रामपुरा से बेलखेड़ा


21 जून को नर्मदा पदयात्री – प्रेमसागर – ने तय किया कि बारिश के कारण गीली जमीन, कीचड़ और कच्चे-पक्के रास्ते की दुरुहता को और झेलने की बजाय मुख्य सड़क – नेशनल हाईवे – का जरीया अपनाया जाये। मुझे यह पसंद नहीं आया। नर्मदा किनारे कच्ची पगडंडी पर भले न चला जाये, भारत में ग्रामीण सड़कों का जाल बिछा है। वे सड़कें भले ही नफासत वाली नहीं हैं, पर पैदल यात्री तो खूब मजे में चल सकता है। प्रधानमंत्री सड़क योजना में तो बारह-पंद्रह फुट चौड़ी सड़कें हैं जिनपर ट्रैक्टर मटकते हुये चलते हैं। उनपर पदयात्रा नहीं की जा सकती?

पर जो प्रेमसागर को पसंद आया वही ठीक है। पदयात्रा में पदयात्री की चलती है, मनयात्री की नहीं। लेकिन मुझे लगा कि आज की यात्रा सलंग (कंटीन्युअस का मालवी शब्द) की बजाय खंड खंड रही क्यूं कि बाबाजी बेलगाम चल रहे थे।

बाबाजी बेलगाम चल रहे थे, और मैं ठिठक-ठिठक कर देखता, सोचता, लिखता रह गया।


रामपुरा से, प्रतापसिंह लोधी जी के घर से चलने के समय भी चाय पी थी, फिर इस चाय की चट्टी पर भी। और कहने को प्रेम बाबाजी कहते हैं कि अब चाय उन्हें ज्यादा नहीं भाती। घर या किसी हल्की सी भी बंदिश वाली जगह (भले ही वहां खूब आदर सत्कार हुआ हो) से निकलते ही आदमी वर्जनामुक्त होता है और पहले पहल चाय की चट्टी तलाशता है।

चाय की चट्टी का चित्र भेजा बाबाजी ने। लिखा है होटल। जहां समोसा, आलूबड़ा, भाजीबड़ा मिलता है। एक फ्रिज भी नजर आता है। बाहर तीन चायार्थी बैठे हैं जो ठंडी हवा में चाय नाश्ते का इंतजार कर रहे हैं। एक स्प्लेंडर बाइक भी गांव की समृद्धि और गतिशीलता दर्शाती खड़ी है। होटल में महिला की आकृति झलक रही है। मलकिन होगी चाय की चट्टी की?

$$ ज्ञानकथ्य अथ हिरनवती आख्यान

हिरनवती चाय की चट्टी सम्भालती है। सड़क में उसकी छोटी सी जमीन गई तो जो मुआवजा मिला वह लगा दिया इस ‘होटल’ में। उसका मायका हिरन नदी के किनारे है। पिता ने ज्यादा तलाश नहीं की नाम रखने को। नदी के नाम पर ही रख दिया। हिरनावती का आदमी नरसिंहपुर में फिटर का काम करता है। गांव से अपडाउन करता है। कभी वहां रुक भी जाता है। ठीक मरद है, पर थोड़ा पीने की आदत है। उसकी कमाई में घर नहीं चलता तो हिरनवती ने इस होटल पर ध्यान देना जरूरी समझा। अब तो उसकी लड़की भी हाथ बटाने लगी है।

खपरैल के होटल वाली औरत

खपरैल की उस चाय-चट्टी में जो औरत समोसे तल रही है,
वह सुबह चार बजे उठती है – मैदा गूंथती है, आलू उबालती है, प्याज़ काटती है।
उसकी एक लड़की है – जो मैदा में नमक ठीक से मिला लेती है,
और अपनी माँ की आँखों का इशारा समझ जाती है।
माँ बोलती कम है, झुँझलाती नहीं,
बस जल्दी-जल्दी काम करती है –
जैसे हर देरी से कमाई का मौका फिसल रहा हो।

