पर्यटन क्या है?


मैं पर्यटन पर नैनीताल नहीं आया। अगर आया होता तो यहां की भीड़ और शानेपंजाब/शेरेपंजाब होटल की रोशनी, झील में तैरती बतख नुमा नावें, कचरा और कुछ न कुछ खरीदने/खाने की संस्कृति को देख पर्यटन का मायने खो बैठता।

DSC02698 पैसे खर्च कर सूटकेस भर कर घर लौटना क्या पर्यटन है? या अब जब फोटो खीचना/वीडियो बनाना सर्व सुलभ हो गया है, तब पिंकी/बबली/पप्पू के साथ सन सेट का दृष्य उतारना भर ही पर्यटन है?

पता नहीं, मैं बहुत श्योर नहीं हूं। मैं इसपर भी पक्की तरह से नहीं हुंकारी भर सकता कि फलानी देवी या फलाने हनुमान जी को मत्था टेक पीली प्लास्टिक की पन्नियों में उनके प्रसाद के रूप में लाचीदाना ले लौटना भी पर्यटन है। मैने काठगोदाम उतर कर सीधे नैनीताल की दौड़ नहीं लगाई। मुझे वहां और रास्ते के अंग्रेजी बोर्डिंग स्कूलों में भी आकर्षित नहीं किया। एक का भी नाम याद नहीं रख सका।DSC02670

ड्राइवर ने बताया कि काठगोदाम में कब्रिस्तान है। मेरी रुचि वहां जा कर उनपर लगी प्लेक पढ़ने में थी। ड्राइवर वहां ले नहीं गया। पर वह फिर कभी करूंगा। मुझे रस्ते के चीड़ के आसमान को चीरते वृक्षों में मोहित किया। और मैं यह पछताया कि मुझे कविता करनी क्यों नहीं आती। ढ़ाबे की चाय, रास्ता छेंकती बकरियां, पहाड़ी टोपी पहने झुर्रीदार बूढ़ा, भूस्खलन, दूर पहाड़ के ऊपर दीखती एक कुटिया – ये सब लगे पर्यटन के हिस्से।DSC02687

खैर, यह मुझे समझ आता है कि सूटकेस भर कर घर लौटने की प्रक्रिया पर्यटन नहीं है।

चीड के पेड़, धान के खेत, पाकड़ के वृक्ष, पहाड़ी  सर्पिल गौला नदी शायद अपनी सौन्दर्य समृद्धि में मगन थे। पर अगर वे देखते तो यह अनुभव करते कि ज्ञानदत्त का ध्यान अपनी घड़ी और अपने पर्स पर नहीं था – वह उनसे कुछ बात करना चाहता था। वह अभी पर्यटक बना नहीं है। अभी समझ रहा है पर्य़टन का अर्थ।

इतनी जिन्दगी बिता ली। कभी तो निकलेगा वह सार्थक पर्यटन पर!


मेरा सार्थक पर्यटन कहना शायद उतना ही सार्थक है जितना अपनी पुस्तक को समर्पित करती अज्ञेय की ये पंक्तियां:
यद्यपि उतना ही निष्प्रयोजन, जितना
एक प्राचीन गिरजाघर से लगे हुये एक भिक्षु-विहार में बैठ कर
अन्यमनस्क भाव से यह कहना कि “मैं जानता हूं
एक दिन मैं फकीर हो जाऊंगा।”


रामपुर


DSC02658आज सवेरे आठ बजे रामपुर था, मेरी काठगोदाम तक की यात्रा में। चटकदार सफेद यूनीफार्म में एक दुबले सज्जन ने अभिवादन किया। श्री एस के पाण्डे। स्टेशन मैनेजर। बताया कि वे जौनपुर के हैं पर अवधी का पुट नहीं था भाषा में। बहुत समय से हैं वे रामपुर में।

रामपुर मुस्लिम रियासत थी। शहर की ढाई लाख की आबादी में साठ चालीस का अनुपात है मुस्लिम हिंदू का। मोहम्मद आजम खान हिंयां राजनीति करते हैं। राजनीति या नौटंकनीति? एक बार तो वे स्टेशन के प्लेटफार्म पर पसर गये थे – इस बात पर कि उनके बाप दादा के जमाने का फर्श तोड़ कर टाइल्स क्यों लगवाई जा रही हैं।

