पहले का ग्रामीण रहन सहन और प्रसन्नता

लोग सामान्यत: कहते हैं कि पहले गरीबी थी, पैसा कम था, मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी, पर लोग ज्यादा सुखी थे। आपस में मेलजोल ज्यादा था। हंसी-खुशी ज्यादा थी। ईर्ष्या द्वेष कम था।


गांवदेहात में घूमते हुये जब मुझे अपनी या उससे अधिक उम्र के लोग मिलते हैं तो उनसे बातचीत करने में मेरा एक प्रमुख विषय होता है कि उनके बचपन से अब में ग्रामीण रहन सहन में कितना और कैसा परिवर्तन हुआ है। अलग अलग लोग अलग अलग प्रतिक्रिया करते हैं। मुख्यत: दलित बस्ती के लोगों की प्रतिक्रिया होती है कि पहले से अब उनकी दशा में बहुत सुधार हुआ है।

अन्य वर्गों के लोग सामान्यत: कहते हैं कि पहले गरीबी थी, पैसा कम था, मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी, पर लोग ज्यादा सुखी थे। आपस में मेलजोल ज्यादा था। हंसी-खुशी ज्यादा थी। ईर्ष्या द्वेष कम था।

कल अगियाबीर में गुन्नीलाल पाण्डेय जी से मुलाकात हुई। उनके साथ रिटायर्ड प्रिंसिपल साहब – प्रेमनारायण पाण्डेय जी भी थे। दोनो सज्जन सत्तर के आरपार हैं। दोनो के पास पुराने और नये जमाने की तुलना करने के लिये पर्याप्त अनुभव-आयुध है।

प्रेम नारायण मिश्र (बायें) और गुन्नीलाल पाण्डेय

गुन्नी पांंड़े ने मेरे अनुरोध पर अपनी छत पर चढ़ी लौकी से तीन लौकियां मुझे दी थीं। जब बात पुराने नये रहन सहन की चली तो गुन्नी बोले – “हेया देखअ; पहिले अनाज मोट रहा। बेर्रा, जवा, बजरी, सांवा मुख्य अनाज थे। गेंहू तो किसी अतिथि के आने पर या किसी भोज में मिलता था। पर उस भोजन में ताकत थी। लोग पचा लेते थे और काम भी खूब करते थे।

“आजकल सब्जी भाजी रोज बनती है। तब यह यदा कदा मिलने वाली चीज थी। बाजार से सब्जी तो कभी आती नहीं थी। घर के आसपास जो मिल जाये, वही शाक मिलता था। और तब ही नहीं, युधिष्ठिर ने भी यक्ष-संवाद में कहा है कि पांचवे छठे दिन सब्जी बना करती थी।”

मेरे लिये यह एक नयी बात थी। मैंने पूछा – “अच्छा? युधिष्ठिर ने क्या कहा?”

यक्ष – युधिष्ठिर संवाद

गुन्नीलाल जी ने महाभारत का एक श्लोक सुनाया। उन्होने बताया कि अरण्य पर्व में यक्ष-युधिष्ठिर सम्वाद है। उसमें यक्ष का एक प्रश्न है –

यक्ष उवाच – को मोदते?

युधिष्ठिर उवाच – पंचमेSहनि षष्ठे वा, शाकम पचति स्वे गृहे। अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते॥

इसका हिंदी अनुवाद मैंने अंतरजाल से उतारा –

यक्ष प्रश्न : कौन व्यक्ति आनंदित या सुखी है?

