पाणिनि जी के कहे पर अवधी में लिखइ क परयोग

एक साध मन में जरूर जिंदा रही कि अवधी में, आपन बोली में पांच सात मिनिट बोलि सकी। बकिया, हमार पत्नी जी ई परयोग के बहुतइ खिलाफ हइन। ओनकर बिस्वास बा कि हमार अवधी कौनौं लाया नाहीं बा।


कालि पाणिनि आनंद जी क फोन आई रहा। ओ तीन ताल वाली बतकही क बाबा हयेन। ओ जेतना पारंगत हिंदी में हयेन ओसे ढेरइ अवधी में होइहीं। ओनसे हम आपन हिंदी सुधारई बदे बात किहा। आपन अवधियऊ धाराप्रबाह करे के बारे में भी कहा। ओ कहेन कि हम अवधी में कुछ लिखि क देखाई त ओ कौनौ सुझाब दई सकिहीं। उही बदे ई लिखत हई।

पाणिनि आनंद

जब हम गदेला रहे, त सात साल कि उमिर तक अवधियई बोलात रहा घरे में। ओकरे बाद पिताजी अपने संगे जेहर लई गयेन ओहर रहे त अवधियउ भुलाइ गइ। एक साध मन में जरूर जिंदा रही कि अवधी में, आपन बोली में पांच सात मिनिट बोलि सकी। बकिया, हमार पत्नी जी ई परयोग के बहुतइ खिलाफ हइन। ओनकर बिस्वास बा कि हमार अवधी कौनौं लाया नाहीं बा।

एक किताब रही सीताराम पांड़े सुबेदार पर। ओ सन सत्तावन क लड़ाई में अंगरेजन क सेना में रहेन और रिटायर भये पर अवधी में आपन आत्मकथा लिखे रहें। ऊ आत्मकथा त बिलाइ गई, लेकिन कौनों अंगरेज अफसर जेम्स लंट ओकर अंगरेजी अनुबाद करे रहेन। ऊ किताब सिविल सेवा के अफसरन के पढ़े परत रही। [अंगरेजी में कितबिया सायदसे इण्टरनेट आर्काइव पर मिलि जाये।] ओकर अनुबाद फेरि से अवधी में मधुकर उपाध्याय करे रहेन। हमरे लगे ऊ प्रति रही पर के जाने के लई गयेन त लौटायेन नाहीं। ओकरे बारे में अपने ब्लॉग पर हम लिखे भी रहे। अब ऊ कितबिया कतऊं मिलतऊ नाहींं बा। आउट आफ प्रिण्ट होई गइ। अवधी पढवैय्या हईअई नाहीं हयें त काहे फेरि छापइ परकासक?

“सीताराम पांड़े” रही होति त ओके पढ़े से कौनो सहायता मिलत। अब त जीडी तोहके खुदै परयोग करे परे।

हमरे खियाल से एतना काफी रहे पाणिनि जी के देखावई बदे। बकिया, ई लिखब बहुत मुस्किल बा। अउर असल बात त ई बा कि एकर कौनो पढ़वईया त हयेन नाहीं! 😆