बारिश के इस कीड़े से तंग हो गये हैं हम। सैंकड़ों की संख्या में जन्म लेती हैं। पहले एक झुंड में धीरे धीरे चलती हैं। जैसे भेड़ें एक झुंड में चल रही हों। कौन उनमें लीडर है? कौन किसके पीछे चल रहा है – पता नहीं चलता।
पर जैसे जैसे इनका आकार बढ़ता है, इनका रंग लाल से गहरा भूरा होने लगता है। शरीर पर दोनो ओर समांतर पीली लकीरें भी दिखती हैं किसी किसी प्रजाति में।
डेढ़ दो इंच की होने पर इनकी हर्ड मेंटालिटी खतम हो जाती है। ये पूरे घर बगीचे, बाथरूम और कमरों में एडवेंचर करने लगती हैं। ढेर सारे पैरों के जोड़ों और आगे टेंटाकल्स के साथ ये बहुत लिजलिजी लगती हैं। चप्पल जूते के नीचे आने पर पट्ट या पिच्च की आवाज के साथ मरती हैं और बड़ा खराब लगता है।
मुझे ये बरसात के मौसम का अत्यंत अप्रिय अंग लगती हैं। पर क्या करें पूरे घर परिसर में इनका प्रसार है!

भुआलिन का अपना एक महत्व है मिट्टी को ले कर। ये नमी का जीव हैं। बारिश के बाद, जब ज़मीन सूखने लगती है, तो वे वापस मिट्टी, सड़ी हुई पत्तियों या लकड़ी के नीचे छिप जाते हैं। वे तब तक वहीं रहते हैं जब तक उन्हें फिर से नमी नहीं मिलती।
यह प्रक्रिया एक तरह के सुप्तावस्था (diapause) की तरह होती है, जहाँ वे अपनी शारीरिक गतिविधियों को कम कर देते हैं और नमी की तलाश में भूमिगत रहते हैं। बारिश के मौसम में जब इनके छिपने के स्थान में पानी आ जाता है और ऑक्सीजन की कमी होती है, ये कुम्भकर्णी निद्रा से जाग जाते हैं। बाहर निकलते हैं और सड़ी गली पत्तियां, लकड़ियां या कूड़ा करकट खाने लगते हैं।

इस प्रकार ये मिट्टी के स्केवेंजर हैं। इनके खाले और इनके मल से ह्यूमस बनता है जो मिट्टी को उर्वर बनाता है। मिट्टी को उलटपलट करते हैं ये और एक तरह से हल चलाते हैं।
मिट्टी की गुणवत्ता सुधारनी हो तो इन भुआलिन या पॉलीडेस्मिड मिलिपीड (Polydesmid millipede) का होना बहुत जरूरी है!
और बच्चों को यह देख मज़ा आता है कि एक के ऊपर एक भुआलिन चढ़ी घूमती दिखती हैं। डबल डेक्कर की तरह। नर मिलीपीड ऊपर रहता है।
जब आप एक के ऊपर एक चढ़े हुए मिलिपीड्स को देखते हैं, तो यह उनके प्रजनन का अनुष्ठान (mating ritual) होता है। यह अनुष्ठान आमतौर पर नमी भरे मौसम में होता है, जो प्रजनन के लिए सबसे अनुकूल होता है।
इस प्रक्रिया को मैरेक्सिस (Maresis) कहा जाता है। इसमें, नर मिलिपीड मादा के ऊपर चढ़कर अपने गोनोपोड्स (gonopods) का इस्तेमाल करता है, जो विशेष रूप से प्रजनन के लिए होते हैं। ये प्रजनन अंग उनके शरीर के निचले हिस्से में होते हैं।

भुआलिन का, जैसे मैने कहा, घर परिसर में बहुत आतंक है। वह इसलिये भी है कि चिड़ियां – जिनकी मेरे घर में बहुतायत है, इन्हें नहीं खातीं। ये जब असुरक्षित महसूस करती हैं तब अपने को गोल डिस्क की तरह सिकोड़ लेती हैं जिससे इनके कोमल नीचे के अंग सुरक्षित रहें।
उसके अलावा ये हाइड्रोजन सायनाइड नामक हल्का विष छोड़ती हैं जो चिड़ियों को खराब लगता है। तो ये हमारी जान का जंजाल ठसक से बनी रहती हैं। मानसून खत्म होने तक इन्हें झेलना होता है।
छोटे स्तन धारी – चूहे और छछुंदर; उनके अलावा मेढ़क, गोजर, टोड और छिपकलियां इन्हे खाते हैं। पर वे खुद बहुत अप्रिय जीव हैं। उनसे तो ये निरीह भुआलिन ही भली!
आखिर यह कीड़ा ख़तरनाक नहीं है। मिलिपीड्स शांत स्वभाव के होते हैं और पौधों की सड़ी-गली चीज़ें, जैसे पत्तियाँ और लकड़ी खाते हैं। वे इंसानों को काटते या डंक नहीं मारते। इनका विष भी मारक नहीं होता। सिवाय इसके कि भुआलिन मुझे पसंद नहीं; ईको सिस्टम में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
मिलीपीड्स 42-43 करोड़ साल से पृथ्वी पर हैं। स्कॉटलैंड में मिला इनका जीवाश्म 42.5 करोड़ साल पहले का है। कार्बोनिफेरस काल (Carboniferous Period), जो लगभग 34.6 से 29.3 करोड़ साल पहले था, में मिलिपीड की कुछ प्रजातियाँ, जैसे आर्थ्रोप्लुरा (Arthropleura), बहुत विशाल थीं। मेरी आल्टो के 10 कार जितनी बड़ी!
सो मिलीपीड्स अप्रिय भले हों, मज़ाक कदापि नहीं हैं!
(सितम्बर 8′ 2025)