युधिष्ठिर उत्तरः हे जलचर (जलाशय में निवास करने वाले यक्ष), जो व्यक्ति पांचवें-छठे दिन ही सही, अपने घर में शाक (सब्जी) पकाकर खाता है, जिस पर किसी का ऋण नहीं है और जिसे परदेस में नहीं रहना पड़ता है, वही मुदित-सुखी है।

गुन्नीलाल जी ने अपने शब्दों में स्पष्ट किया कि शाक-सब्जी रोज बनने की चीज नहीं थी; महाभारत काल में भी नहीं। सम्पन्नता आज के अर्थों में नहीं थी। पैसा नहीं था। लोग अपनी आवश्यकतायें भी कम रखते थे। इसलिये उनपर कर्जा भी नहीं हुआ करता था। गांगेय क्षेत्र में लोग बहुत यात्रा भी नहीं करते थे। परदेस में जाने रहने की न प्रथा थी, न आवश्यकता। इस प्रकार लोग आज की अपेक्षा अधिक आनंदित और सुखी थे।

राजबली विश्वकर्मा

लगभग ऐसी ही बात मुझे राजबली विश्वकर्मा ने भी बताई थी। उन्होने तो बारह किलोमीटर दूर अपनी किराना की दुकान खोली थी, जिसे उनके बाबा बंद करा कर उन्हें गांव वापस ले आये थे। उनके अनुसार भी खाने को मोटा अन्न ही मिलता था, जिसमें आज की बजाय ज्यादा ताकत थी। “आज अनाज उगने में पहले से आधा समय लेता है। इस लिये उसमें स्वाद भी नहीं होता और ताकत भी आधा ही होती है उसमें।”

राजबली के अनुसार भी उस समय लोग ज्यादा प्रसन्न रहा करते थे। “अब तो मोबाइल में ही लगे रहते हैं। दो घर आगे वाले से महीनों बीत जाते हैं, बात ही नहीं होती।”

अपने बचपन की याद कर राजबली बताते हैं कि उन्हें कोई कपड़ा छ साल की उम्र तक नहीं सिलाया गया। पुरानी धोती आधी फाड़ कर उसी की भगई बनाई जाती थी उनके लिये। वही पहने रहते थे। ऊपर बदन उघार ही रहता था। सर्दी में पुआल और एक लोई-दुशाला में दुबके रह कर गुजार देते थे।

ये साठ की उम्र पार सज्जन जो बताते हैं; उसके अनुसार पहले पैसा नहीं था, चीजें नहीं थीं। अभाव बहुत ही ज्यादा था; पर प्रसन्नता बहुत थी।

पता नहीं आज लोग इससे सहमत होंगे या नहीं होंगे; पर इन सीनियर सिटिजन लोगों ने जो बताया, वह तो यही है।


राजबली से मुलाकात

राजबली दसवीं आगे नहीं पढ़े। उसके बाद ममहर बाजार में किराने की दुकान खोली। पर उनके बब्बा को यह पसंद नहीं था कि घर से दूर राजबली पुश्तैनी धंधे से अलग काम करें।


राजबली विश्वकर्मा

राजबली ने कई दिनों से मचिया बना कर नहीं दिया। बता रहे हैं कि लकड़ी खत्म हो गयी है। लकड़ी सप्लाई करने वाले को बोला है। जैसे ही मिलेगी, एक एक कर बना कर देते रहेंगे। अभी जितने लोगों को बातचीत में आश्वासन दिया है, मचिया का; उनको देने के लिये पांच सात और जरूर चाहियें। उसके अलावा हमें भी घर में तीन चार और की आवश्यकता होगी।

दस मचिया तो राजबली जी से बनवानी ही हैं। उसके बाद की देखी जायेगी। वैसे जैसा रघुनाथ जी ने किया है; मचिया ड्राइंगरूम में अथवा पूजा घर में प्रयोग लायक फर्नीचर है। हम तो उसपर बैठ कर रामचरित मानस पाठ करते हैं, रोज रात में। वह पूजा क्षेत्र की पवित्र वस्तु हो गयी है।

हम तो मचिया पर बैठ कर रामचरित मानस पाठ करते हैं, रोज रात में। वह पूजा क्षेत्र की पवित्र वस्तु हो गयी है।

उस दिन शाम साढ़े चार बजे राजबली से मिलने अपनी साइकिल से गया। राजबली घर के बाहर बेंच पर शाम की चाय की ग्लास लिये बैठे थे। उनकी पतोहू मेरे लिये भी चाय ले कर आयी। मैंने शिष्टता से मना किया – चीनी वाली चाय नहीं पीता। उनके साथ वहीं बेंच पर बैठ कर बात हुई।

