ई-पण्डित को धन्यवाद – विण्डोज़ लाइव राइटर के लिये



विण्डोज़ लाइव राइटर ब्लॉगिंग के लिये बेहतरीन औजार है। आप इसे यहां से डाउनलोड कर सकते हैं। मुझे इसका पता ई-पण्डित (श्रीश – मेरे प्रिय ब्लॉगर) की पोस्ट से चला था। यह पोस्ट श्रीश ने 2 जनवरी को छापी थी पर मुझे बहुत बाद में पता चली। इस औजार का प्रयोग करते मुझे एक महीना हो गया है।

लाइव राइटर डाउनलोड कर इंस्टाल करने के बाद मैने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मेरी लगभग सभी पोस्टें विण्डोज़ लाइव राइटर पर लिखी जाती हैं और वे मेरे ब्लॉग पर कैसे लगेंगी – यह जानने के लिये उनका प्रिव्यू भी देख लेता हूं।

यह प्रोग्राम अब बीटा 3 स्टेज में है। मैने लेटेस्ट स्टेज़ इंस्टाल कर लिया है। बहुत अच्छा है। जो लोग इण्टरनेट प्रयोग में डाउनलोड किये गये मेगाबाइट्स को लेकर चिंतित रहते हैं पर अपनी पोस्ट की उत्कृष्टता के प्रति भी सजग होते हैं, उनके लिये तो यह और भी महत्वपूर्ण है।

संजय बेंगानी के सुझाव पर:
निश्चय ही विण्डोज़ लाइव राइटर के डेवलपर बन्धु – वे जो भी, जहाँ भी हों, अतिशय धन्यवाद के पात्र हैं। यह सम्पूर्ण मानवता की सेवा है।

एक पंथ दो काज – मैं श्रीश को धन्यवाद भी दे रहा हूं और विण्डोज़ लाइव राइटर की सिफारिश भी कर रहा हूं। इस लाइव राइटर के वेब-लेआउट (जिसमें आप पोस्ट रचते हैं) की खिड़की ऐसी लगती है:

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और लाइव राइटर में प्रिव्यू ऐसा दीखता है:

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ऑफ लाइन लिखने, प्रिव्यू देखने और सरलता से अपने ब्लॉग पर पब्लिश करने के लिये नायाब सहायता है यह। ट्राई कर देखिये (अगर पहले से ही प्रयोग नहीं कर रहे हैं, तो)!


डिवाइडर पर सोने वाला कहाँ सोयेगा?



कुछ दिन पहले मैने पोस्ट लिखी थी उस व्यक्ति के बारे में जो रात में भरे यातायात के बीच राणाप्रताप चौराहे पर रोड-डिवाइडर पर सो रहा था। उसकी गहरी नींद और अपनी नींद की गोली गटकने पर भी न आने वाली नींद की चर्चा मैने उस पोस्ट में की थी। आज सवेरे दफ्तर जाते समय राणाप्रताप चौराहे पर मैने अपने वाहन को रुकवाया। जिस डिवाइडर पर वह व्यक्ति रात में सो रहा था, उसे और ऊंचा कर उसमें क्यारीनुमा स्थान बना दिया गया था। उसमें मिट्टी डाल कर सौन्दर्यीकरण हेतु पौधे लगेंगे। अब तो उसपर कोई सो नहीं सकता।

आप जरा नीचे दोनो चित्र देखें। सामने राणाप्रताप की प्रतिमा है। दाईं ओर उर्ध्व जेब्रा धारियों वाला डिवाइडर पहले का है। उसके ऊपर ईंट की जुड़ाई से ऊंचाई बढ़ाई गयी है। जुड़ाई की गयी ईंटों के बीच नाली जैसा है जिसमें पौधे लगेंगे। ईंटों का मलबा अभी पास में पड़ा भी है। अब वह वहां सोने वाला कैसे सोयेगा?    

