टुन्नू पण्डित – शैलेंद्र दुबे, मेरे साले साहब; इलाके का इतिहास खोलना शुरू किये हैं अब।
सन 1940-50 में चलता था गोपीगंज के पास तिलंगा से गुड़ से लदा सौ बैलगाड़ियों का काफिला। कलकत्ता जाता था। साढ़े सात सौ किलोमीटर की यात्रा।
रोड़ भी क्या रोड थी। गंगा के कंकर बिछाये जाते थे। एक आदमी धुरमुस से पीट कर उन्हें समतल करता था। तिलंगा से चला कारवां पहला पड़ाव कटका-विक्रमपुर के पास करता था।
बैलगाड़ी के साथ 100-200 लोग और बैल रात गुजारते रहे होंगे – भोर होते ही चल देते होंगे। कैसी और कितनी चहल पहल होती रही होगी!
और यह चल रहा था, तब जब 1860 के दशक में रेल आ चुकी थी।
कब तक चला बैलगाड़ी का कारवां। कब बदलाव हुआ। यह सब सोच कर ही इतिहास जानने का उत्साह मन में जग रहा है।

टुन्नू पण्डित के साथ कई बैठकें होनी हैं अब। एक बातचीत का रिकॉर्डर साथ में रख कर।
टुन्नू पंडित की जय हो!
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