सोन, बाणगंगा, सोहागपुर और शहडोल


13 सितम्बर 2021 की यात्रा के बाद:

शाम पांच बजे प्रेमसागर पांड़े शहडोल के बिचारपुर वन रेस्ट हाउस में पंहुच गये थे। वे सवेरे साढ़े चार बजे ही निकल लिये थे जयसिंह नगर के डेरा से। गूगल मैप में रास्ता करीब पचास किमी का है, पर टूरिस्ट लोकेशन देखते देखते आये तो वे, उनकी फ्रेजॉलॉजी के अनुसार “मोटामोटी” 60 किमी चले।

रास्ते में घना जंगल मिला। किसी वन्य जीव से पाला नहीं पड़ा। घना वन निकलने के बाद सवेरे गाय गोरू चरने के लिये जाते दिखे। उसके अलावा रास्ते में मंदिर थे, सोन नदी थी। सोन यहां वास्तव में नदी ही हैं – शोणभद्र नद नहीं। छोटा सा पाट दिखता है उनका।

सोन नदी

प्रेम सागर के इस इलाके के भ्रमण के संदर्भ में मुझे एक नर्मदा घाटी पर सन 1963 का लिखा एक ट्रेवलॉग हाथ लगा। एक सज्जन नेत्तूर पी दामोदरन 1963 में शहडोल आये थे। वे यहां केंद्र सरकार के विशेष प्रतिनिधि के रूप में आदिवासियों पर कोई अध्ययन कर रहे थे और उस संदर्भ में नर्मदीय क्षेत्र में बहुत घूमे थे। दामोदरन जी 1952-57 के दौरान संसद सदस्य रह चुके थे।

वे यहाँ शहडोल में जिले में सोन नदी में आयी बाढ़ में फंस गये थे। उसी दौरान उन्होने अपने नर्मदा भ्रमण के मेमॉयर्स लिखे जो मलयालम मनोरमा में ‘नर्मदायुदे नत्तिल (The land of Narmada)’ के नाम से छपे। … छोटी सी दिखती सोन नदी इतनी भयंकर बाढ़ भी ला सकती हैं कि पूरा शहडोल का इलाका उससे कट सकता है और नेत्तूर पी दामोदरन उसमें फंस कर एक यात्रा विवरण लिख सकते हैं – ऐसा प्रेमसागर जी के चित्र की नदी से नहीं लगता। पर सोन नदी या शोणभद्र नद – हैं ही ऐसी नदी जिनको देख कर मन में इज्जत या भय का भाव आये। सोन और नर्मदा दोनो अमरकण्टक से निकली नदियाँ हैं। पर दोनो की प्रकृति में बहुत अंतर है। प्रेम सागर का अगर साथ रहा तो नर्मदा के साथ अमरकण्टक से ॐकारेश्वर तक चलना हो सकता है और उनके बारे में बहुत कुछ प्रेमसागर के चित्रों, उनके कथनों, विभिन्न यात्रा विवरणों से सामने आयेगा। सोन का तो शायद यही एक चित्र ब्लॉग पर आये!

और जो यह सोन का चित्र प्रेमसागर ने भेजा है, वही वह स्थान है जहां नेत्तूर पी दामोदरन ने बाढ़ में एक ट्रक जिसमें उसके कर्मी बैठे थे, अपने सामने जलमग्न होते देखा था। उस घटना के बारे में वे लिखते हैं कि वे शहडोल के कलेक्टर से मिल रहे थे कि कलेक्टर ने उनसे कहा कि “अगर वे यहां से घण्टे भर में नहीं निकल जाते तो यहीं फंसे रह जायेंगे। यहां मौसम साफ है पर प्रयागराजघाट और अमरकण्टक में तेज वर्षा हो रही है। बाढ़ का पानी वहां से यहां आने में दो घण्टा लेता है। तब यह नदी यहां बाढ़ में आ जायेगी।”

नेत्तूर पी दामोदरन अपना सामान बांध जब तक सोन नदी – 10 मील दूर – पंहुचे, तब तक बाढ़ आ चुकी थी। ट्रक जलमग्न होते देखा उन्होने। एक सप्ताह वे शहडोल में फंसे रहे और बैठे ठाले अपने भ्रमण के मेमॉयर्स लिखने प्रारम्भ किये। वे मलयालम मनोरमा में छपे और कालांतर में दस साल बाद केरल सरकार की ग्राण्ट/सहायता से उनका पुस्तकाकार प्रकाशन हुआ।