राजबली ने कहा कि लकड़ी देने वाले के पास फिर जायेंगे तकाजा करने। अब मौसम सुधर गया है। अब वे सवेरे चार बजे गंगा किनारे जाना शुरू कर चुके हैं। लूटाबीर (अगियाबीर का घाट) जाते हैं गंगा स्नान को। वहां लोगों से मिले थे, जो मेरे बारे में जानते हैं। … राजबली उन लोगों को जानते हैं, जिन्हे मैं जानता हूं। अर्थात मेरा नेटवर्क बढ़ रहा है।

राजबली घर के बाहर बेंच पर शाम की चाय की ग्लास लिये बैठे थे।

उनके बारे में पूछना शुरू किया। वे सन 1952 में जन्मे। पढ़ाई दसवीं तक की। मिडिल स्कूल तक महराजगंज कस्बे के स्कूल में और दसवीं तक औराई के इण्टरकॉलेज में। उसके आगे नहीं पढ़े। उसके बाद ममहर बाजार में किराने की दुकान खोली। दुकान चल रही थी, पर उनके बब्बा को यह पसंद नहीं था कि घर से दूर राजबली पुश्तैनी धंधे से अलग किराने का काम करें।

उनके बब्बा एक बार उनके यहां ममहर आये। पर उन्होने राजबली के यहां पानी तक नहीं पिया – “काहे कि, मेरी दुकान जहां थी, वहां बहुत सी मुसलमानों की बस्ती थी आस पास। उनके अनुसार मैं अपवित्र हो गया था। मैंने बब्बा से कहा कि वे औजार बनाते हैं। भले ही बधिक द्वारा प्रयोग किये जाने वाले छुरे या तलवार नहीं बनाते; पर जो फरसा या रसोईं का सब्जी काटने वाला चाकू बनाते हैं, उससे भी तो कोई बलि दे सकता है। और लोग देते भी हैं। पर हमारे पुश्तैनी काम करने वाले उससे अपवित्र या पाप के भागी तो नहीं हो जाते?!”

बहरहाल, पारिवारिक विरोध के कारण उन्होने वह किराना की दुकान बंद कर दी। दुकान सन अठहत्तर तक चली। अठहत्तर की बाढ़ में ममहर का इलाका इस ओर से कट गया था। लोग गुड़ बनाने वाले कड़ाहे को नाव बना कर पानी में आवागमन कर रहे थे। उसी समय उन्होने दुकान बंद की। फिर घर आ कर पुश्तैनी काम – लुहार-खाती के काम में लगे।

मैंने राजबली जी को फिर कहा कि उनके साथ नियमित बैठ कर उनके अतीत के बारे में नोट्स लिया करूंगा और ब्लॉग पर प्रस्तुत करूंगा। राजबली सवेरे पूजापाठ के बाद अपनी धौकनी वाली भट्ठी और कारपेण्टरी के काम में लग जाते हैं। इस बीच जो कुछ खाने को मिलता है, वह उन्हें वहीं परोस दिया जाता है। कोई मिलने वाला आया तो उसके साथ भी शेयर होता है वह नाश्ता। बारह बजे वे भोजन करते हैं। उसके बाद उनके पास खाली समय रहता है।

राजबली सवेरे पूजापाठ के बाद अपनी धौकनी वाली भट्ठी और कारपेण्टरी के काम में लग जाते हैं।

मैं राजबली के पास दोपहर-शाम के समय ही जाऊंगा अपनी नोटबुक ले कर। राजबली आकर्षक और रोचक व्यक्तित्व हैं। उनके बारे में लिखना मेरे ब्लॉग को एन-रिच करेगा। निश्चय ही!


