चांडोद से तिलकवाड़ा


चांडोद ओरसांग, सरस्वती (गुप्त) और नर्मदा का त्रिवेणी संगम है। उत्तर तट पर जो बीस बाइस प्रमुख नदियां नर्मदा में आ कर मिलती हैं, उनमें से ओरसांग भी एक है। ओरसांग मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले से अरावली की दक्षिणी पहाड़ियों से निकलती है और गुजरात में छोटा उदयपुर से होते हुये चांडोद में नर्मदा में विलीन होते तक 135किमी की यात्रा करती है। ओरसांग बालू खनन के लिये प्रमुख नदी है। मैं इसके बारे में पढ़ने पर सोचता था कि रेत होने के कारण नदी पूरी तरह गंजी हो गई होगी, पर वैसा था नहीं। चांडोद में नर्मदा से मिलते समय उसमें नर्मदा में अर्पण करने को पर्याप्त जल था।

पर्याप्त? अपने में पर्याप्त क्या मायने रखता है? अपने बचपन में गंगा या किसी अन्य नदी में जितनी जलराशि की कल्पना किया करता था, उसके मुकाबले तो ओरसांग में भी कम जल है और नर्मदा में भी। चित्र में देखने पर दोनो नदियां प्रौढ़ा लगती हैं। पचास-साठ साल की महिला की तरह, जिसके सिर में कई लटें सफेद हो गई हों। मुझे लगता है ये नदियां बहती भी धीरे धीरे होंगी इस जगह पर। अमरकंटक से ॐकारेश्वर तक नर्मदा में जो अल्हड़पन होता है, वह यहां कहां! यहां तो नर्मदा बहुत कुछ गंगाजी जैसी लगती हैं चित्रों में।

चांडोद का त्रिवेणी संगम – बांये ओरसांग और दांये नर्मदा। सरस्वती तो गुप्र रूम में हैं।

चांडोद के आगे वडोदरा जिला से निकल कर यात्री नर्मदा जिले में आता है। नर्मदा जिला बहुत कुछ उत्तरप्रदेश के भदोही जैसा है। छोटा। दो जिलों को छील कर बनाया हुआ। यह 1997 में बना। भरूच के तीन और वडोदरा के एक तालुका ले कर यह बना। नर्मदा किनारे का तिलकवाड़ा तालुका पहले वडोदरा जिले में था। एक और तालुका बनाया गया गरुडेश्वर।

शूलपाणेश्वर की झाड़ी, जो पहले परिक्रमावासियों की लूट के लिये कुख्यात था, इसी नर्मदा जिले में है, पर नर्मदा नदी के दक्षिणी भाग में। वह इलाका अमरकंटक से लौटानी की परिक्रमा यात्रा में पड़ेगा।

नर्मदा जिला गुजरात का पिछ्ड़ा जिला है। शायद सबसे गरीब। पर फिर भी लोग परिक्रमावासियों की सेवा में कोई कोर कसर नहीं रखते। प्रेमसागर को रास्ते में मुसलमानों का एक गांव मिला। वहां बाबाजी का पानी खत्म हो गया था। किसी मुसलमान से पानी स्वीकारना तो धर्म विरुद्ध था! गांव वाले भी यह समझते थे। सो वे बिसलेरी वाली बोतल ले कर आये। यह भी कहा कि बाबाजी, आप यह न समझें कि हम मुसलमान बोतल पर थूक कर आपका धरम भ्रष्ट कर रहे होंगे। एक नल से उन्होने बोतल को बाहर से अच्छे से धो कर बाबाजी को दिया। … गर्मी ज्यादा नहीं पर उमस बहुत थी। दिन में चलने के कारण बाबाजी पंद्रह बीस लीटर पानी पी जा रहे हैं पर सारा पानी पसीने में निकल जाता है। “भईया पेशाब कम ही होता है।”

नर्मदा जिले में परिक्रमा मार्ग पगड़ण्डी वाला है।

पूरा रास्ता कच्ची पगड़ण्डी वाला था और बीच बीच में नेटवर्क भी नहीं काम करता। उसके अलावा एक गांव से दूसरा आठ दस किमी दूर है। रास्ते में लोग कम ही होते हैं। परिक्रमावासी भी ज्यादा नहीं निकलते। वे ज्यादातर साल दो साल के प्रॉजेक्ट पर निकले होते हैं और इस गर्मी-उमस में कहीं आराम कर रहे होते हैं। सोलो यात्रा करने वाले को ज्यादा ही सतर्क रहना होता है। बाबाजी रास्ता भूल गये। एक अधेड़ आदमी और उनकी पोती करीब दो किमी उनके साथ चल कर उन्हें वापस सही रास्ते पर लाये।

