बिज्जू


paws स्वप्न, बीमार हो तो बहुत आते हैं। स्वप्न में हल्की रोशनी में दीखता है मुझे बिज्जू। जंगली बिलाव सा कोई जन्तु। वह भी मुझे देख चुका है। आत्म रक्षा में अपनी जगह बैठे गुर्राहट के साथ दांत बाहर निकाल रहा है।

मुझे प्रतिक्रिया करने की जरूरत नहीं है। अपने रास्ते निकल सकता हूं। पर आशंकित हूं कि कहीं वह आक्रमण कर बैठा तो? मैं अपने पैर का चप्पल निकाल चला देता हूं। कितने बड़े चप्पल! बाइबल की कहानियों के गोलायथ जैसे का चप्पल!

पर वह निशाने पर नहीं लगता। पहला वार खाली। युद्ध में पहले वार की महत्ता है युद्ध का दोष तय करने को। पहला वार, पहला तीर, पहली गोली! पहला शंख किसने बजाया था महाभारत में?!

अब तो मुझे लगता है कि वह आक्रमण कर ही बैठेगा। मैं दानवीय दूसरा चप्पल हाथ में ले कर उसे पीट पीट कर मार देता हूं। उसके शरीर को बायें पैर से फुटबाल की तरह उछालता हूं। मांस का वह लोथड़ा दो मीटर ऊंची दीवार के पार चला जाता है।

पर मुझे संतोष या विजयी भाव नहीं घेरता। अनुताप घेरता है। क्रोंच वध करने वाले सा। एक छोटे जीव को अनायास मारने का अनुताप।

नींद से जगने पर भी वह भाव नहीं जाता। कई स्वप्न इतनी सूक्ष्मता से स्पष्ट क्यों रह जाते हैं मन: पटल पर?

वह स्वप्न मेरी पर्सनालटी बदलेगा? शायद अगली बरसात में सांप-संपोलों को देख उन्हें मारने को उद्धत करने की बजाय मुझे बगल से निकल जाने को प्रेरित करेगा। मैं पहला शंख बजाने वाला भीष्म नहीं बनना चाहता और निरर्थक छोटे युद्ध का विजेता भी नहीं!

महाभारत – उसकी बात अलग है। कौन न बनना चाहेगा अर्जुन!    


आज तीस जून है। प्रवीण पाण्डेय ने आजके दिन अपनी माता जी के सेवा-निवृत्ति के अवसर पर एक पोस्ट लिखी है – 30 जून 2010; जो आप उनके ब्लॉग न दैन्यं न पलायनम् पर देखें। 

यह पोस्ट ड्राफ्ट में बहुत समय से पड़ी थी। स्वप्न-दुस्वप्न बहुधा चले आते हैं; सो अचानक याद आ गयी। अत: पोस्ट कर रहा हूं। पर ब्लॉग पर टिप्पणी-प्रबन्धन का उत्साह या बल नहीं लग रहा। लिहाजा टिप्पणी बन्द!