प्रसन्नता की तलाश – गंगा, गांव की सैर

सवेरे अपने वाहन चालक को सात बजे बुला, उसके साथ एक कप चाय पीने के बाद हम दोनों ने घर से निकल कर गांव की छोटी सड़कों पर यूंही घूमने की सोची। करीब एक घण्टा इस प्रकार व्यतीत करने का कार्यक्रम रखा।


बेटा-बहू-पोती का गांव से प्रयागराज शिफ्ट हो जाना घरेलू दशा में बड़ा बदलाव है हमारे लिये। वैवाहिक जीवन में, शुरुआती दिनों को छोड़ दें तो हम परिवार बनाने में या परिवार के साथ रहने में ही लगे रहे। चालीस साल उस तरह बीते। पहले बेटा-बिटिया को पालने में रहे। बिटिया की शादी होने के बाद कुछ ही समय बीता; और उसमें भी बेटा साथ रहा; हम अपने माता पिता के साथ रहने प्रयागराज आ गये। वहां माता के देहावसान के बाद मेरे पिताजी मेरे साथ रहे। करीब चार साल तो वे और मैं एक ही कमरे को शेयर करते रहे।

नौकरी की समाप्ति पर हम गांव में शिफ्ट हो गये। गांव में मेरा पूरा परिवार – पिता, बेटा-बहू-पोती साथ रहे। कभी कभी मेरी सास जी भी आकर हमारे साथ रहती रहीं। मेरे पिताजी और मेरी सास जी ने देह त्याग भी हमारे इसी गांव के घर में किया।

अब, चालीस साल बाद, यह समीकरण बना है कि गांव में घर है, और केवल हम दो व्यक्ति – पत्नीजी और मैं भर घर में रह रहे हैं। चालीस साल बाद यह स्थिति आयी है कि स्नानघर में जाते समय दरवाजा बंद करेंं या न करें – कोई फर्क नहीं पड़ता। और यह स्थिति एक या दो दिन की नहीं है। आगे केवल एक दूसरे के साथ जीना है।

अटपटा लग रहा है। कोरोना संक्रमण काल से यह कहीं बड़ा डिसरप्शन (disruption) है।

पर हर बदलाव को परखना और उसमें से रास्ता निकालना ही जीवन है। हमने भी, जो परिस्थिति है, उसमें ‘अच्छा’ तलाशने का काम किया। अपनी दिनचर्या बदलने की शुरुआत की। सवेरे उठ कर एक घण्टा घर में ही एक्सर्साइजर पर कानों में हेडफोन लगा पॉडकास्ट सुनते व्यायाम करने को नियमित किया है। पत्नीजी भी म्यूजिक लगा कर घर के बड़े और लम्बे ड्राइंग रूम में घूमने का व्यायाम करती हैं। उनके लिये पौधों की देखभाल, पानी देना और खरपतवार निराई करने के भी काम हैं। उससे भी उनका व्यायाम हो जाता है।

गंगा तट पर रीता पाण्डेय और मैं। चित्र अशोक ने लिया।

हा दोनों ने अपना वजन कम करने की दिशा में प्रयत्न किये हैं। भोजन सीमित करना, दूध वाली चाय की बजाय पानी, जीरा और ग्रीन-चाय का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया है। अब दूध लेने जाने की जिम्मेदारी मैंने ले ली है। उसमें भी कुछ व्यायाम होता ही है।

घर के बाहर देखने के लिये मेरे पास गांवदेहात का भ्रमण पहले से था – साइकिल ले कर 10 किलोमीटर के दायरे में घूम आता था। अब उसमें मैंने पत्नीजी को भी जोड़ा। सवेरे अपने वाहन चालक को सात बजे बुला, उसके साथ एक कप चाय पीने के बाद हम दोनों ने घर से निकल कर गांव की छोटी सड़कों पर यूंही घूमने की सोची। करीब एक घण्टा इस प्रकार व्यतीत करने का कार्यक्रम रखा।

