कौन है इठलाती, बल खाती, नाचती नदी – नर्मदा या गंगा?


प्रेमसागर नर्मदा किनारे चल रहे हैं और मेरा काम उनका यात्रा मार्ग निहारना हो गया है। नक्शे में देखता हूं, नर्मदा सीधे नहीं चल रहीं, घुमावदार बल खाती चलती हैं। यही नर्मदा का सौंदर्य है जिसका बखान वेगड़ सौंदर्य की नदी नर्मदा में करते हैं?

पुस्तक के प्रारम्भ में अमृतलाल वेगड़ जी कहते हैं – नर्मदा सौंदर्य की नदी है। यह नदी वनों, पहाड़ों और घाटियों से बहती है। मैदान इसके हिस्से में कम ही आया है। यह चलती है इतराती, बलखाती, वन प्रांतरों में लुकती छिपती, चट्टानों को तराशती, डग डग पर सौंदर्य की सृष्टि करती, पग पग पर सुषमा बिखेरती। (सौंदर्य की नदी नर्मदा, अमृतलाल वेगड़। पृष्ठ 1 अध्याय – जबलपुर से मंडला।)

इतराना, बलखाना क्या होता है? क्या वह सर्पिल (घुमावदार) गति होता है? जैसे नर्तकी सीधा कदमताल करते नहीं चलती, घूमते लचकते चलती है। पर क्या नर्मदा सीधे सपाट कम, बल खाती ज्यादा चलती हैं? क्या अन्य नदियों की तुलना में उनका बलखाना कहीं ज्यादा है?

नदी के इठलाने बलखाने के लिये एक साइंटिफिक पैरामीटर है – सिनुओसिटी इंडेक्स (Sinuosity Index)। यह निम्न प्रकार से परिभाषित होता है –

सिन्युओसिटी इंडेक्स = सर्पिल मार्ग की दूरी / दोनो छोर के बिंदुओं की सीधी दूरी

यह इंडेक्स जब 1.0 से 1.2 के मध्य होता है तब नदी लगभग सीधी मानी जाती है। अगर यह इंडेक्स 1.2 से 1.5 के बीच होता है तो नदी घुमावदार या मियेंडरिंग (Meandering) मानी जाती है। इस इंडेक्स के 1.5 से अधिक होने पर नदी अत्यधिक घुमावदार (Highly Meandering) कही जाती है।

प्रेमसागर की नर्मदा पदयात्रा और प्रयाग से वाराणसी के बीच (वर्चुअल) गंगा पदयात्रा की तुलना करने का मन हो आया। कौन नदी ज्यादा सर्पिल है, ज्यादा घुमावदार, ज्यादा मियेंडरिंग?

मैंने तुलना करने के लिये निम्न अंतिम बिंदु चुने गंगाजी और नर्मदा माई पर –

नर्मदा जी के बल खाने को नापने के लिये मैंने सर्पिल मार्ग को मैप किया। तवा संगम से सक्कर संगम तक। जितने ज्यादा बिंदु चुने, उतनी ही सही मैपिंग हुई नदी की।

गंगा – प्रयाग त्रिवेणी संगम से अस्सी घाट वाराणसी।

नर्मदा – नर्मदापुरम से पहले नर्मदा-तवा नदी का संगम से सोकलपुर के पास नर्मदा-सक्कर नदी का संगम।

मैंने दोनो उदाहरणों के लिये गूगल मैप पर उनके सर्पिल पाथ को मैप किया और कुल दूरी निकाली –

नदी अध्ययन का खंड सर्पिल मार्ग की लम्बाई किलोमीटर सीधी लम्बाई किलोमीटरसिनुओसिटी इंडेक्स
नर्मदा नर्मदा-तवा नदी का संगम से नर्मदा-सक्कर नदी का संगम133.9196.521.387
गंगा प्रयाग त्रिवेणी संगम से अस्सी घाट वाराणसी190.93112.791.693
गंगाजी की सर्पिल यात्रा मैप करने के लिये गूगल मैप पर ये बिंदु लगाये।

