
कछार में इस पार लोग सब्जियां लगाते थे। हाथ से ही गड्ढा खोदते, बीज डालते और खाद-पानी देते थे। पिछली बरस कल्लू-अरविन्द और उसके पिताजी को डीजल जेनरेटर/पम्पिंग सेट के माध्यम से गंगाजी का पानी इस्तेमाल कर सिंचाई करते देखा था। इस साल देखा कि उनके कुछ हिस्से में ट्रैक्टर से गुड़ाई कर कुछ बीज डाले गये थे। अर्थात इस बार किसानी का तरीका पुन: बदला है उन लोगों ने।
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कल्लू के विषय में पिछले सीजन की दो पोस्टें –
कल्लू का बिजूका
गंगा के पानी की पम्पिंग कर सिंचाई
आज (रविवार 13 नवम्बर को) कल्लू दिखा। एक टेण्ट सा बना लिया है अपने खेत के किनारे। वह और उसके साथ एक दो बच्चे खरपतवार बीन कर अलाव जला रहे थे। उससे मुलाकात की मैने।
क्या बोया है?
मटर। और उस खेत में सरसों। दोनो खेत आसपास हैं। गंगाजी की जल धारा से लगभग 150-200 मीटर की दूरी पर। मैं पानी देने की बात उठाता हूं तो कल्लू बताता है कि पम्पिंग से पानी दिया जायेगा। असल में सामान्य से अलग प्रकार से खेती करने में पिछले सीजन का पम्पिंग कर पानी पंहुचा सकने का आत्मविश्वास काम आ रहा है उसके।
वह तकनीक की बात करता है, वह मेहनत की बात करता है। वह यह भी री-इटरेट करता है कि मेहनत करने से कोई परहेज नहीं है उसको। दिमाग और मेहनत के मेल वाला व्यक्ति मुझे पसन्द आता है। कल्लू भी पसन्द आया!
आप देखियेगा, बढ़िया फसल होगी मटर और सरसों की। आपको खूब फोटो खींचने को मिलेगा! कल्लू आत्मविश्वास से कहता है।

एक टेण्ट सा लगाया है उसने। मैं पूछता हूं कि रात में रहते हो क्या यहां पर। उसने बताया कि अभी तो नहीं, पर जब फसल कुछ बड़ी होगी, तब रहेगा। मटर की छीमी जब दानेदार हो जायेगी, तब उसे चोरी से बचाने के लिये दिन रात लगना पड़ेगा कल्लू और उसके परिवार को।
गंगा का मैदान और उसमें लगा टैण्ट, जलता अलाव और धुआं। हल्का कोहरा और सवेरे की रोशनी में सब कुछ बहुत सुन्दर लगा।
मटर और सरसों जमेगी, बड़ी होगी। उसके बहाने कल्लू से मुलाकात होती रहेगी!
(दोपहर में भी कोई काम न होने के कारण यूं ही घाट पर चला गया। लगता है, कल्लू ने घाट की सीढ़ियों पर सीनियर सिटीजंस के लिये रैम्प बनाने के काम में लेबर का ठेका ले लिया है। वह अपने साथ के पांच छ लड़कों के साथ गंगा की रेती खोद कर रैम्प बनाने में डाल रहा था। हरफनमौला जीव है वह!)


रोचक।
सरल हिन्दी का प्रश्न मेरे मन में भी उठा था।
सुबह सुबह गंगा और गंगा तट के चित्र देखकर और आपके लेख पढकर अच्छा लगा।
काश गंगा किनारे हमारा एक छोटा सा घर होता ।
बरसों से मेरी इच्छा रही है कि किसी नदी तट पर या किसी पहाड की चोटी पर या समुद्र तट पर रिटायरमेंट के बाद बस जाऊं
इस बडे शहर से ऊब चुका हूँ
जी विश्वनाथ
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आप ऊब गये हैं तो यात्रा पर निकल लें।
यहां इलाहाबाद भी आयें – यहां का गंगा कछार देखने।
कब बना रहे हैं कार्यक्रम?
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आपके मॉडल भी बड़े अनूठे हैं !
जन्मदिन की बहुत शुभकामनायें !
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मॉडल तो गंगामाई के हैं!
और कोई उनकी बात नहीं करता और मेरे पास बात करने का और कोई मुद्दा नहीं। लिहाजा ब्लॉग पर वही लोग दिखते हैं! :-)
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रोचक मुलाकात!
आपको जन्मदिन की मंगलकामनायें। :)
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धन्यवाद। धीरे धीरे सारा पर्सोना गंगामय होता जा रहा है हमारा! कई लोगों को लगता होगा कि बन्दे के पास कहने को और कुछ हईये नहीं है! :-)
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पर्सोना गंगामय होता जा रहा है यह अच्छा है। बहुत कुछ है गंगा कथा में। आपके गंगा के किनारे यात्रा वाले ड्रीम प्रोजेक्ट का क्या हुआ? :)
जन्मदिन कैसे मनाया इस पर भी एक पोस्ट लिखी जाये। :)
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सर्दी में दो-दो रजाईयाँ से भी परहेज न करने वाला मैं कल्लू का टेण्ट देखकर परेशान हूँ। पूस की रात में इससे कैसे गुजारा होगा। हल्कू की तरह अलाव पर रात काटनी होगी फिर तो! जन्मदिन की बधाईयाँ!
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इस चित्र में देखें – पिछले सीजन में कल्लू खुले आसमान तले रेत में रजाई ले कर सो रहा था! :-)
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कल्लू और मित्रों को रोजगार, देश को मटर व सरसों, आपको सुन्दर दृश्य और हमें पठनीय सामग्री। हर ओर लाभ ही लाभ।
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बिल्कुल!
वैसे कल्लू के साथी संगी जो वर्जनाहीन गाना का रहे थे, वह ब्लॉग पर आ जाये तो सारे पाठक गायब हो जायें! :-)
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after all, diversity is the rule of an enterpreneur. कल्लू के मटर खूब फ़लें और साथ में उसकी ठेकेदारी भी। हरफ़नमौला होना गुण है, कई बार जिंदा रहने की जद्दोजहद भी हरफ़नमौला बना देती है।
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उसका सारा परिवार हरफनमौला लगता है। आप पुरानी पोस्टें पढ़ें तो पता चलेगा!
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Does Kallu own this farm?what’s current price for this farm land per acre?
Those who had farm land near national highways in past they are very rich today.
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No, Kallu does not own the land. It is released by the flow of Ganges and these people have some understanding to take it for farming. They only put in their labour and get the benefit of produce.
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जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं जी!
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धन्यवाद आशीष जी।
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खेती बाड़ी , मचान , अलाव , यह शब्द सुन कर की मन रोमाचित हो जाता है |
घर ( थानारामपुर – बनारस ) रहने का सौभाग्य कम मिला , सिवाय गर्मी की
छुट्टियों के , मुझे याद आ रहा है मक्के के खेत में मचान ( जीरो + १ महला )
पर बैठ कर ..कड़े कड़े कौवा ..नवाब क बेटाउवा..कह कर कौवा उड़ाते थे…
धन्यवाद गुरुवर इन सारी घटनाओ को जिवंत हम तक पहुचाने के लिए …
पालागी ..गिरीश
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आपसे कभी मिलना होगा तब बहुत कुछ एक्स्चेंज होगा बन्धुवर!
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जीवन ऐसे ही चलता है
अहर्निश,
आगे बढ़ता हुआ,
सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ।
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हाँ, और अच्छा लगता है देखना – सीढ़ियाँ भी चढ़ना भी।
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