अपने हाल ही के पोस्ट में उन्होने एक पते की बात कही है। माइकल मण्डेलबाम के हवाले से उन्होने कहा है:
आने वाले अर्थव्यवस्था के सुधार के लिये, जो बहुत तनावपूर्ण होने जा रहा है, एक ऐसे राष्ट्रपति की आवश्यकता होगी जो देश को जोश, ऊर्जा और एकजुटता से इकठ्ठा रख कर नेतृत्व प्रदान करे। हमें इस अर्थव्यवस्था के खतरनाक दौर से उबरना है जब "बेबी बूमर्स" रिटायरमेण्ट के कगार पर हैं, और जिन्हें शीघ्र ही सोशल सिक्यूरिटी और अन्तत मैडीकेयर की जरूरत होगी। हम सभी सरकार को अधिक देने और कम पाने वाले हैं – तब तक, जब तक कि इस गड्ढे से उबर नहीं जाते।
… थामस एल फ्रीडमान एक बार ध्यान से सोचें तो यह सच मुंह पर तमाचा मारता प्रतीत होता है। इस समय की भोग लिप्सा के लिये भविष्य पर कर्ज का अम्बार लगा दिया गया। आज के उपभोग के लिये आने वाले कल के जंगल, नदी, तालाब और हवा ऐंठ डाले गये। भविष्य के साथ वर्तमान ने इतनी बड़ी डकैती पहले कभी नहीं की! बड़ा क्राइसियाया (crisis से बना हिन्दी शब्द) समय है। ऐसे में अच्छे नेतृत्व की जरूरत होती है, झाम से उबारने को। और जो लीडरशिप नजर आती है – वह है अपने में अफनाई हुई। कुछ इस तरह की जिसकी अप्राकृतिक आबो हवा से ग्रोथ ही रुक गयी हो। कहां है वह लीडर जी! कहां है वह संकल्प जो भविष्य के लिये सम्पदा क्रीयेट करने को प्रतिबद्ध हो। आइये सोचा जाये!
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ख़बर पल की नहीं,सामां उम्र भर का।
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फ्रीडमैन को पढ़ना और समझना बहुत महत्वपूर्ण है। दूर की सोचते हैं. दूर की कहते हैं। उन्हे देखकर पक्के तौर पर आश्वस्ति होती है, उन जैसे पत्रकार जब तक हैं, तब यह यह कहा जा सकता है कि इनसाइट्स विश्लेषण के मामले में टीवी शायद अखबार से आगे ना जा पाये।
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यह वर्तमान बहुत स्वार्थी है। इसने भूत को छोड़ा है और न भविष्य को, और वर्तमान का भी अधिकांश किन के पास है? हम जरा सोचें।
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जैसा अनूप भाई कह रहे हैँ – ययाति का भविष्य क्या हुआ था ?महाभारत वेद व्यास जी का लिखा वही है ” जो इसमेँ है वही विश्व साहित्य मेँ मिलेगा, जो वहाँ नहीँ, वो कहीँ भी नहीँ ” जब पीढी दर पीढीबदलाव आते हैँ, भोग और सँयम के मापदँड भी बदल जाते हैँ – अगर हम फ्रीडमेन जैसोँ की चेतावनी मान कर या गाँधी जैसोँ की बातेँ मानतेतब वर्तमान और भविष्य अलग स्वरुप ले पाता – ” as they say, hind sight(vision) is always 20/20 “
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“शायद सन १९१७ की रूसी बोल्शेविक क्रान्ति के बाद पहली बार इतना जबरदस्त सम्पदा हस्तांतरण हुआ है, अब! और यह हस्तान्तरण अमीर से गरीब को नहीं, वरन भविष्य की पीढ़ी से वर्तमान पीढ़ी को हुआ है।”थामस एल. फ्रीडमान ने बिल्कुल सही कहा है ! पर शायद यहाँ टिपणी में फ़ुरसतिया जी जो कह गए हैं ये ठीक वैसा ही नही है ? जब ययाति ने अगली पीढी का ध्यान नही रखा अपने मौज मजे के लिए ! तो यहाँ तो सीधे पुत्र की जवानी भी नही है ! आज के पुछल्ले महाराज ने कोशीश तो की है धनपतियों के साथ मीटिंग करके ! पर आप चुनाव हो जाने दीजिये ये भी आख़िर पुछल्ला ही साबित होगा ! जब पडौस में आग लगती है तो आपका मकान कितना ही मजबूत हो तपन तो पहुंचेगी ही ! पर चुंकी हम लोग फिरंगियों की तरह इतने आराम पसंद नही हुए हैं तो हमारी बहुसंख्य आबादी पर इसका कोई बहुत ज्यादा फर्क नही पडेगा ! ऐसा मेरा मानना है !
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मुझे यही बात हजम नहीं हो पाती कि हर बात में हम हमेशा नेतृत्व की तलाश मे क्यूँ लग जाते हैं और बस, अपने दायित्वों की इति श्री!! गेंद दूसरे पाले में फैंकी और लगे नाचने.क्या आपको नहीं लगता कि नेतृत्व से पहले आत्म संयम और आत्म अनुशासन की जरुरत आन खड़ी हुई है…कहाँ हो लीडर..कहाँ हो नेता वैसा ही है कि सब रायता फैला कर हम ईश्वर को पुकारें कि यह क्या कर रहे हो..कहाँ हो..भक्तों का ध्यान धरो!!जरा सोचियेगा..हम सब एक एक कदम उठायेंगे..बहुतेरे कदम कहलायेंगे.सब उसी तरह दुरुस्त होगा..और इस पुकार चित्कार में नेता ..लीडर क्रेडिट ले जायेंगे..इसी से वो चल रहे अब तक..और हम सब इसी तरह पुकार कर उनके चलने का मार्ग प्रशस्त करते हैं.वरना हमारे बिना उनकी क्या बिसात!!गंभीर और गहरा विषय है.पुछ्ल्ला तो खैर अपनी अहमियत हमेशा ही अपनी अहमियत बरकरार रखेगा…last person seen is on the mind…out of sight our of mind type!!!:)बढ़िया सार्थक आलेख.
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उधारबाडी का सिलसिला तो लगा ही रहता है, बाहरवालों से उधारलेने से अच्छा है घरवालों से ही उधार ले लिया जाय..लेकिन विडंबना यह है कि हम लोग ही इस धरा पर घरवाले भी हैं और बाहरवाले भी हैं सो उधारी चक्र चल रहा है….लेकिन इस चक्कर मे अगली पीढी के लिये जो एकमुश्त कर्जे की रकम अदा करने की बारी आएगी तो शायद हमें सोचने का भी वक्त न मिले….पर्यावरण से लेकर आर्थिक क्षेत्र तक, सब जगह यही हाल है।
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आप तो जानते ही हैं जी कि दुनिया में कहीं भी कुछ होता है उसके जैसा भारत में पहले ही हो चुका होता है। राजा ययाति ने अपने लड़के से उसकी जवानी उधार लेकर मौज किये तो यहां धन-सम्पदा कौन चीज है जी?
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सच बात है. फ्रीडमन को पढने में मुझे भी आनंद आता है.
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जी हाँ दुरस्त बात -आज के आदमी की पर्यावरणीय शोषण की जो स्थिति है उअसे तो यही लगता है की हम अपने भावी पीढियों के कर्जदार हो चले हैं !
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