गंजीत से पीलीकरार


सताईसवां दिन – मिले नाश्ता, गमछा, लाठी और इक्यावन रुपये

दो विकल्प थे प्रेमसागर के पास। एक था पक्की सड़क के रास्ते चलने का और दूसरा नर्मदा किनारे किनारे कुछ असुविधाजनक मार्ग का। ज्यादातर लोग सुविधा चाहते होंगे। मैं तोल रहा था कि प्रेमसागर कौन सा रास्ता चुनते हैं। अगर वे झटपट परिक्रमा कर अपने बैज की तरह परिक्रमा पूरा करने को भुनाना अधिक वरीयता पर रखते हैं तो पहला विकल्प उनके लिये है। और अगर उन्हें ‘नर्मदा खींच रही हैं’ तो दूसरा। भला हुआ कि उन्होने दूसरा विकल्प चुना।

असुविधाजनक मार्ग

गंजीत में नाथ सम्प्रदाय के आश्रम में मुख्य बाबा रात इग्यारह बजे आये। भोजन कर अलग होने चले गये। प्रेमसागर की उनसे बात नहीं हो पाई। सवेरे वो पैंट पहन कर घूमते दिखे। पैंट पहने दिखने से महंत जी का आभामंडल ध्वस्त हो गया प्रेमसागर की नजर में। महंत जी नाथ पंथ में दीक्षा लिये हैं पर उन्हें अभी लंगोटी नहीं मिली है। “बारह साल की कड़ी परिच्छा के बाद लंगोट मिलती है भईया। आसान बात नहीं है।”

प्रेमसागर शायद कनफड़ दीक्षा की बात कह रहे थे जिसमें योगी को कान में मुंदरी पहना कर पूर्ण योगी को सनद मिलती है। उसी में हो सकता है, दो टुकड़ों का लंगोट भी पहनाया जाता हो।

पीलीकरार का नर्मदा तट

नर्मदा किनारे चलते हुये कुछ चित्र लिये प्रेमबाबा ने। अच्छे आये। आगे रास्ता कठिन हो गया। नहीं दिखा तो खेत के बीच से चलना पड़ा। कपास की बुआई की तैयारी हो रही थी। खेत बड़े बड़े थे। पांच दस एकड़ के। प्रेमसागर प्रभावित थे जुताई के तरीके से। “यहां हल का फाल 9इंच से एक फुट का होता है। उससे अढ़ाई फुट की मिट्टी ऊपर नीचे हो जाती है। उसके बाद रोटर और उलाव से गोलगोल घुमा कर खेत तैयार किया जाता है। मिट्टी वैसे हो जाती है जैसे आटा गूंथा जाता है।”

“भईया, हमें किसानी करनी हुई तो हल यहीं से मंगायेंगे।”

कई खेतों में बिजली का तार की बाड़ से झटका मशीन जोड़ी गई थी। इस इलाके में जंगली और बहेतू जानवरों की भी दिक्कत है।

“आज का दिन खास था भईया। आज मेरे सामने मोर नाचता दिखा। फोटो लेने से मैं चूक गया। दिन भर में अगर दिखा तो फोटो जरूर लूंगा।” पर मौका आया नहीं।

जहाजपुर में शत्रुघ्न पटेल और उनकी पत्नी ने नाश्ता कराया और उसके बाद एक गमछा, लाठी और इक्यावन रुपये दे कर पैर छुये।

जहाजपुर में शत्रुघ्न पटेल और उनकी पत्नी ने नाश्ता कराया और उसके बाद एक गमछा, लाठी और इक्यावन रुपये दे कर पैर छुये। मुझे जब बताया तो प्रेमसागर से ईर्ष्या हुई। गमछा, लाठी और ऊपर से रुपये – ये तीनो बहुत काम के हैं! मुझे मिले होते तो कितना आनंद आता। “लाठी बहुत अच्छी है भईया। और मुझे बहुत जरूरत भी थी।” प्रेमसागर ने यह नहीं कहा – आप इतना लिखते हैं मेरे लिये, गमछा और 51 रुपया आप रख लीजियेगा! :lol:

जहाजपुर में नाश्ता मिला और पंडिज्जी गांव में एक महिला दुकानदार ने भोजन कराया। नर्मदा माई समय समय पर चुग्गा डालती रहीं बाबाजी के मुंह में।