उक्त आंकड़ों से नर्मदा जी और गंगा जी की सिनुओसिटी क्रमश: 1.387 और 1.693 निकली। नर्मदा घुमावदार हैं पर गंगा अत्यधिक घुमावदार हैं।

नदियां पहाड़ों में लगभग सीधी रेखा में बहती हैं। ऊंचाई से नीचे आने में कूदती हैं – प्रपात बनाती हैं। गोमुख से हरिद्वर के बीच गंगा भी वह करती हैं और अमरकंटक से नीचे उतरने में नर्मदा भी। मैदान मिलने पर दोनो नदियां अपने वेग से धरती को काटती हैं और दूसरी ओर मिट्टी जमा करती हैं। इससे घुमावदार बहना होता है और बड़े मोड़ और गोखुर (Oxbow) झीलें बनती हैं।

Oxbow Lake an example from Wikipedia

गंगा जी हरिद्वार के बाद यह करती हैं और नर्मदा भी मैदान में उतरने पर यह करती हैं। फर्क यह है कि गंगा को बहुत विस्तृत गांगेय मैदान मिलता है सर्पिल घुमाव के लिये पर नर्मदा सतपुड़ा तथा विंध्य के बीच एक संकरी रिफ्ट घाटी में ही थोड़ा बहुत घूम पाती हैं। नर्मदा जी को इठलाने बलखाने को ज्यादा जगह विंध्य और सतपुड़ा से घिरा रंगमंच प्रदान नहीं करता।

नर्मदा एक अपेक्षाकृत सीधी बहने वाली नदी है। इसी कारण से, यह पश्चिम की ओर बहती हुई भी अपने मुहाने पर कोई बड़ा डेल्टा नहीं बनाती, बल्कि एक ज्वार-नद-मुख (estuary) बनाती है, क्योंकि अवसादों को जमा करने के लिए पर्याप्त मोड़ और धीमा बहाव नहीं मिलता। इनके उलट गंगा का एक विशाल गंगासागर-सुंदरवन का डेल्टा है।

भारत की सभी बड़ी नदियों में (जिनमें सिंधु भी शामिल है); नर्मदा सबसे सीधी बहती नदी है!

नर्मदा जी के सौंदर्य को मैं कम नहीं कर देखना चाहता। वह तो अप्रतिम है। पर नदी का सर्पिल चलना, वह मैंने गंगाजी में बहुत देखा है। वह भी मुझे मोहित करता है। वेगड़ जी की तरह गंगाजी की कोई सौंदर्य यात्रा करने वाला नहीं रहा शायद। पर धीर गम्भीर गंगा जी का सौंदर्य भी कम कर नहीं आंकना चाहिये। गंगा जी के किनारे लोग उतने गंगाभक्त नहीं हैं, तो क्या?!

यह आम धारणा कि नर्मदा चिर युवा, इठलाती, बल खाने वाली हैं और गंगा शांत, कोमल, करुणामयी हैं; एक जन सामान्य में (और विद्वानों में भी) मिथक ही है। नदी की चाल को निहारना केवल धारणा नहीं, आंकड़ों पर ठहराव दे कर करना चाहिए।

गंगा किनारे का सूर्यास्त। मेरे घर के समीप।

मैं गंगा किनारे बहुधा बैठता हूं। इतनी धीरे बहने वाली सीधी सपाट नदी कैसे गोखुर झील का निर्माण कर सकती होगी? पर मेरे पुरातत्ववेत्ता मित्र रविशंकर जी का कहना है कि गंगा हमेशा ऐसी नहीं थीं। वारह पुराण और कूर्म पुराण में उनका नाम भद्रा या महाभद्रा आता है – अर्थात विशाल जलराशि के साथ तेज बहने वाली नदी। उसके कटाव से प्रयाग और वाराणसी के बीच (और उसके पहले या बाद में भी) ऑक्स-बो आकृति की झीलें बनीं।

यह सम्भव है। रविशंकर जी ने कहा कि पुरुषोत्तम वामन काणे जी के धर्मशास्त्र का इतिहास में भी भद्रा नाम का जिक्र है गंगा के लिये। बहुत कुछ वैसे जैसे सरस्वती नदी के लिये घग्घर या घर्घर नाद करने वाली नदी का योग बताया जाता है। … वाराह पुराण का सन्दर्भ तलाश पाया गूगल का जैमिनी। बाकी दोनो सोर्स नहीं जांच सका। कभी रविशंकर जी से मिलना होगा तो इसपर चर्चा होगी। फिलहाल तो मैं गंगा और नर्मदा के इठलाने बलखाने को ले कर मगन हूं! नर्मदे हर! जय गंगा माई!


