सुधा शुक्ल हमारे घर मिलने आईं। पंड़ाने (पांडेय लोगों के घरों का समूह) के दीपू की बुआ हैं वे। मेरी पत्नीजी की हमउम्र, जन्म 1959–60 के आसपास। करीब एक किलोमीटर पैदल चलकर आई थीं। वे और मेरी पत्नीजी बचपन की सखियाँ हैं। उस समय सखियाँ अग्नि को साक्षी मानकर बनती थीं—जैसे राम और सुग्रीव। सुधाContinue reading “सुधा जी की शादी और पालकी का जमाना”
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पत्थर के ईंख पेरने वाले कोल्हू का समाजशास्त्र
टुन्नू पंडित बताते जा रहे थे – “मिर्जापुर के आगे विंध्याचल की पहाड़ी से निकलता था पत्थर और वहीं बनते थे बड़े, आठ फुट के कोल्हू। इतनी बड़ी चीज जो वहां बनती थी, पूरे इलाके में – गोरखपुर देवरिया तक दिखती है। बीच में कहीं कोई पहाड़ नहीं जहां वे बन सकें।” विंध्य की पहाड़ियोंContinue reading “पत्थर के ईंख पेरने वाले कोल्हू का समाजशास्त्र “
टुन्नू पंडित सुनाते हैं पुराने समय का हाल
कंकड़हिया सड़क – गंगा के कंकरों को जगह जगह गड्ढे भरता और धुरमुस से पीटता आदमी गांव से लालानगर तक जाता था। दिन भर के काम पर उसे चार आना मजूरी मिला करती थी। फागुन से पहले सड़क यूं रिपेयर होती थी और उसके बाद गुड़ का बैलगाड़ियों का काफिला निकला करता था तिलंगा से। Continue reading “टुन्नू पंडित सुनाते हैं पुराने समय का हाल”
