भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
8 जून: प्रेमसागर की पदयात्रा में किसान की पीड़ा, बिटिया की प्रसादी और माफी गांव की कथा
अजय पाल जी के घर से थोड़ा देर से निकले प्रेमसागर। “हम तो तैयार थे भईया, पर उन लोगों का दरवाजा थोड़ा देर से खुला। बिना कह कर बिदा लिये चलना मुझे ठीक नहीं जान पड़ा।”
दिन में कई नदियां पार कीं। बागदी और जामनेर नदियों के नाम दिये प्रेमसागर ने। इनके पाट काफी चौड़े थे और पानी भी खूब था उनमें। उसके अलावा छोटी छोटी कई नदियां थीं। कुछ पर पुल थे और कुछ के बांस के पुल बह चुके थे। पानी कम था तो चल कर पार करना कठिन न था। एक नदी को पार करने के बाद प्रेमसागर ने वीडियोकॉल से नर्मदा तट का हाल बताया। नाम बताया गोंदी नदी। गोंदी नर्मदा संगम स्थान था। गोंदी पर ह्यूमपाइप का पुल रहा होगा जो आधा बह चुका था। एक पाइप से दूसरे पर कूद लगाई होगी। पानी कम था तो पार करने की खुशी प्रेमसागर को थी। पदयात्री को इस तरह के छोटे छोटे एडवेंचर प्रसन्नता देते हैं। और उनसे दो चार किलोमीटर अतिरिक्त चलना बच भी जाता है।
एक दुकान पर बैठी लड़की ने बाबाजी को रोका। उसने कहा आज उसका जन्मदिन है। प्रसादी बन रही है। ग्रहण कर ही जायें। “भईया, बिटिया का आग्रह कैसे न मानता मैं। एक घंटा वहीं रुका।” जगह थी निकुंज आश्रम ब्रजवाड़ा। बिटिया का भंडारा वहीं हुआ था।
वहीं एक परिक्रमावासी की पुरानी डायरी पड़ी थी। हर दिन का तीन चार लाइन में विवरण लिखा था और उसके पास आश्रम की सील भी लगाई हुई थी। सील लगवाने का कारण समझ में नहीं आता, अगर यात्री कोई प्रायोजित यात्रा न कर रहा हो। प्रेमसागर की थ्योरी है कि कुछ परिकम्मावासी किसी और के संकल्प की पूर्ति के लिये यात्रा करते हैं और उसका प्रमाण इस तरह रखते हैं। यह जरूर है कि प्रायोजित परिकम्मा बहुत कम ही होती होगी। यूं मुझे लगता है कि प्रायोजक और पदयात्री दोनो ही इसका प्रचार करने से बचते होंगे।
परिकम्मा वासी की डायरी का एक पन्ना
इस संदर्भ में मुझे अमृतलाल वेगड़ जी की पुस्तक का अंश याद हो आया। उन्होने लिखा था – रास्ते में एक सन्यासी की कुटी मिली। मैने सन्यासी से पूछा – कैसे कैसे लोग नर्मदा की परिक्रमा करते हैं?” तो कहने लगे “अधिकतर लोग भीख मांगने के लिये ही परकम्मा उठाते हैं। इससे पेट भी भर जाता है और पैर भी पुज जाते हैं।” (सौंदर्य की नदी नर्मदा, पेज 2-3)
एक जगह मूंग की फसल का ढेर लगा दिखा। “भईया मूंग यहां खूब होती है, पर किसान खुश नहीं है। उनका कहना है कि इस साल सरकार खरीद नहीं रही। बाजार में दाम अच्छे नहीं मिल रहे। वे याद करते हैं कि शिवराज सिंह मामा का टाइम अच्छा था। सरकार किसान की फिकर ज्यादा करती थी।”