किसी ने कहा वो इठलाती है,
नदी है, नर्तकी कहाती है।

बह ज्यों चली बीच जंगल नदी,
हर इक मोड़ पर मुस्कुराती है।

कहीं नागिन और कहीं हिरनी सी,
चाल में, कहाँ कैसा बल खिलाती है?

वो नर्मदा है या गंगा माई —
ये सच्चाई किस किस को सताती है?


सुडानिया से मोतलसिर


जून 13 उनतीसवां दिन।

श्रद्धालु मिलते गये, सूरजकुंड की थाह नहीं मिली, और लू ने प्रेमसागर को रोक दिया — फिर भी यात्रा रुकी नहीं

कल 13 जून को सुडानिया से चल कर भारकच्छ पंहुचे प्रेमसागर।

सवेरे पांच बजे सुडानिया के आश्रम से निकले थे। सवेरे एक सज्जन देवेश पटेल जी ने चाय पिलाई। चलते समय आधा सेर देसी घी और बाती का पैकेट भी दिया। बोले हम तो नर्मदा माई की नियम से आरती कर नहीं सकते, आप ही कर दिया करना बाबाजी। पता नहीं बाबाजी इससे पहले शाम के स्नान के बाद जो ध्यान करते हैं, उसमें नर्मदा जी को दिया-बाती करना भी होता है या नहीं, अब जुड़ गया।

परिकम्मा वासी को अपनी ही नहीं, मिलने वाले लोगों की श्रद्धा को भी कांधे पर साधते बढ़ना होता है। नर्मदे हर!

मैने यह नहीं पूछा कि देवेश जी से कुछ नगदी भी पाये क्या? श्रद्धा प्रेम तो सही है, पर नगदी हो तो श्रद्धा में तरावट आ जाती है! :lol:

आगे हथनौरा पड़ा। वहां सूरजकुंड है जिसके बारे में कहावत है कि वह अथाह गहरा है। हाथी तो क्या, खाट की रस्सी तक डूब जाये और थाह न मिले। अर्थात एक खाट की बिनाई में लगी रस्सी की लम्बाई से ज्यादा गहरा है सूरज कुंड।

खाट की रस्सी लटका कर किसने नापी होगी गहराई? कहावतें तो कवि की कविता की तरह उपमा देने में निर्दोश भी होती हैं और अचम्भित करने वाली भी।

देवेश पटेल और उनकी पत्नीजी का एक चित्र लिया प्रेमबाबा जी ने। प्रेमबाबाजी का उनकी लाठी और पिट्ठू के साथ चलते हुये फोटो भी मेरे अनुरोध पर देवेश जी ने खींचा। प्रेमसागर ने उसे और फोटोजीनिक बनाने के लिये उनके छोटे बच्चे को भी साथ लिया फोटो में।

आगे एक गांव पड़ा जैत। वहां के नितिन जाट जी का फोटो लिया बाबाजी ने । नितिन जाट के मामा जी ने अपने गांव के मुहाने पर एक सुंदर द्वार बनवाया है अपने माता पिता की स्मृति में। माता सुंदर देवी थीं और पिता प्रेम जी। द्वार के ऊपर लिखा है प्रेमसुंदर द्वार, जैत। माता पिता की स्मृति में स्मारक का यह तरीका कितना अच्छा है। कितने ही लोग द्वार के नीचे से गुजरते होंगे। वे सब याद करते होंगे प्रेमजी और सुंदर देवी को। नितिन जाट सेवा भावी भी हैं।

नर्मदा किनारे रायसेन जिले में ही तीन बार के मुख्य मंत्री और आजकल भारत की काबीना में मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी का पुश्तैनी गांव है। उनके घर के बाहर खड़े हो कर प्रेमसागर जी ने अपना चित्र खिंचवाया।

शिवराज सिंह जी का गांव का घर अच्छा और सुरुचिपूर्ण है। घर आमंत्रित करता सा लगता है। बड़े मंत्री जी का भौकाल दिखाता, ऊंची दीवार में किले नुमा अहसास कराता घर नहीं लगता, जैसा उत्तर भारत का एक टुच्चा सा नेता भी कराना चाहता है!