स्टेशन की इमारत अच्छी है। बाहर एक बड़ा पाकड़ का पेड़ दिखा। मानो पीपल को अपना कद कम करने को विवश कर दिया गया हो। या उसे उसकी माई ने हाइट बढ़ाने के कैप्स्यूल न खिलाये हों! प्लेटफार्म पर भी पाकड़ थे। उनके चौतरे पर लोग बैठ सकते थे छाया में।

DSC02657 मेरे इंसपेक्टर महोदय ने कहा कि साहब एक ही चीज प्रसिद्ध है रामपुर की – रामपुरी चाकू। गाड़ी बीस मिनट रुकती है। खरीद लायें क्या? मैने कोई उत्सुकता नहीं जताई।

स्टेशन के पास घनी आबादी है। श्री पाण्डे बताते हैं कि ज्यादा पुरानी नहीं है। कुछ दशकों में बसी है।

मैने पूछा – रामपुर का राम से कुछ लेना देना है? पाण्डेजी बोले – कुछ समय से लोग बोलने लगे हैं कि पास में कोसी नदी बहती हैं; वहां राम जी आये थे। नहीं तो यह जगह शायद रमपुरा गांव थी।

भगवान राम चन्द्र पहले लोक संस्कृति में थे, पर अब उनको बहुत लोग अपने अपने एरिया में बुलाने लगे हैं!  🙂


हल्द्वानी में ट्रेन हॉल्ट के दौरान पोस्ट की गयी यह।


लल्लू


हमें बताया कि लोहे का गेट बनता है आलू कोल्ड स्टोरेज के पास। वहां घूम आये। मिट्टी का चाक चलाते कुम्हार थे वहां, पर गेट बनाने वाले नहीं। घर आ कर घर का रिनोवेशन करने वाले मिस्तरी-इन-चार्ज भगत जी को कहा तो बोले – ऊंही त बा, पतन्जली के लग्गे (वहीं तो है, पतंजलि स्कूल के पास में)!

यानी भगत जी ने हमें गलत पता दिया था। पतंजलि स्कूल कोल्ड स्टोरेज के विपरीत दिशा में है।

GDP977-001 अगले दिन उन गेट बनाने वाले सज्जन को वे हमारे घर ले आये। उन्होने नाम बताया – लल्लू।

बस लल्लू? पूरा नाम क्या है? उन्होने कहा कि यही है, सब उन्हे लल्लू के नाम से जानते हैं।

पूरी बात करने पर हमने दस हजार रुपये का बयाना दिया। उनका नाम दर्ज किया मोबाइल में। एक बार फिर पूछा मैने – नाम लल्लू भर है? अब उन सज्जन ने दस हजार की गड्डी जेब में डालते हुये कहा – “वैसे नाम नसीम अहमद है। पर सब लल्लू के नाम से ही जानते हैं।”

मैं समझ गया; हिन्दू बहुल क्षेत्र में नसीम अहमद मुस्लिम होने के कारण अपने ग्राहक खोना नहीं चाहते। लिहाजा लल्लू हैं।

लल्लू चलने को हुये। उनके नमस्ते करने पर मेरी पत्नीजी ने कहा – अरे, जरा रुकिये, पानी तो पीते जाइये।

वे रसोई में गयीं, लल्लू जी के लिये जलपान लाने को। इस लिये कि लल्लू यह न समझें कि लल्लू से नसीम अहमद होते ही वे घर के दाना-पानी के अयोग्य हो गये!

एक समाज बने जिसमें नसीम अहमद को लल्लू कहाने की जरूरत न पड़े।     


अनुराग शर्मा (स्मार्ट इण्डियन) जी ने मेरा पगड़ी युक्त चित्र भेजा है। बकौल रीता पाण्डेय, बहुत जम रही है पगड़ी।

Gyandutt Turban 

एक बार मेरे सहकर्मियों नें इन्दौर में पहनाई थी पगड़ी। पर वह चित्र कहीं इधर उधर हो गया।


भाग ६ – कैलीफिर्निया में श्री विश्वनाथ


यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अमरीकी/कैलीफोर्निया प्रवास पर छठी अतिथि पोस्ट है।


इस बार बातें कम करेंगे और केवल चित्रों के माध्यम से आप से संप्रेषण करेंगे।

शॉपिंग:
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एक जमाना था, जब हम विदेश से चीजें खरीदकर लाने में गर्व महसूस करते थे। अब भूल जाइए इस बात को। कुछ चीज़ों को छोडकर, हम भारतीयों के लिए वहाँ से कुछ खरीदना मूर्खता ही लगता है।