शाम चार बजे सातधारा से गुजरे प्रेमसागर। बीच में बड़े पत्थरों से नदी सात धाराओं में विभक्त हो जाती हैं। प्रेमबाबा गिनते चले – एक दो तीन…छ। सातवीं थोड़ा आगे चल कर स्पष्ट हुई। “ठीक, पूरी सात हैं भईया।”

सातधारा

आगे भागनेर नदी मिली। वेगड़ ने अमृतस्य नर्मदा में लिखा है कि वह बड़ी मासूम सी नदी है। आसानी से पार की जा सकती है। पर जब नर्मदा में बाढ़ आये तो इसमें पानी बहुत हो जाता है। वह पानी भगनेर का नहीं, नर्मदा का होता है जो उफन कर भगनेर में चला आता है।

अभी तो प्रेमसागर भगनेर किनारे पगडंडी पकड़ चल रहे थे। गांव वाले उन्हें बताये कि नदी पार करने के लिये बांस का पुल है। उससे पार कर लें, वर्ना 10-12 किलोमीटर ज्यादा चलना होगा, तब सड़क का पुल आयेगा। लेकिन पुल नीचे था करीब दो मंजिल नीचे। झाडियों में छिप गया था। उस चक्कर में दिखा नहीं और प्रेमसागर दो किलोमीटर आगे बढ़ गये। खेत में काम करने वाले लोगों ने पीछे से जा कर उन्हें वापस बुलाया और पुल पार कराया।

“गांव वालों ने ही पार कराया वह बांस का पुल भईया। जर्जर था। बिल्कुल लछमन झूला की तरह।”

भागनेर का पुल

भागनेर का बांस और लकड़ी से बना संकरा पुल पहली नज़र में ही भरोसा और भय दोनों उत्पन्न करता है। यह लक्ष्मण झूला कहां है? यह तो आधुनिक इंजीनियरिंग की सभी मान्यताओं को विखंडित करता लक्ष्मण जुगाड़ है। प्रेमसागर की श्रद्धा और एडवेंचर ही इसे पार कर सकता है।

मैंने लाइनें लिखीं –
पुल क्या था, लकड़ी जर्जर,
हर डग पर होता चरर मरर।
“चल बेटा, मैं हूं साथ तेरे”,
मानो बोली नर्मदा लहर।

और उसे जोड़ते हुये एक कैप्शन पोस्टर बनाया।

वे आज बुधनी तक चलना चाहते थे, पर शाम हो जाने पर पैर पहले थामने पड़े। उन्हें पीलीकरार नामक जगह पर एक करुणानिधान अन्नक्षेत्र दिखा। वहीं रह गये रात में। कुल बीस किलोमीटर से ज्यादा चले होंगे।

रास्ते में लोग सहूलियत देते गये। या परकम्मा की भाषा में कहूं तो माई प्रेमसागर की खोजखबर के लिये रास्ते के लोगों को सजेहती रहीं।

दिन अच्छा ही गुजरा बाबा जी का। मुझे उनको मिले इक्यावन रुपये खटक रहे हैं। कम से कम आधा तो मुझसे बांटना चाहिये उन्हे। छ सौ किलोमीटर दूर उनको मिली भोजन-परसादी तो मैं नहीं ले सकता; नगदी तो शेयर कर ही सकता हूं। :lol:

प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes

#नर्मदाप्रेम #नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #प्रेमसागर_पथिक

नर्मदे हर!!
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नीलकंठ से गंजीत


दस जून: श्रद्धा की छाया में छब्बीसवां दिन

नीलकंठ से रवाना होते ही एक सज्जन पीछे से आये और प्रेमसागर को हलवा दे कर चले गये। ज्यादा बात भी नहीं हुई उनसे। यह जरूर था कि वे नीलकंठ के थे। अपने खेत पर जाने की जल्दी मे थे वे। नाम बताया – रघुराज सिंह।

यूं कोई आये और आपको हलवा-मिष्टान्न दे कर चला जाये, नर्मदा किनारे चलते पदयात्री को यह लग सकता है कि नर्मदा माई ने ही भेजा है प्रसाद। अगर यात्री सोलो चल रहा हो, अकेला, और वह थोड़ा बहुत आध्यात्म-खोजी (Spiritual Seeker) हो तो वह जरूर ऐसी घटना को नर्मदा माता के चमत्कार से जोड़ कर देखेगा।