प्रेम सागर, 12 ज्योतिर्लिंग कांवरिया जी पर पोस्टें –
पहली दस पोस्टेंपोस्ट-1 पोस्ट-2 पोस्ट-3 पोस्ट-4 पोस्ट-5 पोस्ट-6 पोस्ट-7 पोस्ट-8 पोस्ट-9 पोस्ट-10
11. रोक लिया आज धूप बारिश और पैर के दर्द ने
12. प्रेम सागर की पदयात्रा से तुम क्या चाहते हो, जीडी?
13. सोन, बाणगंगा, सोहागपुर और शहडोल
14. संकल्पों की कसौटी पर जीवन कसते प्रेमसागर
15. प्रेमसागर जी को लह गया नया स्मार्टफोन!
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा

मैंने तो यह पुस्तक अमेजन किण्डल पर पढ़ी है। प्रेम सागर प्रकरण न होता तो मैं न तो शहडोल पर अपना ध्यान केंद्रित करता और न यह पुस्तक खंगालता। 😆

सोन नदी के बाद प्रेमसागर बाणगंगा सैलानी स्थल से हो कर गुजरे। उसके कुछ चित्र उन्होने दिये हैं। बाणगंगा में एक तालाब है। पानी है उसमें पर बहुत साफ नहीं दिखता। या कहें तो गंदला है। टूरिस्ट प्लेस के हिसाब से जल को साफ करने का जो प्रयास होना चाहिये था, वह नहीं है। लोग और टूरिज्म वाले दोनो उत्तरदायी लगते हैं।

बाणगंगा के कुछ दृश्य उक्त कोलाज में हैं। साधू जी कोई त्यागी महराज हैं, जिनका राम मंदिर वहां है। बाणगंगा में चबूतरों पर परित्यक्त/खण्डित मूर्तियाँ लगी हैं। उनके कई चित्र प्रेम सागर जी ने भेजे हैं। उनका कहना है कि समय के साथ ही वे सैण्ड-स्टोन की मूर्तियाँ खण्डित हुई होंगी। किसी विधर्मी विध्वंस की बात तो उन्हें किसी ने नहीं सुनाई।

बाणगंगा के बारे में उन्हें किंवदंति बताई गयी कि अर्जुन ने प्यासी गाय को पानी देने के लिये एक बाण धरती में मारा था और उससे गंगा की जलधारा फूटी जिससे गाय की प्यास दूर हुई। सम्भवत: जलाशय उसी ‘गंगा’ का प्रतीक है।

अर्जुन या पाण्डव यहां कैसे आये? इसके बारे में कहा जाता है कि शहडोल ही मत्स्य प्रदेश है – राजा विराट का राज्य। पाण्डवों ने वनवास के तेरहवें वर्ष में यहीं अज्ञातवास किया था। विकीपीडिया में भी ऐसा लिखा है। नेत्तूर पी दामोदरन की उक्त पुस्तक में भी ऐसा वर्णन है। मैं अब तक यह मानता था कि मत्स्य देश राजस्थान के अलवर या जयपुर का इलाका था। पर शहडोल के संदर्भ में यह जानकारी मेरे लिये नयी है।

राम सीता, कृष्ण या पाण्डव ऐसे चरित्र हैं, जिनपर भारत का हर इलाका अपना कुछ न कुछ दावा करना चाहता है। पूरा उत्तरावर्त और दक्षिणावर्त, पूरा हिमालय प्रदेश और सिंधु या उसके पार अफगानिस्तान का क्षेत्र भी किसी न किसी प्रकार से इन महाकाव्य कालीन स्थलों और घटनाओं से स्वयम को जोड़ता है। शायद यही भारत को एक सूत्र में पिरोने की कड़ी है और एक कारण है कि मेरे जैसा आदमी वृहत्तर भारत के स्वप्न देखता है – गंधार से म्यान्मार तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक!

प्रेम सागर जी ने बताया कि वन विभाग के रेंजर साहब (त्रिपाठी जी) कल उन्हें वह स्थान भी दिखाने वाले हैं जहां अज्ञातवास में जाते समय पाण्डवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के पेड़ पर छिपा कर रखे थे। अर्थात प्रेम सागर कल भी शहडोल और उसके आसपास अपना समय गुजारने जा रहे हैं। अगली पोस्ट में पाण्डव चर्चा सम्भव है!