बाबाजी रास्ता भूल गये। एक अधेड़ आदमी और उनकी पोती करीब दो किमी उनके साथ चल कर उन्हें वापस सही रास्ते पर लाये।

तिलकवाड़ा पंहुचते हुये एक जगह कुछ गरीब परदेसी खुले में लकड़ियां इस्तेमाल कर अपना भोजन बना रहे थे। बहुत सुंदर दृष्य था। गरीबी का सौंदर्य!

कुछ गरीब परदेसी खुले में लकड़ियां इस्तेमाल कर अपना भोजन बना रहे थे।

तिलकवाड़ा प्राचीन जगह है। यहां का मारुति मंदिर बनवाना शिवाजी से प्रारम्भ किया था। प्रेमसागर को वहीं रुकने को स्थान मिला। रात का भोजन खुले में परोसा गया। बाबाजी के साथ एक और कोई भी बैठे थे भोजन करने। चित्र मैने ध्यान से देखा – भोजन तो अच्छा ही लग रहा था। नर्मदा माई और हनुमान जी खूब ख्याल रख रहे हैं परिक्रमावासी का।

तिलकवाड़ा से रामपुरा तक नर्मदा उत्तरवाहिनी हो जाती हैं। इस उत्तरवाहिनी नर्मदा की पंचकोशी परिक्रमा लोग चैत्र मास में करते हैं। एक दिन में पूरी करते हैं परिक्रमा। तिलकवाड़ा में नर्मदा का पाट कुछ छोटा है। यहां एक पॉन्टून पुल बनता है यात्रा के लिये। रामपुरा में लोग फेरी से पार करते हैं नर्मदा। जो वीडियो मैने देखे, उनमें दूर दूर से आये लोग हैं और सभी उत्साह से ओतप्रोत हैं। कहा जाता है कि उत्तरवाहिनी नर्मदा की 22किमी की यह परिक्रमा पूरी परिक्रमा का फल देती है। प्रेमसागर इस मिनी परिक्रमा के बारे में नहीं जानते थे। वे पता करने को कह कर रात्रि विश्राम में गये।

रात का भोजन मारुति मंदिर में।

प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes

नर्मदाप्रेम नर्मदे हर!!


नर्मदा पदयात्रा – सुरासामळ से चांडोद


सोलह मई को भरूच के नीलकंठ महादेव मंदिर से प्रेमसागर ने परिक्रमा पदयात्रा प्रारम्भ की थी। उन्नीस मई को चार दिन पूरे हो गये। लम्बी यात्रा में पहला कदम महत्वपूर्ण होता है। यह चार दिन की यात्रा पहला कदम ही मानी जाये। अगर यात्रा पटरी से उतरनी होती तो इस बीच उतर गई होती। अब तो लगता है नर्मदामाई संकल्प पूरा करा ही देंगी!

बहुत अर्से से पैदल चलना नहीं हो रहा था उनका तो शरीर रवां होने में समय ले रहा है। पहले दिन तो दोपहर में ही यात्रा शुरू हुई थी। उस दिन 10-12 किमी चलना हुआ। उसके बाद तीन दिन औसत 20किमी प्रतिदिन चल रहे हैं प्रेमसागर। धीरे धीरे यह नित्य चलना तीस किमी प्रतिदिन के औसत पर आयेगा, ऐसा उनका सोचना है।

चौथे दिन सुरासामळ से चांडोद तक की यात्रा 21किमी की रही। सवेरे थोड़ी यात्रा के बाद साढ़े छ बजे प्रेमसागर शायद सिनोर के नर्मदा तट पर थे। वहां नर्मदा के जल में झिलमिलाते सूर्योदय दर्शन किये और चित्र भी खींचे। “भईया आज आपके मनमाफिक नर्मदामाई का फोटो ले पाया हूं।” – प्रेमसागर ने मुझे फोटो भेजते समय फोन कर कहा।

