भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
यहाँ ममफोर्डगंज में पीपल के पेड़ के नीचे एक हाथी रहता था। चुनाव की घोषणा होने के बाद उसे नहीं देखा मैने। सोचा, शायद बहुजन समाज पार्टी के प्रचार में लग गया होगा।
ममफोर्डगंज, इलाहाबाद में वह स्थान जहां हाथी रहता था, पीपल के पेड़ तले। बहुत दिनों से वह नहीं था यहां।
अन्यथा दफ्तर जाते हुये उसे पीपल के पेड़ के नीचे देखा करता था। एक पैर लोहे के जंजीर से बंधा रहता था। कभी कभी उसका मेक अप किया मिलता था और कभी सादी अवस्था में। एक दो बार उसे सड़क पर चलते देखा था।
पेड़ के नीचे वह पीपल या किसी अन्य पेड़ के पत्ते खाया करता था।
बहुत दिनों से मैं उस हाथी को मिस कर रहा था।
अचानक आज सवेरे मुझे दूर से ही दिखा कि हाथी अपने स्थान पर वापस आ गया है। मोबाइल बड़े मौके पर निकल आया और चलते वाहन से एक तस्वीर ले पाया मैं उसकी। एक दिन पहले ही उस स्थान का चित्र चलते वाहन से लिया था, जब वह नहीं था!
आज सवेरे उस हाथी को कई सप्ताह बाद मैने फिर नियत जगह पर देखा। उसके रखवाले-महावत भी वहां थे। प्रसन्नता की बात है न?!
बहुत अच्छा लगा ममफोर्डगंज में उस हाथी को अपने स्थान पर वापस देख कर। उसके रखवाले-महावत भी पास में बैठे दिखे। हाथी अपने कान फड़फड़ा रहा था –
हथिया रे हथिया तोर बड़े बड़े कान। (ओनसे) तोर माई पछोरई नौ मन धान। (हाथी रे हाथी, तेरे बड़े बड़े कान हैं। उन्हे सूप की तरह प्रयोग करते हुये तेरी मां उससे नौ मन धान साफ करती है!)
यह शहर का अंत है। शहर का उत्तरी-पूर्वी किनारा। लाइन शाह बाबा की मजार इलाहाबाद के मध्य में है – इलाहाबाद स्टेशन पर। शिवकुटी वहां से लगभग 15-18 किलोमीटर दूर है। वैसे भी यह स्थान शैव मन्दिरों और गंगा के तट के कारण है। किसी इस्लामी या सूफी सम्प्रदाय के स्थान के कारण नहीं। पर लाइन शाह बाबा का यह फकीर यहां यदा कदा चला आता है। उसी ने बताया कि पन्द्रह बीस साल से आ रहा है और हमारे घर से उसे कुछ न कुछ मिलता रहा है।
हजरत लाइन शाह बाबा की मजार का फकीर।
वह बात जिस जुबान में करता है, उसमें उर्दू का बाहुल्य है। कुछ कुछ कम समझ में आती है। पर मैं उसका पहनावा और मैनरिज्म देख रहा था। कुरता-पायजामा पहन रखा था उसने। सिर पर स्कल कैप से कुछ अलग टोपी। गले में लटकाया लाल दुपट्टा। बगल में एक भरा-पूरा झोला और पांव में कपड़े के जूते। एक कद्दू की सुखाई आधी तुमड़ी थी, जिसे एक पेटी से सामने पेट पर फकीर ने लटका रखा था और जिसमें भिक्षा में मिला आटा था। बोलने में और हाथ हिलाने में नाटकीय अन्दाज था उस बन्दे का।
घर के अन्दर चला आया वह। एक कप चाय की मांग करने लगा। उसमें कोई खास परेशानी न थी – मैने अपने लोगों से एक कप चाय बना कर देने को कह दिया। तुलसी के चौरे पर टेक ले कर बैठ गया वह। उसके बाद अपना वाग्जाल बिछाना प्रारम्भ किया उसने।
लाइन शाह बाबा का फकीर। मुझसे यह अनुरोध करने लगा कि वह दो बात कहना चाहता है, क्या घर में आकर एक ईंट पर बैठ सकता है?