शहडोल के पहले ही पड़ता है सोहागपुर। या सोहागपुर का वर्तमान नाम शहडोल है। सोहागपुर कालाचूरि राजाओं की राजधानी थी। यहां हजारवीं शती का विराटेश्वर मंदिर है। वह आर्कियॉलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के संरक्षण में है। उस मंदिर का मत्स्यदेश के राजा विराट से कोई लेनादेना है? इस बारे में जानकारी मुझे नहीं मिली। प्रेम सागर ने पूरे मंदिर के घूम घूम कर चित्र लिये। बड़ी बारीकी से। उनका मोबाइल कैमरा अगर ठीक होता तो चित्र बहुत ही अच्छे आते! पर जो आये हैं वे भी खराब नहीं है!

विराटेश्वर मंदिर, सोहागपुर, शहडोल

मंदिर के स्थापत्य पर शहडोल जिले के विकीपेडिया पेज या आर्कियालॉजिकल सर्वे के पट्ट से ले कर जानकारी ब्लॉग पर डाली जा सकती है। पार वह इतनी सुलभ है कि पाठक उन्हें स्वतन्त्र रूप से देख सकते हैं। मैं तो यहां प्रेमसागर के कुछ चित्रों का स्लाइड शो प्रस्तुत कर देता हूं। मंदिरों की स्थापत्य कला पर मेरी समझ अगर परिष्कृत होती तो कुछ लिखता भी। कहीं कहीं उल्लेख है कि मंदिर थोड़ा झुक रहा है। प्रेमसागर ने भी बताया कि अगर ध्यान से देखा जाये तो झुकाव नजर आता है। अन्यथा बहुत ज्यादा नहीं है।

प्रेम सागर जब दत्तचित्त विराटेश्वर मंदिर के चित्र खींचने में लगे थे, तो उन्हें आर्कियॉलॉजिकल सर्वे के एक कर्मी, कोई अवधेश मिश्रा जी ने रोका कि चित्र खींचने की मनाही है। पर तब तक वे पर्याप्त चित्र ले चुके थे।

14 सितम्बर सवेरे 9 बजे:

आज प्रेमसागर शहडोल के बिचारपुर रेस्टहाउस में ही रुके हैं। आसपास के कुछ स्थान दिखाने के लिये रेंजर साहब (त्रिपाठी जी) उन्हें ले जायेंगे। पाण्डवों का अस्त्र शस्त्र रखने का स्थान है और एक इग्यारहवीं सदी का प्राचीन दुर्गामंदिर है। इसके अलावा दो तीन और भी स्थान हैं।

कल प्रेमसागर निकलेंगे अमरकण्टक के लिये। कल अनूपपुर तक पंहुचेंगे; परसों राजेंद्रग्राम और अगले दिन अमरकण्टक! यह यात्रा पथ तय करने में मुख्य रोल वन विभाग के लोगों का है। इतनी बड़ी सहूलियत प्रेमसागर को मिल गयी है। उस सब के लिये वे मुझे, प्रवीण जी को और वन विभाग वालों को धन्यवाद देते हैं। “और महादेव की कृपा तो हई है!” यह जरूर जोड़ते हैं।

सब कुछ महादेव की इच्छानुसार ही हो रहा है। यह पोस्ट भी महादेव की प्रेरणा से ही है! नहीं?


प्रेम सागर की पदयात्रा से तुम क्या चाहते हो, जीडी?


(रोज इग्यारह बजे प्रेम सागर कांवरिया को ले कर ब्लॉग अपडेट करना एक अजब सा फितूर बन गया है। उस बारे में मेरा यह मोनोलॉग। इसे एक बैठेठाले का सोचना ले कर पढ़ लिया जाये! 😆 )


तुम रोज लिख कर, प्रेमसागर से पूछ कर, उनके कहे को रिकार्ड कर और बाद में उसे कई बार सुन कर उसमें जो अर्थ भरने का यत्न कर रहे हो; उसका कोई खास लाभ है? तुम इस एक्सरसाइज की निरर्थकता से थक जाओगे; पर प्रेमसागर की धार्मिक आस्था, श्रद्धा और जुनून को मैच नहीं कर पाओगे।

