हम बच्चों की आवाज़

मेरा नाम पद्मजा है, मेरी उम्र तेरह साल है, और मैं गर्व के साथ कहती हूँ कि मैं भारत की नागरिक हूँ।। मैं एक ऐसे देश में पलीबढ़ी हू जो अपनी संस्कृति, विविधता और लोकतंत्र के लिए जाना जाता है। बचपन से हमें सिखाया जाता है कि शिक्षा, मेहनत , साहस से हम अपना भविष्य बना सकते हैं। हमें बताया जाता है कि अगर हम ईमानदारी से पढ़ें, लगन से काम करें और अपने सपनों के लिए लड़ें; तो हम जरूर आगे बढ़ेंगे। मैं यह मानती भी हूँ। 

लेकिन आजकल मैं अपने भविष्य को लेकर चिंतित रहती हूँ।

हमारी शिक्षा व्यवस्था में आज भी बहुत सी चुनौतियाँ हैं। परीक्षा और मूल्यांकन को लेकर छात्रों की शिकायतें अक्सर सामने आती रहती हैं। एक छात्रा होने के नाते मैं सोचती हूँ कि जब आज इतने बच्चे अपनी कॉपियों की जाँच और अंक देने की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं, तो जब मैं बारहवीं तक पहुँचूँगी तब हालात कैसे होंगे? क्या मेरी मेहनत का सही मूल्यांकन होगा? क्या हर बच्चे को उसकी योग्यता के अनुसार अवसर मिलेगा? ये सवाल मेरे मन में बार-बार उठते हैं।                               

लेकिन मेरी चिंता केवल अपनी पढ़ाई तक नहीं है।

जब भी मैं गाँव जाती हूं, वहाँ के बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती, बिल्कुल भी नहीं। लेकिन उनके पास वो सुविधाएँ नहीं होतीं जो शहर के बच्चों को आसानी से मिल जाती हैं। कहीं अच्छे शिक्षक नहीं हैं, कहीं बुनियादी संसाधन नहीं हैं, और कई घरों में बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियाँ भी उठानी पड़ती हैं। खाना बनाना, छोटे भाई बहनों को देखना और गाय-बकरियां चराना जैसे काम।

सर्दियों के दिनों में उनको दो घंटे पत्तियां और टहनियां भी बीननी होती हैं। ठंड से बचने के लिये वे अलाव जलाने के काम आती हैं।

तब, लगता है कि एक ही शिक्षा व्यवस्था में दो बिल्कुल अलग दुनियाएँ हैं , एक जहाँ हर सुविधा उपलब्ध है, और दूसरी जहाँ बच्चे बुनियादी चीजों के लिए भी संघर्ष करते हैं।
                                                                                                                                    

मेरे गांव के दोस्तों की फोटो

हम अक्सर सुनते हैं कि भारत जल्द ही दुनिया की बड़ी शक्तियों में शामिल होगा। यह सुनकर अच्छा लगता है। लेकिन मेरा सच्चा मानना है कि किसी देश की असली ताकत उसकी इमारतों, सड़कों या तकनीक से नहीं, बल्कि उसके बच्चों की शिक्षा से तय होती है। अगर इस देश का हर बच्चा अच्छी शिक्षा नहीं पा रहा, तो हमें इस पर गंभीरता से सोचना होगा।

मैंने खुद देखा है कि अमीर परिवारों के बच्चों को बेहतर स्कूल, बेहतर सुविधाएँ और बेहतर अवसर मिलते हैं, जबकि गरीब परिवारों के बच्चे आज भी बुनियादी शिक्षा के लिए जूझ रहे हैं। ऐसा क्यों? शिक्षा तो हर बच्चे का अधिकार है, फिर यह अधिकार सबको समान रूप से क्यों नहीं मिलता?

मैं चाहती हूँ कि सरकारी स्कूल इतने बेहतर बनें कि अमीर और गरीब दोनों परिवारों के बच्चे साथ बैठकर पढ़ें, सीखें और आगे बढ़ें। अगर हम सब एक ही देश के नागरिक हैं, तो शिक्षा में इतना बड़ा अंतर क्यों?
यही सवाल मैं हमारी शिक्षा व्यवस्था और नीति-निर्माताओं से पूछना चाहती हूँ।

आखिर हर बच्चे को समान अवसर कब मिलेगा?


Published by Padmaja Pandey

I am studying in Standard 8th. I am interested in Writing and Debating on Current Issues.

6 thoughts on “हम बच्चों की आवाज़

  1. अपनी उम्र से बहुत आगे की सोच। पद्मजा विलक्षण प्रतिभा की धनी है और उसके माता पिता बाबा दादी सभी अत्यंत भाग्यशाली हैं🪷💐🌹🌹💐🪷

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  2. मुझे लगता है सर, कि आप को इन या ऐसे ही बच्चों को, अगर वह शिक्षा ग्रहण करना चाहते हैं, तो उनको आप थोड़ा शिक्षित करें। शायद ये सबसे अच्छी वापसी होगी प्रकृति को।

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    1. मेरी पत्नीजी कोशिश करती रही हैं। पर अधिकांश बच्चियां खेतों में कटाई, कार्पेट की बुनाई या मटर-मिर्च तोड़ने में लगने में ज्यादा रुचि दिखाती हैं। उससे घर के बाहर निकलने को मिलता है और आमदनी भी।

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