अवैध खनन की मिट्टी ले जाता ट्रैक्टर नहीं चाहता कि उसकी पारी मिस हो। वह जल्दी में रहता है। ट्रॉली क्षमता से अधिक लादी जाती है। गांव की जर्जर सड़कों पर ट्रैक्टर दौड़ते हैं। थोड़ा भी गड्ढा मिले तो संतुलन बिगड़ सकता है। ऊपर से चलाने वाले अक्सर 17-20 साल के लड़के होते हैं — बिना लाइसेंस, जोश से भरे, पर अनुभव और कौशल में कम।
ऐसे ही एक ट्रैक्टर ने एक लड़की को धक्का मार दिया। चालक को लगा कि गांव वाले पकड़ कर उसकी पिटाई कर देंगे। वह ट्रैक्टर भगा ले चला। आगे सड़क किनारे खड़े एक लड़के पर ट्रैक्टर चढ़ा दिया। पहिया उसके सीने के ऊपर से निकल गया। अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मृत्यु हो चुकी थी।
काम पूरा अवैध था, पर चलता सबकी आंखों के सामने था।
एक गांव वाला मुझे घटना का ब्यौरा दे रहा था। बीच-बीच में खैनी की लार थूकता जाता था और बताता जाता था — “कौन बोलेगा? कौन मरे हुए का पक्ष लेगा? मिट्टी का थोर-बहुत सबको मिलता है। जिसमें जितनी ताकत है, उसको उतना मिलता है। दरोगा, परसासन, परधान, रसूखदार — सबको।”
मैंने पूछा, “पर जो लड़का मरा, वह तो दलित था। दलित संगठन हैं। अम्बेडकर जयंती पर रैली निकलती है। इलाके का विधायक भी दलित है। वे लोग कुछ नहीं कर रहे?”
वह खिसियानी-सी, खोखली हंसी हंसा। शायद मेरी नादानी पर, शायद समाज की दीमक लगी राजनीति पर।
बोला, “सब सरये देवता हयें। मिट्टी खुदवाने वाला हर देवता को जानता है। देवता चढ़ावा पाते हैं। पत्र-पुष्प पाते हैं और खुश रहते हैं। लोगों के बीच उनके लिए फौंकते हैं, पर करते कुछ नहीं।”
मैं कुछ देर चुप रहा।
लोकतंत्र में देवता खत्म नहीं हुए हैं। उन्होंने केवल वेश बदल लिया है। अब वे मंदिरों में नहीं, सिंडीकेटों में रहते हैं। पूजा घंटी से नहीं, हिस्सेदारी से होती है। प्रसाद नकद, मिट्टी, बालू और ठेकों के रूप में चढ़ता है। और जिस व्यवस्था में सबको हिस्सा मिलता हो, वहां न्याय सबसे पहले अनाथ होता है।
कुछ देर बाद मैं अपनी साइकिल उठाकर चल देता हूं।
अब दूर से कोई ट्रैक्टर आता दिखाई दे तो मैं किनारे रुक जाता हूं और उसे पहले निकल जाने देता हूं।

मुझे कुछ हो गया तो कोई देवता मेरी सुनवाई नहीं करेगा।
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