कोहरा न हो, बाजार कुनमुनाता सा खुल रहा हो और आप जिस दुकान के लिये अपनी लिस्ट ले कर साइकिल से निकले हों, वह अभी खुली न हो तो तय मानिये कि या तो आपको खीझ होगी या नई कहानी मिलेगी।
मैं सवेरे आठ बजे ही घर से निकल लिया था। साइकिल बिजली वाली थी – लगे हाथ उस साइकिल का नामकरण भी कर दिया जाये; बिजली – तो बिजली पर सवार जल्दी ही पंहुच गया महराजगंज बाजार में।
दवाई की दुकान वाला अभी आया नहीं था। वह मुझे एमआरपी पर 8-10 परसेंट छूट देता था। अब? मैं आगे बढ़ गया।
चाय बनाने वाला चाय बना रहा था और ग्राहक भी काफी बैठे थे। उसकी बेंच पर जगह भी बची थी मेरे बैठने लायक। पर घर से तीन चार कप धकेल कर चला था तो वहां भी नहीं रुका।

एक नुक्कड़ की मैडीकल दुकान दिखी। आज तक उसपर कभी गया नहीं था पर अब रुक गया – और मुझे बहुत जानदार आदमी मिले दुकानदार के रूप में। उन्होने मेरी अपेक्षा से ज्यादा भलमनसाहत से सस्ती दी दवा।
एक नहीं थी, तो मेरे भरोसे दुकान छोड़, गल्ले से एक नोट ले कर गली की मैडीकल दुकान पर गये और ले आये। बताया कि पचहत्तर की है, पर दुकान वाले भाई ने उन्हें 65 में दी है तो मैं 65 ही दे दूं।
मैने मोबाइल से पैसा दिया तो नाम झलका – राजकुमार सेठ। मैने पूछा – आप ही राजकुमार हैं?
“जी। राजकुमार सेठ नाम है मेरा। पर आसपास लोग बाबा प्रधान के नाम से जानते हैं। यहां महराजगंज का दस साल प्रधान रह चुका हूं।” – बाबा प्रधान ने कहा।
बाबा प्रधान! मुझे याद आया एक दुकानदार से मैने महराजगंज के प्राचीन विवरण के बारे में पूछा था तो उन्होने कहा था – आप तो बाबा प्रधान से मिलिये, वे ही आपको बतायेंगे इस गंज के बारे में। अच्छे और मिलनसार आदमी हैं।
यह संयोग बना कि आज बाबा प्रधान यूं ही मिल गये! वे 64 साल के हैं। छ दशक की उनकी अपनी यादें हैं और अपने पहले की दो पीढ़ी से सुना भी उनको पता होगा ही। दो गांवों – कंसापुर और हुसैन पुर के मेल से बना यह महराजगंज अच्छा खासा इतिहास रखता होगा। वह सब बताने वाले सज्जन हाथ लग गये।
बाबा प्रधान जी का मैने फोन नम्बर ले लिया है। चलते चलते उनकी दो चार फोटो भी क्लिक कीं। कुलही और मफलर ओढ़े थे वे। यह सोच कर कि शक्ल ठीक से आये, इसलिये मफलर भी खोल दिया बाबा प्रधान जी ने।
चलते चलते चाय पिलाने की पेशकश भी की – शायद वे मुझसे कुछ और भी बातचीत के मूड में रहे हों; पर पत्नीजी ने जल्दी घर लौटने को कहा था, तो उनसे विदा ले कर चला आया।
अब सोचता हूं कि एक दो दिन में सवेरे एक थर्मस चाय ले कर उनकी दुकान पर जाऊंगा और उनसे कहूंगा – आज से साठ सत्तर साल पहले के महराजगंज की चर्चा करें वे।
क्या ख्याल है? कोई सशक्त लेखमाला निकल पायेगी उससे? ब्लॉग पोस्ट निकलेगी या कोई मेमॉयर! दस पंद्रह मिनट की मुलाकात से मुझे लगता है बाबा प्रधान में लेखन मसाला दे सकने की बहुत सम्भावनायें हैं। इस इलाके में शायद सब से नायाब सम्भावनाओं के स्रोत होंगे वे!
बाबा प्रधान के साथ चाय, या चाय के कई दौर ड्यू रहे!

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