गुड़ से लदी 100 बैलगाड़ी का काफिला

bailgadi caravan

टुन्नू पण्डित – शैलेंद्र दुबे, मेरे साले साहब; इलाके का इतिहास खोलना शुरू किये हैं अब।

सन 1940-50 में चलता था गोपीगंज के पास तिलंगा से गुड़ से लदा सौ बैलगाड़ियों का काफिला। कलकत्ता जाता था। साढ़े सात सौ किलोमीटर की यात्रा।

रोड़ भी क्या रोड थी। गंगा के कंकर बिछाये जाते थे। एक आदमी धुरमुस से पीट कर उन्हें समतल करता था। तिलंगा से चला कारवां पहला पड़ाव कटका-विक्रमपुर के पास करता था।

बैलगाड़ी के साथ 100-200 लोग और बैल रात गुजारते रहे होंगे – भोर होते ही चल देते होंगे। कैसी और कितनी चहल पहल होती रही होगी!

और यह चल रहा था, तब जब 1860 के दशक में रेल आ चुकी थी।

कब तक चला बैलगाड़ी का कारवां। कब बदलाव हुआ। यह सब सोच कर ही इतिहास जानने का उत्साह मन में जग रहा है।

गुड़ लदा बैलगाड़ी कारवां

टुन्नू पण्डित के साथ कई बैठकें होनी हैं अब। एक बातचीत का रिकॉर्डर साथ में रख कर।

टुन्नू पंडित की जय हो!

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अगले दिन 29 जनवरी की सोशल मीड़िया पर पोस्ट –

गोपीगन्ज के तिवारी जी से मैने पूछा – सुना है तिलंगा से कलकत्ता के लिये 100 बैलगाड़ियों का काफिला जाया करता था। गुड़ से लदा हुआ।

तिवारी जी की उम्र 60+ की होगी। उनके बचपन में बैलगाड़ी के कारवां की स्मृति तो नहीं है, पर यह जरूर याद है कि तिलंगा (गोपीगंज से 5 किमी दूर) में जब भी जाते थे, बैलगाड़ियां बहुत दीखती थी वहां। उनके जन्म के एक दो दशक पहले का दृश्य रहा होगा कारवां का।

और गुड़ तो खूब होता था इलाके में। हर गांव में गन्ने की खेती और कई कोल्हू होते थे गन्ना पिराई के। बड़े, पत्थर के कोल्हू!

महराजगंज के बाबा प्रधान ने कहा – जी, वैसा हुआ करता था। बाकी, ज्यादा जानकारी पता कर एक दो दिन में बात करेंगे मुझसे।

बैलगाड़ी का कारवां – 1940-50 का रेलवे का कम्पीटीटर! यह जानकारी मुझे बहुत आकर्षित कर रही है।

टुन्नू पंडित का कहना है – कारवां गांव के पास आता था तो केवटाने की औरतें, सिर पर घास की टोकरी लिये दौड़ लगाती थीं – बैलों को घास चाहिये होता था। दो सौ बैलों के लिये घास! शिवाला के पास मैदान में कारवां रुकता था और बाटी लगा करती थी शाम के समय।

यह सब सुन लिख कर क्या बनेगा जी? इतिहास या उपन्यास? या कुछ लिखने बनाने की काबलियत है जीडी में?

बैलगाड़ी का कारवां शाम को शिवाला पर
बैलगाड़ी का कारवां शाम को शिवाला पर रात्रि विश्राम

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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