सवेरे साढ़े आठ बजे पंहुच जाता हूं मैं बाबा प्रधान की दुकान पर। और वे खोलने लगते हैं महराजगंज का अतीत। बाबा प्रधान अगर मुंह में पान मसाला या सुरती लिये होते हैं तो मुझे देखते ही बाहर निकल कर एक कोने में मसाला थूंक कर बगल की चाय की दुकान पर चाय का ऑर्डर कर वापस आ कर बैठते हैं और मेरे सवालों का जवाब देना प्रारम्भ करते हैं।
मैं अभी भी दुविधा में हूं कि मैं क्या सुनने-लिखने की सोच रहा हूं। वह बाबा प्रधान और उनके माध्यम से ज्ञात पात्रों के वर्तमान और अतीत से बुनी कथा होगी या खालिस महराजगंज का व्यक्तिगत तौर पर बुना लोक-इतिहास होगा।
जब तक यह तय नहीं होता, मैं बहते पानी की तरह बातचीत को बहने देता हूं। साथ में बहती है मेरी सोच भी। फिलहाल मैं महराजगंज का अतीत सुनने-बुनने लगता हूं।
काशी नरेश का किला रामनगर में है। वहां से अगर महराजगंज कस्बे में आया जाये तो गंगाजी पर पुल पार कर वाराणसी आना होगा और वहां से वाया मोहन सराय ग्रांड ट्रंक रोड पर महराजगंज आया जायेगा। कुल दूरी 45 किमी होती है।

बाबा प्रधान ने बताया कि यह महराजगंज काशी नरेश की रियासत का एक छोटा बाजार था। यहां एक भटियारों की बस्ती थी, अस्तबल था और छोटी सराय थी। भटियारे बनारस से आने वाले घुड़सवारों के घोड़ों की देखभाल करते थे। सराय काशी नरेश के कारिंदों-संदेशवाहकों-लगान वसूली ले जाने वालों के लिये रुकने और भोजन आदि की व्यवस्था करती थी।
महराज की यह आउटपोस्ट थी, तो उसी कारण से दो गांवों (हुसैनीपुर और कंसापुर) की संधि पर इस सराय के लिये बाजार उपजा। और नाम बना – महराजगंज।
रामनगर से 45 किलोमीटर की दूरी घोड़ों से सफर की एक दिन की आदर्श दूरी है। यह दूरी और स्थान की जीटी रोड से जुड़ी होना इसे सही जगह बनाते हैं एक आउटपोस्ट बनने के लिये। पता नहीं, बाबा प्रधान जी ने इस कोण से सोचा था या नहीं, पर ट्रेन परिचालन की लॉजिस्टिक्स की मेरी बुद्धि में तो यही निर्णय आया।
और फिर दिमाग में प्रश्न कुलबुलाने लगे – सराय थी तो रसोईया, धोबी, नाई, भिश्ती, बाजार … सब की जरूरत होती होगी? ये सब उपलब्ध होते होंगे। पास ही कोई लोकल एजेंट या जम्मींदार भी रहे होंगे जो राजा का स्थानीय प्रशासन देखते होंगे और जरूरत अनुसार लठैत/सैनिक/पुलीस वाले मुहैय्या कराते रहे होंगे।

बाबा प्रधान शायद मेरे मन की कुलबुलाहट भांप गये। उनकी दुकान के सामने से एक सांवला आदमी जा रहा था। उसे उन्होने बुलाया – तनी एहर आऊ। वह पास आया। बाबा प्रधान ने उसे सामने की कुर्सी पर बैठने को कहा। मुझे बताया – ये शकील है। इसका घर बगल में वहीं पर है जहां सराय हुआ करती थी। शकील भटियारा जाति का है।
शकील ने बताया – उसके दादा सन पचहत्तर तक इक्का चलाया करते थे। लोग महराजगंज से औराई तक इक्के से जाया करते थे। उसे अपने बचपन की याद है जब जीटी रोड पर वे घोड़े की नाल जड़ा करते थे। वे लोग अपने नाम के आगे फारुखी लगाते हैं। मिर्जामुराद, बाबू सराय आदि जगहें जहां सरायें थीं, वहां वहां उसकी जाति के लोग हैं और उसकी रिश्तेदारी वहां है।
शकील के जरीये मुझे इतिहास की पहेली सुलझती सी लगी। … इतिहास का धागा जैसे उसके ही घर के पिछवाड़े पड़ा हो।