उस सिलसिले में कल द्वारिकापुर के गंगा तट पर गये।

सूर्योदय होने पर भी कोहरा था। कहीं कहीं तो बहुत घना भी हो जाता था। उसे चीरते हुये धीमी चाल से कार से निकलना और खिड़की से गांव देहात को निहारना बहुत अच्छा लग रहा था। साइकिल पर होता तो कई जगह रुकता – सरसों के खेत, घूरे पर सवेरे की बटोरन ले कर जाती महिला, बासी भात थाली में उंडेलती महिला, स्कूल जाते बच्चे – यह सब ठहर कर देखता। पर वाहन पर बैठ गुजरते हुये देखना भी खराब नहीं था। कार की एक खिड़की मैंने और दूसरी पत्नीजी ने सम्भाल ली थी। देखते हुये इतना अच्छा लग रहा था कि बात करना बंद हो गया।

गंगा तट के करार से नीचे उतरती पत्नीजी।

वाहन पार्क कर हम गंगा तट की ओर चले। घाट पर कोहरा इतना था कि जल या कोई गतिविधि दिख नहीं रही थी। अगर हमें पहले से गंगा तट की जानकारी न होती तो दिखाई न देने के कारण हम नीचे उतरते ही नहीं। बहुत पास जाने पर एक खाट पड़ी दिखी। शायद पिछले दिन मौनी अमावस्या स्नान के लिये घाट पर किसी पण्डा ने बिछाई होगी और रात में उसे वापस नहीं ले गया होगा। तीन चार महिलायें स्नान कर रही थीं। उसके आगे तीन बालू ढोने वाली बड़ी नावें किनारे लगीं थीं। एक नाव में रहने का कमरा था, उसमें से निकल कर नाविक चाय पी रहा था। एक आदमी अण्डरवियर पहने साबुन लगा कर गंगा में डुबकी लगाने वाला था। पत्नीजी ने कहा – उसपर तो कैमरा मत साधो!

घाट के किनारे बबूल के वृक्ष भी शांत थे। कोहरे का कम्बल ओढ़े।

सब कुछ शांत, सब कुछ सुंदर, सब कुछ पहले का देखा होने पर भी नया। हम दोनो के हाथ में मोबाइल थे और उसमें फोटो कैद करने के लिये खूब यत्न कर रहे थे हम। दस पंद्रह मिनट थे वहां हम। आनंद ही आनंद था वहा!

महिलायें स्नान कर लौटने लगीं तो मेरी पत्नीजी ने उनसे बात की। एक महिला करहर (तीन किलोमीटर दूर गांव) की थी। पैर सूजे थे। फाईलेरिया था। पर वह सालों से नियमित गंगास्नान को आती है। बाकी महिलायें इसी गांव – द्वारिकापुर की थीं। उनके पास नित्य गंगा स्नान एक धर्म, व्यवहार, आनंद और प्रसन्नता की आदत है। वैसी ही आदतें हमें अपने में विकसित करनी हैं। और उसके लिये पूरी तरह से प्रयासरत हैं हम दोनो।

घर वापस आने पर प्रसन्नता का प्रभाव दिन भर बना रहा। वही ध्येय भी था!

हमारा वाहन चालक अशोक। उसे मोबाइल से चित्र लेना भी सिखाना होगा, अगर कार भ्रमण नियमित होता है, तो!

सावन में बाबा विश्वनाथ के कुछ “बम”

योगी बम – यह बन्दा डीजे के शोर पर नाच रहा था। मैने फोटो लेने का उपक्रम किया तो वह अपना चेहरा आगे करने लगा। मैने कहा, तुम्हारे मुंह का नहीं, पीठ का फोटो लेना है। योगी-बम का!


