कुंठित लोगों की असहिष्णुता

Old man and Redicule

एआई उनकी बैसाखी बन गया है, तो वे अपने को और भी फूला हुआ पाते हैं।

अजीब किस्म के कॉन्स्टीपेटेड लोग हैं। मानसिक बवासीर के शिकार।
मुझे याद आता है—साल भर पहले मैंने सर्दियों में साइकिल चलाने के बारे में लिखा था। पोस्ट में बस इतना था कि ठंड के बावजूद मैंने एक घंटा साइकिल चलाई। उम्र के हिसाब से कई लोगों ने आश्चर्य और प्रशंसा जताई। पर एक सज्जन ने लिखा—“अंदर रहा कर बुड्ढ़े, नहीं तो जल्दी मर जाएगा।”

कुछ लोग ऐसे हैं जो किसी बुढ़ाते की कोई भी ‘साहसिक’ बात पचा नहीं पाते। उन्हें कब्ज़ हो जाती है। कुछ न मिले तो रिटायरमेंट पर व्यंग कसते हैं, बुढ़ापे में सनकी होने, सठिया जाने, स्मृतिलोप से ग्रस्त होने की बात करने लगते हैं।

कल एक सज्जन ने भारत में “विकसित” एआई मॉडल पर एक लम्बा लेख ठेला। लेख में बात थी, पर कनेक्शन नहीं था—न लेखक से, न पाठक से। जगह-जगह दोहराव, भाषा में सूखापन। पढ़ते हुए लगा कि या तो यह किसी विभागीय प्रेस-विज्ञप्ति से निकला है, या एआई को आदेश दे कर लिखवाया गया है।

एआई के साथ अगर सौहार्दपूर्ण संवाद किया जाए तो वह भाषा-लालित्य के साथ किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति की तरह लिखता है। पर अगर उसे मात्र बाइनरी आदेश दिए जाएँ, तो वह सूखा भूसा परोसता है। उस लेख का कंटेंट ठीक था, पर प्रस्तुति ठीक वैसी ही—भूसे जैसी।

मैंने एक साइट से पूछा—यह मानव का लिखा है या एआई का? उत्तर मिला—81 प्रतिशत एआई। यह बात उन सज्जन को बताई तो वे आहत हो गए। आहत होते ही उन्होंने अपने को महान लेखक घोषित किया और मुझे सनकी व नकारात्मक बता दिया। उनके शब्द थे—

“सनक गए हैं क्या आप? लगता है पहली बार मेरा लेख पढ़ रहे हैं। मैंने खुद दो जगह चेक किया—Quillbot पर 0% और ZeroGPT पर 50% बता रहा है। इतनी समझ तो इस उम्र में होनी चाहिए कि भारतीय भाषाओं में विदेशी मॉडल गच्चा खाते हैं।
मैं उसी तरह लिखता आया हूँ जब एआई चैटबॉट्स आए भी नहीं थे। तकनीकी विषयों पर मैं कॉलेज के समय से लिख रहा हूँ।
इलाज करवाइए अपना। बुढ़ापे में इतनी नकारात्मकता ठीक नहीं।”

old man and redicule
अपमान झेलता बूढ़ा आदमी

मैं ऐसे तथाकथित लिक्खाड़ पत्रकारों से पहले भी मिल चुका हूँ। 2007–08 में, जब हिंदी ब्लॉगिंग की शुरुआत थी, तब इन्हीं लोगों ने अपना मुहल्ला-कस्बा जमा रखा था। यह भी सच है कि उनमें कई संयत और सज्जन हैं, पर कई निहायत बदतमीज़ और भीतर से खोखले भी हैं। इतने वर्षों में लोग बदले नहीं—या शायद और ज़्यादा असहिष्णु हो गए हैं।

अब एआई उनकी बैसाखी बन गया है, तो वे अपने को और भी फूला हुआ पाते हैं। वे यह मान ही नहीं पाते कि कोई और—कोई नौकरशाह, कोई सीनियर सिटीजन—भी लिख सकता है, शब्दों का सधा हुआ प्रयोग कर सकता है, या उनके विपरीत विचार रख सकता है। लिहाज़ा और कुछ न मिले तो नौकरशाह को भ्रष्ट कह देंगे, बूढ़े को सनकी और सठियाया बता देंगे। और अगर वह प्रतिक्रिया दे दे, तो उसके जल्दी दिवंगत होने का शाप भी दे देंगे।

असल समस्या लेखन नहीं है।
समस्या यह है कि कुछ लोग यह स्वीकार नहीं कर पाते कि दुनिया में उनकी आवाज़ के अलावा भी आवाज़ें हैं—और उनमें से कुछ उम्रदराज़, स्वतंत्र और असहमत भी हो सकती हैं।

अजीब कुंठा है लोगों में।

पर, शायद उस बहस में मैं भी बेकार पड़ गया। उम्र का तक़ाज़ा है कि अब कदम नाप कर रखूँ।

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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