आगे चलने पर मैने उन्हें नर्मदा तीरे चलने की बजाय सीधे चांडोद पंहुचने को कहा। उस आधार पर वे चले भी, पर मोटाफोफलीया में उनका इंटरनेट गायब हो गया। नक्शे में गूगल ने ठीक अपडेट नहीं दिया तो उनका ट्रैक बदल गया। वे गलत सड़क पर एक सवा किमी चले होंगे कि मेरी नजर उनके मार्ग पर पड़ी। बोलने पर वे वापस लौटे। फिर मोटा फोफलीया में ही दोपहर का विश्राम किया। वहीं मंदिर के पुजारी थे प्रीतम जी। उनकी पत्नीजी ने भोजन भी कराया। नर्मदा माई की कृपा ही तो है कि कदम कदम पर प्रीतम जी की तरह के लोग मिल रहे हैं। और वो भी तो अच्छे भईया थे जिन्होने अपनी मोटर साइकिल पर बिठा प्रेमसागर को वापस सही जगह ला कर छोड़ा।

प्रीतम जी ने बताया – कोई अतिथि रात बाहर बजे भी आ जाये तो उसके लिये भोजन बनाने में उनकी धर्मपत्नी को आलस नहीं लगता। नर्मदा माई के किनारे रहने वालों की प्रवृत्ति ही ऐसी बनी हुई है – शताब्दियों, सहस्त्राब्दियों से!

आज रास्ते में प्रेमसागर ने खेती पर नजर डाली। केला, गन्ना, कपास और एरण्डी की खेती नजर आई। लोगों से बातचीत में उन्हें खेती करने का एक अलग तरीका मिला। जिनके खेत हैं वे जुताई बुआई कर पौधे निकलने पर खेत बाहरी लोगों को देते हैं। वे लीज पर लेने वाले मचान बना कर आगे खेती की देखभाल करते हैं और मण्डी में उपज सही हिसाब से बेचते हैं। इससे किसान और इन लीज पर लेने वालों – दोनो को खूब मुनाफा होता है। किसान तो बताता है कि उसे चार गुना लाभ मिल रहा है। लीज पर लेने वाले राजस्थान, भावनगर, जूनागढ़, अलीराजपुर के लोग हैं। उनके पास अपनी जमीन नहीं है। वे इस तरह मेहनत कर कमाते हैं। प्रेमसागर की जानकारी में जो गैप होंगे, वे तो जानकार लोग ही भर पायेंगे। पर बकौल प्रेमसागर, इस तरह साझे की खेती फायदा तो दे रही है सब को।

एक जगह चाय के लिये रुकने पर मैने प्रेमसागर को सुझाव दिया – वे सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही पदयात्रा करें। शाम समय से किसी ठिकाने पर पंहुच कर मुझे आठ बजे तक यात्रा के बारे में बता दिया करें। अभी तो वे रात आठ नौ बजे तक ही पंहुच रहे हैं किसी मुकाम पर। यह सुझाव प्रेमसागर ने आज मान लिया। कब तक ऐसा चलेगा, नर्मदा माई जानें। सब कुछ उनके विधान से ही चल रहा है! प्रेमसागर भी उन्ही से चल रहे हैं, मैं भी उसी से प्रेरित लिख रहा हूं और प्रीतम जी और उनकी पत्नीजी जैसे लोग उन्ही से प्रेरित सेवा कर रहे हैं। सेवा के आदानप्रदान से ही यात्रा उद्भूत हो रही है!

प्रेमसागर कहते हैं कि उनका मोबाइल अच्छी तरह काम नहीं कर रहा। तब जरूरी हो जाता है कि वे अपनी आंखों से ज्यादा सूक्ष्मता से देखें, याद रखें और उसे लिखने के लिये अवसर मिलते ही बतायें। आगे यात्रा लम्बी है, यह अनुशासन बहुत काम आयेगा।

शाम के समय एक जगह घर लौटते पशु दीखे। चरवाहे भी साथ साथ रहे होंगे। प्रेमसागर में चित्र लेने का बढ़िया सेंस है – या विकसित हो गया है!