नागनेर (ऐसा प्रेमसागर ने लिखा) में एक सज्जन राजेंद्र सिंह जी के घर दोपहर की भोजन-प्रसादी ग्रहण की। वे कुछ सुनाते रहे कि ऊदल की पत्नी इसी गांव की थी। नर्मदा किनारे रोज स्नान को जाया करती थी। “भईया इस जगह का नाम मुगल काल में बदला गया। नागनेर हो गया।” नक्शे में जगह का नाम नंदनेर आता है। पूरी कथा क्या है, वह तलाश नहीं पाया। यह ब्लॉग पोस्ट कभी पुस्तक बनने में प्रयोग हुआ तो और छानबीन करूंगा। ब्लॉग के खुरदरे और फटाफट लेखन में उतना शोध नहीं हो पाता। [यह प्रसंग भविष्य की गहराई से छानबीन के योग्य है]

राजेंद्र सिंह जी के यहां ही भोजन के बाद दोपहर का आराम किया बाबाजी ने। चार बजे उठ कर चले। आठ बजे वे भारकच्छ पंहुचे।

लेकिन पहुंचे कहां, पंहुचाये गये। एक दिन पहले तीस किलोमीटर चले थे, आज गर्मी और उमस में 25 किलोमीटर चल चुके थे, जब लू के कारण ज्वर ने उन्हें आ दबोचा।

“एक पेड़ की छांव में उठ बैठ रहा था भईया। लोग देखे तो यहां ले आये।” रात आठ बजे प्रेमसागर ने फोन कर बताया।

गर्मी का मौसम और ऊपर से उमस। दो तीन दिन में मानसून आ टपकेगा। उससे पहले उनचास डिग्री तापक्रम का अहसास था। सवेरे पांच घंटा चल चुके थे बाबाजी। शाम चार बजे फिर उठ कर पेरने लगे अपने आप को। दो घंटे में लू ने दबोच लिया। भारकच्छ पार कर चुके रहे होंगे। तब लोग वापस उन्हें लाये और एक राम मंदिर के निर्माणाधीन हॉल में उन्हें टिकाया।

कई लोग जमा हो गये थे प्रेमसागर के राह चलते अस्वस्थ होने की सुन कर। कोई उनमें से डाक्टर साहब को बुला लाये। बुखार तेज था तो एक अन्य सज्जन बर्फ भी लाये। दो घंटा बाबाजी के सिर पर ठंडे पानी और बर्फ की पुल्टिस रखी गयी। डाक्टर खुद सहृदय व्यक्ति थे। वे रुक गये और प्रेमसागर के सिर पर पट्टी रखने लगे। दो घंटे में ताप उतरा।

जून 14, तीसवां दिन

रात में आराम करने के बाद प्रेमसागर फिर निकल लिये भारकच्छ से। “भईया, वहां आश्रम बन रहा है और जगह ठीक से बन नहीं पाई है। टीना की छत है और गर्मी बहुत लगती है उसमें। लोगों ने तो बहुत सहायता की पर…” प्रेमसागर ने अपनी सफाई दी।

मैने उन्हें अनुरोधात्मक आदेश दिया कि कोई ऑटो ले कर आगे किसी अन्य जगह पंहुचें जहां व्यवस्था बेहतर हो और वहां कम से कम दो दिन रुक कर आराम करें। शरीर आराम मांगता है। उसे तुमने नहीं दिया तो बुखार ला कर जबरी आराम छीना। अब शरीर की इज्जत करना सीखो।

