बाबा प्रधान की तबियत कुछ नासाज़ थी। सवेरे देर से उठे थे, पर फिर भी मेरे साथ आ बैठे। बातचीत यूँ ही शुरू हुई और देखते-देखते महराजगंज बाजार के बढ़ने की कहानी आगे खुलने लगी—कैसे धीरे-धीरे बुनियादी सुविधाएँ आईं, और पानी जैसी साधारण लगने वाली चीज़ कभी पूरे बाजार की सामूहिक चिंता हुआ करती थी।
ज्यादा पुरानी बात नहीं होगी—आज से कोई तीस साल पहले या उसके आसपास की। हुसैनीपुर-कंसापुर की संधि पर, जहाँ हुसैनीपुर के कोने पर बाबा प्रधान की मेडिकल की दुकान है, उससे दोनों ओर करीब-करीब सौ-सौ मीटर तक बनिया लोग बसे थे—सेठ, चौरसिया, जायसवाल। सड़क तब भी उतनी ही चौड़ी थी जितनी आज है, पर हालत बहुत खराब रहती थी। नालियों की कोई व्यवस्था नहीं थी। बरसात में घुटनों तक पानी भर जाता था।
आसपास तीन-चार कुएँ थे, पर सबका पानी खारा। पीने में दिक्कत, दाल ठीक से नहीं पकती थी और खारे पानी से कपड़े भी साफ़ नहीं होते थे। बाबा प्रधान बताते हैं कि पानी का स्वाद ही नहीं, पानी का असर भी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ता था।
हाईवे के उस पार, करीब पाँच-छह सौ मीटर दूर मंदिर था और उसके साथ जुड़ा तालाब। वह अब भी है। औरतें सिर पर अनाज और कपड़े लेकर वहीं जाती थीं—धोतीं, गीला अनाज और कपड़ा लेकर लौटतीं। पीने का मीठा पानी तो आसपास के गाँवों से आता था। तिउरी और तितराही में सिंचाई के लिए ट्यूबवेल लगे थे। वहीं से लोग सिर पर हंडा रखकर पानी लाते थे।

“मैं तब पचीस साल का रहा,” बाबा प्रधान बोले। “अपने साथी-संगियों के साथ चर्चा की और एक दल बनाया—नाम रखा क्षेत्र विकास पार्टी।” उन्होंने बताया कि वे मेरे श्वसुर जी, पंडित शिवानंद जी, से भी मिले थे, और उन्होंने हमेशा सहयोग और प्रोत्साहन दिया।
इसी बीच एक सज्जन बगल से गुजर रहे थे। बाबा प्रधान ने उन्हें बुलाकर परिचय कराया—
“ये हैं नागेंद्र चौरसिया। मेरे अभिन्न मित्र। साथ-साथ पढ़े हम। औराई के काशीराज कॉलेज से इंटर पास किया। इलाके के लिए जो कुछ किया, इनके साथ किया।”
नागेंद्र जी से परिचय हुआ। बाबा प्रधान के हम-उम्र हैं। आगे उनसे भी विस्तार से बात होगी। ओरल हिस्ट्री के पात्र मिलते जा रहे हैं—और हर पात्र के साथ बाजार का एक नया कोना खुलता है।
बाबा प्रधान आगे बताते रहे—
“हम लोगों ने साइकिलें जुटाईं। तितराही-तिउरी के ट्यूबवेलों से बाल्टियों में मीठा पानी अपनी बस्ती तक लाने लगे। लोगों को लगने लगा कि नौजवान कुछ अपने लिए नहीं, पूरे समुदाय के लिए कर रहे हैं।”
“जायसवाल जी थे—लंबे, स्वस्थ शरीर के, गोरे, बड़ी शानदार पर्सनालिटी। उनके पास एक मारुति ओमनी वैन थी। हमने उन्हें भी पार्टी में जोड़ा। उस समय तेल सस्ता था। हम पाँच-सात लोग कई बार बनारस गए, अधिकारियों से मिले। अनुरोध और विनय की भाषा में बात रखी।”
परिणाम निकला।
सन 1993 में पानी की पाइप लाइन स्वीकृत हुई। जगह-जगह नल लगे। महराजगंज के लिए यह किसी क्रांति से कम नहीं था। कई घरों में पहली बार नल से गिरते पानी को लोग देर तक देखते ही रहे।
“अच्छा, तब पानी की टंकी बन गई थी?” मैंने पूछा।
“नहीं,” बाबा प्रधान बोले। “तब चकापुर में सरकारी ट्यूबवेल था, उसी से सप्लाई आती थी। टंकी तो बाद में बनी। पानी समय-समय पर आता था, पर घर-घर पानी पहुँचना—यह बड़ी बात थी।”
बात देर तक चली। फिर पुनः मिलने का वादा करके विदा हुआ।
बाबा प्रधान जी से सुनने को अभी और भी बहुत कुछ है—महराजगंज बाजार के विकास की यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है।
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