एक (निरर्थक) मूल्य-खोज

DSC02733 नैनीताल के हॉलीडे होम के स्यूट में यह रूम हीटर मुंह में चमक रहा है, फिर भी अच्छी लग रही है उसकी पीली रोशनी! मानो गांव में कौड़ा बरा हो और धुंआ खतम हो गया हो। बची हो शुद्ध आंच। मेरी पत्नीजी साथ में होतीं तो जरूर कहतीं – यह है स्नॉबरी – शहरी परिवेश में जबरी ग्रामीण प्रतीक ढूंढ़ने की आदत।

इस सरदी में घर में दो सिगड़ी खरीदनी है, तापने को। पुराने घर में फायरप्लेस तुपवा दिया गया है। उसकी चिमनी मात्र मेहराब सी जिन्दा है। लौटेंगे सिगड़ी की ओर। क्या मैं पर्यावरण को पुष्ट करूंगा? नहीं जी। अपनी खब्तियत को पुष्ट करूंगा। और यह मेरी जेब पर भी भारी पड़ेगा। लकड़ी और कोयला बहुत मंहगा है।

हम जमीन से उखड़े की यह खब्तियत है। और मजे की बात है कि हम पानी पी पी कर कोसते हैं अरुनधत्ती या मेधा पाटकर को, जब वे इसी तरह की खब्तियत (?) दिखाते हैं।।

मैं अपनी गरीब के प्रति करुणा को टटोलता हूं। वह जेनुइन है। पर जब जिन्दल और वेदान्त वाले गरीब की जमीन हड़प कर उसे उसके नैसर्गिक जीवन से बेदखल करते हैं, तो मैं विकास के नाम पर चुप रहता हूं। यह हिपोक्रेसी है न?

डाक्टर ने टेलीफोन पर मेरा हाल ले कर दवाई दी है मुझे। यहां नैनीताल में बेचारे होस्ट ले आये हैं दवा। ले कर सोना है। पर यह क्या अण्ड-बण्ड लिख रहा हूं। DSC02713

सब जा चुके हैं। अपने स्यूट को भीतर से बन्द भी मुझे करना है।

खिड़की से दिखता है नैनी झील में झिलमिलाती रोशनियों का नर्तन। – मेरे गांव में तालाब में इतना पानी होता था कि हाथी बुड़ जाये। अब जिन्दा है गांव का ताल या पट गया?

एक भ्रमित की गड्डमड्ड सोच। गड्डमड्ड खोज।      


मेरा, एक आम भारतीय की तरह, व्यक्तित्व दोफाड हो गया है। अधकचरा पढ़ा है। मीडिया ने अधकचरा परोसा है। मां-बाप सांस्कृतिक ट्रांजीशन के दौरान जो मूल्य दे पाये, उनमें कहीं न कहीं भटकाव जरूर है। भारत का जीवन धर्म प्रधान है पर उसके मूल में हैं कर्मकाण्ड। मॉडर्न पढ़ाई के प्रभाव में कर्मकाण्ड नकारने की प्रवृत्ति रही तो कहीं कहीं धर्म भी फिसल गया हाथ से।

पर यह आधुनिक प्रश्नोप्निषद पचपन साल की उम्र में परेशान क्यों करता है? क्यों कि पचपन की उम्र इन प्रश्नों से दो चार होने की हो रही है शायद!


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

21 thoughts on “एक (निरर्थक) मूल्य-खोज

  1. सच्ची अभिव्यक्ति!! सादर नमन!!"मॉडर्न पढ़ाई के प्रभाव में कर्मकाण्ड नकारने की प्रवृत्ति रही तो कहीं कहीं धर्म भी फिसल गया हाथ से।"यही हो जाता है हमसे।

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  2. श्री भूपेन्द्र सिंह की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी – बहुत भावनात्मक टिपण्णी की है बन्धु आपने ,हमारे अंदर के आदमी की बात्त सुनकर वरना चाहता हर कोई यही कहना पर ऊपर से ओढे हुए आचरण को ही वास्तविकता मान कर दबा देता है अंतर्मन की संवेदना को ,ऑंखें गीली हो गयीं आपकी बातें पढ़ कर /जो भी हो ,आपने मन को छुआ ,मेरा स्नेह ,आदर और दीपावली पर अग्रिम शुभकामनायें स्वीकारिये

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  3. पचपन पहुंचने वाले के पास सवालों के जवाब हों या न हों, वह ठीक-ठाक जवाब देना तो सीख ही लेता है. 'आइ एम नॉट ओके' जैसे सवाल आपके मन में उठ रहे हैं, इसे बनाए रखना चुनौती जैसा ही है.