रात ढलने पर ही ठिकाने पंहुचे प्रेम बाबाजी। कोई जगह है करौंदमाफी। वहां आश्रम है – करुणाधाम आश्रम। बोर्ड पर लिखा है – अन्नक्षेत्र और परिक्रमावासियों के ठहरने की उत्तम व्यवस्था। आठ दस कर्मचारी भी हैं आश्रम में। स्थानीय ही हैं। मैने प्रेमसागर से कहा कि उनसे पता करें करौंद के आगे माफी क्यूं लगा है। गांव को कभी मालगुजारी/लगान में माफी दी गई होगी? शायद मुगल काल में? पर उन स्थानीय लोगों में से कोई बता नहीं पाया। सिर्फ यही बताया कि उनके दादा-परदादा के जमाने से नाम यही है – करौंदमाफी।
करौंदमाफी
नेमावर पार कर आये हैं प्रेमसागर। नेमावर या नर्मदा तट के दूसरी ओर हंडिया को नर्मदा माई का नाभि स्थल कहा जाता है। प्रेमसागर ने उत्तर तट की पदयात्रा का आधा पार कर लिया है। पूरी परिक्रमा होने में अगर कोई संशय रहा हो, तो अब दूर हो जाता है। नर्मदा माई की कृपा से पदयात्रा अच्छी ही चल रही है। और उनके साथ मेरी मनयात्रा भी खूब मौज में है।
बकिया, प्रेमसागर हलुआ पूड़ी छान रहे हैं और मैं अपनी कैलोरी गिनता घासफूस पर जिंदा हूं। मुझे अगर पच्चीस किलोमीटर रोज चलना आता तो इस युग का अमृतलाल वेगड़ बनता। अभी तो प्रेमसागर के जरीये देख सुन रहा हूं नर्मदा माई की हलचल को!
प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes
धर्मेश्वर महादेव जंगल के किनारे पर हैं। सवेरे वहां से चल कर तीन किलोमीटर आगे तक जंगल मिला। तब तक मोबाइल का सिगनल भी गायब रहा। जंगल पार होने के बाद सहमता-सकुचाता वह वापस आया। प्रेमसागर की लाइव लोकेशन फिर झलकने लगी।
बाबाजी के भेजे दो चित्र मुझे इस तीन किलोमीटर के प्रतीक से लगे। एक में जंगल से गुजरता रास्ता है और दूसरे में रास्ते के साथ लगा वन विभाग का बोर्ड है, जिसमें बघेरा जैसा कोई जीव बना है। उसके साथ लिखा है – कृपया धीरे चलें 30(किलोमीटर), वन्य प्राणी विचरण क्षेत्र। … शायद धीरे चल कर आप वन्यजीवों की इज्जत करते लगते होंगे। तेज चाल चलना उनपर रौब गांठने जैसा होता होगा।
जंगल खतम हुआ तो बारिश होने लगी। तेज हुई, और फिर और तेज। आसरा तलाशते प्रेमसागर को देवीलाल जी ने देखा। उनके पोता-पोती दौड़ कर अपने घर बुला लाये। वहां केवल बैठने भर को जगह नहीं मिली, देवीलाल जी ने आदर सत्कार किया। उनकी बहू ने हलवा बनाया और साथ में चाय भी। प्रेमसागर ने लगभग चहकते हुये मुझे विवरण दिया मानो कोई लाटरी जीत कर आये हों। वैसे नर्मदा परिक्रमा में पग पग पर लाटरी लगने का ही भाव आता है प्रेमसागर में।
देवीलाल जी का परिवार भरापूरा लगता है। खेती करने वाले लोग। उनके दो बेटे हैं। चित्र में उनके बेटे और पीछे खड़ी उनकी पत्नियां नजर आती हैं। अब यह पता नहीं चलता कि किस पत्नी ने हलुआ बनाया। परम्परा अनुसार तो देवरानी को बनाना चाहिये। ये भी हो सकता है दोनो बहनें हों। बहने होने पर देवरानी-जेठाने के रिश्ते में एक लेयर और चढ़ जाती है।