आज 22-23 किमी चल कर प्रेमसागर चांडोद पंहुचे। यह स्थान नर्मदा, ओरसांग और सरस्वती का त्रिवेणी संगम है। छोटा उदयपुर से निकली ओरसांग नदी यहां नर्मदाजी में मिलती है। और प्रयागराज की त्रिवेणी की तरह सरस्वती नदी तो अंत: सलिला हैं ही। रात आठ बजे प्रेमसागर ने जब मुझसे बात की तो वे नौदुर्गा माता के मंदिर में थे। वहीं परिक्रमावासी ठहरते हैं। इस जगह के बारे में देखने बताने का काम वे कल सवेरे मंदिर से रवाना होने के बाद करेंगे।

प्रेमसागर जी की सहायता करने के लिये उनका यूपीआई एड्रेस है – prem199@ptyes

#नर्मदाप्रेम नर्मदे हर!!

नर्मदा तट पर सूर्योदय
प्रीतम जी के साथ प्रेमसागर
रास्ते में केले की खेती
चांडोद के कुछ पहले घर को लौटते ये पशु नजर आये।

नर्मदा परिक्रमा – पैर और शब्द की यात्रायें


कल प्रेमसागर की नर्मदा परिक्रमा का पहला दिन था। जेठ का महीना है और धरती गर्म है। मानसून अभी महीना डेढ़ महीना दूर है। चलना कठिन होगा ही और आगे जब मानसून आ जायेगा तब दूसरे तरह की तकलीफ बढ़ेगी। पर जिद्दी हैं प्रेमसागर। कॉन्ट्रेरियन सोच वाले। अभी निकल लिये हैं परिक्रमा को।

भरूच में दिन में ताप पैंतीस डिग्री था। पर उमस ज्यादा थी। मौसम वाला बता रहा था – फीलिंग लाइक 44डिग्रीज। चौवालीस डिग्री के ताप में कौन निकलता है?

मैं इंटरनेट खंगालता हूं। लोग अक्तूबर या फरवरी-मार्च में भी निकलते हैं तो पूरी तैयारी से। उनके पास ओढ़ने बिछाने को होता है। पानी का इंतजाम होता है। पूजा की सामग्री होती है। टॉर्च होती है, थाली-कटोरी-लोटा होता है। मच्छरकी क्रीम होती है और दवायें भी होती हैं। प्रेमसागर के पास यह सब नहीं है। मेरे घर से दहिमन का एक लाठी कटवाये थे वे पर मेरे यहां से निकलते समय वह यहीं भूल गये। अब उनके पास कोई लाठी भी नहीं है। परिक्रमा के पथ पर कई स्थानों पर बंदरों का आतंक है। एक लाठी तो होनी ही चाहिये थी।

फिर, सामान न भी हो तो खरीदा जा सकता है। पर उसके लिये पैसे चाहियें। प्रेमसागर के पास तो वह भी कुछ खास नहीं होगा। खेत की सरसों की फसल बेच कर निकले हैं। पर एक दो बोरा सरसों से 2600किमी की पदयात्रा कैसे हो सकती है? प्रेमसागर वह सब कैल्क्यूलेशन नहीं करते! … अजीब आदमी है यह!


ऐसा नहीं है कि परिक्रमा केवल प्रेमसागर ही कर रहे हैं। वे तो केवल पैरों से यात्रा कर रहे हैं। मैं शब्दों-विचारों से यात्रा कर रहा हूं। मुझे भी यात्रा सामग्री तलाशने, तराशने और उनको शब्द देने में उतना ही समय देना होता है जितना प्रेमसागर को चलने में। मैं लैपटॉप/की-बोर्ड पर बैठे थक जाता हूं तो ब्रिस्क चाल से चल भी लेता हूं। कल मैने तय किया कि प्रेमसागर नर्मदा परिक्रमा में 2600किमी चलेंगे तो मैं भी पूरी यात्रा के दौरान 260किमी तो चल ही लूंगा। वह भी एक तरह का पदयात्रानुशासन होगा। उसके अलावा नर्मदा तीरे तीरे मैं भी वर्चुअल यात्रा कर लूंगा। मुझे जितना अनुभव होगा, वह प्रेमसागर के अनुभव जैसा भले ही न हो, पर होगा उतना ही महत्वपूर्ण!