वो औरत जूझती है, हार नहीं मानती –
उसका ‘होटल’ चलता है, समोसे बिकते हैं, भजिए में मिर्च ज़रा तेज़ होती है
पर मेहनत की तासीर कुछ ऐसी है
उसके चाय और समोसे का स्वाद सबसे अलग होता है।

परकम्मावासी भी ऐसा ही कहते हैं।


बस, आज के चित्रों में यही एक चित्र था जो कुछ कहता था। बाकी तो एनएच 47 का हाईवे था। सपाट चिक्कन हाईवे पर क्या लिखा जाये। प्रेमसागर उसपर सटासट चलते रहे। दिन भर में 45 किलोमीटर चले। एक दो जगह रुक कर जंगल और हिरन नदी को निहारा होगा, बस।

एक संदेश में लिखा है – बरघटिया घाटी। पर चित्रों में कोई घाटी जैसा नजर नहीं आता। चूक गये प्रेमसागर चित्र खींचने में। नक्शे में डोंगरगांव और हीरापुर के बीच एनएच45 पर यह हेयरपिन बैंड दिखता है। उस जगह पर ग्रेडियेंट भी सबसे ज्यादा है। इस हेयरबैंड पिन वाली जगह पार करते फोटोग्राफी होनी चाहिये थी!

एनएच 45 पर हेयरपिन बैंड

हेयरपिन बैंड बोलता है – मुझे सीधा नहीं बना सकते थे, वरना तुम्हारे इंजन हाँफने लगते। बरसात में मैं फिसलता भी हूँ, डराता भी हूँ, लेकिन संभालता भी मैं ही हूँ। पहाड़ की छाती चीर कर मैं बना हूं। मैं सिर्फ रास्ता नहीं हूँ मैं वह वलय हूँ जिसमें इंसान और पहाड़ संवाद करते हैं—घूम कर, थमकर, समझकर।

प्रेमसागर जब गुजरे तो हेयरपिन बैंड बोल रहा था। फुसफुसा कर। पर बाबाजी नर्मदे हर, नर्मदे हर बोलते निकल गये। ध्यान ही नहीं दिया!

आगे हिरन नदी मिली। नदी का चित्र लेना प्रेमसागर के ट्रेवल-प्रोटोकॉल में है। सो उसके चित्र उन्होने लिये। सुंदर है यह नदी। पर हिरनी को तलाशता रह गया मैं उसकी जलराशि में। यहां, नर्मदा से सांकल घाट संगम के 8 किलोमीटर पहले तो हिरन में खूब पानी नजर आता है, नदी किनारे एक जुताई किया खेत सुंदर लग रहा है। पर पीछे जबलपुर जिले में ही यह नदी पूरी तरह सूखी हुई है। इस आशय की खबरें नेट पर मुझे मिली। नर्मदा की कई सहायक नदियां गर्मियों में सूखने लगी हैं या सूखने के कगार पर हैं।

नर्मदा की इतनी अनुषांगिक नदियां गुजर चुकी हैं कि बिना किसी लोक कथा या पौराणिक आख्यान के, वह आंकड़ा भर बन हाशिये पर जाने लगती है। हिरन का नाम हिरन क्यों है? कोई लोक कथा नहीं मिली।

नदी हो कर भी अगर कोई कथा से वंचित रह जाये, तो वह बस लहरों में नहीं, गुमसुम मौन में बहा करती है।

बाबाजी शाम के समय बेलखेड़ा पंहुचे। अशोक शुक्ल जी के साढ़ू भाई ध्रुवजी दिघर्रा, पास में मातनपुर में रहते हैं। अशोक जी के बेटे आश्विनी के साढ़ू रमाकांत नवेरिया जी बेलखेड़ा के हैं। सढ़ुआने में भेज दिया है बाबाजी को अशोक शुक्ल ने। और वहां खातिरदारी भी अच्छी हुई प्रेमसागर की। शायद उसी आशा में पैंतालीस किलोमीटर की दौड़ लगाये थे बाबाजी। घाटी और नदी पार करते हुये!

