने इस परिवर्तन को और तीव्र कर दिया है।
इसके समर्थक कहते हैं कि अब हर व्यक्ति के पास एक निजी शिक्षक, निजी शोध-सहायक और निजी सलाहकार होगा। यह बात काफी हद तक सही है। मैं स्वयं इसका लाभ उठाता हूँ। लेकिन मैं एक दूसरी संभावना भी देखता हूँ। हर व्यक्ति के पास अब एक निजी भ्रम-निर्माता, निजी मनोरंजन मशीन और निजी प्रतिध्वनि-कक्ष भी हो सकता है।
तकनीक दोनों भूमिकाएँ निभाने में सक्षम है।
समस्या मशीन में नहीं है। समस्या यह तय करने में है कि हम उससे क्या करवाना चाहते हैं।
हमने लंबे समय तक सूचना की कमी को समस्या माना था। अब सूचना की अधिकता समस्या बनती जा रही है। पहले ज्ञान तक पहुँचना कठिन था। अब ज्ञान और शोर को अलग करना कठिन हो गया है।
मुझे कभी-कभी लगता है कि भविष्य की सबसे दुर्लभ वस्तु तेल, डेटा या बिजली नहीं होगी। वह होगी—अविभाजित ध्यान। एकाग्रता। फोकस।
जिस व्यक्ति के पास किसी विषय पर लगातार दो घंटे सोचने की क्षमता बची होगी, वही वास्तव में संपन्न माना जाएगा।
फ्रीडमैन ने दुनिया को वहाँ से देखा जहाँ नई सड़कें बन रही थीं। मैं उसे वहाँ से देख रहा हूँ जहाँ उन सड़कों पर चलते वाहनों ने पैदल चलने की ताकत घटा दी है।
हर नई तकनीक कुछ नई क्षमताएँ देती है। लेकिन वह कुछ पुरानी क्षमताओं को अनावश्यक भी बना सकती है। ट्रैक्टर ने खेती को अधिक उत्पादक बनाया, लेकिन अधिकांश लोगों से बैलों के साथ खेत जोतने की क्षमता छीन ली। जीपीएस ने रास्ता ढूँढना आसान किया, लेकिन दिशाबोध को कमज़ोर किया। एआई हमारे लिए लिख सकता है, पढ़ सकता है, सार बना सकता है, तर्क कर सकता है। प्रश्न यह नहीं है कि वह क्या कर सकता है। प्रश्न यह है कि उसके उपयोग के बाद हम क्या करना बंद कर देंगे। हमारी कौन-कौन सी क्षमताएँ कुंद हो जायेंगी।
प्रगति का प्रश्न केवल यह नहीं है कि हम कितनी दूर और कितनी तेजी से जा सकते हैं। प्रश्न यह भी है कि यदि वाहन रुक जाए तो क्या हम अभी भी चल सकते हैं। बिना जीपीएस के अपना गंतव्य तलाश सकते हैं?
यहीं आकर मुझे झुर्रियों का रूपक एक और अर्थ देता है।
दुनिया सपाट नहीं हुई। दुनिया में झुर्रियाँ पड़ गईं।
शुरू में मुझे लगता था कि झुर्रियाँ वृद्धावस्था का संकेत हैं। लेकिन बाद में मैंने सोचा कि वे हमेशा उम्र का संकेत नहीं होतीं। मनुष्य के चेहरे पर भी झुर्रियाँ तब अधिक दिखाई देती हैं जब वह थका हुआ हो, पर्याप्त नींद न ले पाया हो, शरीर पर तनाव अधिक हो। अच्छी नींद, थोड़ी सैर, साफ़ हवा और संतुलित दिनचर्या के बाद वही चेहरा कहीं अधिक तरोताज़ा दिखाई दे सकता है।
शायद सभ्यताओं के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है।
संभव है कि हमारी सभ्यता बूढ़ी नहीं हुई है। संभव है कि वह केवल थकी हुई हो।
पिछले तीन दशकों में हमने वैश्वीकरण, इंटरनेट, स्मार्टफ़ोन, सोशल मीडिया और अब एआई जैसी क्रांतियों को लगभग बिना रुके आत्मसात किया है। हमने अपने ऊपर बहुत कुछ एक साथ लाद लिया है। शायद हमें प्रगति रोकने की आवश्यकता नहीं है। शायद हमें उसे पचाने की आवश्यकता है।
शायद हमें और अधिक सूचना नहीं, बल्कि बेहतर छनाई चाहिए। और अधिक संपर्क नहीं, बल्कि अधिक अर्थपूर्ण संपर्क चाहिए। और अधिक गति नहीं, बल्कि बीच-बीच में ठहरकर यह देखने की आवश्यकता है कि हम जा कहाँ रहे हैं।
मैं यह नहीं कहूँगा कि दुनिया टूट रही है। मैं यह भी नहीं कहूँगा कि दुनिया सपाट हो रही है।
मैं केवल इतना कहूँगा कि दुनिया में झुर्रियाँ पड़ गई हैं।
और झुर्रियाँ हमेशा पतन का संकेत नहीं होतीं।
कभी-कभी वे केवल यह बताती हैं कि शरीर या सभ्यता को थोड़ा विश्राम, थोड़ा संतुलन और थोड़ा आत्मनिरीक्षण चाहिए।
वैश्वीकरण ने दुनिया को जोड़ा। एआई ने उसे और कसकर मोड़ दिया। अब चुनौती जुड़ने की नहीं, उन झुर्रियों के बीच अपना संतुलन बनाए रखने की है।