वहां लोग अजनबी पदयात्री को इतना भाव देते हैं। इसके पीछे नर्मदा माई ही हैं ऐसा प्रेमसागर कहते रहते हैं। मैं प्रेमसागर की श्रद्धा को चैलेंज नहीं करना चाहता। उम्र का असर है या नर्मदा की इतनी हो गई यात्रा का, या नर्मदा पर पूरी श्रद्धा से लिये ट्रेवलॉग्स को पढ़ने का, मैं महसूस कर रहा हूं कि भौतिकता, तार्किकता और श्रद्धा को कुछ तो जोड़ने वाली कड़ी है।

रघुराज सिंह: “एक सज्जन पीछे से आये और प्रेमसागर को हलवा दे कर चले गये।”

कोनार नदी नीलकंठ मंदिर के आगे नर्मदा में मिलती है। पर कोनार को संगम स्थल पर पार करने का मार्ग नहीं है। पदयात्री घूम कर आगे बढ़ते हैं। “संगम के पास काफी ढलान है, भले ही नदी में पानी कम है। वहां उतरने लायक नहीं है। और नदी में पार होने के लिये वहां नाव भी नहीं है।”

कोनार के बारे में प्रेमसागर को बताया गया कि इसका नाम कौशल्या नदी भी है। यहां राम लक्ष्मण सीता और शंकर जी पैदल चले थे और उनके पदचिन्ह भी हैं। आस्तिक हैं प्रेमसागर। रास्ते में पदचिन्ह देखते चले। “अगर दिखे तो फोटो ले कर आपके पास भेजूंगा।”

अन्तत: कोनार नदी पर पुल प्रेमसागर ने पौने नौ बजे पार किया। नदी का जल ज्यादा नहीं हैं, पर गहरी जरूर है। गम्भीर स्वभाव की नदी लगती है। अगर नाम कौशल्या है तो अपने नाम को सार्थक करती जान पड़ती है। नदी में बारिश के मौसम में पानी बढ़ता होगा।

कोनार नदी

आगे जो गांव पड़ा वहां राजू सिंह जी ने अपने घर पर चाय पिलाई। “इस इलाके में राजपूत ज्यादा लगते हैं भईया।” प्रेमसागर ने कहा।

दिन भर की यात्रा करने के बाद शाम को एक और घटना प्रेमसागर ने बताई। दोपहर बारह बजे एक गांव था जैना टप्पर। एक बच्चा प्रेमसागर को बुला कर अपने घर ले गया। वहां भोजन कराया।

“भोजन में आमरस था, रोटी और नमकीन सेवियां। दोपहर हो गई थी तो मैं वहीं बराम्दे में चादर बिछा कर आराम करने लगा। मुझे नींद आ जाती है और तीन बजे सोता हूं। वह भी गहरी नीद। उठाने पर भी नहीं जागता।”

पर आज घंटा भर बाद ही कुछ अजीब हुआ। प्रेमसागर ने एक रहस्य कथा सुनाने के अंदाज में कहा कि उन्हे लगा कोई गाल हिला कर कोई कह रहा है – उठो, कब तक सोते रहोगे।

“मैं उठ गया भईया। आसपास देखा तो कोई नजर नहीं आया। आवाज किसी औरत की थी। एक बार मुझे लगा कि मेरी बहन तो नहीं आ गई है मुझे सरप्राइज देने। दीदी ने फोन पर कहा भी था कि कभी मौका मिला तो आ कर मिलेंगी।”

“पर आसपास खूब देखा, मुझे कोई नजर नहीं आया। फिर सोचा कि कहीं कोई कुत्ता न हो, जो सोते देख मेरे पास आ गया हो। पर कोई जीव नहीं था वहां।”

प्रेमसागर ने कहा – उन्हें लगा, यह आवाज़ नर्मदा माई की रही होगी। आवाज़ और स्पर्श ऐसा ही अनुभव करा रहे थे। माई कह रही थीं कि उठो और चलो। उन्होने मुंह धो कर पानी पिया और चल दिये।