उस सब की बात आगे की पोस्ट में!

नर्मदे हर! #नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #नर्मदाप्रेम


धर्मपुरी से रामपुरा, जिला नरसिंहपुर


जून 19 की शाम प्रेमसागर झूरी घाट, पदमगंगा, बरमान घाट होते धर्मपुरी के शांति धाम आश्रम पंहुचे।

नर्मदा जी के तट पर ही आश्रम है। परिसर से नर्मदा जी दिखती हैं। आश्रम मदनदास त्यागी, बाल ब्रह्मचारी जी का है। उनके बारे प्रेमसागर ने बताया कि वे बहुत सात्विक हैं। नमक नहीं खाते। उस रोज उनसे मिलना नहीं हो पाया। कहीं बाहर गये थे।

आश्रम का अभी निर्माण कार्य चल रहा है। दोतल्ला बन रहा है। नर्मदा जी पास में हैं तो नर्मदा बालू मिलने की सहूलियत है।

रात में बिजली नहीं थी। गाढ़े अंधेरे में भोजन परोसते हुए आश्रम के देखभाल करने वाले राजेशजी बोले — “सिर्फ दाल-रोटी है बाबाजी, पर थाली जरूर भारी है।”

थाली सचमुच भारी थी — रोटियाँ पाँच थीं, पर हर एक को मानो बेलन बनाते समय पूरी नर्मदा परिक्रमा कर आया हो। प्रेमसागर मुस्काए — “भोजन तो सादा था, लेकिन थाली में रोटी नहीं, चुनौती परोसी गई थी।

खाना शुरू किया तो हर कौर के साथ शरीर नहीं, श्रद्धा को तृप्त करना पड़ रहा था। प्रेमसागर का नियम था – थाली में कुछ भी न छोड़ा जाये। और रोटियाँ ऐसी कि एक रोटी पांच बराबर।

“भईया,” प्रेमसागर ने बाद में कहा, “खाने में एक घंटा लग गया। वो रोटियां रोज़ खानी पड़ें तो महीने भर में कुरते का साइज बदलवाना पड़े- और दरवाजे भी छिलवाने पड़ें।”

20जून – शांति धाम, धर्म पुरी से विकोर, कुड़ी, छोटा धुआंधार, गुरसी, गोकला होते रामपुरा।

सवेरे राजेश जी ने लाल चाय पिलाई और बीस रुपये भेंट कर पैर छुये बिदा करते समय। प्रेमसागर पैसे को मना करने लगे तो राजेश जी बोले “सिद्ध महात्माओं को इस तरह विदाई देने की आश्रम की परम्परा है। आप तो 12 ज्योतिर्लिंग की, इक्यावन शक्तिपीठ की पदयात्रायें कर चुके हैं। आप तो सिद्ध हैं।”

रात बिजली नहीं थी तो प्रेमसागर का मोबाइल भी तीस परसेंट बैटरी बता रहा था। कहीं रुक कर दोपहर में चार्ज करेंगे – सिद्ध होने के बावजूद मोबाइल की बैटरी की फिक्र करने की आदत बरकरार है बाबा जी की।

सिद्ध महात्मा की भी बैटरी 30% पर आ ही जाती है! :lol:

रायसेन के सोकलपुर के बाद पदयात्रा में जब नरसिंहपुर जिला आता है तो नर्मदा का भूगोल बदला बदला दिखता है। सोकलपुर तक तो नर्मदा धीर गम्भीर दिखती थीं। कुछ कुछ गंगा जी की तरह। अब वे पत्थर को काटती, रास्ता बनाती, पत्थरों के रंगमंच पर नाचती लगती हैं। उनका हर दृष्य एक खूबसूरत पेंटिंग लगता है। थोड़ी सी दूरी में नदी का स्वरूप यूं बदला है मानो सादे सूती साड़ी की बजाय नर्मदा माई ने अब अस्सी कली का छींटदार घाघरा पहन लिया हो। और पैरो में पाजेब की रुनझुन बढ़ गई हो।