प्रेमसागर के साथ यही दिक्कत है कि रास्ते में लोगों के साथ मिलते उनके सम्बंधों-रिश्तों की परतें नहीं टटोलते। वे मुझे सीधा सपाट ट्रेवलॉग लिखने का मसाला तो देते हैं पर सम्बंधों के माधुर्य से अनछुये से निकल जाते हैं।
देवीलाल जी का परिवार
आगे एक नदी का संगम है नर्मदा जी से। नक्शे में नाम है दतौनी (Datauni) पर प्रेमसागर लिखते हैं धतूरी या धतूरा। अब जो हो, उस संगम की खासियत यह है कि उसके सामने नर्मदा के बीच एक टापू है। टापू खूब बड़ा है और उसपर एक किला है। यह जोगा जाट का बनाया 900 साल पुराना किला है। बताते हैं भोगा और जोगा दो भाई थे। चंदेलों ने इन्हें निमाड़ की जागीर दे दी थी। पर जिंदगी तो लड़ने भिड़ने में ही गई। बड़े भाई भोगा का देहांत एक युद्ध में हुआ। छोटे भाई ने किला बनवाया। यह किला शस्त्रागार का काम करता रहा।
जोगा की पत्नी गुर्जरी थी और नर्मदा माई की भक्त थी। रोज नर्मदा स्नान को आती थी। एक रानी रूपमती ने मांडू का रेवाकुंड बनवाया और दूसरी जोगा जाट की पत्नी आज नर्मदा के बीच किले से याद आ रही है।
लगता है आज भी इस इलाके में जाट बहुत हैं। दतौनी नदी पर पुल बनाने का काम चल रहा है। लोगों के आने जाने के लिये नदी में ह्यूम पाइप डाल कर रास्ता बना दिया गया है। पुल का काम करने वाले लोगों और आने जाने वालों के लिये कपिल जाट जी ने एक दुकान खोल रखी है। वहीं दोपहर का भोजन-प्रसादी बना कर कपिल जी ने प्रेमबाबा को अर्पित की। बाबाजी की आज दूसरी लाटरी लगी। “भईया कपिल जाट जी बिना परसादी लिये जाने ही नहीं दिये!”
आगे मजे मजे में चलते बाबाजी फोन पर मुझसे बतियाते रहे। “भईया तमखन से गुजर रहा हूं। बच्चा लोग देखते हैं तो दौड़ कर आते हैं। नर्मदे हर बोलते हैं और फिर कहते हैं टॉफी दो! पचास रुपये रोज की टाफी लग जाती है। टॉफी के बहाने बच्चों में नर्मदा माई के प्रति श्रद्धा के संस्कार तो जागते ही होंगे। परिक्रमावासियों से भी अपनापा उपजता होगा।”
“भईया राजस्थान के लोग मिले। ऊंट पर अपना सारा सामान लादे, बाल बच्चा समेत आ रहे हैं। यहां मूंग खूब होती है। उसकी बुआई कटाई करते हैं। चार पांच महीने के फसल सीजन के बाद मेहनत का रोकड़ा और कुछ मूंग ले कर वापस अपने देस लौटते हैं।”
इस क्षेत्र में लोग बड़े पैमाने पर मूंग उगा रहे हैं। उसके लिये श्रमिक दूर दूर से आते हैं। भरतपुर से, डूंगरपुर से… खेत में ही झोंपड़ी – मचान बना कर तीन चार महीना रहते हैं।
मैने पूछा – किसी घुमंतू किसान से बात की? पर प्रेमसागर रुकते कम ही हैं बातचीत को। उनके माध्यम से जानकारी तो मिलती है, कथायें नहीं। कथा के लिये मुझे समांतर मनयात्रा करनी पड़ती है।
