कब होता है पतझड़?
ऋतुयें हैं – ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमन्त वसन्त। पतझड़ क्या है – ऑटम (Autumn) शरद भी है और हेमन्त भी। दोनो में पत्ते झड़ते हैं।
झरते हैं झरने दो पत्ते डरो न किंचित। रक्तपूर्ण मांसल होंगे फिर जीवन रंजित।
यह ट्विटरीय बात ब्लॉग पोस्ट पर क्यों कर रहा हूं? अभी उपलब्धि/लेखन/पठन के पतझड़ से गुजर रहा हूं। देखें कब तक चलता है! ![]()
औरों की ब्लॉग पोस्टें देखता हूं – सदाबहार नजर आती हैं। चहकते, बहकते लोग। धर्म के नाम पर धर्म से लड़ते लोग। कविता कहते सुनते वाहावाही करते लोग। कैसे लोग बाईपास कर जाते हैं शरद और हेमन्त को और सदा निवसते हैं वसन्त में!

मत हो पतझड़ देख उदासहै नवीन का यह आगाज़
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समझ नहीं पाए हम पतझड़ आज तक !
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"औरों की ब्लॉग पोस्टें देखता हूं – सदाबहार नजर आती हैं। चहकते, बहकते लोग। धर्म के नाम पर धर्म से लड़ते लोग। "इस बहस ने तो पूरा धार्मिक उन्माद फैला रखा है , मन बहुत व्यथित है इन मानसिक तौर पर विकृत लोगो की पोस्ट देखकर |
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और जब इतने सारे विवाद चल रहे हों…धर्म के नाम पर लड़ते लडाते , एक दूसरे को कुटते पीसते पीसा हुआ फिर से पीसते तो वहां क्या वसन्त और क्या शरद….सब माया है….कहीं धूप कहीं छाया है :)
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कविमना इसे कैसे बाईपास कर सकते हैं…गुनते हैं..और सहेजते हैं. कौनो जरुरी है कि हर चीज आपको बता ही दी जाये…आपे कौन सारा कुछ बताये हैं जो मन में चल रहा है…इतना भर न: चहकते, बहकते लोग। धर्म के नाम पर धर्म से लड़ते लोग…..:)
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कहाँ-कहाँ से विचार-सूत्र तलाशते हैं आप ! इस बहाने ब्लॉग-नब्ज़ पर उंगली ।
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चहकना बहकना ऐसा कोई मुश्किल काम नहीं है …मुश्किल है स्वनाम को धन्य करती आपकी प्रविष्टियाँ …सावन आये या ना आये जिया जब झूमे सावन है …एक बार मन से मुस्कुराकर देखिये …पतझड़ पास भी नहीं फटकेगा …बहुत शुभकामनायें ..!!
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आज आपके ही आत्मोन्नति window से साभार कुछ लोग महान पैदा होते हैं,कुछ महान बन जाते हैं। कुछ प्रेस एजेण्ट नियुक्त कर लेते हैं। ~ पॉल ब्रण्टन। सन 1934 —————— – अधिभार सहित :) – कुछ लोग विवाद पैदा करते हैं ।कुछ विवादित होना चाहते हैं । कुछ ब्लॉगर बन जाते हैं :) – श्री श्री कतराय स्वामी
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प्रकृति मे पतझड नित समय पर होता है यह सर्व विदित है, किन्तु हिन्दी चिठठाकारी मे २४/७ डेज बारह मास चोबिस घडी पतझड चालू रहता है जी। ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥धर्म भी बुद्धि का विषय है ? ? ? मुम्बई-टाईगरएक प्रसिद्ध हिन्दी ब्लोगर को पहचानो
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औरों का पता नही पतझड का ज़िक्र हो तो मुझे यह याद आती है – पुन: तपेगी वातझरेंगे पीले-पीले पातसहेंगे मौसम के आघातबता दो पात-पात पर लिखे गयेअनुबन्धों का क्या होगा!धूप-छांव में बुने गयेअनुबन्धों का क्या होगा!पावन होगा द्वारकभी तो आओगे इस पारलिये मादक सौरभ का भारबता दो रात-रात भर रचेस्वप्न से छ्न्दों का क्या होगा!धूप-छांव में बुने गयेअनुबन्धों का क्या होगा!मुस्कायेंगे पातमधुप दे जायेंगे सौगातसजेगी मौसम की बारातबता दो सांस-सांस में घुलीहुई उन गन्धों का क्या होगा!धूप-छांव में बुने गयेअनुबन्धों का क्या होगा!महेश सक्सेना[http://hindini.com/fursatiya/archives/400]
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