आगे नर्मदा का यह अल्हड़ रूप और निखरा मिलेगा यात्रा में।

***

रात में झमाझम बारिश हुई है। देर तक चलती रही। सवेरे प्रेमसागर निकल तो लिये पर कब तक चलेंगे कहा नहीं जा सकता। ज्योतिर्लिंग पदयात्रा के परिचित हैं राजकुमार जी। वे नर्मदा के दक्षिण तट वाले हैं। आगे केरपानी में उनके मामा जी का घर है। मामाजी ने दोपहर की भोजन-प्रसादी का निमंत्रण दिया है। “भईया, अगर दिनमें बारिश होती रही तो हो सकता है केरपानी में ही रात्रि बिस्राम हो। आगे माई जानें।”

माई कुछ और ही जान रही थीं। रास्ता बारिश से फिसलन वाला हो गया था। एक जगह तो बारिश इतनी तेज आई कि पांच घंटे रुकना पड़ा। एक मकान बन रहा था। छत की ढलैय्या हो गई थी। वहीं अपनी चादर बिछा कर आराम किया प्रेमसागर ने।”

बारिश, कच्चा रास्ता और फिसलन

बारिश, कच्चा रास्ता और फिसलन का परिणाम यह हुआ कि बीच में नर्मदा किनारे जा ही न पाये बाबाजी। छोटा धुआंधार के प्रपात देखना तो छूट ही गया। केरपानी तक पंहुच दोपहर का भोजन राजकुमार जी के मामा के यहां तो क्या, रात तक वहां नहीं पंहुच पाये।

एक पुल पार किया। लकड़ी और बांस का जर्जर पुल। किसी नाले पर था। नर्मदा का बैकवाटर नाले में आता है। इस जगह पर हमेशा पानी रहता है। दो तीन किलोमीटर घूम कर जाने की बजाय नाला पार करने के लिये गांव वालों ने यह पुल बनाया है।

“भईया, बड़ा ही ‘मुस्किल’ था पुल पार करना। पर माई का नाम ले कर कर ही लिया। कोई आसपास था नहीं। बाद में गांव वालों ने बताया कि मैं शायद आखिरी आदमी रहा पार करने वाला। कल सवेरे पुल निकाल दिया जायेगा।”

यह पुल बारिश के चौमासे में, जब नर्मदा बढ़ती हैं और नाले में पुल को डुबाने वाला पानी आ जाने वाला होता है, तब गांव वाले इसे उखाड़ देते हैं। हर साल की परम्परा है।

नाले पर पुल

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पुल का संवाद – मैं एक अस्थायी पुल हूँ — जितना तुम्हारा, उतना ही क्षणभंगुर।

किसी नक्शे में मेरा नाम नहीं है। किसी शासनादेश में मेरा ज़िक्र नहीं। मैं तब बनाया गया था जब किसी गांव वाले के मन में मेरा विचार आया, जो ज्यादा चलना नहीं चाहता था। रस्सी बाँधी गई, लकड़ियाँ गड़ीं, और मैं बन गया।

हर बार जब कोई मुझे पार करता है, मैं डरता हूँ कि कहीं उसका भरोसा न टूटे। मैं जानता हूँ कि मेरी पीठ चरमराती है, किनारे खिसकते हैं, और बारिश के आने पर मेरा कोई वजूद नहीं रहेगा।

लेकिन फिर भी, मैं बना रहा — दो किनारों के बीच एक धागे जैसी हिम्मत की तरह।

तुम आज मुझ पर चले। तुम्हारे पाँवों ने मेरी जर्जर साँसों में कुछ गरिमा भर दी। कल मैं उखाड़ दिया जाऊँगा — लकड़ियाँ जलेंगी या गड्ढों में डाल दी जाएँगी।

लेकिन जो मुझे पार कर गये, उनके भीतर मैं एक स्मृति बन जाऊँगा — एक पुल नहीं, एक प्रसंग।

मैं यह चाहता हूँ — कि तुम मुझे याद करो, मेरे होने के लिये नहीं,
बल्कि उस हिम्मत के लिये जो तुमने दिखायी, मुझ पर कदम रख कर।”

हर साल उखड़ता हूँ, पर हर बार जोड़ता हूँ — मैं हूँ गाँव का पुल!

