मनोहर श्याम जोशी जी की किताब है – नेता जी कहिन। पाँच–सात किताबें लोगों को उपहार दे चुका हूँ। यहाँ तक कि मेरी प्रति भी कोई सज्जन ले गये तो ले कर भूल गये।
सो एक प्रति हफ्ता भर पहले फिर खरीदी। उसी में पत्नीजी ने पढ़ा – जर्दालू की किर्रू लेवल भेंट के बारे में।
किताब में उस पेज का ट्रांसस्क्रिप्ट कुछ यूं है –

… नेताजी हंसे, बोले – पिछली साल में यह (सिगरेट) कितनी मर्तबा छोड़ी है?
हमने गिन कर बताया – सातवीं।
“तब रख लीजिये।” उन्होने कहा। “काम आयेगी। नहीं तो भगत आ कर पीते रहेंगे। आपका पान मसाला, तम्बाकू चल रहा हय तो यह सउदा हम कानपुर वाले चेले को लिख देंगे। मगर है वह जर्दालू आम टाइप।”
“जर्दालू आम टाइप?”
“पुरानी चाल का चालू। वह यूँ है—एक बार किसी चेला महोदय ने सी.एम. को लिखा: पत्र के साथ, भागलपुर का फस्सक्लास सौ जर्दालू आम सेवा में भेजा जा रहा हय, सो ग्रहण किया जाय। अउर हमारा राजसभा के लिए अउर ऊ न हो तो पब्लिक सर्विस कमीशन के लिए लम्बर लगाया जाए। अबे गदहे, इन कामों के लिए लाखों के वारे-न्यारे हो रहे हैं, अउर तू समझे है जर्दालू आम की डाली से बात बन जाएगी! बताइए! इन जर्दालू आम टाइपों ने भी अपने ढंग से एइसी-की-तइसी फेर दी हय पालटिक्स पर। डाली भेजू, चरण-छू किर्रू पालटीसियन, जब देखिये तब हीं हीं हीं, मेरा यह काम करवा दीजिए। अरे काम अइसे होते हैं कभी। काम का ढंग होता है। न करो तो डसडंट बने घूमते हैं। आप समझ लीजिए कक्का, इस देश में विद्रोही, क्रान्तिकारी कोई नहीं ससुरा। सबै हीं हीं हीं डसडण्ट हैं। कौमे अइसे डसडण्टों की है ससुरी।”
खैर, अब ऊपर की भूमिका के बाद मुख्य बात पर आया जाये। आज एक खबर पढ़ी कि जापान अमरीका के जन्मदिन के 250 साल होने पर ढाई सौ चेरी के पेड़ भेट करेगा।
यह क्या हुआ?
शुद्ध जर्दालू आम छाप डिप्लोमेसी!

ट्रम्प गारू खांटी बनिया बुद्धि वाले मनई हैं। बिना माल-पानी के उनके यहां पत्ता नहीं हिलता। हर चीज में डील सूंघते हैं। न होने पर उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल पैंकते हैं। पांच सौ परसेंट टैरिफ लगाने की धमकी अलग ठोंकते हैं।
ट्रम्प के साथ क्या 250 चेरी के झाड़ काम आयेंगे? किर्रू लयवल (किर्रू – जो बड़े नेताओं, देशों को कोसते भी हैं पर जीते भी हैं उन्हीं के सहारे) डिप्लोमेसी सोच रहा है जापान।

ट्रंप जी को डील में “मालपानी” दिखना चाहिए — वरना उन्हें सौदा अधूरा लगता है। अब जापान 250 चेरी के पेड़ दे रहा है, तो ट्रंप जी के मन में सहज सवाल उठेगा:
“पेड़ तो ठीक हैं, पर माल कितने टन का है? और इनसे अमेरिका को क्या मिलेगा—टूरिज़्म, इंस्टाग्राम रील्स या अगला चुनाव? ग्रीनलैण्ड न सही जापान अपना एक मझला साइज का टापू ही भेंट कर दे!”
जापान की चेरी के पेड़ भेंट करने की डिप्लोमेसी वैसी ही है जैसी भारत द्वारा 250 जर्दालू (भागलपुरी) आम की टोकरी भेंट करने से होगी।

किर्रू लेवल की जर्दालू डिप्लोमेसी!
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