तब के महराजगंज की एक अलग छवि मन में बनने लगी। वह धुंधली थी, पर थी रोमांटिक! बाबा प्रधान ने उसमें बारीकियां भरीं। और उससे जो कुछ उपजने लगा वह एक क्वासी-हिस्टॉरिकल खिचड़ी कही जा सकती है। जीडी की मानसिक खिचड़ी। धीमी आंच पर वह खिचड़ी खदबदाने लगी है।
बाबा प्रधान मिले, शकील मिले; और भी चरित्र और उनके पूर्वज प्रकट होंगे। एक रचना बनने लगेगी।
मुझे लगता है – यह बैठकी मुझे तो भा रही है, बाबा प्रधान को भी रुच रही है! और यह अगर सही से चलती रही तो यह महराजगंज-कथा को जन्म देगी। बाबा प्रधान की समाज दृष्टि और मेरी हर बात को अलग अलग कोणों से खोदने-कुरेदने की वृत्ति यह कथा रचेगी। देहात की हाट से आज के अर्बनाइज होते करीब 100 करोड़ का वार्षिक टर्नओवर (इतना तो होगा ही, ज्यादा भी हो सकता है) वाले महराजगंज की कहानी हम दोनो बुनेंगे!
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समय में पीछे चला जाये। शेरशाह सूरी ने जीटी रोड दुरुस्त कर दी है। कच्ची-पक्की, संकरी सड़क बन गई है। पटना से दिल्ली, लाहौर, पेशावर तक बैलगाड़ी/ऊंटगाड़ी से सामान और व्यापारी आने जाने लगे हैं। उस समय शायद महराजगंज नहीं है पर सराय आ चुके हैं। मोहन सराय, मिर्जामुराद, बाबू सराय और उनके साथ सैनिकों के पड़ाव और छावनियां भी हैं जिससे गुड्स-ट्रांसपोर्ट निरापद हो सके।
उसके बाद मुगलिया शासन आता है। काशी नरेश का राज्य उस सल्तनत की एक बड़ी रियासत है। गंगा के उस पार उनका किला है – रामनगर का किला। पर वहां से बनारस में गंगा के पश्चिमी तट को जोड़ने के लिये पुल नहीं है। मौसम के हिसाब से नावें चलती हैं और/या पीपे के पुल बनते हैं। पुल न होने से किला सुरक्षित रहता है। आवागमन फिर भी होता है। घोड़े और घुड़सवार गंगा पार कर आते जाते हैं।
वही समय होगा जब काशी नरेश के कर्मचारी – घुड़सवार – नियमित आने लगे होंगे और रामनगर से महराजगंज के पास बघेल की छावनी (स्थानीय एजेंट या जम्मींदार) से नियमित सम्पर्क होने लगा होगा।
मैं कल्पना करता हूं – मोटे तौर पर महराजगंज कस्बे का बीज चार-पांच सौ साल पहले पड़ा होगा। वह समय रहा होगा जब काशी में बाबा तुलसीदास, तुलसी घाट पर किष्किंधाकांड की रचना कर रहे होंगे और बाबा प्रधान के पूर्वज हुसैनीपुर के अपने छोटे से घर के सामने पहली बार मंगलवार की हनुमान जी की पूजा कर कपड़े की दुकान बिछा रहे होंगे। उसी से शुरू हुई होगी महराजगंज की सप्ताह में दो दिन (मंगल और शुक्रवार) की हाट।
ऐसा ही कुछ हुआ होगा!
(आगे भी बाबा-पुराण जारी रहेगा)
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