भोजन में आमरस था, रोटी और नमकीन सेवियां।

अपनी यात्रा के पूर्वार्ध और अब की तुलना करते हुये प्रेमसागर ने कहा – “कुछ दिन पहले तक भईया चलने में थकान होती थी। रास्ते में पचीस पचास आदमी अपनी बाइक और कारें रोक कहते भी थे कि वे आगे छोड़ देंगे। कभी कभी मन डोलता भी लगता था। उनका अनुरोध कभी माना नहीं। पर अब तो थकान नहीं लगती।”

“शाम को दो किलोमीटर पहले एक जगह लोग आश्चर्य कर रहे थे कि नीलकंठ से एक दिन में चल कर आ गये यहां तक। लोग इतना चलने में दो-तीन दिन लगाते हैं। भईया, अब चलने में कोई परेशानी नहीं होती मुझे। लगता है, नर्मदा माई सब ध्यान रख रही हैं।”

प्रेमसागर नर्मदा का नाभि स्थल पार कर चुके नेमावर में। उत्तर पथ की आधी यात्रा सम्पन्न हो गई है। आज छब्बीस दिन हो गये। आधी यात्रा तक पदयात्री नर्मदा को समझने में लगा रहता है। आधी यात्रा के बाद नदी उसको समझने लगती है। अब नर्मदा समझ रही हैं प्रेमसागर को।

प्रेमसागर आंवली घाट रुकना चाहते थे। नर्मदा परिक्रमा में आंवली घाट का बहुत अधिक महत्व है। इसे लोक मान्यताओं में एक सिद्ध और प्रसिद्ध घाट माना जाता है। यहां हथेड़ नदी और मां नर्मदा का संगम होता है। आंवली घाट के बारे में लोक मान्यता और कथायें हैं कि यहां अनेक ऋषि-मुनि, संत और तपस्वी आते-जाते रहे हैं, और कईयों ने यहां तपस्या की है। ऐसा कहा जाता है कि पांडवों ने भी यहीं तपस्या की थी और यहां अमावस्या और पूर्णिमा पर देवी-देवता स्नान करने आते हैं।

पर आंवली घाट में प्रेमसागर जी का रुकना नहीं हो सका। वहां 3-4 अन्न क्षेत्र बंद थे। ताला लगा था। एक सज्जन ने गंजीत जाने का सुझाव दिया। गंजीत आंवलीघाट से तीन किलोमीटर आगे है। वहां भी नर्मदा किनारे नाथ सम्प्रदाय का आश्रम है। गंजीत जा कर वहां जगह मिली। वहां प्रेमसागर अकेले परिक्रमावासी थे।

मैंने पूछा – गंजीत का आश्रम कैसा है?

“कुल मिला कर ठीकठाक है। आश्रम के पास तीन बीघा जमीन है। महंत जी कोई मालवीय जी हैं। वे पास में जूना अखाड़ा के दत्तात्रेय मंदिर गये हैं। आश्रम के कर्मचारी लोगों ने मुझे रुकने को कह दिया है। वे भोजन-प्रसादी का इंतजाम कर रहे हैं। कल सवेरे बगल में नर्मदा माई के दर्शन करूंगा और फिर आगे निकल लूंगा।”

गंजीत का नाथ सम्प्रदाय का आश्रम

आज प्रेमसागर को यात्रा करते छब्बीस दिन हो गये हैं। शरीर और मन रंवा हो गया है रेवा माई की यात्रा में। अब शारीरिक थकान नहीं है। छोटी छोटी बातें पूरे मनोयोग से मुझे बताने लगे हैं। शायद मुझमें भी परिवर्तन है। मैं उनकी यात्रा की कमियां (जो मेरे हिसाब से हैं, पर शायद हैं नहीं) अनदेखा करना भी सीख गया हूं। उनकी पदयात्रा और मेरी मनयात्रा चल ही निकली है।

अब प्रेमसागर नहीं चल रहे — नर्मदा माई स्वयं उन्हें चला रही हैं।


प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes

#नर्मदाप्रेम #नर्मदायात्रा #नर्मदापरिक्रमा #प्रेमसागर_पथिक

नर्मदे हर!!