वर्चुअल यात्रा, यात्रा की एक अलग सी विधा है जो शायद मेरे द्वारा ही परिमार्जित की जा रही है।


कल दोपहर दो बजे के बाद प्रेमसागर से नीलकंठेश्वर महादेव से नर्मदा परिक्रमा प्रारम्भ की। लोग परिक्रमा प्रारम्भ करते समय नीलकंठ मंदिर में संकल्प पूजा करते हैं। या किसी और मंदिर में भी कर लेते हों। प्रेमसागर ने की या नहीं मैने पूछा नहीं। यूं इतना बड़ा ऑफ-सीजन यात्रा का साहस बिना संकल्प आता ही नहीं। बहरहाल वे निकल पड़े और मेरा अनुमान था कि वे दस – इग्यारह किमी चल पायेंगे आधी शिफ्ट में। वही हुआ। रात साढ़े आठ बजे वे शुक्लतीर्थ पंहुचे। रास्ते में एक मोबाइल वाले सज्जन से अपना मोबाइल रिपेयर कराया। मोबाइल वाले बंधु ने मुफ्त में ही काम कर दिया और बाबाजी को एक नेकबैंड भी दे दिया – फ्री में! सोलो यात्रा करते समय भगवन्नाम श्रवण का इंतजाम भी कर दिया उन सज्जन ने। उनका नाम है अशोक सिंह। अशोक राजस्थान के रहने वाले हैं और भरूच में दुकान खोले हैं।

प्रेमसागर बे मौसम के परक्कमावासी हैं। उन्हें शायद रात विश्राम का ठिकाना खोजने में दिक्कत हो रही होगी। नर्मदामाई ने उनकी सहायता को शैलेश भाई और उनके बेटे को भेज दिया। वे प्रेमसागर को रास्ते में मिले। उन्हें प्रसाद खिलाया और नर्मदा मंदिर में ला कर उनके सोने का इंतजाम भी किया।

मैं एक चित्र अशोक सिंह और दूसरा शैलेश जी और उनके बेटे का साथ लगा रहा हूं।


शुक्लतीर्थ, जहां नर्मदा मंदिर में प्रेमसागर ने विश्राम किया, नर्मदा किनारे ही है। वहां से कुछ ही दूर नर्मदा तट पर सनसेट प्वॉइंट है। उस जगह के गूगल मैप पर अनेक चित्र नत्थी हैं। बहुत ही आकर्षक हैं वे सूर्यास्त के चित्र! प्रेमसागर खुद तो वह सूर्यास्त नहीं देखेंगे। सवेरे तो वे निकल लेंगे यात्रा पर। पर एक एक सन-सेट चित्र को मैने ध्यान से देखा। वही वर्चुअल यात्रा है!

शुक्लतीर्थ एक ग्रामपंचायत है। यहां कार्तिक पूर्णिमा पर एक पांच दिवसीय मेला लगता है। लाखों लोग आते हैं मेले में। सन 2013 की टाइम्स ऑफ इण्डिया की खबर के अनुसार उस साल डेढ़-दो लाख लोग आये थे। अब तो संख्या और भी होती होगी।

शुक्लतीर्थ की एक मॉइथॉलॉजिकल कथा भी है। नर्मदा के किनारे तपस्वी परेशान थे नर्मदा जी के बार बार उनके आश्रम को जलमग्न कर देने से। उन्होने विष्णु भगवान का आवाहन किया तो भगवान आये और नदी का मार्ग बदल दिया। नक्शे में नर्मदा का मार्ग बदला भी दिखता है। जो हुआ रहा हो; हर छोटे बड़े काम के लिये भगवान आया करते थे। अब वैसा कहां होता है?! अब शायद वैसे तपस्वी भी न रहे।

शुक्लतीर्थ में मैने विष्णु मंदिर तलाशने की कोशिश की। वह दिखा नहीं। शुक्लेश्वर महादेव का मंदिर जरूर दिखा।

पहले दिन की पदयात्रा

आगे प्रेमसागर जी की पदयात्रा और अपनी वर्चुअल यात्रा – दोनो की उपयुक्त जुगलबंदी करने का तरीका निकालूंगा। अभी तो जो बन पड़ा, लिख दिया। लेखन धीरे धीरे मांजा जायेगा। नर्मदे हर!

#नर्मदाप्रेम #NarmadaPrem

(एक चित्र अशोक सिंह और दूसरा शैलेश जी और उनके बेटे का संलग्न है। तीसरे चित्र में सफेद कपड़े में प्रेमसागर हैं और नीलकंठेश्वर मंदिर उनके पीछे है।)


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