$$ज्ञानकथ्य – अथ रामलाल देवासी आख्यान
रामलाल देवासी मिला मुझे नर्मदा के पास एक खेत के किनारे। ऊँट की रस्सी थामे खड़ा था। पास में उसका बेटा — नाम रॉबिन — बाल झटकता घूम रहा था। बेटी रवीना कुछ दूर मचान पर बैठी थी। नाम चौंकाने वाले लगे। पूछने पर रामलाल की आँखें मुस्कुराईं — “मेरी घरवाली को पुराने नाम पसंद नहीं हैं। कहती है जमाना बदल गया है।”
रामलाल डूंगरपुर से चला था। कई दिन की ऊँट-यात्रा करके नर्मदा के इस किनारे पर आकर टिका है। उसी के गाँव के कुछ लोग यहां पीढ़ियों से बस गए हैं — नेमावर के पास। “हमारे बाबा के साथी लोग रहे होंगे जो यहीं बस गये,” उसने बताया। “अब वे लोग खेत वाले बन गए हैं, ट्रैक्टर चलाते हैं, हम अब भी ऊँट से आते हैं, मेहनत करते हैं।”
बच्चों की पढ़ाई का ज़िक्र आया। बोला — “मेरी घरवाली कहती है, कुछ तो सीखें। भेरूसिंह जी प्रधान हैं, उनके भरोसे स्कूल भेज देती है। कापी-किताब मिल जाती है।”
मैं सोचता रह गया — ये बच्चे क्या बनेंगे? अगली पीढ़ी के घुमंतू किसान? मूंग की खेती में मेहनत मजूरी करेंगे या किसी और रास्ते चलेंगे? रॉबिन की चाल में थोड़ा टीवी वाला नायक था, पर आँखों में खुला आसमान भी था।
मुझे प्रेमसागर के भेजे गये चित्रों में रामलाल देवासी के लिये एक प्रतिनिधि चित्र भी मिल जाता है। अपनी मनयात्रा के लिये वही दे रहा हूं।
रामलाल देवासी
ये घुमंतू लोग पीढ़ियों से एक और तरह की नर्मदायात्रा करते हैं। डूंगरपुर से बरास्ते बांसवाड़ा, रतलाम, उज्जैन और देवास यहां नर्मदा किनारे की श्रम यात्रा। वे चार-पांच सौ किलोमीटर ऊंट पर और पैदल चलते हैं। और चौमासा नर्मदा किनारे बिता वापस लौटते हैं। परिक्रमावासी की यात्रा श्रद्धा यात्रा है तो रामलाल देवासी जैसे श्रम यात्रा करते हैं। अलग अलग तरह की नर्मदा यात्रायें!
लेखकीय निवेदन: पाठकों के लिये $$ चिन्हित अनुच्छेद ‘ज्ञानकथ्य’ हैं — जहाँ ज्ञानदत्त पाण्डेय पात्रों, स्थलों या अनुभवों पर स्वतंत्र रूप से दृष्टिपात करता है। इन ‘ज्ञानकथ्यों’ को कथाशैली में प्रस्तुत किया गया है – जैसे “अथ रामलाल देवासी आख्यान”, जो पौराणिक कथाओं के छंद में एक विनम्र प्रयोग है।
प्रेमसागर की पदयात्रा पर लौटा जाये। शाम के समय तेज चाल से चले बाबाजी। नेमावर पंहुचने में अभी समय लगेगा – घंटा डेढ़ घंटा। पर अचानक बच्चे दौड़ते आये और उन्हें घेर लिया। बोला – “दादाजी बुला रहे हैं। बोले कि बाबाजी को पकड़ लाओ। आज यहीं रोकेंगे।”
“दादाजी बुला रहे हैं। बोले कि बाबाजी को पकड़ लाओ। आज यहीं रोकेंगे।”
आज बाबाजी की ट्रिपल लॉटरी लगने का दिन था। अजय पाल जी का घर परिक्रमा मार्ग पर ही था। उन्होने प्रेमसागर को जाते देखा तो बुला लिया। रात का डेरा उन्हीं के घर रहेगा।