करौंदमाफी से नीलकंठ


दिनांक 09 जून

करौंदमाफी में आश्रम की व्यवस्था अच्छी थी। आसपास गांव नहीं था। आश्रम से दूरी पर गांव थे। पर आश्रम का अन्नक्षेत्र चल रहा था। मैने पूछा – रात की प्रसादी में क्या था?

“रोटी, दाल, भुजिया आलू की, चावल सब था। सब भरपेट था भईया। मांगने की भी जरूरत नहीं थी। घूम घूम कर परोस रहे थे। यहां यह व्यवस्था बहुत अच्छी है। यूपी, बंगाल, बिहार और राजस्थान-गुजरात में भी यह व्यवहार नहीं है। दक्षिण में तो और खराब है, सिवाय कर्नाटक के। तामिलनाडु में तो बिना पैसे चाय-पानी भी नहीं मिला था। वहां तो बात समझने पर भी हिंदी वाले को नहीं समझते थे। करोंदमाफी के बहाने पूरे भारत का तुलनात्मक अध्ययन बता दिया प्रेमसागर ने।”

रास्ते के बच्चों के बारे में प्रेमसागर कई बार बता चुके हैं। आज फिर बताया – “भईया यहां बच्चा बच्चा दौड़ कर पास आ जाते हैं। नर्मदे हर कहते हैं बड़े जोश से। उन्हें चाकलेट दो तो उनसे कितनी भी बार नर्मदे हर कहला लो! इस जमाने में जहां अपना सगा बेटा पास नहीं आता, ये दौड़ कर आते हैं और कहते हैं – बाबा हमें आशीर्वाद दो।”

चाकलेट की आशा में पास आते बच्चे। नर्मदे हर!

साढ़े आठ बजे बीजलगांव आया। वहां से थोड़ी बहुत बात मुझसे की।

प्रेमसागर वहां चल रहे थे पूरी ऊर्जा के साथ और यहां भदोही में मेरी तबियत ठीक नहीं थी। सारे शरीर में दर्द था और मुझे लग रहा था कि पेशाब में संक्रमण हो गया था। दिन डाक्टर को दिखाने और परीक्षण कराने में निकल गया। पता चला कि ज्यादा शारीरिक श्रम (साइकिल चलाने) से मेरा क्रेटिनिन बढ़ गया है और श्वेत रक्त कणिकायें भी बढ़ गई हैं। इस सब के कारण दिन में प्रेमसागर से बातचीत लगभग नहीं हुई। कुछ चित्र उन्होने भेजे थे, वही देखे। बीच बीच में उनकी लाइव लोकेशन देखता रहा।

तबियत ठीक नहीं थी तो मुझे न बातचीत के लिये शब्द मिल रहे थे और न विचार आ रहे थे। प्रेमसागर की यात्रा चल रही थी, पर मेरी मनयात्रा को विश्राम की दरकार हो रही थी।

रात पौने नौ बजे प्रेमसागर जी से बात हुई। उन्होने बताया कि उनका दिन भी कुछ अच्छा नहीं रहा। दिन में किसी से कोई खास मुलाकात – बात नहीं हुई। गांव दूर दूर थे और जो लोग दिखे भी वे अपनी खेती में परेशान नजर आये। बादल घिरे थे और बारिश आने को थी तो उन सब की भी व्यस्तता थी अपनी फसल सहेजने की। लोग नहीं मिले तो दोपहर में भोजन भी प्रेमसागर को कहीं नहीं मिला।

“काफी देर बाद, लगभग बीस किलोमीटर चलने पर एक चाय की दुकान मिली। वहां चाय और पोहा ले कर खाया। और भईया आम मिल गये थे। एक जगह जहां आम थे, वहां रखवाले ने चार आम दे दिये। मीठे थे।”

“मेन बात यह रही कि गर्मी और उमस बहुत ज्यादा थी। पेड़ भी कम ही मिले। छाया में बैठ सुस्ताने को भी जगह नहीं मिली। नर्मदा किनारे किनारे चलना हो रहा था तो तीन बार माई के पास जा कर नहा लिया”