मौसम अच्छा था। मेघ-आच्छादित। बारिश नहीं थी। उस साल सावन के महीने में उमस के कारण अब तक कांवरियों की भीड़ देखने निकला नहीं था। मौसम अच्छा होने के कारण उस दिन मैं बटोही (अपनी साइकिल) के साथ निकल लिया।

घर से निकलते ही 600 मीटर पर नेशनल हाइवे है। NH19 – वाराणसी को जाता हुआ। बांई ओर की आधी सड़क कांवरियों के लिये रिजर्व है। उसपर साइकिल सवार भी चले जाते हैं। मैं भी चला – कांवरियों की दिशा के उलट। साथ में नोकिया का पुराना फ़ीचर फोन, जिससे साइकिल चलाते हुये भी आसानी से फोटो क्लिक किया जा सकता है। साइकिल पर चलते में अच्छे चित्र तो नहीं आते, पर जो देखा, वह दर्ज हो जाता है 99% मामलों में।

26 जुलाई 2017 की फेसबुक नोट्स पर इसे पहले पहल पोस्ट किया था। जो अब फेसबुक की बदली पॉलिसी के कारण वहां उपलब्ध नहीं है। पोस्ट अब कुछ परिवर्तित/परिवर्धित कर दी है। मेरे लैपटॉप की गैलरी में उपलब्ध सभी चित्रों का उपयोग किया है।

सावन में तीसरा सप्ताह था। कांवरियों की संख्या ठीकठाक दिखी। मुझे देख कई चलते चलते कह रहे थे – बोल बम। उत्तर में मैं हाथ हिला रहा था। एक आध बार कह भी दे रहा था – बोल बम! ‘बोल बम’ का उत्साह संक्रामक होता है। कुछ कुछ मुझमें भी हो रहा था।

अनेक प्रकार के ‘बम’ थे शंकर जी के। कांवरिये मूल भावना – प्रयाग (या अन्य स्थान) से सावन में गंगाजल ले कर बाबा विश्वनाथ के लिंग पर चढ़ाने की आस्था के अतिरिक्त हर मनुष्य अपनी अपनी विविधता लिये था।

कुछ के चित्र ले पाया। वे प्रस्तुत हैं।

बन्दर बम – यह काले मुंह वाला बन्दर भी कांवरियों में था। उसके साथ चलते नौजवान ने बताया कि जब बहुत छोटा था, तब से पाल रखा है इसे।

मुझे बताया कि यह बंदर बम पहले भी कांवर यात्रा में शरीक हो चुका है। लोगों के बीच काफी अनुशासित था। फिर भी, मुझे उसके समीप जाने में भय जरूर लगा! … बंदर मोबाइल देख कर जाने कैसा व्यवहार करे?! वह लोगों के बीच बैठा था और उसके स्वामी के अलावा और लोग भी कुछ न कुछ दे रहे थे।

महिला बम। यह अकेले चल रही थी। कांवरियों में लगभग 0.2% महिलायें हैं। तीन किलोमीटर में मुझे तीन दिखीं।

इस साल महिलायें ज्यादा थीं, पहले की अपेक्षा। और यह अकेली तेज चलती महिला कांवरिया तो ज्यादा ही आत्मविश्वास से भरी लग रही थी।

झांकी बम – यह झांकी नुमा कांवर अपने तरह की अनूठी थी।

झांकी बम लिये और भी कांवरिये थे। और भी बेहतर/बड़ी झांकी नुमा कांवर लिये। इस साल यह नया फैशन था, जो दिखा। झांकी सिर पर ले कर चलने में अतिरिक्त वजन तो होता है, पर उससे अन्य लोग आकर्षित होते हैं। आस्था भी कुछ परसेण्ट ज्यादा दिखती/लगती हो। कुल मिला कर मुखे लगा कि भविष्य में झांकी -बम ट्रेण्डी हो जायेंगे और झांकी बनाने वालों का कारोबार चमकेगा।

सड़क बम – सावन भर अन्यथा बहुत व्यस्त रहने वाला यह हाईवे इस समय कांवरियों की प्रॉपर्टी है। आराम से बैठे हैं उसपर। बीचोंबीच। एक जगह मैने कांवरियों को सड़क पर व्यायाम करते और अपना गमछा सुखाते भी पाया।

हाईवे का आधा हिस्सा उनके हवाले होने के कारण कांवरियों में महीने भर के लिये स्वामित्व की अनुभूति अवश्य होती है। वे सड़क के बीचो बीच बैठ कर यही दर्शा रहे थे!

