आर्मचेयर नर्मदा परिक्रमा — दिन 3 : तहरी, त्रिपुंडी और चितलंगिया का दालान
नीलकंठ की ई-मेल समय पर थी। छ बजे सवेरे। वह ज्यों का त्यौं नीचे है –
सवेरे नींद एकदम समय पर टूटी — चार बजे। यह अजीब है कि बाहर खुले में नींद पहले से बेहतर आती है। मन भी हल्का था और शरीर भी। नर्मदा किनारे की हवा में जैसे कोई ‘अदृश्य प्रार्थना’ हर पल बह रही हो।
स्नान खुले में करना था, पर हैंडपम्प कल ही जवाब दे गया था। प्रधान ने बताया था — “पाइप नीचे से टूट गया है, बैगा लोग आएंगे तो खुदवाना पड़ेगा।”
उसी समय सुदामा दो बाल्टी पानी लिए हाज़िर। जैसे कोई किला तोड़ लाया हो।
साथ में मुस्कराहट और एक समाचार —
“भाभी कोदों की तहरी बना रही हैं। ताजा मटर भी पड़ी है उसमें। साथ में आप दही लेंगे या छाछ?”
मैंने पूछा — “कौन भाभी?”
सुदामा ने हँसते हुए बताया कि प्रधान का लड़का जबलपुर में रेलवे में क्लर्क है। उसकी पत्नी गांव में रहती है — सास-ससुर की सेवा में। “अब जब क्वाटर मिल जाएगा, तो चली जाएगी। तब तक मेरी तो भाभी ही हुई न!”
सुदामा आत्मीय लड़का है। स्वभाव से ही अपना बनाने वाला। हर किसी को रिश्ते में बदल देता है — कोई मामा बन जाता है, कोई दादा। शायद यही उसकी सबसे बड़ी योग्यता है — “लोकसंग्रही सरलता।”
“सर, मैं आपको सर बोला करूं कि बाबा?”
“बहुत चालाक हो सुदामा! बाबा कहोगे तो मुझे बाबा बनना पड़ेगा। फिर किसी दुकान पर खर्चे का ‘चौथाई नियम’ खत्म हो जाएगा। ठीक है?”
सुदामा हँसकर बोला — “जब मन करेगा, आप सर होंगे, जब मन करेगा बाबा। सुविधा के साथ रिश्ता बदलना चाहिए न!”
भाभी की तहरी बेमिसाल थी। मोटा अनाज, हल्की सी खुशबू — मटर के साथ भुने मसालों का धीमा राग।
तहरी ने देर तक भूख नहीं लगने दी। निकलते-निकलते नौ बज गए।
बेना, बैगा और सड़क का संगीत
सुदामा के हाथ में एक बांस का बेना था।
“भाभी ने दिया है। बैगा औरत आई थी — वही चार पंखे लाई थी। प्रधान जी से पूछकर भाभी ने हमें दे दिया। बहुत सुंदर लगा, तो झिझका नहीं।”
वह बेना बैगाओं के गोंडी सौंदर्यबोध का नमूना था — किनारे पर रंगीन धागों की कढ़ाई, बांस की रेखाओं में जैसे गीत उकेरे गए हों।
सड़क सँकरी थी, लेकिन जैसे धूप और छाया मिलकर उसके दोनों कंधों पर चल रही हो।
कभी ढलान, कभी चढ़ाई — पर थकान नहीं। कहीं-कहीं नीम की छाँव, कहीं महुआ की गिरती पत्तियाँ।
त्रिपुंडी महराज और चाय का आश्रम
जुनवानी गाँव पड़ा। मंदिर का नाम नहीं देखा, पर प्रवेश द्वार पर त्रिपुंड लगाए एक सज्जन ने ऊँची आवाज में कहा —
“नर्मदे हर! भाई जी, चाय पीते जाइए।”
नेकी और पूछ-पूछ!