तुम्हारे पास कुछ शब्द बुनने की तकनीक आ गयी है जीडी। बारह-चौदह साल से वह प्रयास कर रहे हो, तो कुछ तो आ ही गयी है। लोगों ने टिप्पणियों में कुछ प्रशंसात्मक कहा तो तुम उसे सत्य के आसपास मान लिये। और उसी के बल पर इतने साल से उलूल जुलूल लिखते रहे। यह सोशल मीडिया है ही वाहियात चीज। जो लाइक-धर्म का पालन कर देती है। ज्यादा हुआ तो प्रशंसात्मक टिप्पणी कर देती है। वह भी एक बार्टर होता है। अहो रूपम, अहो ध्वनि वाला मामला। और उससे तुम फूल गये हो।

प्रेम सागर पाण्डेय

तुम्हे ये प्रेम सागर पांड़े मिल गये। उनके पास जुनून है। द्वादश ज्योतोर्लिंग पैदल यात्रा करने का। वह भी अनवरत करते चले जाने का। उनका ध्येय विशुद्ध धर्म और श्रद्धा (और जिद?) के पाले में आता है। तुमने उसमें एक अवसर नहीं देखा तो क्या देखा? तुम केवल यह चाहते हो कि यात्रा प्रेमसागर करें और उसके बल पर ट्रेवलॉग तुम रचो। पर यह उतना आसान नहीं, जितना तुमने सोचा था। प्रेम सागार के पैर, अपनी श्रद्धा अपने जुनून, अपने धर्म से चल रहे हैं। उनके चक्षु अपनी शंकर भक्ति से देख रहे हैं और उनका मस्तिष्क उनको आगे बढ़ने या रुकने का निर्देश धर्म की अपनी समझ से दे रहा है। प्रेमसागर को तुमसे कुछ भी, चवन्नी भर भी लेना देना नहीं। तुम्हारा ट्रेवलॉग किस स्तर का बने, उसका कण्टेण्ट क्या हो, उसका कलेवर कितना आकर्षक हो, उसके चित्र कितने जीवंत हों, इससे प्रेम सागर को क्या? उनके पास तो अमरकण्टक जाने का लक्ष्य है। वहां से जल उठाना है। एक कांवर का इंतजाम करना है – वह जो मजबूत और हल्की हो और उसे ले कर दूसरे से तीसरे…आठवें, दसवें, बारहवें ज्योतिर्लिंग तक जा शिव जी की पिण्डी पर अर्पित करना है।

अमृतलाल वेगड़ की कोलाज और स्केच पुस्तक। यह मुझे अनूप शुक्ल ने दी थी।

यात्रा के सौंदर्य और अनुभूतियों का ट्रेवलॉग और शंकर जी की पिण्डी पर जल चढ़ाना दो अलग अलग कृत्य हैं और पहला दूसरे पर चड्डी गांठ कर (piggybacking कर) सम्पन्न नहीं हो सकता। तुमने करीब दो सप्ताह से यह प्रयत्न कर देख लिया है। प्रेम सागर, अपने पैरों के घर्षण और तलवों के दर्द के बावजूद अपनी श्रद्धा में मगन चले जा रहे हैं। और तुम? तुम इसी परेशानी में पड़े हो कि ट्रेवलॉग में वह अनुभव तो दिख ही नहीं रहा, जो दिखना चाहिये। उन जगहों के लोग, वहां की वनस्पति, वहां के जीव, वहां की कथायें और यात्रा में होने वाली उत्फुल्लता उसमें नहीं आ पा रही। तुम प्रेम सागर को चित्र लेने की तकनीक बताना चाह रहे हो। सवेरे और शाम के गोल्डन ऑवर की सूरज की रोशनी का लाभ लेने को कहते हो, जिससे चित्र अच्छे आयें। चित्र को पोट्रेट मोड की बजाय लैण्डस्केप मोड में लेने को कहते हो।

पर प्रेम सागर का ध्येय चित्र लेना है ही नहीं। उनका ध्येय आगे बढ़ते चलना है। अगली गर्मी के पहले बाकी स्थान निपटा कर पहाड़ की ओर रुख करना है। उन बेचारे का मोबाइल का कैमरा भी जो है सो है।

