राम सेवक के बागवानी टिप्स

उनके आते ही घर के परिसर की सूरत बदलनी शुरू हो गयी है। हेज की एक राउण्ड कटिंग हो गयी है। मयूरपंखी का पौधा अब तिकोने पेण्डेण्ट के आकार में आ गया है। एक दूसरे से भिड़ रहे पेड़ अब अनुशासित कर दिये गये हैं।



राम सेवक मेरे पड़ोस में रहते हैं। गांव से बनारस जाते आते हैं। आजकल ट्रेनें नहीं चल रही हैं। बस का किराया ज्यादा है और शहर में आस पास जाने आने के लिये वाहन चाहिये, इस कारण से साइकिल से ही बनारस जाना हो रहा है। पचास किलोमीटर एक तरफ का साइकिल चला कर जाना और शाम को वापस पचास किलोमीटर चला कर गांव आना सम्भव नहीं, इसलिये शहर में एक कमरा किराये पर ले रखा है रुकने के लिये और सप्ताहांत में ही गांव वापस आते हैं।

राम सेवक

राम सेवक; जिनका कहना है कि माता-पिता ने उनका नाम ही सेवा करने के लिये रखा है; बनारस में माली का काम करते हैं। कई बंगलों में समय बांध रखा है। समय के अनुसार लोग पेमेण्ट करते हैं। कहीं हजार, कहीं दो हजार, कहीं चार हजार।

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गांव में रिहायश – घर के परिसर की यात्रा : रीता पाण्डेय

घर में अपने पति समेत बहुत से बच्चों को पालती हूं मैं। ये पेड़-पौधे-गमले मेरे बच्चे सरीखे ही हैं। ये सब मिलकर इस घर को एक आश्रम का सा दृष्य प्रदान करते हैं। बस, हम अपनी सोच ऋषियों की तरह बना लें तो यहीं स्वर्ग है!


रीता पाण्डेय (मेरी पत्नीजी) कोरोनावायरस के लॉकडाउन समय में नित्य एक – दो पन्ने लिख रही हैं। किसी भी विषय में। शायद रोज लिखना ही ध्येय है। भला हो इस कोविड19 के कठिन समय का कि यह लेखन हो रहा है। मेरे जिम्मे उस लेखन को टाइप कर ब्लॉग में प्रस्तुत करने का काम रहता है। वह करने में भी एक आनंद है।

प्रस्तुत है, रीता पाण्डेय की आज की पोस्ट –

पति के रिटायरमेंट के बाद, अगले ही दिन, हमारे रहने की जगह बदल गयी। घर में उनकी दिनचर्या में बहुत बदलाव आया। पर मेरी दिनचर्या लगभग वैसी ही रही। आखिर, मैं तो रिटायर हुई नहीं थी; और होना भी नहीं चाहती।

अभी भी (रेलवे के बंगलों की तरह) मेरे घर का परिसर काफी बड़ा है। आजकल कोरोनावायरस के लॉकडाउन के समय में उसी परिसर में मेरी यात्रा होती है। सुबह की चाय का ट्रे बाहर बराम्दे में रखने के बाद जब नजर घुमाती हूं तो लाल गुड़हल के फूल आमंत्रित करते हैं। कुछ फूल भगवान के चरणों में समर्पित करने के लिये रख लिये जाते हैं तो कुछ डाल पर मुस्कराने के लिये छोड़ दिये जाते हैं।

अभी भी (रेलवे के बंगलों की तरह) मेरे घर का परिसर काफी बड़ा है।

उसके पास बोगनबेलिया है। श्रीमाँ ने उनका नामकरण किया था – डिवाइन प्रोटेक्शन। अचानक अमरूद पर नजर जाती है। दो साल पहले लगाया था। तेजी से बढ़ा है पौधा। पिछली साल दो बार फल दिये थे। अभी उसमें फिर फूल खिलने की तैयारी हो रही है।

बोगनबेलिया है। श्रीमाँ ने उनका नामकरण किया था – डिवाइन प्रोटेक्शन।

अमरूद की तरफ ही पपीता है। वह भी फल देता रहा है और देने को तैयार हो रहा है। कलमी आम के वृक्ष तो कई हैं पूरे परिसर में। दो-तीन साल पहले लगाये गये। उनकी ऊंचाई ज्यादा नहीं बढ़ेगी। पर उनपर भी बौर आये हैं और अब टिकोरे लग रहे हैं। सामने की क्यारियों में कोचिया कुछ उदास करते हैं, पर उन्ही के साथ गमलों में लगाये कोचिया स्वस्थ हैं। उन्हे देख प्रसन्नता होती है। चम्पा के पत्ते तो पूरी तरह झड़ चुके हैं। अब उनका कलेवर बदल रहा है।