हम दोनों के ब्रेक वहीं लगे।
चाय की केतली पत्थर की चूल्हे पर चढ़ी थी।
सुगंध ने आने से पहले ही आगोश में ले लिया — दालचीनी, लौंग, इलायची और एक अपरिचित घास…
“एक घास है कुशा जैसी। कभी चायपत्ती न हो तो वही पीता हूँ।” महराज बोले।
हाथ में लिया, सूंघा — वह लेमनग्रास थी। महक गाढ़ी थी, पर ज़हर सी नहीं। शांत करती।
आधा घंटा वहां बीता — चाय के साथ उनके किस्से भी घुलते रहे।
उन्होंने बताया कि वे कभी साधु नहीं बने, पर ‘श्रद्धा में स्थायी ठहराव’ पा चुके हैं।
इस पोस्ट को बनाने में चैट जीपीटी से संवाद का योगदान रहा है।
चितलंगिया और मारवाड़ी दालान
दोपहर तीन बजे ‘मारवाड़ी गाँव’ पहुँचे। गाँव बिखरा था — जैसे कोई लंबा स्वप्न, जो नर्मदा की धार के साथ बह रहा हो। पक्के मकान थे, पर कुछ ने खपरैल की जिद अब भी नहीं छोड़ी थी।
एक बड़े खपरैल वाले घर के सामने खड़े सज्जन ने आवाज दी —
“आप नर्मदा यात्री हैं? आइए, थोड़ा आराम कर जाइए।”
वे थे गिरीश चितलंगिया। साठ के करीब उम्र, धोती-कुर्ता में अपनेपन की झलक।
बताया कि उनके दादाजी जोधपुर से कारोबार के सिलसिले में आए थे, पचास साल पहले। अब यही गाँव उनका वतन है।
“फागुन में पुष्कर जाना है — कुलदेवी नौसर माता के दर्शन के लिए। एक मनौती है जो पूरी हुई है।”
हमने आज की यात्रा विराम की सोची। उन्होंने दालान का एक कमरा दे दिया — चटाई बिछी थी, दीवार पर गोबर से बनी मांडना की आकृति अब भी कुछ-कुछ झलक रही थी।
शाम की चाय वहीं मिली। खाना भी बना ही था — बाजरे की रोटी, मूंग की दाल और गुड़।
घाट पर संध्या
शाम को हम दोनों मारवाड़ी गांव के नर्मदा के घाट पर पहुँचे।
घाट पक्का बना हुआ था — पत्थर की सीढ़ियाँ थीं, पर कई जगह ईंटों के पैबंद थे।
वो पैबंद इतने करीने से लगे थे कि लगता — जैसे कोई माँ फटी ओढ़नी को ऐसे रफू कर दे कि कोई देखे तो कहे — “कपड़ा भले पुराना हो, पर आदर से संभाला गया है।”
नदी शांत थी, पर उसकी आँखों में दीया झिलमिला रहे थे।
सुदामा ने घाट की सीढ़ियों पर बैठ कर कुछ नहीं कहा — बस पैर जल में डाले और चुपचाप आसमान की ओर देखता रहा।
“तीसरे दिन की यात्रा में सुदामा की चतुराई, ‘भाभी’ की तहरी, त्रिपुंडी की चाय, और चितलंगिया का दालान — सब मिलकर यात्रा नहीं, एक गृहस्थ तीर्थ बन गए।”
आज हम सड़क से चले, ज्यादा नहीं चले। कुल 13-14किलोमीटर। पर यात्रा की आशंका और झिझक कम हो गई है। अब घने जंगल में भी धंसे तो छटपटायेंगे नहीं। और घने जंगल से बच कर चलना तो ध्येय है ही नहीं।
– तुम्हारा, नीलकंठ चिंतामणि


चल रही है यात्रा और साथ मे है हम सब भी
जय नर्मदे , नर्मदे हर
LikeLike
जय हो!
LikeLike