भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
बहुत अर्से से यह मुझे बहुत लिज़लिजी और भद्दी चीज लगती थी। व्यक्तित्व के दुमुंहेपन का प्रतीक!
मुझे याद है कि एक बार मुझे अपने संस्थान में झण्डावन्दन और परेड का निरीक्षण करना था। एक सज्जन गांधी टोपी मुझे पहनाने लगे। मैने पूरी शालीनता से मना कर दिया और अपनी एक पुरानी गोल्फ टोपी पहनी।
पर, अब कुछ दिनों से इस टोपी के प्रति भाव बदल गये हैं। मन होता है एक टोपी खादी भण्डार से खरीद लूं, या सिलवा लूं। पहनने का मन करता है – इस लिये नहीं कि फैशन की बात है। फैशन के अनुकूल तो मैं कभी चला नहीं। बस, मन हो रहा है।
इस टोपी की पुरानी ठसक वापस आनी चाहिये। शायद आ रही हो। आप बेहतर बता सकते हैं।
टाटा स्टील का एक विज्ञापन यदा कदा देखता हूं – उनके एथिक्स कोआर्डिनेटर (क्या है जी?) के बारे में।
टाटा स्टील का एथिक्स कोऑर्डिनेटर विषयक विज्ञापन - ज्योति पाण्डेय के चित्र के साथ
मुझे नहीं मालुम कि ज्योति पाण्डेय कौन है। विज्ञापन से लगता है कि टाटा स्टील की मध्यम स्तर की कोई अधिकारी है, जिसकी अपने विभाग में ठीकठाक इज्जत होगी और जिसे विज्ञापन में अपना आइकॉन बनाने में सहज महसूस करती होगी।
पर एथिक्स ऐसा विषय है जिसमें अपने व्यक्तित्व/चरित्र को समग्रता से न रखा जाये तो मामला गड्ड-मड्ड हो जाता है। एथिक्स कम्पार्टमेण्टमेण्ट्स में नहीं हो सकता। उदाहरण के लिये अगर आप अपने बच्चों के लिये आदर्श माता पिता नहीं हैं, अगर आप अपनी पुरानी पीढ़ी की फिक्र नहीं करते, अगर आप अपने पड़ोसियों के काम नहीं आते तो मात्र विभागीय एथिक्स को बहुत दूर तक नहीं ले जा सकते!
सो, ज्योति पाण्डेय (जो भी हों) यह समग्रता कितनी और किस प्रकार लाती हैं, जानने की उत्सुकता है।
[वैसे जब एथिक्स की बात चलती है तो चेन्ने की मकान बनाने वाली कम्पनी अलाक्रिटि [Alacrity] याद आती है। उसे कोई अमोल कारनाड़ जी ईमानदारी और नैतिकता के नियमों के आधार पर चलाते थे। नब्बे के दशक की बात है। मैने उनसे उनका कुछ लिटरेचर भी मंगाया था सन 1997 में। कालांतर में वह कम्पनी बन्द हो गयी। चोरकटई के जमाने में एथिक्स बड़ी विषम चीज है! ]
फिलहाल मैं रेलवे अस्पताल में भर्ती हूं। अगले एक दो दिन के लिये। मुझे तेज बुखार और रक्त में संक्रमण था। जिन डाक्टर साहब की छत्र छाया में हूं – डा. विनीत अग्रवाल; वे अत्यंत दक्ष और व्यवहार कुशल डाक्टर हैं। उनके हाथ में अपने को सौंप कर पूर्णत निश्चिंत हुआ जा सकता है – और वही मैं हूं। मुझे विश्वास है कि उनकी चिकित्सा के बाद मैं अस्पताल से निकलूंगा तो अपने प्रति पूर्णत आश्वस्त रहूंगा।
पचपन-छप्पन की उम्र में मधुमेह की पहचान हुई है! मैं भारत के सलेक्ट 5.1 करोड़ नागरिकों में स्थान पा चुका हूं। करेला, आंवला, येलोवेरा आदि भांति भांति के द्रव्यों/उत्पादों के विषय में देखने आने वाले सलाह ठेलने लगे हैं। अम्मा टेप बजाने लगी हैं – सब गरह हमहीं के घरे आवथ ( सब ग्रह हमारे ही घर आता है!)। अस्पताल में पोस्ट लिखना – पब्लिश करना अच्छा लग रहा है!
मैं किताबी कीड़ा (किकी) विषय को कण्टीन्यू कर रहा हूं। निशांत और कुछ अन्य पाठकों ने पिछले पोस्ट की टिप्पणियों में पुस्तकें खरीदने/पढ़ने की बात की है। हिन्दी में और हिन्दी के इतर भारत में बड़ा पाठक वर्ग है।
पाठकों की रुचि/व्यवहार पर फॉर्ब्स इडिया ने पाठक सर्वे किया था/चल रहा है। फॉर्ब्स इण्डिया लाइफ ने उसके अंतरिम (?) परिणाम अपनी त्रैमासिक पत्रिका में छापे हैं। इस छापने तक उसमें 2150 से अधिक लोग सम्मिलित हो चुके थे। बहुत रोचक हैं उसके परिणाम।
मेरे ख्याल से हिन्दी पाठक वर्ग को फॉर्ब्स इण्डिया लाइफ के लेख की जानकारी देना बहुत बड़े कॉपीराइट उलंघन का मामला नहीं है; अत: उस सर्वे के पत्रिका में छपे परिणाम मैं प्रस्तुत कर रहा हूं –