सुशील की गुमटी

चील्ह में सुशील की गुमटी, पास में अजय खड़ा है।

हम लोग मेरे लड़के के विवाह के लिये मिर्जापुर की ओर बढ़ रहे थे। कई कारों में परिवार के लोग। परस्पर मोबाइल सम्प्रेषण से तय पाया गया कि गोपीगंज के आगे चील्ह में जहां गंगाजी का पुल पार कर मिर्जापुर पंहुचा जाता है, वहां रुक कर चाय पीने के बाद आगे बढ़ा जायेगा।

चील्ह में सभी वाहन रुके। एक गुमटी वाले को चाय बनाने का आर्डर दिया गया। गुमटी पान की थी, पर वह चाय भी बनाता था। गुमटी में पान मसाला के पाउच नेपथ्य में लटके थे। एक ओर बीकानेरी नमकीन के भी पाउच थे। सामने पान लगाने की सामग्री थी।

सुशील की गुमटी की मुख्य आमदनी पान और चाय से है।

चाय इतने बड़े कुल्हड़ में वह देता था, जिससे छोटे कुल्हड़ शायद बना पाना एक चुनौती हो कुम्हार के लिये। एक टीन के डिब्बे में कुल्हड़ रखे थे। मैने उससे पूछा – कितने के आते हैं ये कुल्हड़?

इससे छोटा कुल्हड बनाना शायद चुनौती हो कुम्हार के लिये! :-)

अपनी दुकान की चीजों की लागत बताने में हर दुकानदार थोड़ा झिझकता है, वैसे ही यह भी झिझका। फिर बोला – बीस रुपये सैंकड़ा की सप्लाई होती है।

दिन भर में कितने इस्तेमाल हो जाते हैं?

कोई कोई दिन दो सौ। कोई कोई दिन तीन सौ।

तब तो तुम्हारी ज्यादा आमदनी चाय से होती होगी? पान से भी होती है? 

वह युवा दुकानदार अब मुझसे खुल गया था। बोला – चाय से भी होती है और पान से भी।

मैने पीछे लगे पानमसाला के पाउच दिखा कर कहा – इनसे नहीं होती?  ” इनसे अब बहुत कम हो गई है। पहले ज्यादा होती थी, तब ये आगे लटकाते थे हम, अब पीछे कर दिये हैं। अब दो तीन लड़ी बिक पाती हैं मुश्किल से।”

उसे मैने सुप्रीम कोर्ट के आदेश – पानमसाला प्लास्टिक के पाउच में नहीं बेचा जा सकता – के बारे में बताया। “अभी भी पूरी तरह कागज का पाउच नहीं है। कागज के पीछे एक परत है किसी और चीज की।” – उसने मुझे एक पाउच तोड़ कर दिखाते हुये कहा।

उसकी चाय अच्छी बनी थी – आशा से अधिक अच्छी। दाम भी अच्छे लिये उसने – चार रुपये प्रति छोटा कुल्हड। पर देने में कोई कष्ट नहीं हुआ हम लोगों को – बारात में जाते समय पर्स का मुंह वैसे भी आसानी से खुलने लगता है!

चलते चलते मैने उससे हाथ मिलाया। नाम पूछा। सुशील।

उससे आत्मीयता का परिणाम यह हुआ कि जब हम अगले दिन विवाह के बाद लौट रहे थे तो पुन चील्ह में चाय पीने सुशील की गुमटी पर रुके। जाते समय सांझ हो गयी थी, सो गुमटी का चित्र नहीं लिया था। आते समय सवेरे के नौ बज रहे थे। चित्र साफ़ आया।

साथ चलते अजय ने पूछा – अब सुशील भी ब्लॉग पर आ जायेगा?

मैने जवाब दिया – देखता हूं। ब्लॉग आजकल उपेक्षित सा पड़ा है। उसपर जाता है सुशील या फ़ेसबुक या ट्विटर पर। अन्तत: पाया कि सुशील “मानसिक हलचल” पर ही जमेगा।

चाय बनाने के लिये दूध निकालता सुशील।

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

41 thoughts on “सुशील की गुमटी

  1. पुत्र के विवाह की हार्दिक बधाई- मिर्जापुर तो हमारी भी ससुराल है.

    Like

  2. बेटे के विवाह की हार्दिक बधाई – हमारी ससुराल भी मिर्जापुर है. :)

    Like

  3. पान मसालों की बिक्री कम हो रही है , अच्छा लगा जानकार . मदिरा की दुकानों पर ऐसा सुनने को कब मिलेगा , फिलहाल तो वहां भीड़ बढती ही देखी जा सकती है , लगभग हर नुक्कड़ पर .
    कुल्हड़ की चाय , गुमटी , चाय बनानेवाला सुशील ….जिंदगी हमेशा इतनी सरल क्यों नहीं होती !!

    Like

  4. नखलऊ ट्र्निंग में पता चला कि आप विवाह में व्यस्त हैं, मल्हन साहब से चर्चा होती रही। ढेरों बधाईयाँ आपको। सुशील भी अपने व्यवसाय में सिद्धहस्त हों..

    Like

  5. सुशील से परिचय अच्छा लगा । प्यारा सा बच्चा है । मेहनती भी । पान मसाला ना बेचे, कमाई तो हो ही रही है ।
    जैसे कि नीरज जी ने कहा है सामान्य पात्रों को रोचक बनाने में आपका कोई सानी नही । बेटे के विवाह की बधाई ।

    Like

  6. सुशील से परिचय अच्छा लगा । प्यारा सा बच्चा है । मेहनती भी । पान मसाला ना बेचे कमाई तो हो ही रही है ।
    झासे कि नीरज जी ने कहा है समान्य पात्रों को रोचक बनाने में आपका कोई सानी नही ।

    Like

Leave a reply to पा.ना. सुब्रमणियन Cancel reply

Discover more from मानसिक हलचल

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Design a site like this with WordPress.com
Get started