देवास जिले का आखिरी गांव है करोंदमाफी। उसके बाद सीहोर शुरू होता है। शुरू में पड़ता है सातदेव। वहां बालू का खनन बहुत होता है। ट्रेक्टर से बालू की ढुलाई होती है। शायद अवैध होता है यह कारोबार। “खबरिया दिखे भईया। नदी के दोनो तरफ एक एक खबर देने वाले हैं। वे खबर देते हैं कि पुलीस आ रही है। पर पुलीस का ज्यादा डर नहीं है। खबर देने वाले भाई ने कहा – पुलीस पकड़ेगी भी तो क्या करेगी। पैसा लेगी और छोड़ देगी।”

आज के अनुभव अच्छे नहीं रहे प्रेमसागर के। इसलिये वे बात भी नेगेटिव विषयों की ही कर रहे थे।

रात में नीलकंठ पंहुचे। नर्मदा किनारे मंदिर छोटा ही है पर खूब पेड़ हैं इर्दगिर्द। नर्मदा माई 100-200 मीटर पर ही होंगी। यहां अन्न क्षेत्र नया बना है। यज्ञशाला के दालान में कई परिक्रमा वासी रुक सकते हैं। यज्ञशाला की दीवार पर लिखा है – “यहां नर्मदा परिक्रमा करने वालों के लिये निशुल्क भोजन व्यवस्था किया जाता है।”

पर आश्रम में केवल वहां के बाबा जी थे। पचहत्तर साल के होंगे। भोजन के बारे में प्रेमसागर ने पूछा तो बाबाजी ने कहा – यहां और कोई तो है नहीं; हमारे पास दोपहर की चार रोटी बची हैं… उससे काम चले तो…

नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर

प्रेमसागर ने कहा – बाबाजी, पास से अगर तरबूज मिल जाये तो हम दोनो खा कर सो जायेंगे। बाबाजी ने उसमें भी ना नुकुर की। बोले उनके पास पैसा नहीं है। “भईया उन्होने कहा कि तरबूज पचास के आयेंगे, मैने सौ रुपये दिये। पर थोड़ी देर बाद बाबा जी ने आ कर बताया कि तरबूज तो मिले नहीं।”

“भईया, लग गया कि आज नर्मदा जी का जल पी कर रहना पड़ेगा। बाबाजी पैसे लौटा रहे थे तो मैने कहा – बाबाजी मैं तो पैसे दे चुका हूं, अब वापस नहीं लूंगा, आप ही रख लीजिये।”

बाबाजी – “मैं तो पैसे नहीं ले सकता। आप मंदिर को दान देना चाहें तो दे दीजिये।”

“भईया, अब दान देने की बात आई तो मैने खोज कर एक रुपये का सिक्का निकाला। एक सौ एक रुपया मंदिर के नाम से बाबाजी को दान दे दिया।”

थोड़ी देर बाद देखा कि बाबाजी का मन बदल गया। वे भोजन बनाने लगे। उन्होने बाटी (गाकड़) लगाई और दाल भी बनाई। दोनो ने भोजन किया।

अगले दिन नीलकंठ से रवाना हो कर बाबाजी के बारे में प्रेमसागर ने बताया – “फिर तो भईया, बाबा जी बिल्कुल बदल गये थे। सवेरे जिद कर उन्होने चाय और पोहा बना कर मुझे खिलाया। खाये बिना जाने ही नहीं दिया। वे कह रहे थे – आप अच्छे संस्कारी आदमी हैं। आप जैसे परिक्रमावासी आयें तो कितना अच्छा हो।”

मैने पूछा – बाबाजी के नाम गांव के बारे में पता नहीं किया?

“किया भईया। वे अनूप सिंह हैं। नीलकंठ गांव के ही रहने वाले हैं। परिवार से अलग आश्रम में रहते हैं। अनूप सिंह जी गांव वालों के बारे में कह रहे थे कि वे सहायता नहीं करते। पर भईया आश्रम को अनाज वगैरह तो गांव वाले ही देते हैं।” – प्रेमसागर ने जवाब दिया।

भले, अच्छे पर कुछ जटिल हैं अनूप सिंह जी। गहरे में आत्मीय हैं और ऊपर से रूखे। शायद गांव वालों की उपेक्षा या परिक्रमावासियों का अकृतज्ञ रवैया उसके मूल में हो।

नीलकंठ के बाबाजी – अनूप सिंह

प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes

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