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  4. ये सवाल तो आते ही रहेंगे और स्नाबरी भी अपनी जगह बनी रहेगी। और व्यक्तित्व में जरूरी नहीं कि सब कुछ सजा संवरा हो, विरोधाभास बने रहने चाहिये वरना बहुत जल्द इंसान अपने को महान समझने लगता है (या लोग ऐसा कहने लगते हैं) और उसके बाद क्या होता है ये बताने कि जरूरत नहीं।लेकिन, वयक्तित्व में सरलता ग्लेशियर के बहाव कि तरह धीरे धीरे आये तो बनी रहती है, इसी तरह विचार भी धीरे धीरे परिष्कृत हों तो लम्बा साथ देते हैं। यूं तो मैने यहां अमेरिका में बहुत सारे So called Environment friendly, supporting green, eco-friendly लोगों को देखा है । लेकिन जब मेरे पिछले जन्मदिन पर एक मित्र (५५ से ऊपर) सपत्नीक आये और एक रीसायकिल हुये ग्रीटिंग कार्ड (जो किसी ने कुछ महीने पहले उनको दिया था) पर अपना नाम पेन से काटकर मेरा नाम लिखा, और देने वाले का नाम काटकर अपना नाम लिखा और साथ में अपना बधाई सदेश भी, तो लगा कि ये इनके व्यवहार का हिस्सा है। किसी रैली अथ्वा विचार से प्रेरित होकर एक हफ़्ते की जद्दोजहद नहीं।ऐसे ही आप चलते चलें, अपने आप स्नाबरी खतम होती रहेगी और विचार बदलते रहेगें :)

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  5. सवाल करने के बाद जो बातें दिमाग में आ रही हैं उन्हें भी लिख दिया कीजिये. कई बार सवाल पूछ के अझुरा के निकल लेते हैं आप :)

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  6. मित्रों नैनीताल मैं छुट्टी मनाने नहीं, वरन एक बैठक के संदर्भ में गया था। और वहां बीमार भी रहा। यह जरूर है कि मुझे ब्लॉग पोस्ट लिखने का अवसर मिला और यात्रा के दौरान जो इण्टरनेट कनेक्टिविटी मिली, वह बहुत खराब नहीं थी। खरीददारी के नाम पर मात्र वापस लौटते समय सडक के एक ओर बैठे एक बालक से मूली खरीदी जो सफेद की बजाय बैंजनी रंग लिये थी। मात्र बीस रुपये का खर्चा। वापस लौट रहा हूं। गाड़ी मुरादाबाद तक आई है। पंकज अवधिया जी का सुझाया वीडियो, धीमे नेट के चलते देख नहीं सका हूं अभी तक। शुभ रात्रि।

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  7. " मेरा, एक आम भारतीय की तरह, व्यक्तित्व दोफाड हो गया है। अधकचरा पढ़ा है। मीडिया ने अधकचरा परोसा है।"सभी अपने व्यक्तित्व के इसी दोहरेपन से जूझ रहें हैं या फिर नज़रें चुरा जाते हैं .

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  8. "भारत का जीवन धर्म प्रधान है पर उसके मूल में हैं कर्मकाण्ड। मॉडर्न पढ़ाई के प्रभाव में कर्मकाण्ड नकारने की प्रवृत्ति रही तो कहीं कहीं धर्म भी फिसल गया हाथ से। "मेरे भावों को इतने सुन्दर ढंग से शब्द और अभिव्यक्ति देने के लिए आपका आभार…

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  9. नैनीताल की खुशनुमा वादियों में विभिन्न विचार आवेंगे. अम्पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाएँ, केवल काम चलाऊ नहीं.

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