आपके लड़के की सारी तकलीफें खत्म हो जायेंगी। बस एक काले घोड़े की नाल लगवा लें घर के द्वार पर। और फिर अपने पिटारे से एक नाल निकाल कर दे भी दी उसने। मेरी पत्नीजी ने पूछना प्रारम्भ किया – उनका भाई भदोही से विधान सभा चुनाव लड़ रहा है, उसका भला होगा न? फकीर को शायद ऐसी ही तलब की दरकार थी। अपनी प्रांजल उर्दू में शैलेन्द्र (मेरे साले जी) के चुनाव में विजयी होने और सभी विरोध के परास्त होने की भविष्यवाणी दे डाली उस दरवेश ने। उसने लगे हाथ अजमेर शरीफ के ख्वाजा गरीब नेवाज से भी अपना लिंक जोड़ा और पुख्ता किया कि जीत जरूर जरूर से होगी।
यह जीत की भविष्यवाणी और बेटे के भविष्य के प्रति आशावादी बातचीत अंतत: मेरी पत्नीजी को 250 रुपये का पड़ा।
इजाजत पा कर वह फकीर तुलसी के चौरे की टेक लगा कर बैठ गया और फिर उसने वाग्जाल फैलाना प्रारम्भ किया।
हज़रत लाइन शाह बाबा के फकीर नें फकीरी चोले और लहजे को कैसे भुनाया जाता है – यह मुझे सिखा दिया। आज, रविवार, की यह रही उपलब्धि!
बौद्ध विहार में दान के उपयोग के बारे में बहुत पहले पढ़ा था – दान में मिले कम्बल पहले ओढ़ने, फिर बिछाने, फिर वातायन पर परदे … अंतत: फर्श पर पोछा लगाने के लिये काम आते थे। कोई भी कपड़ा अपनी अंतिम उपयोगिता तक उपयोग किया जाता था। मुझे लगा कि कितने मितव्ययी थे बौद्ध विहार।
पर जब मैने अपनी गांवों की जिन्दगी को देखा तो पाया कि इस स्तर की मितव्ययता आम जीवन का हिस्सा है।
पुरानी साड़ी या धोती का प्रयोग कथरी या दसनी बनाने में किया जाता है। यह मोटी गद्दे जैसी चीज बन जाती है। इसका प्रयोग बिछाने में होता है और सर्दियों में यदा कदा ओढ़ने में भी।
मेरे पास दफ्तर में एक दसनी है, जिसे छोटेलाल सोफे पर लंच के बाद बिछा देता है – आधा घण्टा आराम करने के लिये। घर में अनेक इस प्रकार की दसनियाँ हैं। जब यात्रा अधिक हुआ करती थी तो मैं एक रेलवे की बर्थ की आकार की कथरी ले कर चलता था और रेल डिब्बे में घुसने पर पहला काम होता था पैण्ट कमीज त्याग कर कुरता-पायजामा पहनना तथा दूसरा होता था बर्थ पर दसनी बिछा कर अपनी “जगह” पर कब्जा सुनिश्चित करना।
यहां गंगाजी के कछार में शराब बनाने वालों को कथरी का प्रयोग गंगा किनारे रात में सोने या फिर अपने सोमरस को रेत में दबा कर रखने में करते देखा है मैने।
भजगोविन्दम।
कथरी शब्द संस्कृत के कंथ से बना है। भजगोविन्दम में आदिशंकर ने एक सुमधुर पद रचा है –
स्वामी चिन्मयानन्द ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया है और उस अंग्रेजी अनुवाद का हिन्दी अनुवाद है –
योगी, जो मात्र एक गोडाडी (गली में परित्यक्त कपड़ों की चिन्दियों को सी कर बनाया गया शॉल) पहनता है, जो अच्छे और बुरे की परिभाषाओं से निस्पृह रहते हुये अपने चित्त को योग में अवस्थित रखता है, वह ईश्वरीय गुणों में रमता है – एक बालक या एक विक्षिप्त की तरह!
उस दिन श्री गिरीश सिंह ने ट्विटर पर लगदी का एक चित्र लगाया तो मन बन गया यह पोस्ट लिखने का। लगदी, गोडाडी, कथरी, दसनी आदि सब नाम उस भारतीय मितव्ययी परम्परा के प्रतीक हैं, जिनमें किसी भी सम्पदा का रीसाइकल उस सीमा तक होता है, जिससे आगे शायद सम्भव न हो।
और यह रीसाइकल वृत्ति हमारी योगवृत्ति से भी जुड़ी है। आधुनिकों के लिये योग चमकदार मर्केटेबल योगा होगा, पर हमारे लिये तो वह कथरी/लगदी/गोडाडी/दसनी में लिपटा बालोन्मत्त योग है। बस!