कछार रिपोर्ताज – 3

कोई अपने प्रिय जानवर को रात में दफना गया है गंगाजी की रेती में। यह काला कुकुर खोदने का प्रयास कर रहा है कब्र।

बहुत कम होता है, या हूं कहूं कि शिवकुटी के इस हिस्से में पहली बार देखा – कोई अपने प्रिय (शायद पालतू जानवर) को दफना गया था रेत में। एक गेरुआ कपड़ा और गेन्दा की माला थे कब्र के ऊपर। एक काला कुत्ता कब्र खोदने का प्रयास कर रहा था। भगाने पर भी वहीं आ जा रहा था। अगर वह खोद पाया तो शव की दुर्गति तय है। पर मरे की क्या दुर्गति?

यह देखा कि कई साल से लोग मिट्टी की गगरी या प्लास्टिक की बाल्टी से रेत में आठ-दस फीट गहरे खोदे कुंये से पानी निकाल कर अपनी कछार की सब्जियां सींचते रहे हैं। पिछली साल राम सिंह जी को डीजल के पम्प से सिंचाई करते देखा था। इस साल उनका लड़का कल्लू बता रहा था कि तीन अलग अलग जगह खेती करने के कारण वह ठेले पर सिंचाई पम्प रख कर इस्तेमाल कर रहा है। पर इस साल पम्प इस्तेमाल करने वाला वह अकेला नहीं है। मैने देखा कि कई अन्य ने रेत में खुदाई कर गंगाजी के पानी की पम्पिंग व्यवस्था कर ली है और लम्बी कोलेप्सेबल पाइप का प्रयोग कर दूर तक सिंचाई कर ले रहे हैं। शायद लम्बे पाइप से एक दूसरे का खेत भी सींच ले रहे हैं। इससे मैनुअल लेबर की जरूरत कम हुई है और फसल की क्वालिटी बेहतर लग रही है।

पिछले साल की पोस्ट पर मैने पम्प से सिचाई को ‘लीप फारवर्ड’ कहा था। उस पर अशोक पाण्डेय की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी थी – 

ज्ञान दा, आप जिस ‘तकनीकी लीप फार्वर्ड’ की बात कर रहे हैं, उसके लिए चीन को धन्‍यवाद देना चाहिए। ये चायनीज डीजल इंजन पंपिंग सेट है। वजन मात्र 50-55 किलो, डीजल की खपत मात्र आधा लीटर प्रति घंटा, कीमत मात्र 10 से 12 हजार रुपए। जब से भारत में यह आयी है, खेतों की सिंचाई में किसानों को काफी सुविधा हो गयी है। छोटी-छोटी चीजें ही खेती में क्रांति लाती हैं। चाइनीज सेट और प्‍लास्टिक के पाइप से किसान कहां से कहां तक पानी पहुंचा दे रहे हैं… आज से एक दशक पहले तक किसानों को एक जगह से दूसरी जगह तक पानी पहुंचाने के लिए खेत में कच्‍ची या पक्‍की नाली बनानी पड़ती थी। .. खैर बात हो रही थी चायनीज पंपिंग सेट की..करीब डेढ़ साल पहले मैंने इस पर एक पोस्‍ट लिखी थी –  http://khetibaari.blogspot.com/2009/08/blog-post.html तब सरकार इस पर अनुदान नहीं देती थी, लेकिन अब इस पर भी अनुदान मिलने लगा है। हालांकि सारा अनुदान व्‍यापारी झटक जाते हैं, लेकिन तब भी यह उपकरण हिन्‍दुस्‍तानी मॉडल से काफी सस्‍ता पड़ता है। इसीलिए किसानों में तेजी से यह लोकप्रिय हो गया है।

पानी के तीन स्रोत देखे हैं मैने यहां कछार में – गंगाजी की बहती धारा, रेत खोद कर निकाला गया पानी और शिवकुटी/सलोरी/चिल्ला/गोविन्दपुरी के नाले का पानी। नाले का पानी उन स्थानों पर सिंचाई के काम आता है, जहां से गंगा की जल धारा बहुत दूर हो गयी है और जहां कछार करार के नजदीक है। नाले के पानी को विभिन्न नालियों में मोड़ने का काम भी खेती करने वाले करते हैं। आधुनिक भगीरथ!

कछारी खेती मॉर्डनाइज हो रही है। लोग भी हो रहे हैं। पण्डाजी की चौकी पर बैठा मैं वापसी में सुस्ता रहा था कि कई लोगों ने सूचना दी कि नागनथवा को कल बहुत पीटा लोगों ने। एक महिला सिर पर बोरी रखे आयी और पण्डाजी को बताने लगी – अप तो दस सवा दस बजे चले जाते हैं। यह दोपहर में हुआ। नगनथवा को कुछ लोगों ने दो लाठी मारा। सिर में भी और पैर में भी।

नगनथवा पर विशद चर्चा हुई। उसके पास बकरियां हैं। शायद कछार के किसी के खेत में हिल गयी रही हों। यह भी हो सकता है कि कच्ची शराब का मामला हो। आस पास तो तीन चार जगह बनती है। पीने वाले इकठ्ठे हो जाते हैं और बहुधा मार पीट का मामला बन जाता है। जब शराब नहीं बनती, लोग सामान्य दिखते हैं। शराब बनने लगती है, तो लोगों (पीने वालों) के चेहरे ऐसे दीखते हैं जैसे चुचका आम!

अचानक रावत जी आ गये। पहाड़ के रहने वाले हैं और यहां उनकी कोई दुकान है। उन्होने कहा कि कछार का यही हाल यहां से मुरादाबाद तक का है। वहां पास में है हरथल। कच्ची शराब वहां भी बहुत बनती है गंगा के कछार में – कईं कोई रोक टोक नहीं प्रशासन की। और वहां, जहां शराब बनती है, पीने वाले मतवाले रहते हैं। आस पास कोई घर नहीं, जहां चोरी न हुई हो। चोरी कर के ही पीने वाले शराब पाने का जुगाड़ करते हैं।

नगनथवा किस चक्कर में मराया, यह तो पता नहीं। पर उसके बहाने कछार की पर्याप्त सोशियो-पोलिटिको-इकनॉमिक चर्चा हो गई।

मैं फिर घर चला आया मालगाड़ियों का प्रबन्धन देखने। बहुत कुछ वैसे जैसे विक्रम और वेताल वाला वेताल हर कहानी के बाद पेंड़ पर जा कर उल्टा टंग जाता है! :lol:

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

12 thoughts on “कछार रिपोर्ताज – 3”

  1. समीरलाल, पुराने जमाने के टिप्पणीकार का ई-मेल से कमेण्ट:

    आप तो रिपोर्ताज एक्पर्ट टाईप हो चले…गज़ब माहौल बनाये हैं जी…अरविन्द मिश्र जी पढ़ेंगे तो कहेंगे कि…ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं……..सुन्दर पूर्णता सत्चिन्तन !…. :)

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