Rana1 Rana2
     राणाप्रताप की प्रतिमा लाल अर्ध-वृत्त में घेरी गयी है।

ऐसा ही हाल वर्षा ऋतु में बेघरबार लोगों के सोने का होता है – आज एक ठौर, कल वह गायब। मुझे तो उस डिवाइडर पर सोने वाले की फिक्र हो रही है।

यह भी सम्भव है मित्रों कि वह बेसुध सोने वाला व्यक्ति कोई और ठिकाना पाकर फिर भी गहरी नींद सोये। और हम उसकी सोने की जगह की फोटो ले, ब्लॉग पर छाप, जगह छिन जाने की तकलीफ से अपनी नींद न आने का एक और निमित्त या बहाना स्थापित कर लें।

उसे तो आखिर नींद आनी ही है और हमें तो आखिर नींद नहीं ही आनी है! :-)  


क्या बतायें – सिनेमा का ‘स’ तक नहीं आता



संजीत त्रिपाठी ने संजय लीला भंसाली पर लिंक दिये हैं – मेरी उनके प्रति अज्ञानता दूर करने को। पर उन लिंकों पर जाने पर और भी संकुचन हो रहा है। संजय भंसाली बड़े स्तरीय फिल्म निर्देशक लगते हैं। जो व्यक्ति पूरे आत्मविश्वास के साथ कहे कि ‘वह सिनेमा के माध्यम से अपनी व्यक्तिगत छटपटाहट व्यक्त कर रहा है और उसकी फिल्मों के माध्यम से विश्व उसके जीवन को समझ या वाद-विवाद कर सकता है’ वह हल्का-फुल्का नहीं हो सकता। और हमारा यह हाल है कि कल आलोक पुराणिक के एक कमेण्ट के माध्यम से पहली बार संजय का नाम सुना! उसी पर मैने ब्लिंक (अनभिज्ञता में भकुआ लगना) किया – संजय लीला भंसाली कौन हैं? और फिर मित्रवत सदाशय व्यवहार के नाते संजीत ने लिंक दिये।

संजय लीला भंसाली
(चित्र विकीपेडिया से) Sanjay
“संजय लीला भंसाली की ‘सांवरिया’ की पहली झलक अलसभोर की तरह है, जिसमें कुछ दिखता है और बहुत-सा छिपा रहता है। आप अंग्रेज कवि कोलरिज की अधूरी कविता ‘कुबला खान’ की तरह अलिखित का अनुमान लगाइए। एक अच्छा फिल्मकार दर्शक की कल्पनाशीलता को जगा देता है। अगले प्रोमो में उजाला अधिक होगा और सूर्योदय की रक्तिम आभा होगी। धीरे-धीरे हर प्रोमो दिन के पहर-दर-पहर उजागर करेगा फिल्म को। दीपावली पर प्रदर्शन के समय सूर्य अपनी पूरी आब पर होगा।”
जयप्रकाश चौकसे दैनिक भास्कर में.

और संजय लीला भंसाली की फिल्में – ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘ब्लैक’, ‘सावरिया’ अथवा ‘खामोशी – द म्युजिकल’ का नाम भी कल ही सुना। ‘देवदास’ का नाम इसलिये ज्ञात है कि ऐश्वर्य राय के विषय में पढ़ते हुये और फोटो के माध्यम से पता चल गया था।

कल से ही यह लग रहा है कि कम से कम ब्लॉगरी करने के लिये तो अपनी समझ और अनुभव का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। और फिल्म ज्ञान उसमें मुख्य तत्व है; जिसका विस्तार आवश्यक है। ऐसा नहीं कि पहले मैने यह महसूस नहीं किया। दस जून को मैने एक पोस्ट ‘फिल्म ज्ञान पर क्रैश कोर्स की जरूरत’ नामक शीर्षक से लिखी थी। पर उस समय सब मजे-मजे में लिखा था। प्रतिबद्धता नहीं थी। अब लगता है – सिनेमा का डमीज़ वाला कोर्स होना ही चाहिये।

इस विषय में पहला काम किया है कि दो ठीक से लगने वाले मूवी/बॉलीवुड ब्लॉग्स की फीड सब्स्क्राइब कर ली है। कुछ तो पढ़ा जायेगा इस तरह फिल्मों पर।

कुछ दिनों बाद हिन्दी सिनेमा के नाम पर मैं ब्लिंक नहीं करूंगा! पक्का।


मदर (माँ मीरा – श्री अरविन्द आश्रम) के पास एक रुक्ष साधक आया। वह अपनी साधना में इतना रम गया था कि सुन्दरता, भावुकता, स्नेह और दुख जैसी अनुभूतियों से विरत हो गया था। मदर ने उसे काफी समय तक रोमाण्टिक उपन्यासों को पढ़ने को कहा। वह आश्चर्य में पढ़ गया पर उसने आदेश का पालन किया। कालांतर में उसकी रुक्षता समाप्त हो पायी।

जीवन (हम जैसे सामान्य जनों का छोड़ दें); साधक का भी हो तो भी बैलेंस मांगता है। और वह बैलेंस उसे मिलना चाहिये!


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