कटका स्टेशन की पगडंडी पर चलते हुए मैं अक्सर लोगों के चेहरे देखता हूँ — कुछ जल्दी में, कुछ यूँ ही चलते हुए, कुछ अपनी-अपनी मुश्किलों में खोये हुए। पर इस बार जो चेहरा रुका, वह था जोखन।
एक साधारण-सा आदमी।
या पहली नज़र में साधारण-सा दिखता आदमी।
धूप में थोड़ा सिकुड़ा चेहरा। सफेद होती दाढ़ी। ग्रीस से दागदार हाथ। पीछे उसकी छोटी-सी दुकान — टीन का शेड, ईंट की कच्ची दीवार, दीवार पर टंगे घिसे-पिटे औज़ार और ऊपर से लटके ट्यूब-टायरों के गोल चक्र। स्टेशन के पास ऐसी दुकानें होती हैं जिन पर समय चिपका रहता है। जोखन की दुकान भी वैसी ही है।
जोखन कंहार जाति का है। कभी उसके पुरखे ज़मींदारों के लिये इनारा (कुआं) से पानी भरते थे। पालकी उठाते थे। यह काम उस समय रोज़गार ही नहीं, पहचान भी था। पर इनारा का स्थान चांपाकल या ट्यूब वेल ने ले लिया। योजनाएँ बदल गयीं, पानी नलों में आने लगा अब; और पालकी की जगह कारें आ गईं।
जिन पेशों ने पीढ़ियाँ चलाई थीं, वे काम खत्म हो गये।
जोखन के पिता ने इस बदलाव को समझा। कटका स्टेशन पर साइकिल रिपेयर की दुकान शुरू कर दी। यह वह समय था जब मीटर-गेज की ट्रेनें चलती थीं और भाप इंजनों की सीटी गांव-गिरांव तक सुनी जाती थी।
जोखन बताता है कि उसके पिता सन 2005 में मेरी बिटिया की शादी में बनारस भी गये थे। इतने साल पुरानी बात भी वह बड़ी गर्मजोशी से सुनाता है, जैसे रिश्ते का कोई पुराना धागा अब भी चल रहा हो। वह मुझे सम्बोधन में भी साहेब या गुरूजी नहीं कहता – जीजा बुलाता है।
जोखन ने मिडिल तक पढ़ाई की। 1989 में दुकान पर आ बैठा। मां लंबे समय से बीमार थीं, और 1991 में चल बसीं। उसके बाद पढ़ाई की कोई संभावना रही ही नहीं।
उसकी बातों में एक वाक्य बार-बार आता है —
“बहुत गरीबी रही… बहुत कठिन समय रहा वह।”
जब कोई आदमी एक ही वाक्य दोहराता है, तो समझ में आता है कि वह घटना उसके भीतर कितनी गहराई तक गड़ी होगी। जोखन उस गरीबी का विस्तार नहीं करता, वह बस उसे याद करता है — एक पुराने घाव की तरह जिसे अब दर्द तो नहीं होता, पर उसका निशान साफ दिखता है।
जोखन के दो बेटे हैं। दोनों बम्बई में हैं।
छोटा एसी कम्पनी में नौकरी करता है। बड़ा बिजली की मरम्मत और वायरिंग करता है।
दोनों वहीं जोखन के छोटे भाई के साथ रहते हैं। अभी शादी किसी की नहीं हुई।
जोखन मुस्कराते हुए कहता है —
“देखे में लगा हई शादी के लिहे…”
दुकान के भीतर छाया और बाहर धूप का एक पुराना-सा विरोध है। साइकिलों के ट्यूब हवा में कभी कभी झूलते हैं — जैसे समय के गोल चक्र। नीचे औज़ार रखे हैं जिन पर पसीने और ग्रीस का वर्षों का इतिहास जमा है।
मुझे अपनी साइकिल में ताला लगवाना था। उसने सौ रुपये लिये। एक चक्के की छुछी का ढक्कन गायब था, वह फ्री में लगा दिया। बिना कुछ कुनमुनाये।
काम करते-करते बात आगे बढ़ी और जोखन धीरे-धीरे अपने बीते सालों की गठरी खोलने लगा। भाप इंजन की आवाज़, स्टेशन की चहल-पहल, दुकान की शुरुआत, मां की बीमारी… और फिर दुकान स्टेशन से हट कर हाइवे पर खोलने का प्रकरण।
और फिर अचानक कहा —
“आप सुनने लगे… तब बताये। वर्ना का फायदा बताय के?”