जिद्दी आदमी हैं प्रेमसागर। वे दांये बांये के अर्थहीन तर्क दे कर अपने मन की करते आये हैं, आज भी कर सकते थे। पर शायद खुद को भी लगा कि शरीर सही में आराम मांगता है। कुछ देर बाद वे मोतलसिर में थे। वहां नर्मदा किनारे एक आश्रम बन रहा है। सुविधायें अच्छी हैं। आज यहां रहे। कल भी रहेंगे।

मोतलसिर के आश्रम में शाम के समय प्रेमसागर ने नर्मदा उस पार के एक सरपंच जी से वीडियो कॉल करवाई। मोतलसिर रायसेन जिले में है। नर्मदा के दूसरी ओर नर्मदापुरम (होशंगाबाद) जिला पड़ता है। नर्मदापुरम के हरिपुर गांव के पूर्व सरपंच हैं हरनारायण सिंह। उनके बाल और दाढ़ी मूछें अहसाह दिलाती हैं किसी सन्यासी का। आवाज से भी वे सरल और मधुर लगते हैं। उन्होने बताया कि महंत जी ने साढ़े चार लाख में आश्रम के लिये जमीन खरीदी और आश्रम बनवा रहे हैं। करीब बाईस लाख खर्च आयेगा। कमरे, शौचालय आदि बन कर तैयार हैं। महंत जी ने बागवानी भी कुछ की है। परिसर पूरा बना नहीं है, पर सुंदर लगता है।

अब प्रेमसागर अगर कल रुकते हैं तो इस जगह के बारे में लिखने को और अवसर मिलेगा। पर उसकी सम्भावना रुपया में छ आना भर है।

नर्मदे हर! #नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #नर्मदाप्रेम


पीलीकरार से सुडानिया


जून 12, अठाईसवां दिन। प्रेमसागर चल रहे हैं; मैं लिखते-लिखते बह रहा हूँ। कुछ ज्यादा ही बह(क) रहा हूं!

पीलीकरार से पांच बजे निकल लिये प्रेम गुरूजी। निकलते समय एक सज्जन नर्मदा प्रसाद जी ने एक गमछा और इक्यावन रुपया अर्पण कर विदाई की उनकी। कल एक गमछा पाये और आज एक और। क्या करेंगे दो का बाबाजी? जितना भोजभात मिले, वह भले प्रेमसागर खायें, पर जो नगदी और सामान परिक्रमा में मिले, कायदे से उसको मेरे साथ फिफ्टी-फिफ्टी शेयर करना चाहिये। आखिर जितनी मेहनत वे पदयात्रा में कर रहे हैं, उतनी मैं मनयात्रा में कर रहा हूं और दिन में तीन घंटा यह ट्रेवलब्लॉग लिख रहा हूं। :lol:

वे पगयात्रा कर रहे हैं, मैं मनयात्रा। मन की यात्रा में भी पैरों की तरह श्रम से छाले पड़ते हैं — बस दिखते नहीं।

चलते चलते सवेरे के आसमान के चित्र क्लिक किये। कुछ तरह के दृष्य देख शायद कंडीशनिंग हो गई है कि हाथ मोबाइल पर चला जाता है फोटो ‘घींचने’ के लिये। प्रेमसागर यह भी समझते हैं कि किस तरह के दृष्य मुझे पसंद हैं।

सवेरे का दृष्य

साढ़े छ बजे वे बुधनी में थे। एक समोसे की दुकान पर चाय समोसा के लिये रुके होंगे वहां। चित्र में लिखा है – बुधनी के मशहूर समोसे। समोसे जैसी साधारण सी चीज भी कहीं के नाम से मशहूर हो सकती है?! समोसे भी अगर मशहूर हो सकते हैं, तो साधारण होना कोई दोष नहीं।

दुकान पर काली चीकट शटर के कवर पर मोबाइल नम्बर लिखा है जिसपर फोन पर ऑर्डर किया जा सकता है। ऐसी साधारण सी दुकान फोन पर भी ऑर्डर ले सप्लाई करती है? रेट लिस्ट है – समोसा, जलेबी, कचोरी और पोहा सब दस रुपये। दस रुपये का एक आईटम और चाय से नाश्ता हो सकेगा। एक परात में ताजा बना पोहे का ढेर नजर आया।

