पीढ़ियों की सोच में अंतर


पिछले शनिवार को मैं लोकभारती प्रकाशन की सिविल लाइंस, इलाहाबाद की दुकान पर गया था। हिन्दी पुस्तकों का बड़ा जखीरा होता है वहां। बकौल मेरी पत्नी "मैं वहां 300 रुपये बर्बाद कर आया"। कुल 5 पुस्तकें लाया, औसत 60 रुपया प्रति पुस्तक। मेरे विचार से सस्ती और अच्छी पेपरबैक थीं। हिन्दी पुस्तकें अपेक्षाकृत सस्ती हैं।

वहां काउण्टर पर लगभग 65 वर्ष के सज्जन थे। दिनेश जी। बातचीत होने लगी। बोले – नये जवान पुस्तक की दुकान पर काम लायक नहीं हैं। डिग्री होती है पर पढ़ना-लिखना चाहते नहीं। पुस्तकों के बारे में जानकारी नहीं रखते। बस यह चाहते हैं कि शुरू में ही 5-7 हजार मिलने लगें। आते बहुत हैं, पर एम्प्लॉयेबल नहीं हैं। मैने भी अदी गोदरेज का कहा सन्दर्भित कर दिया – "जो एम्प्लॉयेबल है वह एम्प्लॉयमेण्ट पा जाता है।" उनसे हाथ मिला कर मैं वापस लौटा। दिनेशजी से बोलचाल का नफा यह हुआ कि डिस्काउण्ट 10-15 रुपये ज्यादा मिल गया।

कल श्री उपेन्द्र कुमार सिन्ह (उनके परिचय के लिये यह पोस्ट देखें) और मैं शाम को कॉफी हाउस गये। कॉफी पीते हुये कॉउण्टर पर दक्षता से काम करते मैनेजर को हम देख रहे थे। चलते समय सिंह साहब ने मैनेजर से बातचीत की। मैनेजर तीस पैंतीस की उम्र का था। नाम बताया बैजू। केरळ का निवासी। हम लोगों ने कॉफी हाउस की सामान्य जानकरी ली। बैजू को श्री सिन्ह ने कहा कि मैं कॉफी हाउस पर लिख चुका हूं। मैने अपना परिचय भी दिया बैजू को – पाण्डेय। बैजू ने समझा कि मैं शायद साम्यवादी हूं। बोले – आप कॉमरेड है! उत्तर में मैने गुनगुना कर ‘न’ इस अन्दाज में कहा कि वह व्यक्ति समझ न पाये कि मैं ‘कॉमरेड’ नहीं हूं। भ्रम बना रहे।

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कॉफी हाउस के मैनेजर कामरेड बैजू    कॉफी हाउस में गहमागहमी का माहौल

बैजू ने बताया कि इलाहाबाद का कॉफी हाउस आर्थिक रूप से थोड़ा डगमगाया हुआ है। कुछ रिटायरमेण्ट के करीब बूढ़ों ने काम की क्वालिटी पर ध्यान की बजाय अपने रिटायरमेण्ट का जुगाड़ ज्यादा किया (अभिप्राय अक्षमता और भ्रष्टाचार से था)। मैं कॉमरेड बैजू से भी हाथ मिला कर रवाना हुआ।

फिर सोचा – दिनेश जी नयी पीढ़ी को अक्षम और जल्दी पैसा बनाने को आतुर बता रहे थे। कॉमरेड बैजू पुरानी पीढ़ी को स्वार्थी और भ्रष्ट करार दे रहे थे। दोनो ही असंतुष्ट। बस मैं ही प्रसन्न था कि बैठे बिठाये बिना साम्यवादी प्रतिबद्धता के कॉमरेड बन गया। और दूसरी जगह 10-15 रुपये ज्यादा डिस्कॉउण्ट पा गया।

पीढ़ियों की सोच का अंतर आपने भी अपने अनुभवों में महसूस किया होगा।   


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

17 thoughts on “पीढ़ियों की सोच में अंतर

  1. वैसे ज्ञान जी मैं आपको एक बात बताता हूँ..जहाँ तक जेनेरेशन गैप की बात है तो मैं अपने पापाजी से सबसे ज्यादा जुडा हुआ हूँ और उन्हें अपना सबसे अच्छा मित्र भी मानता हूँ… और कम से कम ये गैप हमारे बीच तो बिलकुल नहीं है…

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  2. मुझे नही लगता है कि लोक भारती में छूट दी जाती है। क्‍योकि मैने भी करीब 550 की किताबे खरीदी थी किन्‍तु 10 रूपये की भी छूट नही दी। कहते है कि कोई आमदनी नही होती है। खैर जेनरेशान गैप की बात मै मनता हूं किन्‍तु वह इनता भी नही है। वैसे अच्‍छा काम है बात की बात की टाईम पास भी हूआ। और छूट की लूट भी की। :)

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  3. गांवों में मुहावरा चलता है. अश्वस्थामा मरो नरो वा कुंजरो. आपने काफी हाउस में इस कहावत को चरितार्थ कर दिया.

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  4. जनरेशन गैप को कितना भी दोस्ताना व्यवहार रखने पर भी नही हटाया जा सकता, वह रहेगा ही।आपकी यह और पुरानी कुछ पोस्ट पढ़ने से मालूम चलता है कि ब्लॉगिंग के कारण आपमें कुछ बदलाव आ रहें हैं तो क्यों न एक पोस्ट सिर्फ़ उसी पर हो जाए!!

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  5. समस्या एक-दूसरे के विचारों के लिए सम्मान न देने की वजह से शुरू होती है.दोनों पीढ़ियों के बीच वार्तालाप तब तक नहीं शुरू हो सकता, जब तक दोनों एक दूसरे के विचारों को सम्मान नहीं देंगे.आपने दोनों के विचारों को सुना, इसीलिये आप को लाभ हुआ.दिनेश जी से डिस्काउंट के रूप में और कामरेड से वैजू से आपको कामरेड की मान्यता देने के रूप में…..जीवन में मध्यमान का महत्व है, ये बात साबित हो गई…:-)

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