एक जगह बीमारी देवी से बात करती है, एक जगह सिस्टम से, और एक जगह सिर्फ़ माँ से।
मैं दलित बस्ती के समीप रहता हूं। वहां कई बच्चों को माता निकली हैं। माता अर्थात खसरा या मीजल्स। वहां जिंदगी फिर भी चल रही है।
खसरा कोई नई बीमारी नहीं है पर समाज के लिए खसरा आज भी वही है—डर, अनिश्चितता, जुकाम, बुखार, न्यूमोनिया, पलई चलना और माँ की नींद छीन लेने वाली बीमारी। अलग अलग जगह लोग अलग तरीके से इसे डील करते हैं— करते होंगे।
मेरे मन में खसरा के कई दृश्य बनते हैं।
पहला दृश्य तो घर के पास की दलित बस्ती का है। वहां आबादी सघन है, साफ सफाई कमजोर है और बीमारी तेजी से फैलती है। स्वास्थ्य विभाग के लिये तो वह नक्शे में नही है शायद। एमएमआर जैसे टीकों की बात यहाँ सैद्धांतिक लगती है। बीमारी की रोकथाम नहीं है, बस सह लिया जा सकता है।

नीम के पेड़ के नीचे बिटना बैठी है। मिट्टी का दीपक, एक नारियल, कुछ फूल और चार अगरबत्तियाँ। देवी का कोई चित्र नहीं है, पर माई पर विश्वास पूरी तरह मौजूद है। बच्चे को अलग रखा गया है—यहाँ यही आइसोलेशन है। थोड़ी बहुत दवा जुकाम–बुखार की है, भरोसा माता का।
अब चेहरे पर दाने सूख गये हैं। पाँच–सात दिन गुजर गये हैं। बिटना माता की पूजा कर खाली हुई है। कल से काम पर जायेगी।
यहाँ बीमारी ईश्वर का कोप नहीं, बल्कि नियति का एक चरण है, जिसे सामूहिक रूप से झेला जाता है।
दूसरा दृश्य हज़ारों किलोमीटर दूर, मेरी कल्पना में, अमेरिका के एक छोटे से कस्बे का है—मेपलवुड, ओहीयो। यहाँ एक महिला है—एमली कार्टर। वह नीम के नीचे नहीं बैठती। वह स्कूल बस वाले को खबर कर देती है कि बच्चा स्कूल नहीं जायेगा। उसका फोन कान से लगा है, लैपटॉप खुला है। सर्च इंजन पर “measles outbreak near me” लिखा हुआ है। डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय कर रही है एमली। बीमा पॉलिसी चेक कर रही है।
यहाँ बीमारी देवी नहीं है, सिस्टम की समस्या है। एमली की चिंता निजी है, पर उसका समाधान संस्थागत। वह सोशल मीडिया पर लिखती है—“Hope everyone stays safe.”
यहाँ आइसोलेशन एक मेडिकल शब्द है और एमली जानती है कि उसका कितनी कड़ाई से पालन करना है।

तीसरा दृश्य और भी अलग है—बलूचिस्तान का कोई दूरदराज इलाका। कच्ची दीवारों के घर में एक छोटा कमरा। यहाँ गुल बीबी बच्चे को बाहर नहीं निकालती। वह खुद भी बाहर नहीं जाती। दरवाज़ा आधा बंद है—हवा आ सके, पर दुनिया से कोई सम्पर्क न हो।
वह बस अपनी क़िस्मत और अल्लाह की मर्ज़ी के बारे में सोचती है। किसी से कहे भी तो क्या कहे?
यहाँ आइसोलेशन कोई स्वास्थ्य नीति नहीं है। यह भय की नैसर्गिक अभिव्यक्ति है। वह बच्चे को सीने से लगाए बैठी रहती है—जैसे बीमारी से नहीं, अनजान और निर्दयी दुनिया से बचा रही हो। न देवी है, न सिस्टम। सिर्फ़ गुल बीबी के रूप में माँ है, और प्रतीक्षा।

इन तीनों दृश्यों में बीमारी एक ही है—खसरा। वायरस का व्यवहार एक जैसा है। शरीर की प्रतिक्रिया भी (लगभग) समान। लेकिन समाज बदलते ही बीमारी का अर्थ बदल जाता है। कहीं दैवीय विश्वास उपचार है, कहीं व्यवस्था, और कहीं केवल माँ का शरीर।
हम अक्सर विकास को लीनियर समझते हैं—आस्था से विज्ञान की ओर, परंपरा से आधुनिकता की ओर। लेकिन इन तीन माँओं को साथ रखकर देखें तो यह रेखा टूट जाती है। यहाँ कोई “पिछड़ा” या “अगड़ा” नहीं है। यहाँ सिर्फ़ अलग–अलग संसाधनों के भीतर जीती हुई माँयेँ हैं।
भारत की दलित बस्ती की बिटना अकेली नहीं है—पूरा मोहल्ला उसके साथ है। अमेरिकी एमली अकेली है, पर उसके पीछे मजबूत संस्थाएँ खड़ी हैं। बलूच गुल बीबी पूरी तरह अकेली है—न समुदाय, न व्यवस्था। पर तीनों में एक समानता है—अपने बच्चे के लिए लिया गया उनका निर्णय।
खसरा अंततः एक मेडिकल समस्या है, लेकिन माँ के लिए वह पहले एक नैतिक और भावनात्मक प्रश्न है—मैं अपने बच्चे को कैसे बचाऊँ?
एक जगह बीमारी देवी से बात करती है, एक जगह सिस्टम से, और एक जगह सिर्फ़ माँ से।
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