तुम उन्हें जीवों, लोगों और बातचीत के बारे में पूछते हो, वह वे तब ही बताते हैं, जब उन्हें याद आये। उनके पास कोई नोटबुक, कोई वॉइसनोट लेने का अनुशासन है नहीं। उसकी उनको जरूरत भी नहीं है। उन्हें सिर्फ रात को रुकने की जगह चाहिये, कहीं सादा, साधारण भोजन मिल जाये बस। कहीं मोर नाचता हो, कोई खरहा गुजरे, कोई लोमड़ी सामने आये, कोई गायों का झुण्ड सरकता नजर आये तो उसे देखने को तुम जरूर रुकना चाहोगे, शायद अपनी स्क्रेप-बुक में नोट्स भी लो। पर प्रेमसागर की प्राथमिकताओं में वह नहीं होगा। उन्हें तो शंकर जी की पिण्डी पर जल अर्पण करना है… वही ध्येय है।

सौंदर्य की नदी नर्मदा की प्रति लिये मैं।

प्रेम सागर अमरकण्टक से जल ले कर ॐकारेश्वर की यात्रा करना चाहते थे तो उसमें तुम्हें वेगड़ जी की “सौंदर्य की नदी नर्मदा” का सीक्वेल नजर आया। पर प्रेम सागर जी को दो सप्ताह ट्रैक कर और दिन भर उसी के बारे में सोचते सोचते जो बन पा रहा है; उससे वह स्वप्न खण्डित हो रहा है। वैसा कुछ कहा/लिखा जा सकता है रिमोट तौर पर?! प्रेम सागर न तो रिमोट कण्ट्रोल्ड मंगल यान हैं, जिन्हें भदोही के इस गांव से कुछ करने या अनुभव करने को कहा जा सकता है। और वे अपने में अमृतलाल वेगड़ भी नहीं हैं, जिनके पास शांतिनिकेतन का अनुशासन हो, नंदलाल बोस का जिनको सानिध्य रहा हो, जो स्केचिंग, लेखन, कोलाज बनाने और चित्रकारी में पारंगत रहे हों और जिनकी लेखनी में जादू हो!

आदरणीय दिनेश कुमार शुक्ल जी फेसबुक पर टिप्पणी करते हैं – यह तो अमृतलाल वेगड़ जी के नर्मदा की पैकम्मा वाले यात्रा-संस्मरणों की याद दिला रहा है। हिंदी मे वैसे संस्मरण कम हैं। पाण्डेय जी बहुत सुन्दर। हर हर महादेव।

बाई द वे, वेगड़ जैसे तो तुम भी नहीं हो जीडी! 😀

तुम रोज लिख कर, प्रेमसागर से पूछ कर, उनके कहे को रिकार्ड कर और बाद में उसे कई बार सुन कर उसमें जो अर्थ भरने का यत्न कर रहे हो; उसका कोई खास लाभ है? तुम इस एक्सरसाइज की निरर्थकता से थक जाओगे; पर प्रेमसागर की धार्मिक आस्था, श्रद्धा और जुनून को मैच नहीं कर पाओगे।

देखो, कब तुम ऊबते हो?! कब तक करते हो अपडेट इस यात्रा ब्लॉग को!


प्रेम सागर, 12 ज्योतिर्लिंग कांवरिया जी पर पोस्टें –
पहली दस पोस्टेंपोस्ट-1 पोस्ट-2 पोस्ट-3 पोस्ट-4 पोस्ट-5 पोस्ट-6 पोस्ट-7 पोस्ट-8 पोस्ट-9 पोस्ट-10
11. रोक लिया आज धूप बारिश और पैर के दर्द ने
12. प्रेम सागर की पदयात्रा से तुम क्या चाहते हो, जीडी?
13. सोन, बाणगंगा, सोहागपुर और शहडोल
14. संकल्पों की कसौटी पर जीवन कसते प्रेमसागर
15. प्रेमसागर जी को लह गया नया स्मार्टफोन!
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा
13 सितम्बर 2021, सवेरे आठ बजे:

आज प्रेम सागर सवेरे साढ़े चार बजे निकल लिये। जय सिंह नगर रेस्टहाउस के दो किमी बाद से घना जंगल शुरू हो जाता है। उसमें बाघ, भालू और यदा कदा हाथी भी विचरते हैं। बस्ती वालों को मवेशी ले कर उधर न जाने की हिदायत दी गयी है। प्रेम सागर को सलाह दी गयी कि भोर में ही वह जंगल पार कर लें। उस समय दैनिकक्रिया के लिये लोग निकले होते हैं। थोड़ी चहल पहल होती है और उस समय वन्य जीवों से सामना होने की सम्भावना कम है।

मैंने उनसे सात बजे बात की थी तब वे उस घने जंगल को पार कर चुके थे। सकुशल! उन्होने बताया कि आगे एक चाय की दुकान दिख रही है। वहां वे चाय के लिये रुकेंगे। अभी ‘मोटामोटी’ पंद्रह किलोमीटर चल चुके हैं!