बुधनी मंहगा शहर नहीं लगता।

बुधनी की समोसे की दुकान

बुधनी रेलवे का स्टेशन है। पटरियां पार करते भी एक दो चित्र लिये हैं प्रेमसागर ने। लैण्डस्केप चित्र दिखाता है कि कस्बा साफ सुथरा है। बुधनी शिवराज सिंह (मामा जी) की विधान सभा सीट हुआ करती थी। यहीं आसपास कहीं के रहने वाले हैं वे। एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री थे और अब कबीना मंत्री हैं। लगता है अपने इलाके को अच्छे से संवारा है मामा जी ने।

दिन में नर्मदा किनारे जगहें पड़ती हैं जोशीपुर, बंद्रभान घाट, शाहगंज, और बनेता। इन जगहों के ज्यादा विवरण नहीं मिले या दिये प्रेमसागर ने। बंद्रभान या बंदरभान से गुजरते हुये घाट के कुछ चित्र उन्होने क्लिक किये। नर्मदा परिक्रमाओं में इस जगह का काफी वर्णन मिलता है। पर जगह तो मुझे बहुत साधारण लगी। रेलिंग, सीढ़ियां, इमारत और सीमेंट की बेंचें, सब कुछ ऐसा लगता है मानो यह स्थान 10-15 साल में घाट के रूप में डेवलप किया गया हो। चलते चलते लिये चित्रों में स्थान की ऐतिहासिकता या पौराणिकता का कोई कतरा भी नजर नहीं आता। सीमेंट और पेंट का अधिक प्रयोग जगहों को अजीब बना देता है।

बंद्रभान घाट पर वेगड़ जी ने सूर्योदय और सूर्यास्त निहारते पूरा एक दिन लगा दिया था। तब (1998 में) यह जगह पुरानी और जीवंत रही होगी। अब तो यह नई काट का पिकनिक स्थान सा लगता है।

यहां नर्मदा के किनारे आरामदायक सीमेंट की बेंचें हैं, पर संतों के पैर अब नहीं टिकते होंगे।

लगता है, बंद्रभान का घाट अब इंस्टाग्राम है — वेगड़जी वाला घाट नहीं।

बंद्रभान के दो चित्र।

बंद्राभान पर वेगड़ जी की कुछ पंक्तियां – यहां कोई गांव नहीं है। कगार पर मंदिर और धर्मशाला है। पीपल का विशाल पेड़ और बड़ा चबूतरा है। हम इसी पर सोयेंगे। निर्जन स्थान है। पहाड़ों के बीच से आती घुमावदार सड़क है। कभी कभी बस भी आ जाती है। अगर यह स्थान दो चार दिन बाद आया होता तो हम यहां दो दिन ठहरते। इस सुंदर स्थान का दोष यह था कि यह हमें पहले ही दिन मिल गया था। (अमृतस्य नर्मदा। अध्याय 10)

नदी किनारे परिक्रमा मार्ग के रुप में मेरे मन में कल्पना थी कि छ फुट चौडी कच्ची पक्की सड़क होगी। परिक्रमा की गरिमा और एकांत के लिये वही ठीक भी रहता। पर परिक्रमा मार्ग के लिये जो सड़क बनी है, वह तो एक स्टेट हाईवे जैसी लगती है। डबल लेन की। जोश में ज्यादा ही काम कर दिया जाता है। और वह एक पारम्परिक परिकम्मावासी को अटपटा लग सकता है।

तीन दशक पहले की वेगड़ की पदयात्रा के रेखाचित्रों से बिल्कुल अलग प्रकार का नजर आता है आज की पदयात्रा का रास्ता। इतनी चिकनी चौड़ी सड़क तो पदयात्रा का वह खुरदरापन नहीं दिखाती, जिसकी मुझे अपेक्षा थी। परिक्रमा की गरिमा चौड़ी सड़कों में नहीं, पगडंडियों की थकान में है।