अजय पाल करीब अस्सी साल के हैं। भरापूरा परिवार है। किसान हैं। मजबूत आदमी। सिवाय कान से कम सुनाई देने लगा है, उसके अलावा पूरी तरह स्वस्थ हैं। वे भी राजस्थान से यहां आ कर बसे हैं। उनके पुरखे – उनसे दो पीढ़ी पहले, जोधपुर से यहां आये और नर्मदा की उपजाऊ जमीन और जल उपलब्धि ने यहीं थाम लिया।
“भईया, हमें तो ये सब देख आचर्ज (आश्चर्य) होता है। हमारी तरफ ऐसे लोग नहीं हैं। और भईया यहां ये लोग अपने खेत पर भी अगर बाइक से जाते हैं तो किनारे बाइक खड़ी कर चाभी उसी में छोड़ देते हैं। ऐसा हमारी तरफ तो कभी देखा सुना नहीं।”
जगह का नाम है राजोर। अजय पाल जी के यहां आतिथ्य भरपूर था। मैने पूछा नहीं कि क्या क्या खाये रात की प्रसादी में; पर जो भी रहा होगा, बढ़िया ही रहा होगा।
बकिया, प्रेमसागर हलुआ पूड़ी छान रहे हैं और मैं अपनी कैलोरी गिनता घासफूस पर जिंदा हूं। मुझे अगर पच्चीस किलोमीटर रोज चलना आता तो इस युग का अमृतलाल वेगड़ बनता। अभी तो प्रेमसागर के जरीये देख सुन रहा हूं नर्मदा माई को!
प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes
रतनपुर से एक ऊर्ध्व देशांतर रेखा नक्शे पर खींचें तो नर्मदा के दूसरी ओर वह पुनासा से गुजरेगी। पुनासा गांव के पास ही बना है नर्मदानगर, जो इंदिरासागर बांध परियोजना का मुख्यालय है। कुल मिला कर प्रेमसागर रतनिया के आगे जो यात्रा कर रहे हैं वह बांध बनने के पहले का परिक्रमा मार्ग नहीं रहा होगा। आगे साठ सत्तर किलोमीटर की परिक्रमा नर्मदा के जल के सहारे नहीं; मूल स्वरूप वाली नर्मदा की स्मृति और श्रद्धा के सहारे चलती है। एक परिकम्मावासी कहता है – इंदिरा सागर में माँ नर्मदा की साँसें धीमी हो गईं, पर हृदय अभी भी स्पंदित है।
इंदिरासागर में डूब का क्षेत्र
रतनिया से दातौनी नदी के नर्मदा संगम तक की सत्तर किलोमीटर की यात्रा मूलत: डूब प्रभावित परिवर्तित यात्रा मार्ग है। यह उत्तर तट पर है। दक्षिण तट पर तो इंदिरासागर की डूब का विस्तार और व्यापक होगा।
मैं प्रेमसागर की इस पदयात्रा के संजय की भूमिका के फेर में न पड़ता तो इंदिरासागर के इलाके को चिमटी से खोल खोल कर देखने का कोई प्रयास शायद जिंदगी भर न करता। प्रेमसागर खुद तो शायद अब भी न कर रहे हों। उनके जिम्मे तो मात्र चलना है। मन की यात्रा तो मेरे जिम्मे है।
वेगड़ जी की नर्मदा यात्रा नर्मदा परिक्रमा नहीं थी। अत: उसमें भले ही सौंदर्य और लालित्य तो बहुत है नर्मदा का, पर परिक्रमा वाला अनुशासन नहीं है। उनको पढ़ने से यह नहीं पता चलता कि बांध के पहले परिक्रमावासी कहां कहां से गुजरते थे। मेरे ख्याल से वे आगे की सत्तर किलोमीटर की यात्रा करने की बजाय नर्मदा तट से चिपके चलते होंगे। बेचारे पदयात्री अब छिटक गये हैं नर्मदा माई से। मानो इंदिरासागर के 1000 मेगावाट बिजली का करेंट उन्हें दूर फैंक गया हो।
