बूढ़ा आदमी और दांत का डाक्टर

Old man and Dentist

दांत के डाक्टर साहब और उनकी जूनियर ने मेरे बाँई ओर के दाँतों का अंतिम रेडियोग्राफ शूट कर परिणाम देखा और संतोष की साँस ली। आज की मेरी सिटिंग पूरी हुई।

स्वमित्र, डाक्टर साहब ने पूछा—बाहर जो दद्दा बैठे हैं, उनका क्या मामला है। पहले आ चुके हैं?

खुशबू, जूनियर डाक्टर, ने बताया—नहीं, पहले तो नहीं देखे।

बाहर निकलते निकलते डाक्टर साहब और दद्दा की बातचीत सुनाई पड़ी। दद्दा इलाज का दाम तौलने आए थे और अपने को पर्याप्त गरीब-निरीह दिखाने में सफल लग रहे थे। उन्होंने कहा—
“हमार दंतवा बनई देब्य?” (मेरे दांत बना देंगे?)

उनका कहना था कि भरोसगंज में दांत लगवाए थे। खाते समय दांत गिर कर टूट गए। अब खाना नहीं खा पाते। बड़ी तकलीफ है।

यह साफ़ लगता था कि भरोसगंज में उनका भरोसा उठ गया था। इन डाक्टर साहब के बारे में सुनकर यहाँ आए थे। उन्होंने मुँह खोल कर अपने नीचे और ऊपर के दांत दिखाए। एक-आध दांत ही बचे थे। शायद चबाने के मोलर तो नहीं ही रहे होंगे।

इससे पहले कि डाक्टर अपना ओपीनियन देते, दद्दा ने मुद्दे की बात की—
“केतना लागे? हमरे लगे ढेर बा नाहीं।” (कितना पैसा लगेगा? मेरे पास ज़्यादा नहीं है।)

पूछने पर बताया कि भरोसगंज में एक हज़ार में दांत बनवाए थे। शायद यह अंडरस्टेटमेंट हो। दद्दा हज़ार रुपये को बेंचमार्क बनाना चाहते थे।

डाक्टर साहब ने कहा—
“तोहर हड्डी नाहीं बा जौने पर दांत टिकि सकइ।”

फिर उस वृद्ध की मायूसी का असर रहा होगा कि बोले—
“अच्छा, पाँच मिनट रुकिए। एक बार ध्यान से देख कर बताऊँगा कि कुछ हो सकता है या नहीं।”

खुशबू ने देखा कि मैं इस वार्तालाप में रुचि लेता खड़ा हूँ। वह मेरे लिए एक कुर्सी ले आई। बैठने के लिए।

मैं, पूरी जिज्ञासा के बावजूद, वहाँ रुका नहीं—घर से निकले दो घंटे हो गए थे। पत्नीजी घर पर इंतज़ार करती होंगी। मैं चला आया।

पर मन लगा रहा कि उस वृद्ध का क्या हुआ होगा।
डाक्टर साहब कोई समाधान दे पाए होंगे या नहीं।

अगर रुका होता, तो शायद देख पाता…
आख़िर दद्दा को पूरे दांत नहीं चाहिए थे। उन्हें इतना चाहिए था कि खाना फिर से खाना लगे। मिक्सी, ग्राइंडर, उबाल-छान—इन सबके बीच उनकी दुनिया नहीं थी। एक तरफ़ की चौभर मिल जाए तो रोटी-दाल-भात खा सकें।

आप क्या सोचते हैं—क्या हुआ होगा उस ग्रामीण दद्दा का?
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कभी-कभी लगता है—
कुछ पेशों में यह संभावना हमेशा रहती है कि आदमी
सिर्फ़ अपना काम न करे,
कुछ कहानियाँ भी अपने नोट्स में जमा ले,
भविष्य में लिखने के लिए।
शायद स्वमित्र (डाक्टर साहब) के पास वह संभावना खुली है।

सबस्टेक पर पोस्ट का लिंक – https://gyandutt.substack.com/p/130

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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