घने जंगल को पार करने पर यह शिव मंदिर दिखा उन्हें –

बाकी विवरण उनसे शाम को उनके शहडोल पंहुचने के बाद बातचीत के आधार पर पोस्ट होगा। जाइयेगा नहीं। आयेंगे आपके पास दैनिक ब्रेक के बाद! 😆


रोक लिया आज धूप बारिश और पैर के दर्द ने


11 सितम्बर 2021 की यात्रा:

अगले दिन सवेरे सवेरे पांच बजे उनसे हाल पूछा। प्रेमसागर ने बताया कि पैर में तकलीफ है। जांघ में रगड़ के कारण घाव का मामला नहीं है। बारिश में ऊबड़-खाबड़ और रपटीले रास्ते पर चलने से कहीं पैर मुड़ गया है। पांव सूजा नहीं है। केवल दर्द भर है जो एक दिन आराम से ठीक हो जायेगा।

कल प्रेम सागर को गुजरना पड़ा जंगल के बीच से। रास्ता अच्छा नहीं था। लोग भी नहीं थे। मुश्किल से पांच सात लोग दिखे होंगे पूरे रास्ते। कोई बातचीत भी नहीं हुई। बस रास्ते से गुजरते जाना हुआ। बीच में बारिश कई बार आ गयी। रुकने को कोई जगह नहीं मिली। भीगना खूब हुआ। उससे भी तबियत ढीली हो गयी। बारिश में भीगना हो, पीठ पर पिट्ठू लदा हो और साइड में बस्ता (स्लिंग बैग), रास्ता अच्छा न हो, कहीं गड्ढे हों और कहीं बारिश से रपटीला हो। उसमें चालीस पैंतालीस किमी की दूरी। ज्यादा ही मेहनत हो गयी।

और दिन सांझ होने के पहले पहले गंतव्य तक आ जाते थे प्रेम सागर। पर आज जब शाम सवा सात बजे तक भी उनका न कोई मैसेज मिला और न कोई फोन आया तो मैंने अपनी ओर से बात की। उन्होने बताया कि अभी रास्ते में ही हैं। आज रफ्तार बहुत कम रही है। आधा घण्टा और लगेगा पंहुचने में। आज चित्र भी कम लिये हैं। रेस्ट हाउस पंहुचने पर अपलोड कर देंगे। बारिश बार बार हुई तो भीगना बहुत हो गया। रुकना कई बार पड़ा। बारिश खतम होने पर धूप भी बहुत तेज होती थी। उसमें चलना भी दुष्कर था।

रास्ते में दिखा यह ग्रामीण। कोई बात नहीं हुई उससे।

उसके बाद भी उनका कोई अपलोड और फोन नहीं आया। रात साढ़े नौ बजे मैंने उनसे अपने सोने जाने के पहले बात की तो उन्होने बताया कि अभी भोजन किया है। पैर में तकलीफ है। भीगने के कारण तबियत भी ठीक नहीं लग रही। कुछ देर बाद चित्र भेज देंगे। … मैं सोने चला गया।

प्रेम सागर, 12 ज्योतिर्लिंग कांवरिया जी पर पोस्टें –
पहली दस पोस्टेंपोस्ट-1 पोस्ट-2 पोस्ट-3 पोस्ट-4 पोस्ट-5 पोस्ट-6 पोस्ट-7 पोस्ट-8 पोस्ट-9 पोस्ट-10
11. रोक लिया आज धूप बारिश और पैर के दर्द ने
12. प्रेम सागर की पदयात्रा से तुम क्या चाहते हो, जीडी?
13. सोन, बाणगंगा, सोहागपुर और शहडोल
14. संकल्पों की कसौटी पर जीवन कसते प्रेमसागर
15. प्रेमसागर जी को लह गया नया स्मार्टफोन!
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा

अगले दिन सवेरे सवेरे पांच बजे उनसे हाल पूछा। प्रेमसागर ने बताया कि पैर में तकलीफ है। जांघ में रगड़ के कारण घाव का मामला नहीं है। बारिश में ऊबड़-खाबड़ और रपटीले रास्ते पर चलने से कहीं पैर मुड़ गया है। पांव सूजा नहीं है। केवल दर्द भर है जो एक दिन आराम से ठीक हो जायेगा।

