करें मास्टरी दुइ जन खाइँ, लरिका होइँ, ननियउरे जाइँ

गुन्नीलाल जी का मत है कि हमें 50-30-20 के नियम का पालन करना चाहिये। “जितनी आमदनी हो, उसके पचास प्रतिशत में घर का खर्च चलना चाहिये। तीस प्रतिशत को रचनात्मक खर्च या निर्माण के लिये नियत कर देना चाहिये। बचे बीस प्रतिशत की बचत करनी चाहिये।


आपको इस पोस्ट का शीर्षक अजीब सा लग सकता है। यह स्कूल मास्टर की आर्थिक दशा पर अवधी/भोजपुरी में कही एक कहावत है जो गुन्नीलाल पाण्डेय जी ने उद्धृत की। अभिप्राय यह कि, उनके युग में, (अनियंत्रित आदतों के कारण) स्कूल मास्टर दो का ही खर्च संभालने लायक होता था, बच्चे ननिहाल की कृपा से पलते थे। … आज भी कमोबेश वही हालत होगी, बावजूद इसके कि वेतन पहले की अपेक्षा बहुत सुधर गये हैं। बहुत बड़ी आबादी अपने खर्चे अपनी आय की सीमा में समेटने की आदतों को नहीं अपनाती… और यह इस प्रांत/देश की बात नहीं है – वैश्विक समस्या है। उपभोक्तावाद ने उत्तरोत्तर उसे और विकट बना दिया है।

श्री गुन्नीलाल पाण्डेय

गुन्नी लाल पाण्डेय मेरी जीवन की दूसरी पारी के प्रिय मित्र हैं। वे स्कूल मास्टर के पद से रिटायर हुये हैं। पहली पारी में उनसे मुलाकात तो सम्भव नहीं ही होती। दूसरी पारी में भी अगर मैं अगर एक कॉन्ट्रेरियन जिंदगी जीने की (विकट) इच्छा वाला व्यक्ति न होता और मेरी पत्नीजी मेरी इस खब्ती चाहत में साथ न देतीं तो गुन्नीलाल जी से मुलाकात न होती। उनसे मैत्री में बहुत और भी ‘अगर’ हैं, पर उनसे मैत्री शायद हाथ की रेखाओं में लिखी थी, तो हुई।

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गिरीश केसरी का शोरूम

गिरीश जी के शोरूम से लौटते समय दो चीजें मेरे मन में छायी रहीं – एक तो गिरीश जी की विनम्रता और सज्जनता (कोई शक नहीं कि वे सफल व्यवसायी हैं), और दूसरे मध्यवर्ग के बारे में मेरा अपना बदला नजरिया।


पिछले वर्ष मुझे लगा कि गांव में गांव के स्तर पर जीवन जीने की जिद; गर्मी-बरसात के मौसम में बहुत सार्थक नहीं है। यहां बिजली की समस्या है, पर उससे भी ज्यादा; बरसात के उमस भरे मौसम में (जो चार महीने चलता है) चिपचिपाती गरमी में चल नहीं पाता। अपनी व्यक्तिगत उत्पादकता लगभग शून्य हो जाती है। पत्नीजी भी अब जवान नहींं रहीं। उन्हें भी शहरी मेमसाहब से गांव की फुआ में रूपांतरण में गर्मी-बरसात झेलने की क्षमता उतनी नहीं है, जितना मैं सोचता था।

लिहाजा, यह तय किया था कि इस बरसात से पहले एयरकण्डीशनर लगवा ही लिया जाये। बढ़ती उम्र में यह पहला बड़ा समझौता था, अपने रिवर्स माइग्रेशन की साधारण जीवन जीने की जिद का। और मुझे उसका बहुत पछतावा नहीं हो रहा।

मेरे साले साहब के मित्र श्री गिरीश केसरी जी से फोन पर बात हुई। उन्हें पहले से नहीं जानता था, पर साले साहब के रेफरेंस और गिरीश जी की अपनी सज्जनता का लाभ यह हुआ कि गिरीश जी ने बनारस से एक वाहन में उपकरण और लगाने वाले कारीगर भिजवा कर 4-5 घण्टे में ही 45 किलोमीटर दूर इस गांव में एयर कण्डीशनर लगवा दिये। यह अहसास हुआ कि अभी भी हम गंवई निरीह प्राणी नहीं, रेलवे के बड़े साहब जैसा स्तर रखते हैं। 😆

गिरीश केसरी

गिरीश जी ने कह दिया था कि उपकरणों में कोई भी दिक्कत आये तो वे कोरोना काल में तुरंत ठीक कराने का वायदा तो नहीं कर सकते, पर 2-3 दिन में अवश्य निदान करा देंगे।