सब कुछ यहाँ भारत में उपलब्ध है और बहुत ही कम दामों में।
कई सारी चीज़ें तो भारत, चीन, बंगला देश से वहाँ भेजी जाती हैं जहाँ तीन या चार गुना दामों पर बिकती हैं।

वैसे मॉल्स तो बहुत अच्छे हैं और हमारे मॉल्स से बडे हैं। चित्र देखिए।
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हमने कई सारे मॉल्स देखे पर वहां कुछ खरीदने से हिचकते थे। पत्नी चीज़ें देखती थीं,  अच्छी लगती थीं फ़िर दाम देखती थीं और झट मन में डॉलर को रुपयों में बदलती थीं  और फ़िर चौंक जाती थी।

हम दूर से तमाशा देखते रहते थे।

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बस किसी तरह कुछ तो वहाँ से खरीदकर ले ले जाना  ही था।

लोग क्या कहेंगे? अरे! अमरीका से कुछ नहीं लाया? पत्नि ने अपनी लालसा पूरी की। यह देखिए, पत्नी और बेटी किन चीज़ों से आकर्षित हुए हैं। यहाँ की सभी वस्तुएं  एशियाई देशों से वहाँ पहुंची हैं।

हमें चुप और खुश करने के लिए हम से पूछे बगैर मेरे लिए कुछ कपडे और एक घडी  खरीदकर दी ।
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जैसा मैंने पहली किश्त में बताया था, अमरीकी लोग ज्यादा दिखाई नहीं देंगे आपको।
चेहरे देखिए इस चित्र में। ग्राहक चीनी या कोरियाई लगते हैं।
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एक बात हमें पसन्द आई। जब मॉल वाले कोई नई खाने लायक चीज़ बेचना चाहते हैं तो फ़्री सैंपल (free sample) का प्रबन्ध है। इस महिला को देखिए जो फ़्री सैंपल तैयार कर रही है। हमने अवसर पाकर खूब इन चीज़ों को चखा।

यह भी अच्छी चाल है। हम तो भोले भाले हैं। फ़्री सैंपल चखने के बाद वहाँ से छुपके से खिसक जाना हमें अच्छा नहीं लगा।
क्या सोचेंगे यह अमरीकी लोग भारतवासियों के बारे में? मन की शान्ति के लिए कुछ खरीदना पड़ा। 😦
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बर्फ़ का अनुभव
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आजीवन हम पश्चिम या दक्षिण भारत में ही रहे हैं। हमने ज़िन्दगी में बर्फ़ का अनुभव कभी नहीं किया था। कभी कशमीर या सिमला गए ही नहीं।

यह मेरा पहला मौका था बर्फ़ को देखने, छूने और उसका अनुभव करने का। हम Squaw  Valley  गये थे, जो Lake Tahoe  टैहो के पास है। आप बर्फ़ की तसवीरें देखिए। उसपर चलने में थोडी कठिनाई हुई| चलने में पैर फ़िसलने का डर रहता था। पर कुछ देर बाद आसानी से चल सके।
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पहली बार स्नोमैन (snowman) बनाने की कोशिश की। फ़्लॉप हुआ मेरा प्रोजेक्ट।
गणेशजी की मूर्ति बनाने निकला था और देखिए क्या बना पाया।
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फ़िर भी गर्व से उस की एक तसवीर लेने में मुझे झिझक नहीं हुई।
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Lake Tahoe भी गया था। अति सुन्दर झील है यह। एक किनारे पर रेत और दूसरे किनारे पर चिकने और गोल गोल कंकड।
पानी इतना ठंडा और शुद्ध कि हम तो बिना किसी हिचक उसे अपने हथिलियों में लेकर पीने लगे। भारत में हिम्मत नहीं होती ऐसी झीलों से पीने की, सिवाय हरिद्वार / हृषिकेश में गंगा के पानी के।
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सैन फ़्रैन्सिस्को
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दो बार सैन फ़्रैन्सिस्को गया था। पत्नी के लाख मना करने के बावजूद, हम Apple I Store के अन्दर झांकने से अपने आप को रोक नहीं सके| उसे चिढ है इन गैड्जेटों से। कहती है "तुम्हारा इन चीज़ों से लगाव अस्थायी होता है। बाद में मुझे ही इन चीज़ों पर जमे धूल को साफ़ करना पडता है।"

करीब बीस मिनट Apple का  नया Ipad को आजमाया। कमाल की चीज़ है यह। काश यहाँ भारत में उपलब्ध होता।

