मितव्ययता की कवायद

frugal life lecture

प्रधानमंत्री जी ने जनता (पढ़ें: टैक्स भरने वालों) से कहा है कि सोना कम खरीदें, विदेश यात्राएँ टालें, ईंधन बचाएँ और मितव्ययिता अपनाएँ।

हम तो 28 फरवरी को, जिस दिन पिछला गैस सिलिंडर रीफिल हुआ था, तभी से गैस चूल्हे को लगभग दरकिनार कर चुके हैं। तीन महीने बाद भी सिलिंडर आधे से अधिक भरा है। रसोई का अधिकांश काम इंडक्शन और स्लो कुकर पर होने लगा है। खाना दिन में बनता है, इसलिए काफी हद तक सौर ऊर्जा पर ही काम चल जाता है। यह सब प्रधानमंत्री जी के कहने से पहले शुरू हो गया था।

और भी बदलाव हुए हैं। अमेजन से हर महीने तीन-चार हजार रुपये का किराना आता था; इस बार मुश्किल से एक हजार का आया। सब्जी, दूध, डबलरोटी और छोटी-मोटी जरूरतों के लिए अब अधिकतर बिजली की साइकिल ही निकलती है। मसाले घर में पहले से ही पिस रहे हैं। नमकीन खरीदने की बजाय घर में चिवड़ा और मखाना भुनने लगे हैं।

मितव्ययी जीवन

सोच-समझकर जो संभव है, वह कर रहे हैं। हम उस पीढ़ी के लोग हैं जिसने अभाव देखे हैं। महीने के आखिरी सप्ताह रद्दी बेचकर घर का खर्च चलाने वाली मानसिकता के किर्रू लोग हैं हम। मितव्ययिता हमारे लिए कोई नया सरकारी कार्यक्रम नहीं, पुरानी आदत है।

लेकिन जब द इकॉनॉमिस्ट के ताजा अंक में “Pay Taxes, Get Lectures” शीर्षक से व्यंग्य लेख पढ़ा तो मुंह कड़वा हो गया। उसमें लिखा था:

“इस महीने कम से कम एक दिन ऐसा रहा जब दिल्ली के मुख्यमंत्री मेट्रो से चले, मध्य भारत के एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश साइकिल से दफ्तर गए, कश्मीर के एक नेता ने घोड़ा-गाड़ी की सवारी की और बिहार के मुख्यमंत्री अपने कार्यालय तक लगभग पाँच सौ मीटर पैदल चले। भारत के सबसे समृद्ध राज्य महाराष्ट्र के नेता ने शायद सबसे बड़ा त्याग किया—वे इकोनॉमी क्लास में उड़ान भरकर गए।”

व्यंग्य की धार साफ है। समस्या मितव्ययिता के संदेश में नहीं है। समस्या यह है कि त्याग का प्रदर्शन और त्याग का अभ्यास, दोनों अलग-अलग चीजें हैं।

सारा ज्ञान और सारी नसीहतें हम जैसे लोगों के लिए हैं, जो पहले से ही हिसाब-किताब लगाकर जीते हैं। ऊपर के लोग एक दिन का प्रतीकात्मक त्याग करते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, और फिर जीवन अपनी पुरानी पटरी पर लौट आता है। दो दर्जन गाड़ियों का काफिला फिर उसी शान से सड़क पर दौड़ता है।

मितव्ययिता बुरी चीज नहीं है। देश को ऊर्जा बचानी चाहिए, आयात कम करने चाहिए और संसाधनों का सोच-समझकर उपयोग करना चाहिए। पर करदाता को उपदेश से ज्यादा उदाहरण चाहिए।

त्याग का उपदेश सबसे प्रभावी तब होता है जब उपदेशक का त्याग दिखता भी हो।

निष्कर्ष:

“हम मितव्ययिता के खिलाफ नहीं हैं। हम तो उसे जी रहे हैं। तकलीफ तब होती है जब मंच पर त्याग का उपदेश देने वाला व्यक्ति मंच से उतरते ही विशेषाधिकारों की दुनिया में लौट जाता है।”

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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