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शाम सात बजे रामपुरा में रात्रि विश्राम की सोची प्रेमसागर ने। रामपुरा में चंद्रभान लोधी जी उन्हें मंदिर तलाशते देखे तो अपने घर ले गये। रात आनंद से गुजरी भले ही दिन का बरसात ने कचरा कर दिया था।

सवेरे प्रतापसिंह लोधी और उनकी पत्नीजी से विदा ली प्रेमसागर ने। जो चित्र मेरे पास भेजा उसमें प्रतापसिंहजी हाथ जोड़ कर बैठे हैं — वह केवल नमस्कार नहीं, गाँव के उस भाव को दिखाता है जो कहता है: “हमारे घर जैसे भी लस्त पस्त हों, हमारा मन विशाल हैं।”

उनकी पत्नी — गुलाबी साड़ी में — दो फुट अपने आदमी से दूर बैठी हैं। उनके बैठने और देखने में संकोच नहीं, परम्परा की मर्यादा है।

चित्र में घर के भीतर बिछी हुईं बोरीयाँ, कंबल, और हल्का अंधकार – उस जीवन की झलक है जिसमें ‘प्रदर्शन’ नहीं, ‘प्रयोजन’ महत्वपूर्ण होता है। बाँयी ओर की चौकी पर रखे बर्तन, दायीं ओर हरा पर्दा — यह जीवन का अस्तव्यस्त सौंदर्य है, जिसे शहरों की नफासत शायद कभी नहीं पकड़ सके।

रामपुरा से चलते प्रेमसागर कल की कठिन पदयात्रा से सीख ले बोल रहे थे – “भईया, आज माई के किनारे किनारे नहीं हाईवे पकड़ कर आगे चलूंगा। आगे कहीं बाजार आयेगा तो एक कपड़े का जूता लूंगा। रेनकोट भी, जो खूब लंबा हो। सेंडल तो भईया मिट्टी में धंस जा रहा है।”

यह बंदा कभी यात्रा की योजना बनाने में नहीं रहता। चल देता है। फिर जब परेशानी सामने आती है, तब समाधान तलाशता है। प्रतिक्रियावादी है शुद्ध रूप से! सारे धरम करम वाले वैसे ही होते हैं। पैर धंसा देते हैं; फिर कहते हैं हमारी कुशल क्षेम माई देखेंगी! बेचारी नर्मदा पर कितना बोझ डालते हैं ये सिद्ध महात्मा! :lol:

धरम-करम वाले पहले पैर धंसा देते हैं, फिर माई को पुकारते हैं!” 😄

जब तक थाली में रोटी हो, परम्पराओं की मर्यादा हो और हो रास्ते में लकड़ी का पुल — भारत बचा रहेगा। नहीं?

नर्मदे हर! #नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #नर्मदाप्रेम


हीरापुरा से धर्मपुरी – तीन ठहराव


जून 19-20 को रही हीरापुरा और उससे आगे की पदयात्रा। मुझे मोटे तौर पर तीन विषय दिये प्रेमसागर ने।

