गांव में आने के बाद हमने एक पौधा चीकू का लगाया था। उस समय घर खेत ही था। कोई पेड़ नहीं। सो बहुत से पेड़ों के पौध लगाये। सन 2016 में बारिश शुरू होने के साथ ही लगाये होंगे। खेत की जमीन उपजाऊ है तो लगभग सभी पौधे लग गये। चीकू को पानी भी दिया जाने लगा। वह पनप गया। लेकिन जमीन की नमी का लाभ एक शीशम के बीज ने उठा लिया। जाने कहां से वह उड़ कर आया और चीकू की बगल में ही उग गया। चीकू के मुकाबले बहुत तेजी से बढ़ने वाला पौधा होता है शीशम। दो साल में वह पेड़ बन गया और चीकू एक छोटी झाड़ी जैसा ही रहा। जमीन की सारी उर्वरा शक्ति शीशम खींच लेता था।

शीशम और सागौन के कई वृक्ष पनप गये थे। तो यह निर्णय लिया गया कि शीशम को वहां से हटा कर चीकू को पनपने का अवसर दिया जाये। उसे काट दिया, पर रक्तबीज की तरह वह पुन: पनप गया और चीकू की बढ़त जस की तस रही। एक कुपोषित बच्चे की तरह – स्टंटेड (Stunted – उम्र के हिसाब से अवरोधित ऊंचाई का झाड़)! फिर रामसेवक जी ने खोद कर शीशम की जड़ समूल रूप से निकाली। जब शीशम परिदृष्य से गायब हुआ, तब चीकू बढ़ने लगा। इस साल तो उसमें फल भी लगे हैं। कम ही हैं – पंद्रह बीस फल। पर पूर्वांचल के इस हिस्से में चीकू के फल आना अपने आप में आनंददायक है।

उस रोज रात में बारिश हो रही थी। चीकू का गाछ झूम रहा था। सारा ध्यान उसी पर जा रहा था। अगले दिन यह सोच कर कि तेज हवा में उसके फल टूट कर बरबाद न हो जायें, हमने सारे फल तोड़ कर एक छोटे टब में पकने रख दिये। कल एक दो पके फल खाये। बहुत मीठे! फल बहुत बड़ी साइज के नहीं हैं। पर स्वाद में अच्छे हैं। सात साल बाद चीकू लगाना सार्थक हुआ।

आज मैं देख रहा हूं कि चीकू पर नई कलियां सी फिर आ रही हैं। झूमती डाल के साथ चित्र लेना कठिन लगा, पर मन भी चीकू के पेड़ के साथ झूमा।
घर परिसर में घूम कर देखा। दो व्यक्तियों के खाने लायक भिण्डी मिल गयी। नींबू में तो फल-फूल नहीं दिखे, पर उसी के मौसेरे भाई हजारा में फूल भी नजर आये और फल भी लग गये हैं। फल देख कर अच्छा लगा। हजारा भी मानसून की हवा में झूम रहा था। चित्र लेते समय मोबाइल के शीशे पर भी एक दो बूंदें गिरीं। मौसम तो नम है ही। नब्बे फीसदी आद्रता है और दिन में उतनी ही बारिश का अनुमान। मौसम शीतल है तो उमस नहीं लग रही। हजारा के पास ही एक बुलबुल थी। वह कुछ ट्यून सा बजा कर उड़ गयी।

घर परिसर में सौ कदम चलना, पेड़-पौधों को निहारना और उनकी हरियाली आंखों से सोखना – मानसून के मौसम की नियामत है। घर से बाहर नहीं निकलना हो रहा। गांव में कीचड़ है और बारिश में भीगने का भी भय है। पर यहीं चहलकदमी करते चीकू, हजारा, बेला, भिण्डी और बुलबुल निहारना भी कम आनंद नहीं देता।
जियो मेघ! जियो मानसून!
