बढ़ती उम्र, साइकिल और नई पीढ़ी

Golu Dubey

दो दिन से राजन भाई मेरे घर आ रहे हैं। दस साल पहले वे मुझे साइकिल के जोड़ीदार बन कर यहां गांवदेहात का करीब 10 वर्ग किलोमीटर का एरिया दिखाने वाले थे। एक एक चप्पा चप्पा – नदी, ताल, खेत और लोग हमने देखे। पर कालांतर में उनका साइकिल चलाना और मेरे घर पर आना भी घटते घटते शून्य हो गया।

उन्होने एक मोटर साइकिल खरीद ली और यदाकदा रास्ते में कभी कभी दिखने लगे। महराजगंज में बनवारी की चाय की चट्टी उनका एक अड्डा थी। बाजार में जाने पर यदा कदा वहां दिख जाया करते थे। पर सम्पर्क ठण्डी चाय की तरह ठण्डा गये थे।

वे सन 1952 की पैदाइश हैं। बकौल उनके 72 पार हो चुके हैं। मैं दो महीने में 70 का हो जाऊंगा। उनका कहना है कि अब मोटर साइकिल भी बाजार में भीड़ में चलते और रुक कर पार्क करते समय उन्हे असहज करने लगी है। “अब चार एक साल और चलेगी मोटर साइकिल। उसके बाद आसपास के लिये भी एक कार की जरूरत पड़ेगी।”

राजन पंडित साइकिल से मोटर साइकिल पर आ चुके हैं। अंतत: चार चक्का पर आने की उनकी योजना बन चुकी है। पर मैं अभी भी साइकिल चला रहा हूं। असल में मुझे मोटर साइकिल या कार चलाना आता नहीं। फर्क यह पड़ा है कि साइकिल चलाना अब उत्तरोत्तर घर परिसर में ही होने लगा है। अब मन होता है कि घर के पीछे अपने खेत में ही एक साइकिल ट्रैक बनवाऊं जिसमें एक चक्कर करीब 500 मीटर का हो सके। उसमें बिना किसी यातायात के निर्बाध पॉडकास्ट सुनते साइकिल चलाई जा सके। और उस ट्रैक के एक छोर पर मचान भी बन जाये!

अपने अपने बुढ़ापे की अपनी अपनी प्लानिंग!

अब राजन भाई अपनी कम, अपनी पोती और अपने बेटों की ज्यादा बात करते हैं। छोटा बेटा, प्रिंस नई कार खरीदा है। बड़े बेटे की बिटिया अदिति उसके सामने डांस कर रही है। उधर बड़ा बेटा गोलू अमरीका घूम रहा है। टेक्सास से उसकी दो फोटो राजन भाई ने दिखाईं।

राजन भाई अगली पीढ़ियों में मगन हैं! गांव में अकेले रहते हैं। एक बार भोजन बनाते-करते हैं। उसके अलावा दूध और केला का सेवन करते हैं। कटका स्टेशन के प्लेटफार्म पर दो-चार किलोमीटर घूमते हैं। बड़ी सन्यमित और सरल जिंदगी है उनकी। बढ़ती उम्र में कैसे अपने को ढाला जाये? इस विषय में उनसे सीखने को बहुत कुछ है।

राजन पंडित यूं मिलते रहे तो सत्तर पार की जिंदगी के प्रबंधन पर बहुत कुछ सीखा, लिखा जायेगा। ☺️🙏

Golu Dubey, Rajan Dubey
ऊपर के दो चित्र गोलू के टेक्सास के हैं। नीचे हैं राजन भाई, मेरे ड्राइंग रूम में

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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