तेज बम – उनका समूह सवेरे तेजी से चल रहा था। वे डाक-बम (दौड़ कर अनवरत चलने वाले) तो नहीं थे; पर सवेरे सवेरे काफ़ी दूरी दाब दे रहे थे।

हर कांवरिया अपने चलने में दूरी, समय और आगे बैठने, विश्राम करने या नहाने धोने का मानसिक गुणा-गणित बिठाता चलता है। उसी क्रम में ये कांवरिये सवेरे मौसम का लाभ ले कर ज्यादा से ज्यादा दूरी तय करना चाहते थे। या, इनको बाबा विश्वनाथ ज्यादा ही अपनी ओर खींच रहे थे; कह नहीं सकते।

योगी बम – यह बन्दा डीजे के शोर पर नाच रहा था। मैने फोटो लेने का उपक्रम किया तो वह अपना चेहरा आगे करने लगा। मैने कहा, तुम्हारे मुंह का नहीं, पीठ का फोटो लेना है। योगी-बम का!

योगी की नयी नयी सरकार बनी और वे किसी भी ‘स्टार’ से कम नहीं हिंदू नौजवानों में। योगी का सितारा उसके बाद और भी चमका है और मोदी के बाद वे सबसे अनूठे वोट कैचर बने हैं भाजपा के लिये। यह टी-शर्ट उसी का आभास दे रहा था।

बालक बम – मैने उससे उम्र पूछी तो साथ चलने वाले ने बताया दस साल।

दस साल का बालक। थोड़ा कष्ट में लगता था। पर यात्रा पूरी करने के बाद जीवन पर्यंत इसे याद रखेगा – अपनी पहली कांवर यात्रा को। 🙂

समूह बम – इस समूह में किशोरी भी थी, बालक भी।

मैंने करीब आधा घण्टा व्यतीत किया सड़क पर। कुछ और नये प्रकार का बम नहीं दिखा तो घर वापस हो लिया।


मूलचन्द, गीता पाठ और भजन गायन

विपन्नता और जिम्मेदारियों में यह व्यक्ति टूटने की बजाय गंगा स्नान, गीता पाठ और भरथरी के नाथ पन्थी जोगियों के भजन का सहारा ले रहा है। गजब है मूलचन्द। गजब है हिन्दू समाज!


कई महीनों से सवेरे योगेश्वरानन्द आश्रम के कुंये के चबूतरे पर मूलचन्द पाठ करने आते हैं। उन्होने बताया कि गीता के नौंवे अध्याय का पाठ करते हैं; “जिसको पढ़ने से आदमी नरक नहीं जाता है”। पूछने पर वे श्लोक नहीं बता पाते भग्वद्गीता के। जो एक श्लोक वे कहते हैं, वह भग्वद्गीता में नहीं है। उनका कहना है कि हिन्दी अनुवाद पढ़ते हैं। पर जो वे बताते हैं, वह बहुत गड्ड-मड्ड है। यह भी बोलते हैं मूलचन्द कि उनकी गीता की प्रति का पन्ना फट गया है।

खैर मूल बात यह नहीं कि मूलचन्द का भग्वद्गीता से कैसा परिचय है। हिन्दू धर्म में विविध स्तर के विविध स्कूलों के छात्र हैं। मूलचन्द जिस कक्षा में हैं, हम उसमें नहीं हैं। बस। यह नहीं कह सकते कि हम उनसे श्रेष्ठ कक्षा में हैं।

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अपनी साइकिल के साथ योगेश्वरानन्द आश्रम से लौटने को तैयार थे मूलचन्द। तब उनसे हम लोगों की बात हुई।