यह समय सीमा, हमारे हिसाब से ठीक ही थी। … पर यह नहीं मालुम था कि सामान की नुक्स की बात जल्दी ही हो जायेगी। गांव के बिजली की खराब दशा के हिसाब से वोल्टेज स्टेबलाइजर साथ में लगवाया था। वह अचानक ओवर हीट का इण्डीकेशन देने लगा। शायद उसका फैन खराब हो गया था।

गिरीश जी ने कहा कि आप उसे बनारस आ रहे हों तो कार में साथ लेते आयें, तुरंत उसे रिप्लेस कर दिया जायेगा। अगले दिन बनारस निकलने से पहले गिरीश जी से बात नहीं की, पर जब रास्ते में उन्हें सूचित किया तो समस्या खड़ी हो गयी। कोविड-19 के प्रतिबंधों के कारण आधी दुकानें बारी बारी से वहां बंद रहती हैं। उस दिन उनके शो-रूम बंद होने का दिन था। उनके आसपास का पूरा मार्केट बंद था।

फिर भी, गिरीश जी ने हमारे लिये छुट्टी के दिन भी घर से आये और अपना शो-रूम खुलवाया। हमें पूरा परिसर घुमा कर दिखाया। इस बीच उन्होने दूसरा नया स्टेबलाइजर हमारे वाहन में रखवा दिया था। कुल मिला कर हमें बहुत तवज्जो दी उन्होने। यह भी कहा कि पूरा बाजार बंद होने के कारण वे हमारी मेहमान नवाजी नहींं कर पा रहे हैं, अन्यथा चाय-कॉफी तो आ ही जाता…।

शोरूम बड़ा है गिरीश जी का। ह्वर्लपूल के सभी तरह के ह्वाइट-गुड्स वहां उपलब्ध हैं। अन्य प्रतिष्ठित ब्राण्डों के भी बिजली से चलने वाले उपकरण भी वहां थे। पिछले साल भर हमने तो उपकरण कस्बे की मार्केट या अमेजन पर खरीदे होंगे, उनका बेहतर और वाजिब विकल्प वहां मौजूद था। लेने का मन तो कई चीजों पर ललचाया, पर अपने आप को हमने प्रयास कर रोका। अन्यथा कैशलेस मार्केट का यही घाटा है। आप खाली जेब लिये बाजार जायें तो अपने मोबाइल के बैंकिंग के एप्स के बल से पहाड़ जैसी खरीददारी कर लौट सकते हैं – अगर आपमें अतिरेक में खरीददारी (impulsive buying) करने की (बुरी) आदत हो। किसी तरह हम वहां बिना खरीददारी के निकल पाये – बाजार से गुजरा हूं, खरीददार नहीं हूं वाला भाव ओढ़ कर।

गिरीश जी से मार्केट की दशा पर बातचीत हुई। उन्होने बताया कि लॉकडाउन के समय तो सब कुछ ठप हो गया था। अब भी ग्राहक बहुत नहीं लौटे हैं। पर वे घोर आशावादी नजर आये।

“यह सब सामान जो आप देख रहे हैं, कोई लग्जरी नहीं है। मध्यवर्ग की आम जरूरत की चीज बन चुके हैं। लोग सिल बट्टे पर नहीं लौट सकते, मिक्सर-ग्राइण्डर खरीदेंगे ही। एयर कण्डीशनर अब जरूरत की चीज बन गया है शहरों में। छोटी फैमिली में वाशिंग मशीन के बिना काम नहीं चल सकता। इस लिये इन चीजों की मांग में अस्थाई कमी भले आये, बिक्री होगी ही।” – गिरीश जी का यह कहना गहरे निहितार्थ वाला था। उनके अनुसार पूरे शो रूम में डेढ़ करोड़ का सामान धनाढ्य वर्ग के लिये नहीं, आम शहरी के लिये है।

अपने बारे में गिरीश जी ने बड़ी बेबाकी से कहा – “हमें तो यही (व्यवसाय) ही करना है। और क्या करें। बनिया के बच्चे हैं। नौकरी तो हमारे लिये है ही नहीं। यही काम है हमारा।”

मध्यवर्ग़ की आर्थिक पेशियों की ताकत का जो प्रकटन उनके कथन से हुआ, वह मेरे नजरिये को बदलने वाला था। मिनिमलिज्म का राग भले ही लोग, बतौर फैशन गायें, वास्तविकता यह है कि ये सब ह्वाइट गुड्स अब इतने ह्वाइट नहीं रहे। वे सब बड़ी तेजी से आवश्यकता का अंग बन गये हैं। वह जमाना अतीत हो गया जब 16 इंच का शटर वाला टेलीवीजन खरीदने के लिये पूरा परिवार दो साल बचत करता था और दिवाली के पहले एक दिन उत्सव जैसी उमंग ले कर एक साथ बाजार जाता था। … वे भी क्या दिन थे। अब हर आदमी 40-50 हजार का मोबाइल दो तीन साल में बदल ले रहा है।

गिरीश जी के शो रूम का बाहर से दृष्य

गिरीश जी के शोरूम से लौटते समय दो चीजें मेरे मन में छायी रहीं – एक तो गिरीश जी की विनम्रता और सज्जनता (कोई शक नहीं कि वे सफल व्यवसायी हैं), और दूसरे मध्यवर्ग के बारे में मेरा अपना बदला नजरिया।

अपने आप से मैंने कहा – कभी कभी शहर भी हो आया करो और वहां नये लोगों से मिला भी करो, जीडी। वहां भी देखने समझने को तुम्हे अभी बहुत कुछ मिलेगा।

धन्यवाद, गिरीश केसरी जी!