मेरी पत्नीजी कहती हैं – अब ट्रेवलॉग लिखने के फेर में इंदिरासागर परियोजना का इतिहास-भूगोल छानोगे? उतना अभी तो नहीं करूंगा, पर ढेर सारी सामग्री टटोल जरूर ली है। भविष्य में अगर इस ट्रेवलॉग पर ब्लॉग से ज्यादा गम्भीर लेखन करना हुआ तो वह सब अध्ययन करना होगा।
मैं बांधों का पूरा नक्शा देखता हूं तो एक आस्तिक के नाते ठेस जरूर लगती है; पर वैसे विहंगम दृष्टि से नर्मदा अब भी कमोबेश पहले वाली नर्मदा ही लगती हैं। सरदार सरोवर, इंदिरा सागर और बरगी का इलाका आंत में गांठ जैसे लगते हैं। उनसे नर्मदा जी का सौंदर्य कुछ कम जरूर हुआ है पर वे गंगाजी की तरह आईसीयू की मरीज सी नहीं लगती हैं।
यूं, डूब के आकलन पर कितना समय लगाया जाये? जब पाँवों का रास्ता डूब जाए, तो श्रद्धा नई पगडंडी बना ही देती है।
खैर, अपनी कहने की बजाय प्रेमसागर की मूल यात्रा पर लौटा जाये।
रतनिया में प्रेमसागर आश्रम में रुकना चाहये थे, पर आश्रम का ताला बंद था। मायूसी जरूर हुई। भोजन मिलने की आस नहीं बची तो आश्रम के एक खुले हॉल में चादर बिछा कर सोने की सोची। चादर बिछाने पर एक महिला वहां आई। उन्होने कहा कि बाबाजी, आप मेरे घर आइये और रात वहीं गुजारिये। महिला गरीब थी और उनका घर भी साधारण था, पक्का जरूर था। इसी आश्रम में वे (शक्ति सिंह सोलंकी की माता जी) परिचारिका का काम करती हैं। भोजन बनाती हैं। उन्होने ही रात में भोजन बना कर खिलाया।
गांव में ही टेट्या मामा की प्रतिमा दिखी। सम्भवत: गांव आदिवासी भील-भिलाल लोगों का है। भिलाला भी सोलंकी जातिनाम लगाते हैं। महिला सम्भवत: आदिवासी रही होंगी। प्रेमसागर जी को शबरी माई का प्रसाद मिला! नर्मदे हर। सवेरे जब चलते हुये प्रेमसागर ने उनका चित्र खींचा तो उसमें उनके हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़े हुये थे।
टांट्या मामा की प्रतिमा, शक्ति सिंह सोलंकी की माता जी और उनका घर
रतनपुर के आगे घना जंगल था। शुरुआत में सवेरे चरवाहे और उनके गाय बैल जंगल में चरने के लिये जाते दीखे। “भईया, सभी जानवरों के गले में बड़ी बड़ी घंटियां बंधी थी। कोई जंगली जानवर उनकी आवाज से पास नहीं आते हैं इन आवाजों से। मुझे बताया कि जंगल में सब किसिम के जानवर हैं। बाघ, शेर, चीता… सब कोई। भईया सारिस्का में तो हमने केवल बाघ देखे थे यहां सब हैं। कभी कभी मगरमच्छ भी सैर के लिये चले आते हैं, ऐसा मुझे बताया।”
प्रेमसागर ने खुद कोई जंगली जानवर नहीं देखा, पर उनकी उपस्थिति का अहसास जरूर हुआ। रास्ते में कई जगह हड्डियां बिखरी दिखीं। जैसे किसी शिकार को किसी जंगली जानवर ने खाया हो। कई जगह रास्ते के साइड में बोर्ड लगे दिखे, जिसमें लोगों को सावधान रहने को कहा गया था।