पहला था हीरापुरा में राजराजेश्वरी मंदिर।

यह दक्षिण भारतीय शैली में बना है। स्थापत्य का विश्लेषण तो मैं नहीं कर सकता, पर देखने में सुंदर जरूर लगता है। चार दशक पहले तिरुनलवेलि के तमिळ संत आये थे – षण्मुखानंद पुरी जी। वे 1989 से 2005 के बीच हीरापुरा में क्षेत्र सन्यास किये, नर्मदा किनारे। वे कर्णाटक के राजराजेश्वरी मंदिर के संत शिवरत्न पुरी जी से दीक्षा लेने के बाद 1979 में यहां आये थे। पहले पहल सिंदूर-नर्मदा के सिद्धावती संगम से प्रारम्भ कर नर्मदा परिक्रमा की, फिर परिक्रमा पूरी कर वे हीरापुरा आये और विगत 45 साल से यहां हैं। अभी वे नैमिषारण्य गये हुये हैं, इसलिये प्रेमसागर उनके दर्शन नहीं कर पाये।

हीरापुरा के राजराजेश्वरी मंदिर के मरम्मत का काम चल रहा है। इसके कारण प्रेमसागर ने वहां ज्यादा समय नहीं गुजारा। प्रेमसागर जी से तो ज्यादा जानकारी मिली नहीं, मातृशक्ति की कृपा से षण्मुखानंद जी के एक भक्त मिले रामनिवास दुबे जी; जानकारी के सूत्र उन्होने दिये। दुबे जी को धन्यवाद!

राजराजेश्वरी जिन्हें त्रिपुरसुंदरी या ललिता के नाम से जाना जाता है, वे माता का एक सौम्य रूप हैं। वे दस महाविद्याओं में एक प्रमुख देवी हैं। मैने पढ़ा – “राजराजेश्वरी देवी को धन, वैभव, योग और मोक्ष की देवी कहा जाता है। वे तीनों लोकों में सबसे सुंदर हैं और उनकी आराधना से शारीरिक, मानसिक शक्ति का विकास होता है, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है।” वे गढ़वाल राजवंश और पृथ्वीराज चौहान की कुलदेवी थीं।

हीरापुरा में इतने बड़े संत का निवास है और नर्मदा किनारे इतना महत्वपूर्ण मंदिर है – प्रेमसागर की यात्रा की बदौलत ही मैं जान पाया। यात्रा वृत्तांत लिखने का यह बड़ा लाभ है। यह जान कर भी अच्छा लगा कि माता की पूजा सात्विक या राजसिक है, तामसिक या अघोरपंथी नहीं। कोई पशुबलि नहीं होती उनके परिसर या उनकी साधना पद्धति में।

राजराजेश्वरी मंदिर की दीवारें दक्षिण की हैं, पर उसकी छाया में पूरी नर्मदा समाई है।

दूसरा विषय था एक चकरी चलाती महिला का। यह दृष्य प्रेमसागर को हीरापुरा से आगे निकलने के कुछ समय बाद ही दिखा। साफसुथरा, लीपाई किया घर था। उसपर चूना और गेरू से पुताई भी की गई थी। वहीं यह महिला बड़े आकार की चकरी से मूंग दल रही थी।

“छाती पर मूंग दलना” मुहावरे से ही स्पष्ट होता है कितना कठिन काम है यह! महिला का नामगांव नहीं पता किया प्रेमसागर ने तो चरित्र का रेखाचित्र मैं ही बनाता हूं! आखिर इतने जीवंत चित्र के साथ अन्याय नहीं किया जाता!

$$ ज्ञानकथ्यअथ फूलवती ढीमर आख्यान – चकरी के गीतों में लिपटा जीवन – फूलवती पर साल बहत्तर की हुई हैं। अनुमान इससे लगता है कि उनका बड़ा बेटा तब जन्मा था जब नर्मदा में बाढ़ आई थी। तभी बेटे को बाढ़ू कहते हैं। परिवार भाग कर पंचायत भवन में रह रहा था जब बाढ़ू का जनम हुआ। फूलवती तब मुश्किल से सोलह साल की रही होगी। तेरह-चौदह में गौना लगा था।

परिश्रमी और कठोर महिला है फूलवती। तीनों बेटे, बहुयें और नाती-पोते उनकी बहुत इज्जत करते हैं। पर वह इज्जत सबका ध्यान रखने से आई है। कोई विरासत में टपकी नहीं।

