बारिश, चीकू और हजारा


उस रोज रात में बारिश हो रही थी। चीकू का गाछ झूम रहा था। सारा ध्यान उसी पर जा रहा था। अगले दिन यह सोच कर कि तेज हवा में उसके फल टूट कर बरबाद न हो जायें, हमने सारे फल तोड़ कर एक छोटे टब में पकने रख दिये। कल एक दो पके फल खाये। बहुत मीठे!

घर के बगीचे में


मेरी पत्नीजी के पास इस बागवानी विधा और उसमें पलते जीवजंतुओं के बहुत से अनुभव हैं और बहुत सी कहानियां भी। वे उन्हें ब्लॉग पर प्रस्तुत करें तो छोटे-मोटे रस्किन बॉण्ड जैसा काम हो सकता है। पर पता नहीं उनका यह करने का मन होगा या नहीं। ….

जंगर चोरई नहींं करता मैं – रामसेवक


वे अपने हिसाब से बनारस से खरीद लाते हैं फूलों के पौधे, गमले या अन्य उपकरण। मेरी पत्नीजी उनके साथ लगी रहती हैं। पौधों, वृक्षों को पानी देना, धूप में रखना या बचाना आदि नियमित करती हैं। मेरी पोती चिन्ना पांड़े भी रामसेवक अंकल से पूछने के लिये अपने सवाल तैयार रखती है।

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