सुग्गी का बड़ा बेटा है गोविंदा। गोविंद बिंद। उसकी शादी तय हो गई थी। वैसे तिलक-छकैया दो बार पहले भी हुआ, पर किसी न किसी वजह से बात अटक गई। पहली बार लड़की अच्छी थी, पर घर बहुत दूर था—चंदौली से भी आगे, करीब सौ किलोमीटर। इतनी दूर की रिश्तेदारी नहीं जमी। दूसरी बार तिलक के बाद ही घर में आपद-बिपद आने लगी। सुग्गी को लगा कि लड़की सहेगी नहीं।
यही तर्क उसने हमें बताया। बाकी अंदर की बात तो वही जाने।
इस बार तीसरी जगह बात बनी। शादी की तारीख भी तय हो गई। दो-ढाई हफ्ते पहले से ही सुग्गी रोज सुबह दूध लेकर आती तो शादी की बातें भी साथ ले आती। मेरी पत्नी से कहती—”दीदी, थोर-बहुत मदद लागे बियाहे में।”
हम जानते थे कि इस अवसर पर वह कुछ न कुछ बिना ब्याज का कर्ज जरूर लेगी। आखिर हमने भी दो किश्तों में उसे कर्ज दे दिया। शादी अच्छी तरह निपट गई। बहू भी घर आ गई। रिश्तेदार आए, कुछ दिन रहे और फिर एक-एक कर लौट गए।
शादी के बाद लगा कि इस पूरे प्रसंग में केवल एक परिवार की कहानी नहीं थी। गांव के सामाजिक जीवन में आ रहे बदलावों की भी झलक थी।
सम्पन्न लोगों में ही नहीं, सुग्गी जैसे अपेक्षाकृत विपन्न परिवारों में भी सामाजिक उत्सवों का स्वरूप बदल रहा है। सुग्गी के दो कमरे के घर में—जहाँ चार लोग, एक भैंस और कुछ बकरियाँ रहती हैं—करीब एक दर्जन रिश्तेदार आ गए थे। उनके साथ उनके छुर्री-भुर्री, बच्चे-कच्चे भी थे।
पहले इतने लोगों का जुटना बोझ नहीं होता था। हर व्यक्ति अपने लिए जगह भी खोज लेता था और कोई न कोई काम भी पकड़ लेता था। अब हर किसी को थोड़ा अपना निजी कोना चाहिए। वह जुटा पाना कठिन होता जा रहा है।
पहले रिश्तेदार शादी में हाथ बंटाने आते थे। अब कई लोग पिकनिक के भाव से आते दिखते हैं। काम करने वाले कम होते हैं, पंचाईत करने वाले ज्यादा। इससे कुनमुनाहट और झुंझलाहट भी बढ़ती है। सुग्गी के यहाँ इसकी झलक साफ दिखी।
संकेत मिलने लगे हैं कि अगली पीढ़ी में सुग्गी जैसे लोग भी रिश्तेदारों को ठहराने के लिए छोटा-मोटा होटल या सामुदायिक भवन तलाशेंगे। उनके समाज में ही कोई सस्ते में भोजन बनाने का ठेका लेने लगेगा। विवाह के सामाजिक-सांस्कृतिक अनुष्ठान भी छोटे होंगे और उनका रूप भी बदलेगा।
मोबाइल और यूट्यूब भी इस बदलाव में अपनी भूमिका निभाएंगे। रस्में कैसी हों, सजावट कैसी हो, क्या जरूरी है और क्या नहीं—इन सब पर अब गांव का अनुभव अकेला निर्णायक नहीं रहेगा।
विवाह बदल रहा है, क्योंकि लोगों की जीवन शैली बदल रही है।
शादी के बाद का अध्याय भी कम रोचक नहीं है। विवाह के दो दिन बाद ही गोविंदा काम पर बनारस चला गया। काम की अहमियत बढ़ गई है। घर में एक नया सदस्य आया है। शादी के लिए लिए गए कर्ज चुकाने हैं। बहू के हिसाब से घर में भी कुछ बदलाव करने हैं।

गोविंदा को दहेज में मोटरसाइकिल मिली है। उससे वह गांव में रहते हुए बनारस जाकर काम कर सकता है। मोटरसाइकिल अब केवल स्टेटस सिंबल नहीं रही; वह रोजगार का सुविधा-यंत्र भी बन गई है।
मैं गांव के जितने परिवारों को देखता हूँ, उनमें से अधिकांश—अपने अभाव, गरीबी और समग्र सोच की अस्पष्टता के बावजूद—लटपटाते, लड़खड़ाते, जद्दोजहद करते हुए भी — अपनी स्थिति पहले से बेहतर बना रहे हैं। बहुत कम परिवार ऐसे दिखते हैं जो सम्पन्नता की सीढ़ी से नीचे उतर रहे हों।
सुग्गी और गोविंदा का परिवार भी फिलहाल उसी दिशा में आगे बढ़ता दिखता है। अब परिवार में एक नया सदस्य भी जुड़ गया है। देखते हैं, आने वाले वर्षों में यह बदलाव किस दिशा में और कितनी तेजी से जाता है।
सुग्गी रोज मेरी पत्नी से बतियाने चली आती है। इसलिए इस परिवार में होने वाले बदलावों का पता चलते रहने की पूरी संभावना है।
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