गुड़हल की कई किस्में हैं। कई रंग।

फागुन से पीला गुड़हल भी खिलने लगा। गुलाब तो अपने शवाब पर है! हल्का गुलाबी अमेरिकन गुड़हल पर भी कलियां लगने लगी हैं।

पीले अलमण्डा की बेल ऊपर तक चली गयी है। अचानक नजर गयी तो उसकी फुनगी पर कुछ फूल भी नजर आये। इस बार भयानक बारिश और उसके बाद कड़ाके की लम्बी चली सर्दी में कई पौधे गल-मर गये। ऐसा लगा कि कई पौधे नर्सरी से लाकर फिर से लगाने पड़ेंगे। पर पाया है कि अपराजिता फिर से हरियरा गयी है और झुलसी तुलसी में नये पत्ते आ गये हैं।

कुछ ही वर्षों में पेड़ और बेलें घर को आच्छादित कर देंगे।

घर के पीछे की ओर भी कई पौधे हैं। कई बेलें। वहां एक लीची का पौधा भी लगाया है। गंगा के इस इलाके में चलेगा या नहीं, अभी देखना बाकी है। नीबू का झाड़ हरा भरा है। उसमें कई फूल लगे पर फल लगने के पहले ही झर गये। शायद अगले सीजन में लगें, जब झाड़ और बड़ा हो जायेगा। दिया तो गंधराज कह कर दिया था नर्सरी वाले नें। देखें, क्या निकलता है!

नीम के किशोर वृक्ष हर तरफ हैं। उनके सारे पत्ते झर चुके हैं और नये आ रहे हैं। कुछ ही दिनों में ये हरे भरे हो जायेंगे। केले का एक गाछ है। पिछली बार उनके पेड़ पर प्राकृतिक तरीके से पके केलों का स्वाद ही निराला था। और फल कई दिन रखने पर सड़े-गले नहीं थे।

केले का गुच्छा।

घर के पीछे एक नल है। नौकरानियों के लिये एक प्रकार का पनघट। वे यहां हाथ पांव धोने, नहाने, कपड़ा कचारने, नाश्ता-भोजन करने और बतकही/पंचायत के लिये आती हैं। आजकल यह कोरोनावायरस के लॉकडाउन के कारण वीरान जगह है। इस जगह पर अब बर्तन भर मांजे-धोये जा रहे हैं।

इसी नल के पास एक पारिजात – हारसिंगार – का वृक्ष है। उसकी बगल में चार साल की उम्र का पलाश। पलाश के फूल इस साल देर से आये हैं। हमारे इस पलाश में तो पहली बार ही आये हैं। अभी नया नया पेड़ बना है ये पलाश।

पहली बार फूला है पलाश

घर की इस यात्रा में और भी छोटे मोटे पड़ाव हैं। पीछे चारदीवारी में खेत की ओर जाने का एक छोटा गेट है, जिससे गेंहू का खेत दिखता है। उसके आगे सागौन के पेड़ हैं। घर के ऊपर – दूसरी मंजिल के ऊपर सोलर पैनल है। वहां खड़े हो कर गांव का हराभरा दृष्य बहुत सुंदर लगता है।

घर के पोर्टिको में गमले हैं। उनमें लगे पौधे अपनी आवश्यकता अनुसार मुझे बुलाते रहते हैं। किसी को पानी चाहिये होता है, किसी को धूप या किसी को छाया। कोई कोई तो मानो बात करने के लिये ही बुलाता है। वे हरे भरे होते हैं तो मन प्रसन्न होता है। कोई बीमार हो जाता है तो मन खिन्न होता है। बिल्कुल किसी परिवार के सदस्य की दशा देख कर।

घर में अपने पति समेत बहुत से बच्चों को पालती हूं मैं। ये पेड़-पौधे-गमले मेरे बच्चे सरीखे ही हैं। ये सब मिलकर इस घर को एक आश्रम का सा दृष्य प्रदान करते हैं। बस, हम अपनी सोच ऋषियों की तरह बना लें तो यहीं स्वर्ग है!