एक चित्र किसी नदी या नाले का है, पर उसमें पानी नहीं था।

यात्रा के बारे में बताया कि कुछ खास नहीं दिखा। केवल जंगल ही था। किसी से बात भी नहीं हुई। कोई नदी नहीं मिली। एक चित्र किसी नदी या नाले का है, पर उसमें पानी नहीं था। दूर दूर तक चरवाहे भी नहीं मिले या दिखे। पूरी रास्ते दूर चार पांच गांव या बस्तियाँ नजर आयीं।

रास्ता वीरान था। यहां शायद सड़क ठीक थी, पर वैसे खराब ज्यादा मिली प्रेम सागर को।

बाद में प्रेमसागर जी को पता चला कि जिस रास्ते से वे गुजर कर आये हैं, सोन नदी उसके पश्चिम में बहती है। चार पांच किलोमीटर के अंतर पर। उस ओर जो जंगल हैं, उनमें शेर, बाघ और बनैले सुअर हैं। गांव वाले कभी अपने गाय-गोरू चराते हैं तो उनपर यदाकदा हमला भी करते हैं। बाघ कभी गांव में भी आ जाता है। उस ओर हाथी नहीं हैं। वे पूरब की ओर हैं। कभी कभी गुजरते हैं पर बस्ती पर हमला नहीं करते। शायद यह इलाका हाथियों के काफिले के आनेजाने का नहीं है। कुल मिला कर वे जहां इस समय हैं, वह घने जंगल का इलाका है।

प्रेम सागर बताते हैं कि इस बीहड़ जंगल के इलाके में बड़े ऋषि महर्षि भी तपस्या करने आते थे। आज सावन माह में विशाल मेला लगता है, जिसमें बहुत लोग आते हैं। युग बदला है। अब ऋषि, महर्षि और तपस्या का स्थान मेला ने ले लिया है। मेले अगर अभी एथनिक रंग लिये होंगे इस गिरिजन प्रधान इलाके में तो जल्दी ही उनमें डीजे भी प्रवेश पायेगा।

मैं वेगड़ जी की भाषा उधार लूं तो ऋषि और तपस्या प्रकृति है, मेले संस्कृति हैं और डीजे विकृति है। समाज प्रकृति से विकृति की ओर जायेगा। उसमें प्रेमसागर जैसे लोगों की द्वादशज्योतिर्लिंग पदयात्रा का क्या स्थान रहेगा, भविष्य में?

12 सितम्बर 2021, जयसिंह नगर में विराम:

नाम है जयसिंह नगर, पर जैसा लगता है, स्थान जंगल से घिरा है। जंगलनगर! प्रेमसागर आज यहां रुके हुये हैं। उन्होने वन विभाग के लोगों के कुछ चित्र भेजे हैं। नरेंद्र कुमार डिप्टी रेंजर हैं।

नरेंद्र कुमार डिप्टी रेंजर

एक चित्र लोगों के साथ बैठ कर खिंचवाया है प्रेम जी ने। और एक चित्र में रेस्ट हाउस का डाइनिंग कक्ष है। जंगल में यह सुविधा! धन्यवाद प्रवीण जी का और उन देवाधिदेव महादेव का भी, जो इस पूरे यज्ञ के प्राइम-मूवर है!

बांये से – नरेंद्र कुमार, डिप्टी रेंजर साहब; प्रेम सागर और गोद में नरेंद्र जी का बेटा प्रणव; रामबदन यादव और राम सिंह

जंगल में मंगल – रेस्ट हाउस!

आज चूंकि प्रेमसागर रेस्ट हाउस में रेस्ट पर हैं, मुझे उनसे जंगल के बारे में, लोगों के बारे में और स्थानीय इतिहास, संस्कृति आदि के बारे में जानकारी लेने को कहा है। अभी तक उनका पैर सूजा नहीं है और दर्द बढ़ा नहीं है, इसलिये किसी फ्रेक्चर की सम्भावना तो नहीं होती, पर ऊतकों में जो दर्द होगा वह एक दिन के आराम से दूर हो जायेगा। वैसे भी प्रेमसागर जीवट के आदमी हैं। कल फिट्ट हो जायेंगे।


%d bloggers like this: