गंगातट की वर्णव्यवस्था


Dawn at Ganaga5 इस घाट पर सवर्ण जाते हैं। सवर्णघाट? कोटेश्वर महादेव मन्दिर से सीढ़ियां उतर कर सीध में है यह घाट। रेत के शिवलिंग यहीं बनते हैं। इसी के किनारे पण्डा अगोरते हैं जजमानों को। संस्कृत पाठशाला के छात्र – जूनियर और सीनियर साधक यहीं अपनी चोटी बांध, हाथ में कुशा ले, मन्त्रोच्चार के साथ स्नानानुष्ठान करते हैं। यहीं एक महिला आसनी जमा किसी पुस्तक से पाठ करती है नित्य। फूल, अगरबत्ती और पूजन सामग्री यहीं दीखते हैं।

Dawn at Ganaga8कुछ दूर बहाव की दिशा में आगे बढ़ कर दीखने लगती हैं प्लास्टिक की शीशियां – सम्भवत निषिद्ध गोलियों की खाली की गईं। ह्विस्की के बोतल का चमकीला रैपर।

»»

उसके बाद आता है निषादघाट। केवट, नावें और देसी शराब बनाने के उपक्रम का स्थल।
Country Liquor मैं वहां जाता हूं। लोग कतराने लगते हैं। डायलॉग नहीं हो पाता। देखता हूं – कुछ लोग बालू में गड्ढा खोद कुछ प्लास्टिक के जरीकेन दबा रहे हैं और कुछ अन्य जरीकेन निकाल रहे हैं। शराब की गंध का एक भभका आता है। ओह, यहां विजय माल्या (यूनाइटेड ब्रेवरीज) के प्रतिद्वन्दी लोग हैं! इनका पुनीत कर्तव्य इस गांगेय क्षेत्र को टल्ला[1] करने का है।

वे जो कुछ निकालते हैं, वह नीले तारपोलिन से ढंका एक नाव पर जाता दीखता है! मुझ जैसे इन्सिपिड (नीरस/लल्लू या जो भी मतलब हो हिन्दी में) को यह दीख जाता है अलानिया; पर चौकन्ने व्यवस्थापकों को नजर नहीं आता!

वहीं मिलता है परवेज – लड़का जो कछार में खेती को आतुर है। उससे बात करता हूं तो वह भी आंखें दूर रख बात करता है। शायद मुझे कुरता-पाजामा पहन, चश्मा उतार, बिना कैमरे के और बाल कुछ बिखेर कर वहां जाना चाहिये, अगर ठीक से बात करनी है परवेज़ से तो!

समाज की रूढ़ वर्णव्यवस्था गंगा किनारे भी व्याप्त है!
Country Liquor2


[1] टल्ला का शाब्दिक अर्थ मुझसे न पूछें। यह तो यहां से लिया गया है!


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

43 thoughts on “गंगातट की वर्णव्यवस्था

  1. गंगा मैया की जे . माँ तो अपने सपूत और कपूत को एक जैसा ही स्नेह देती है . वैसे मेरी सलाह है आप ज्यादा ढकी नावं के पास न ही जाए . हर व्यक्ति को उसके रोज़गार सम्बन्धित दखल अच्छा नहीं लगता है शायद आप भी अपवाद नहीं होंगे .

    Like

  2. इसीलिए भूपेन हजारिका कहते हैं ओ गंगा बहती हो क्यूँ ! किसी जगह को नहीं बक्शा इन इम्सानो ने अपनी गन्दी आदत और लालच का शिकार हर जगह को बनाया है !!

    Like

  3. मुझ जैसे इन्सिपिड (नीरस/लल्लू या जो भी मतलब हो हिन्दी में) को यह दीख जाता है अलानिया; पर चौकन्ने व्यवस्थापकों को नजर नहीं आता! व्यवस्थापकों के हफ्ता रूपी चश्मा चढा है जिससे उन्हें ये हरकते नजर ही नहीं आती |

    Like

  4. व्यवस्थापकों को घूस का काला चश्मा पहनाया जाता है, इसलिए नहीं दिखता. न दिखना और प्रयास के उपरांत भी न जान पाने में यहीं तो धुंधला सा परदा है.आप को न तो उसमें जाते सामान में इन्टरेस्ट है और न ही आप उनका कुछ कर सकते है, तो दिख जाता है.भारत की बहुत सी ऐसी चीजें, जिसमें हम कुछ कर नहीं सकते, भारत के बाहर निकलते ही हीरे की चमक लिए दिखने लगती हैं.

    Like

  5. वहीं मिलता है परवेज – लड़का जो कछार में खेती को आतुर है। उससे बात करता हूं तो वह भी आंखें दूर रख बात करता है। शायद मुझे कुरता-पाजामा पहन, चश्मा उतार, बिना कैमरे के और बाल कुछ बिखेर कर वहां जाना चाहिये, अगर ठीक से बात करनी है परवेज़ से तो!समाज की रूढ़ वर्णव्यवस्था गंगा किनारे भी व्याप्त है!hm………….m !

    Like

  6. वर्ण व्यवस्था का स्थान तो वर्ग आश्रित व्यवस्था ने ले लिया है । संज्ञा तो ऐसे आ चिपक जा रही है मानो वह तैयार है समर्पण को । मां गंगा को पुण्य सलिला कैसे देख सकते हैं ये लोग ।इन्हें तो क्षणिक भावावेश में सब कुछ पा लेना है ।आभार!

    Like

Leave a reply to हेमन्त कुमार Cancel reply

Discover more from मानसिक हलचल

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Design a site like this with WordPress.com
Get started