बोर्डों पर लिखी जानकारी के अनुसार यह लक्कड़-कोट है; दण्डक वन। एक जगह लक्कड़ कोट की झाड़ी भी लिखा है। बाद में प्रेमसागर ने बताया – भईया, जितने भी जंगल मैने पार किये हैं, उनसे यह सबसे ज्यादा सुनसान और खतरनाक था।”
लक्कडकोट का दंडकवन
पूरे रास्ते में दो जगह लोगों ने पानी पिलाया। एक जगह तो नौजवान वाहन से आ कर पिलाये और बोले – बाबाजी, हम तो वाहन से यात्रा कर रहे हैंं, फिर भी हमें बारबार प्यास लग रही है। आप तो पैदल चल रहे हैं।” नौजवान और उनके साथ के लोगों ने फोटो भी खिंचाई।
“एक जगह भईया मैं थोड़ा दौड़ कर चल रहा था तो दूर एक झोंपड़ी से दो लड़कियों ने आवाज दे कर रोका और आ कर पानी पिलाया। वे पानी की जरूरत महसूस करती थीं।”
पानी पिलाने वाले
“भईया आज अजूबा देखा। एक बैलगाड़ी में तीन बैल लगे थे। दो एक तरफ और एक दूसरी तरफ। बैलगाड़ी वाले ने कहा कि अगर चौथा बैल होता तो वह भी जोत सकता था। चार बैलों के साथ कितना भी बोझा हो, ले कर चल सकता हूं – गाड़ीवान ने बताया।”
जो चित्र भेजे हैं अब तक यात्रा में प्रेमसागर ने, उससे लगता है मध्यप्रदेश में बैल का उपयोग अभी भी हो रहा है। “ट्रेक्टर हैं, पर छोटे वाले हैं भईया।” … आश्चर्य नहीं कि इस इलाके की आबोहवा साफ सुथरी है।
तीन बैल वाली बैलगाड़ी
शाम सात बजे प्रेमसागर धर्मेश्वर महादेव मंदिर में पंहुचे। बड़ा मंदिर है यह। किंवदंती है कि यह धर्मराज युधिष्ठिर ने बनवाया था। इंदिरासागर की डूब में आ गया था यह मंदिर। मुआवजे से सन 2002 में पहले की जगह से कुछ पीछे इसका पुनर्निमाण हुआ है। कोई मारवाड़ी सज्जन ने इसकी पहल की – प्रेमसागर को बताया गया। एक दूसरा मंदिर – बालेश्वर महादेव भी था, पर उसका पुनर्निमाण अभी तक नहीं हो सका है।
आज एकादशी है। प्रेमसागर फलाहार ही ग्रहण करते हैं। आश्रम के भंडारी हैं बदाम जी, उन्होने बाबाजी के अनुरोध को माना और उन्हें आलू मिला कर तीना के चावल की खीर बना कर खिलाई। “भईया तीना का चावल फलहारी माना जाता है। अगली बार आपसे मिलने आऊंगा तो अपने गांव से ले कर आऊंगा। तीना के चावल के साथ बगला की दाल भी फलहारी होती है। तीना के चावल और बगला की दाल की खिचड़ी बनाई जा सकती है फलाहार में।” …… फोन पर प्रेमसागर से संवाद चलता ही रहता है। उन्होने बताया कि बगला की दाल कुछ कुछ चने की दाल जैसी होती है देखने में।
फलाहार के लिये लोगों ने विकल्प तलाश लिये हैं – पौष्टिकता भी हो और स्वाद भी।
बाबाजी ने प्रसन्न हो कर बदाम जी की फोटो भी भेजी है!
धर्मेश्वर महादेव मंदिर। दांये नीचे हैं बदाम जी, भंडारी
प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes