प्रच्छन्न दार्शनिक


अचानक सड़क के किनारे सामान बेचने वाले से बहुत स्तर ऊपर उठकर मुझे वह संत-दार्शनिक लगने लगे। एक प्रच्छन्न दार्शनिक (दार्शनिक इन डिस्गाइज!)।

आज भी वह वहीं था – नारायण आश्रम के पेवमेण्ट पर बेल के फल लिये। उनके आकार के अनुसार दो ढेरियों में बांट रखा था फलों को। दो पोस्टों में जिक्र कर चुका हूं मकोय वाले बूढ़े का। लिहाजा उनमें कोई नया ब्लॉग मटीरियल नजर नहीं आ रहा था। इतना जरूर लगता था कि यह वृद्ध आस पास से मकोय, आम की कैरी या बेल फल तोड़ कर बेचने बैठ रहा है। यूंही टोह लेने के लिये पूछ लिया – कितना कमा लेते हो?

Philosopherरामसिंह जी।

बूढ़ा ऊपर हाथ उठा कर बोला – जो चाहें वो। वो यानी ईश्वर। फिर बोला – जइसे राखत हयें, वइसे रहत हई (जैसे रख रहे हैं वैसे रह रहा हूं)।

कुछ सोच कर बोला – अब हम चाही कि हमका इन्द्रासन मिलि जाइ त चाहे से थोरउ मिलि जाये। (मेरी चाहने से मुझे इन्द्रासन थोड़े ही मिल जायेगा।)

पर उस बूढ़े बाबा को मेरे रूप में एक श्रोता मिल गया था। उसके बाद देशज सन्तों की बानी (बाबा कबीर भी उनमें थे) इतने फर्राटे से उन बूढ़े ने धाराप्रवाह बोली कि मैं दंग रह गया। अचानक सड़क के किनारे सामान बेचने वाले से बहुत स्तर ऊपर उठकर मुझे वह संत-दार्शनिक लगने लगे। एक प्रच्छन्न दार्शनिक (दार्शनिक इन डिस्गाइज!)। मेरी सारी एकेडमिक्स और अफसरी लिद्द हो गयी उनके समक्ष।

Ram Singh Hutरामसिंह जी की झोंपड़ी जंगल में।

बन्धुवर, कबीर या सुकरात के साथ भी मुलाकात कुछ इसी तरह की होती रही होगी। ये लोग भी सामने वाले के गर्व की हवाफूंक वैसे ही निकालते रहे होंगे और वैसे ही आश्चर्य लगते होंगे।

पहले दोनो बार मैने उन वृद्ध की फोटो बिना उनसे पूछे खींची थी। पर इस बार बाकायदा अनुमति मांगी – एक फोटो ले लूं।

चलते चलते परिचय पूछा। नाम है राम सिंह। आश्रम की वन की पट्टी में वे रहते हैं। उन्हींकी झोंपड़ी के पास दो साल पहले मुझे नीलगाय के दर्शन हुये थे। आप फोटो में राम सिंह जी को और उनकी झोंपड़ी को देखें।

(हमारे प्रच्छन्न दार्शनिक राम सिंह जी बीमार लगते हैं और बुझे से भी। भगवान उन्हें स्वास्थ्य और दीर्घायु दें। … वैसे हम कौन से टिचन्न/टनटनाट हैं; गोड़-मूड़ सब पिरा रहा है!)


एक पुरानी (१८ फरवरी २००८ की) पोस्ट का पुच्छल्ला:

मैने कहा न कि मेरी पोस्ट से ज्यादा बढ़िया टिप्पणियां होती हैं। कल पुराणिक जी लेट-लाट हो गये। उनकी टिप्पणी शायद आपने न देखी हो। सो यहां प्रस्तुत है –

रोज का लेखक दरअसल सेंसेक्स की तरह होता है। कभी धड़ाम हो सकता है , कभी बूम कर सकता है। वैसे, आलोक पुराणिक की टिप्पणियां भी ओरिजनल नहीं होतीं, वो सुकीर्तिजी से डिस्कस करके बनती है। सुकीर्तिजी कौन हैं, यह अनूप शुक्ल  जानते हैं।
लेख छात्रों के चुराये हुए होते हैं, सो कई बार घटिया हो जाते हैं। हालांकि इससे भी ज्यादा घटिया मैं लिख सकता हूं। कुछेक अंक पहले की कादम्बिनी पत्रिका में छपा एक चुटकुला सुनिये –
संपादक ने आलोक पुराणिक से कहा डीयर तुम मराठी में क्यों नहीं लिखते।
आलोक पुराणिक ने पूछा – अच्छा, अरे आपको मेरे लिखे व्यंग्य इत्ते अच्छे लगते हैं कि आप उन्हे मराठी में भी पढ़ना चाहते हैं।
नहीं – संपादक ने कहा – मैं तुम्हारा मराठी में लेखन इसलिए चाहता हूं कि सारी ऐसी तैसी सिर्फ और सिर्फ हिंदी की ही क्यों हो।


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

29 thoughts on “प्रच्छन्न दार्शनिक

  1. राम सिंह जी बीमार लगते हैं और आपका भी गोड़-मूड़ सब पिरा रहा है, फिर भी यह पोस्ट पढते हुए एक मुस्कुराहट अपने आप ही तैर गयी, खासकर गर्व की फूंक वाली बात पर। अब तो दोहराना ही पडेगा, भाग्यशाली हैं आप कि इन सबसे मिलने का समय निकाल पाते हैं। वैसे भाग्यशाली हम भी हैं जो आपका ब्लॉग मिल गया और हम भी एक तरह से इन प्रच्छन्न दार्शनिकों के दर्शन कर सके।

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  2. आदरणीय पांडेय जी ,कहा जाता है की जहाँ न जाये रवि वहां पहुंचे कवि….ये बात बिलकुल सही है .आखिर आपसे पहले भी तो राम सिंह जी से लोगों ने सौदा लिया होगा ,उनसे मिले होंगे ..पर और किसी को उनके अन्दर के कबीर नहीं दिखे …आपको दिखे ….आपने उन्हें समझा.सर ,ऐसे बहुत से कबीर छिपे हैं ..पर उन्हें खोजने वाली दृष्टि तो हो ….शुभकामनायें हेमंत कुमार

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  3. आप तो लगता है कि इन बाबा पर अटक गए हैं, कभी मकोय तो कभी बेर! ;)पुराणिक जी की बात से सहमति है कि दार्शनिक भारत में एक से बढ़कर एक मिल जाएँगे, क्या ठेले वाले, क्या खोमचे वाले। वो तो इन लोगों को कभी मौका नहीं मिला नहीं तो दुनिया के बड़े पर्दे पर ये भी स्टॉर होते। इनकी जगह जो लोग बैठे हैं दार्शनिक बन उनमें आधे तो पांडू होते हैं जिनको दर्शन का “द” न पता होता!बहरहाल, आप फोटू तो ले लिए, पहली वाली में राम सिंह जी नज़र भी आ गए, लेकिन दूसरी में जंगल ही दिखे है कुटिया नाही! :)

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  4. नमस्ते!इस पोस्ट के लिये बहुत आभार….एक श्वेत श्याम सपना । जिंदगी के भाग दौड़ से बहुत दूर । जीवन के अन्तिम छोर पर । रंगीन का निशान तक नही । उस श्वेत श्याम ने मेरी जिंदगी बदल दी । रंगीन सपने ….अब अच्छे नही लगते । सादगी ही ठीक है ।

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  5. तभी तो स्वामी विवेकानंदजी ने कहा था कि भारत के किसी भी गांव के कोने में भी लोग दार्शनिकता की बातें करते मिल जाएंगे। हम हमारी अंगेज़ी दम्भता में उन्हें पहचान नहीं पाते:)

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  6. दर्शन और अध्यात्म ही ज्ञानजी की दृष्टि में भी रचा-बसा है। असली ब्लागिंग का मज़ा भी…बहुत बढ़िया ज्ञानदा…

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  7. मकोय वाले बूढ़े बाबा राम सिंह को सेलिब्रिटी बना दिया आपने. दर्शन और आध्यात्म तो यहाँ की मिटटी में ही रचा बसा है. बस देखने वाले की नियत और नजर चाहिए.

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