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छोटी मोटी दुकानें तो कई सारे देखीं| दो नमूने पेश हैं:

  1. इस दुकान में केवल चॉकलेट बिकते हैं और कोई चीज़ नहीं।
    बच्चे  तो यहाँ से बाहर निकलना ही नहीं चाहेंगे। वैसे हम भी किसी बच्चे से कम नहीं, इस विषय में।
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  2. इस बेकरी को देखिए| डबल रोटी नाना प्रकार की अकृतियों में बना रहे हैं। बच्चों को यह बहुत भाता है
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सैन फ़्रैन्सिस्को चिडियाघर भी गया था| कुछ खास नहीं पर एक मोर को देखने पर भारत (जयपुर और पिलानी) की याद आ गई| मोर पिंजरे में बन्द नहीं था और इधर उधर घूमता रहता था|
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और देखिए इस गोलमटोल और रोयेंदार भेड़ को। वह भी स्वतंत्रता से घूम रहा था और हमे इसे छूने ओर सहलाने कि अनुमति थी। केवल कुछ खिलाना भर वर्जित था।
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जिन्दगी में पहली बार एक ध्रुवीय भालू( polar bear) देखा।
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आगे अगली किस्त में ।
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ


अपने आप से झूठ


Devid Law पता नहीं यह यहां स्वीकार या अस्वीकार करने से फर्क पड़ता है मैं झूठ भी बोलता हूं। झूठ बोलना मानव स्वभाव का बहुत स्वाभाविक अंग है। यह इससे भी सही लगता है कि सदाचार की पुस्तकों और पत्रिकाओं में बहुत कुछ बल इस बात पर होता है कि सच बोला जाये। पर मूल बात यह है कि आदमी अपने आप से कितना झूठ बोलता है।

यह मैने प्रॉस्पेक्ट्स मैगजीन के डेविड लॉ पर लिखे इस लेख को पढ़ने के बाद लिखा है। मेरे मन में कई भारतीय चरित्र घूम रहे हैं। विशेषत: राजनीति में!

कौन अपने आप से ज्यादा झूठ बोलता होगा – एक आम आदमी या एक हाई प्रोफाइल राजनेता? मेरे ख्याल में जो ज्यादा बोलता है, जो ज्यादा इमप्रॉम्ट्यू कम्यूनिकेट (impromptu communicate) करता है – वह ज्यादा झूठ बोलता है। और जो ज्यादा झूठ बोलता है, कमोबेश वह अपने आप से भी उतना अधिक झूठ बोलता है!

यह तो कॉमन प्रेक्टिस है, मैने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे किसी को हानि हो, मैने जान बूझ कर यह नहीं किया, उस दशा में कोई भी व्यक्ति ऐसा ही करता, पहले इस तरह की अवस्था हो ही नहीं सकती थी (तकनीकी विकास न होने से इसके नॉर्म्स ही नहीं बने हैं)” – आदि कुछ तर्क आदमी सेल्फ डिफेंस में बनाता है। पर वह गहरे में जाये तो जान जाता है कि वह सब सही नहीं है।

अपने आप से झूठ बोलना हम स्वीकार करें या न करें, घोर झूठ होता है। झूठ सामान्यत: अप्रिय दशा से बचने के लिये कहा जाता है, और अवचेतन में अपने आप से अपनी ईमेज बचाने के लिये कहा जाता है। सम्भव है नरो वा कुंजरो वा वाला अपने आप से बोला गया युधिष्ठिर का झूठ इसी तरह का रहा हो। और युधिष्ठिर अपने चरित्र के एक स्तर पर उसे सच मानते रहे हों। 

यह टेक्टिकल सच हम यदा कदा बोलते हैं। स्थिति से आत्म दिलासा के साथ निकल लेते हैं कि हमने अपने आप से झूठ नहीं बोला। पर वह होता झूठ ही है। वह जब हस्तामलकवत हमें घेरता है, तब घोर आत्म पीड़ा होती है। कैसे पार पाया जाय उस पीड़ा से। कैसे हो उसका प्रायश्चित?

एक तरीका तो मुझे यह लगता है कि डैमेज कंट्रोल किया जाय। जहां तक उस झूठ की मार पंहुची है, वहां तक उसे स्वीकार से समाप्त किया जाये। उसके प्रभाव से जो प्रभावित हुये हैं, उनसे क्षमा याचना की जाये।

पर उससे तो एक राजनेता की सारी इमारत ध्वस्त हो जायेगी?! नहीं? 