फूलवती गीत गाते पांच सात सेर मूंग दल कर ही उठती हैं जब एक बार चकरी पर आसन लेती हैं। इतना तो आजकल की बहुयें करने की सोच भी नहीं सकतीं! तीन बहुयें और सात पोते पोतियां, पर फूलवती कहती हैं – “अब सबसे प्यारी तो ई चकरी है, कहती कुछ नाही, पर रोज़ मेरा गीत सुनती है।”

सिर पर रखा गया हरा आँचल, मोटी गुलाबी छींटदार साड़ी, ब्लाउज, बाहों से झलकता वर्षों का श्रम, पैर में चांदी की पायल और हाथ में काँच की चूड़ियाँ! गले में एक पुराना मंगलसूत्र, जिसके मोती ढीले पड़ चुके हैं – मैं फूलमती का पहनावा ध्यान से देखता हूं। व्यक्तित्व प्रभावशाली है।

अभी पौरुख है। मेहनत कर लेती हैं फूलमती। आगे क्या होगा? ज्यादा सोचती नहीं फूलमती – “नर्मदामाई देखेंगी!” जीवन भी नर्मदा माई के आसरे और बुढापा भी उनको समर्पित। नर्मदा किनारे का यही जीवन आकर्षित करता है!

फूलवती की चकरी, अब पूजा का चक्र बन चुकी है – श्रम और श्रद्धा दोनों उसमें गुंथे हैं।

तीसरा विषय है बैलगाड़ी हाँकता एक ग्रामीण। चित्र प्रेमसागर ने भेजा। रेखाचित्र मेरा है।

$$ ज्ञानकथ्य। अथ तारासिंह धाकड़ आख्यान – तारासिंह धाकड़ उस साल जनमे थे जब खेती अच्छी हुई थी। बटाई पर खेती करते तारासिंह के पिता का अनाज भंडार लबालब भर गया था। उत्सव मना था तब। और तारासिंह के पिता नर्मदा माई की परकम्मा को निकल लिये थे। वही तरीका था माई के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन था का। माई बाढ़ भी लाई लाती हैं और माई खेती के जरीये समृद्धि भी।

पर तारासिंह वैसा ही रहा जैसे उसके पिता थे। पिता एक एकड़ जमीन बना पाये थे, उसमें तारासिंह कुछ जोड़ नहीं पाया। तब भी खुश रहता है वह। बैलगाड़ी और बैल उसके अपने हैं। बैलगाड़ी से गाँव-गाँव दूध, लकड़ी, माटी और लोग ढोता है। नर्मदा स्नान करने वालों को नहान के अवसर पर लाता, ले जाता है। जितनी बार नर्मदा किनारे जाता है, उतनी बार नर्मदा के जल में नहाता जरूर है तारासिंह!

घर से निकलता है बैलगाड़ी ले कर। गाड़ी में पानी की मटकी, एक मचिया और कुछ चिवड़ा या सत्तू साथ लेता है। दोपहर में किसी पेड़ के नीचे आराम भी करता है जहाँ बच्चों को पुरखों की कहानी सुनाने लगता है – “एक राजा था… पर उसका खजाना ग़ायब हो गया…”

बैलगाड़ी प्रेमसागर के कैमरे में उभरती है – पर उसके गिर्द घूमता जीवन मेरी लेखनी में उतरता है।

प्रेमसागर चित्र मेरे मोबाइल में भेज कर छुट्टी पा जाते हैं। रास्ते में भोजन-प्रसादी और दान दक्षिणा वे समेटते हैं; पर चित्रों पर पात्र गढ़ना मेरे जिम्मे आ जाता है। मलाई उनकी है और पदयात्रा की छाछ मेरे हिस्से है। पता नहीं प्रेमसागर मुझे बतौर अपना स्टेनो न बताते हों अपनी भगत मंडली को! :-D

नर्मदे हर! #नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #नर्मदाप्रेम


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