मुझे रामकृष्ण परमहंस की वह कथा याद आती है जिसमें एक द्वीप पर रहने वाले तीन साधू, मात्र श्रद्धा के सहारे “हम तीन, हमारे तीन” मन्त्र का जाप करते करते नदी को पैरों से चलते हुये पार कर आये जबकि सही मन्त्र सिखाने वाले गुरू जी को मन्त्र शक्ति पर विश्वास नहीं था। उन्होने द्वीप पर आने जाने के लिये नाव का प्रयोग किया। सारा खेल श्रद्धा का है।

हम लोग नाव का प्रयोग करने वाले छात्र हैं हिन्दू धर्म के। मूलचन्द अनगढ़ मन्त्रजाप से पार उतरने वाले हैं।

यो यत् श्रद्ध:; स एव स:। जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा होता है।

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मूलचन्द की बात सुनने और और लोग भी जुट गये।

किसी विद्वान ने (सम्भवत:) गीता के नवें अध्याय – राजविद्या-राजगुह्ययोग के बारे में बताया होगा मूलचन्द को। “यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसे शुभात”। जिसे जानने पर व्यक्ति बन्धन मुक्त हो जाता है। मोक्ष शायद कठिन कॉसेप्ट हो; सो उन विद्वान ने पौराणिक अन्दाज में यह कहा हो कि इस अध्याय के अध्ययन से नरक नहीं जाता आदमी।

खैर जो भी रहा हो; मूलचन्द भोर में गंगा स्नान कर कुंये की जगत पर अकेले जो भी पाठ करते हों, उसको सुनने वाले कृष्ण ही होते होंगे। मूलचन्द जी से उनके पाठ के विषय में और कुछ नहीं पूछा हमने।

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मुझसे आगे चल रहे थे मूलचन्द। अचानक भजन गाने लगे।

वापसी में अपनी साइकिल पर मूलचन्द मुझसे आगे चल रहे थे। अचानक वे कुछ गाने लगे। पीछे से मैने आवाज लगाई – बढ़िया गा रहे हैं। क्या है यह?

मूलचन्द ने रुक कर भजन सुनाया। बताया कि एक जोगी गाता था। “हम ओके सौ रुपिया देहे रहे। ओसे सुना और सीखा भी (मैने उसे 100रुपया दिया। उससे सुना और सीखा भी)”। पगडण्डी पर खड़े हो मैने मूलचन्द का भजन अपने मोबाइल से रिकार्ड किया। (शायद) कौशल्या माता किसी साधू से पूछती हैं – कईसे बाटल बा बबुआ हमार, तनी बतईहे जईहअ (वन में मेरा बच्चा कैसा है? उसका छोटा भाई, उसकी पत्नी सीता कैसी हैं, जरा बताये जाओ)। बड़ा ही मार्मिक। उस समय तो मात्र रिकार्ड कर रहा था मैं; पर घर पर आ कर सुना तो आंखें नम जरूर हो गयीं। आप भी सुनें मूलचन्द जी का भजन गायन –

मूलचन्द ने अपने बारे में बताया। पास के गांव पिपरिया के हैं। “ऊ सामने ईंट-भट्ठा देखात बा। उहीं काम करत रहे। अब काम छुटि गबा। एक भईंस रही, उहौ बेचि दिहा (वह सामने भट्ठा दिख रहा है। वहां काम करता था।अब काम छूट गया। एक भैंस थी। वह भी महीना भर पहले बेच दी।)” । मूलचन्द की विपन्नता स्पष्ट हो गयी। घर में शादी भी पड़ी है।

विपन्नता और जिम्मेदारियों में यह व्यक्ति टूटने की बजाय गंगा स्नान, गीता पाठ और भरथरी के नाथ पन्थी जोगियों के भजन का सहारा ले रहा है।

गजब है मूलचन्द। गजब है हिन्दू समाज!


यह पोस्ट फेसबुक नोट्स में मई 2017 में पब्लिश की थी। अब मुझे पता चल रहा है कि अक्तूबर 2020 से फेसबुक ने नोट्स को दिखाना बंद कर दिया है। यह बहुत ही दुखद है। मुझे वहां से निकाल कर यह ब्लॉग पर सहेजनी पड़ रही है पोस्ट। 😦