बेंगाला का नहीं, कैलीफोर्निया का फैण्टम


हमने पढ़ा है कि फैण्टम नामक मशहूर कामिक्स का चरित्र बेंगाला नामक अफ्रीकी देश (नक्शे पर नहीं मिलेगा, यह मिथकीय देश है) का है। पर हमारे गोपालकृष्ण विश्वनाथ जी को एक अन्य फैण्टम के दर्शन उनके कैलीफोर्निया प्रवास में हुये। मैने उनसे नहीं पूछा कि उन्हे डायना पॉमर भी दिखी या नहीं। आप पूछने के लिये स्वतंत्र हैं!

आप उनकी इस अतिथि पोस्ट में उनके संस्मरणों की पांचवीं किश्त पढ़ें: 


अब कुछ निजी अनुभवों के बारे में जानकारी दे दूँ।

सोचा इस बार कम लिखूँगा और चित्रों को बोलने दूँगा।

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केप्शन : यह है पडोस की एक बहुत ही सुन्दर बिल्ली जिससे मैंने बार बार दोस्ती करने की कोशिश की पर इस घमण्डी बिल्ली ने हर बार मेरा दोस्ती का हाथ ठुकरा दिया। कोई बात नहीं। कम से कम एक दिन तसवीर लेने की अनुमति दे दी उसने।

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केप्शन: अगर पहली बार सफलता न मिले तो क्या, फिर यत्न करें! (If at first you don’t succeed, try again.)

कुछ दिन बाद मैंने दूसरी बिल्ली से संपर्क करने की कोशिश की। इस बार सफ़ल हुआ।

यह काली बिल्ली (जिसका नाम था फेण्टम – Phantom) रोज एक ही समय हमारे घर के पीछे के  बगीचे में आती थी और मुझसे दोस्ती करने के लिए राजी हुई।

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केप्शन: हम इससे खेलने लगे थे। एक पुराना टेनिस का गेंद मिल गया जो बहुत काम आया।

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केप्शन: एक दिन बिन बुलाए, वह घर के अन्दर घुस गई। पत्नी को बिल्ली से कोई लगाव नहीं है। उसने बिल्ली को रोकने की कोशिश की। पर बिल्ली (बिल्ले) ने कह दिया, मैं आपसे मिलने नहीं आया। हम तो विश्वनाथजी के मेहमान हैं। :-) 

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केप्शन : बस पूरे आत्मविश्वास के साथ हमारे ड्राइंग  रूम के सोफ़े की नीचे लेट गई।

पत्नी ने मुझे आवाज देकर आदेश दिया, तुम्हारे इस दोस्त को बाहर ले जाओ।

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केप्शन : हम कहाँ मानते पत्नी की बात?  बस उठा लिया उसे और गोदी में रखकर पुचकारने लगे।

नाम था उसका वेताल (फेण्टम – Phantom)। कैसे पता चला? उसके गले में पट्टी बाँधी हुई थी और उसमें उसका नाम, मालिक का पता और फ़ोन नम्बर भी लिखा था। बडे गर्व के साथ इस चित्र को बेटी को दिखाना चाहा। उसने चेतावनी दी:

खबरदार जो उसे कुछ खिलाया। यदि बिल्ली किसी कारण बीमार हो जाती है या उसे चोट आती है तो पडोसी हम पर मुकदमा दायर कर देंगे! यह भारत नहीं है, अमरीका है!


क्या हुआ यदि अमरीकी लोग मुझसे दोस्ती करने में हिचकते थे? कम से कम वहाँ की बिल्लियाँ ऐसी नहीं हैं। ऐसा क्यों कह रहा हूँ? मेरे कुछ कटु अनुभवों के बारे में भी आपको बता दूँ।

पिछले दस साल से मेरा नाम,  करीब ४ हज़ार अमरीकी लोगों को पता है। यह इसलिए के मैं कुछ professional  yahoo groups का बहुत ही सक्रिय सदस्य रहा हूँ।  और यह सभी लोग मेरे नाम, निवास-स्थान, आयु, पेशा और विचारों से परिचित हैं। इन में से करीब १०० से भी ज्यादा लोग मेरे अच्छे मित्र भी कहे जा सकते हैं क्योंकि हमारे बीच काफ़ी प्राइवेट पत्र व्यवहार हुआ है।