दार्शनिक, कारोबारी या बाहुबली #गांवकाचिठ्ठा

उसने उत्तर देने के पहले मुंह से पीक थूंकी। शायद मुंह में सुरती थी या पान। फिर उत्तर दिया – “सोचना क्या है। देख रहे हैं, काम करने वाले आ जाएं, नावें तैयार हो कर उस पार रवाना हो जाएं। आज काम शुरू हो जाए। बस।


वह पत्थर की बेंच पर पेड़ के नीचे बैठा था। बगल में एक पुरानी साइकिल। पेड़ के तने से उंठगा कर खड़ी कर रखी थी। गंगा किनारे नावों और उनके आसपास की गतिविधि निहार रहा था। अकेला था। पूरा दृश्य कुछ ऐसा था सवेरे साढ़े पांच बजे कि लगा कोई अपने विचारों में खोया या सवेरे की शांत छटा निहारता दार्शनिक टाइप जीव हो। मुझे लगा कि ऐसा बहुत सम्भव है। गंगा विचारों में विचरण करने वालों को आकर्षित अवश्य करती हैं।

वह बेंच पर बैठा गंगा का दृश्य निहार रहा था

मैंने उसके एक दो चित्र लिए, इससे पहले कि वह मुझे देख अपनी मुद्रा बदले। उसके बाद उन सज्जन से बात की – कैसा लगता है गंगा का यह दृश्य? क्या सोचते हैं?

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संदीप कुमार को एक व्यवसाय और, उससे ज्यादा, आत्मविश्वास चाहिये #गांवकाचिठ्ठा

नौकरी में दिक्कत है, व्यवसाय के लिए पूँजी की किल्लत है। संदीप के यह बताने में निराशा झलकती है। पर मेरा आकलन है कि उसमें आत्मविश्वास की कमी है। उसको प्रोत्साहित करने वाले नहीं मिलते उसके परिवेश में।


कोरोना संक्रमण भदोही मेंं प्रतिदिन 6 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ रहा है। संदीप कुमार का काम रोज तीस किलोमीटर साइकिल चला कर डेढ़ सौ ग्रामीण घरों में अखबार बांटना है। जिन गांवों में उसका जाना होता है वे कोरोना वायरस की पकड़ में आते जा रहे हैं। संदीप के काम के खतरे हैं और उसको इनका एहसास भी है। वह मुंह पर एक गमछा लपेटे रहता है। कहीं बहुत ज्यादा रुकता नहीं। सवेरे साढ़े तीन बजे उठता है। पांच बजे महराजगंज कस्बे की अखबार एजेंसी से अखबार ले कर दस बजे तक अखबार बांटने का काम खत्म कर पाता है।

संदीप कुमार, अखबार वाला नौजवान ।
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राजेश सरोज – जल्दी ही बम्बई लौट जाऊंगा #गांवकाचिठ्ठा

वह लॉक डाउन के पहले ही गांव आया था, उसके बाद लॉक डाउन हो गया और वापस नहीं जा सका। अब मौका लगते ही फिर वापस जाएगा। वहां का काम राजेश को पसंद है।


कुछ दिन पहले राजेश सरोज का जिक्र था ब्लॉग पोस्ट में –

कल जब मैं द्वारिकापुर घाट पर टहल रहा था, तो वह स्वत: मेरे पास आ कर खड़ा हो गया। मुझसे बात करना चाहता है, जब भी वह दिखाई पड़ता है। कभी कभी वह बम्बई से भी फोन किया करता था। अपने परिवेश से अलग व्यक्ति के साथ जुड़ना शायद उसे अच्छा लगता है।

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Ghurahu, the tailor in village

I’m searching for any other work which could be given to Ghurahu. He may need support at least in this month, till the usual customers come back in sufficient numbers.


He may be around 45-50 years old. His children are making or trading in ornaments in villages nearby; a traditional work as per their caste. It is a bit strange that even a very small village has a saraf (सराफ – person dealing in ornaments). Very poor people also have some ornaments, may be of silver or other Inferior metal.

But Ghurahu is tailor, not a saraf. He sits in front of a shop in Mahrajganj town bazar, with his feet operated sewing machine and a chair. Must be getting reasonable work in normal days. During marriage season, he becomes very busy. It is very difficult for him to meet delivery deadlines in those days.

Ghurahu, the tailor.
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