यही वाक्य मुझे सबसे ज़्यादा अटका।
गांव में बहुत-सी कहानियाँ बोलने के इंतज़ार में रहती हैं।
लोगों के भीतर दबी होती हैं।
पर लोग तभी बोलते हैं, जब सामने वाला सुनने के लिये तैयार हो।
जोखन के बारे में सोचते हुए मुझे समझ आया कि साधारण दिखने वाला आदमी असल में कितना जटिल होता है। इसमें तीन परतें साफ दिखती हैं।
पहली परत — जीवन की अनवरत यात्रा।
पेशे का खत्म होना, नया काम पकड़ना, मां का अचानक चले जाना, पढ़ाई का छूट जाना, गरीबी का लम्बा दौर… और फिर भी जीवन को बिना शिकायत ढोते रहना। जोखन की कहानी में कोई नाटकीयता नहीं है, पर स्थिरता है — और वही स्थिरता दुर्लभ है।
दूसरी परत — मौन गरिमा।
वह यह नहीं कहता कि उसने त्याग किये। वह यह भी नहीं कहता कि उसने संघर्ष किया।
वह बस याद करता है — सधे हुए स्वर में।
उसमें “दिखावे का दुःख” नहीं है।
यह जो मौन गरिमा है, वह साधारण आदमी की सबसे महत्वपूर्ण पूँजी होती है।
तीसरी परत — उसकी सामाजिक भूमिका।
एक साइकिल मेकैनिक गांव में सिर्फ़ मेकैनिक नहीं होता।
वह अनौपचारिक इतिहास का संरक्षक होता है।
स्टेशन पर आने-जाने वालों की कहानियाँ, किसके यहाँ कौन बीमार है, कौन बम्बई गया, किसने नया घर बनवाया — सब वही जानता है।
जोखन की दुकान गांव का संचार-केंद्र है, बिना मोबाइल, बिना अखबार। लोग आते हैं, साइकिल पम्प मांगते हैं हवा भरने को और एक दो बात आदान प्रदान कर जाते हैं हवा भरते भरते।
ऐसे पात्र साहित्य या पत्रकारिता में अक्सर अनदेखे रह जाते हैं, पर जब उन्हें जगह मिलती है, तो वे कहानी को असली धरातल दे देते हैं।
जोखन में वह “साइलेंट स्ट्रेंथ” है जो सिर्फ़ ग्रामीण भारत में मिलती है — कच्ची दीवारों में टिकी हुई, धूप और धूल से गुज़री हुई।
मैं सोचता हूँ, क्या जोखन साधारण पात्र है?
या हम साधारण में छिपे असाधारण को देखना ही भूल गये हैं?
मेरे लिये जोखन “एक साइकिल मेकैनिक” नहीं,
बल्कि वह सामूहिक कहानी है जिसे देश के गांवों ने पिछले पचास वर्षों में जिया है —
पेशों का लोप, शहर की ओर पलायन, घरेलू विघटन, और फिर भी काम में डटे रहना।
मैं फिर जाऊँगा उसकी दुकान पर।
कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
और मुझे यकीन है — जब दूसरा आदमी बोलने के लिये तैयार होता है, तो उसका इतिहास खुद-ब-खुद बाहर आता है।

शायद अगली बार जोखन कुछ और पन्ने खोलेगा।
और मैं फिर उन्हें लिख लूँगा — जैसे हज़ारों गांवों की छोटी-छोटी आवाज़ें किसी डायरी में सुरक्षित हो गयी हों।
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