यह लोग भारत  के बारे में, हमारी संस्कृति, इतिहास, भारत – पाकिस्तान के बीच हो रही घटनाओं के बारे में जानकारी  के लिए मुझे ईमेल करते थे और उत्तर देते देते मैंने  इन लोगों से अच्छी दोस्ती कर ली थी। वे लोग भी हमसे अमरीका में हो रही घटनाओं के बारे में हमारी निष्पक्ष राय जानना चाहते थे। यह लोग मेरी अंग्रेजी से काफ़ी प्रभावित होते थे। इनमें से तीन ऐसे भी हैं जो किसी कारण भारत आए थे और बेंगळूरु में कोई काम न होते हुए भी केवल मुझसे मिलने के लिए एक दिन बेंगळूरु आए थे। मैंने उनको बाराती जैसा ट्रीटमेन्ट दिया था जिसकी उन्हें अपेक्षा नहीं थी।

कैलिफ़ोर्निया पहुँचने से पहले हमने इन इंटरनेट के दोस्तों से कहा था कि हम पहली बार अमेरिका आ रहे हैं।  सोचा था इनसे अवसर मिलने पर मुलाकात होगी या कम से कम टेलिफ़ोन पर बात होगी और हमने इनसे पता और टेलिफ़ोन नम्बर माँगा ।

पर मुझे निराश होना पडा। सौ से भी ज्यादा लोगों में से केवल १० लोगों ने अपना टेलिफ़ोन नम्बर और पता बताया। इन सब से मेरी टेलिफ़ोन पर बात हुई । केवल एक मित्र घर से निकल कर, १०० से ज्यादा मील गाडी चलाकर मुझसे मिलने आया था। दो घंटे तक हम बात करते रहे। यह मित्र है केविन (Kevin), जिसके साथ मैंने यह चित्र खिंचवाया।

kevin

एक खास मित्र के बारे में आपको बताना चाहता हूँ। यह एक महिला थी जो करीब मेरी ही उम्र की थी। इनके साथ मेरा पत्र व्यवहार सबसे ज्यादा था। सोचा था, चाहे अन्य लोगों से न सही, पर इस महिला से अवश्य मिलूँगा। पर जब पता माँगा तो पता नहीं क्यों इस महिला ने मुझसे बचने की कोशिश की!  बहाने भी अजीब निकले। कहने लगी की मेरा उसके यहाँ  आना ठीक नहीं होगा। उसका घर इस योग्य नहीं है, और उसकी हाउसकीपिंग (housekeeping) इतनी घटिया है कि उसे किसी को घर बुलाते शर्म आती है। उसने यह भी कहा के उसके दो कुत्ते  भी हैं जो मेहमानों को काटते हैँ।

समझने वालों को बस इशारा काफ़ी है। हम वहाँ नहीं गए। टेलोफ़ोन पर बात करके सन्तुष्ट हो गए।

भारत में भी मेरे ब्लॉग जगत के कई सारे इंटर्नेट मित्र हैं।

अवश्य, अवसर मिलने पर किसी दिन इन मित्रों से साक्षात भेंट करना चाहता हूँ और कुछ लोगों से भेंट हो चुकी है।  सपने में भी सोच नहीं सकता के मेरे भारतीय मित्र मुझसे ऐसा व्यवहार करेंगे जो अमरीकी दोस्तों ने किया।

आज इतना ही। सोचा था यह अन्तिम किस्त होगी। विष्णु बैरागी जी और स्मार्ट इन्डियनजी तो मुझे प्रोत्साहित कर रहे हैं। यदि कुछ और दोस्त भी चाहते हैं तो इसे कुछ दिन और जारी रखूँगा। अपने अनुभवों को आप लोगों पर थोंपना नहीं चाहता। ज्ञानजी की कृपा है हम पर। पाँच किस्तें बर्दाश्त की  है। फ़िलहाल मेरा अपना ब्लॉग आरंभ करने का कोई इरादा नहीं है। आखिर कब तक उनकी उदारता का फ़ायदा उठाता रहूँ?

शुभकामनाएं

जी विश्वनाथ


और मैने विश्वनाथ जी से कहा है कि यह ब्लॉग उनका अपना ही मानें। हां, पोस्ट का दिन शेड्यूल करने के मामले में आजकल मैं कुछ आलस्य दिखाता हूं। आशा है वे अन्यथा न लेते होंगे। बाकी, वे जितना मन आये लिखें। जब लिखने-पढ़ने वाले राजी हैं, तो हम कौन होते हैं फच्चर फंसाने वाले! 🙂

हाँ, बतौर ब्लॉगर यह जरूर चाहूंगा कि विश्वनाथ जी अपना एक ब्लॉग बनायें!