बकौल अमृतस्य नर्मदा (वेगड़ जी का दूसरा ट्रेवलॉग), बंद्रभान के उस तरफ भी सुंदर घाट है। अब जब प्रेमसागर दक्षिण तटीय यात्रा करेंगे, तब देखूंगा कि वहां कितनी पौराणिकता बची है – सूरज और चंद्रमा के अलावा। क्या वेगड़ जैसे कवि हृदय को निहारने के लिये वहां कुछ है या सब टूरिस्ट कल्चर में तब्दील हो गया है। खैर कुछ नहीं होगा तो जल में से निकलते सूरज और कल कल करती नर्मदा तो होंगी ही। मैं अपेक्षा करता हूं कि उस ओर की यात्रा में बंद्रभान में एक रात गुजारें प्रेमसागर।

कालियानाग

बंद्रभान के आगे एक कम पानी और ज्यादा बड़े पाट की नदी का चित्र आया। प्रेमसागर ने बताया वह कलिया नाग है। उसमें पानी रोकने को चेकडैम भी बना है सीमेंट का। कलियानाग पूरी प्रागैतिहासिक छटा में जिंदा था, सिवाय चेकडैम के। यहां सब जगह पाण्डवों से जुडी जनश्रुतियां हैं। कलियानाग को देख कर लगता है मैं भी कोई लोक कथा गढ़ दूं इस नाम और चित्र के आधार पर।

देखने में यह कलिया नाग ही लगता है। एक बड़ा-मोटा अजगर जैसा। सिवाय चेकडैम के, जो पौराणिक काल पर आधुनिक सीमेंट की एक खरोंच सा है; नदी कुछ वैसी ही लगती है जैसी पाण्डवों ने देखी होगी। “कलियनाग” कहती लग रह रही है – मैं तो वही हूं, जिसे समय भूल गया है।

रात में प्रेमसागर सुडानिया पहुंचे। वहां सिद्धिविनायक संत सेवा आश्रम में रुकने को ठिकाना मिला। लिखा है – आश्रम में कोई आय का साधन नहीं है। सेवा में कोई त्रुटि हो तो क्षमा कीजियेगा। आप चाहे जो सहयोग कर सकते हैं।

सेवा के नाम से याद आया; कई परिक्रमा वासी अपने रुकने के आसपास जगह साफ करते हैं। जाते समय भी अपनी रुकने की जगह को बुहार कर जाते हैं। उसके उलट और तरह की सेवा वाले भी हैं। कुछ “परिक्रमार्थी” अपने पीछे कड़वा धुआँ छोड़ जाते हैं — बीड़ी के अधजले टुकड़े और मसूड़ों से निकला चूना — मानो वह भी एक ‘भस्म’ हो, जो श्रद्धा की परिधि से बाहर ढरक गई हो।

बहरहाल, एक और सूचना लिखी है वहां – आश्रम पर स्थाई साधू संत की जरूरत है। सम्पर्क करें – सचिन राजपूत। मोबाइल नम्बर भी दिया है। अगर रेलवे से पैंशन न मिल रही होती तो मैं जरूर आवेदन करता। क्या पता इसी बहाने नर्मदा माई अपने पास बुला लेतीं! लगता है, नर्मदा किनारे अब साधू कम, बोर्ड ज्यादा हो गये हैं।

मैं अगर सुडनिया में स्थाई साधू चुन लिया जाता तो अपना बिजनेस कार्ड बनवाता – स्वामी नीलकंठ चिंतामणि, अद्वैताचार्य। भूतपूर्व सिविल सर्वेंट, भारतीय रेलवे। पता नहीं यह लोगों को प्रभावित करता या नहीं।

सुदनिया के आश्रम का बोर्ड

आज प्रेमसागर तीस किलोमीटर चले। अब मुझे भी लिखने में कुछ आनंद आ रहा है। प्रेमसागर चल रहे हैं; मैं लिखते-लिखते बह रहा हूँ। कुछ ज्यादा ही बह(क) रहा हूं!

नर्मदे हर! #नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #नर्मदाप्रेम


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